राजेश ने जान ली नहीं, खुद दे दी

आज दैनिक जागरण, कानपुर के परिसर में जहर खाने वाले राजेश वाजपेयी की मौत हो गई. वे प्रसार विभाग में कार्यरत थे. कोई उन्हें असिस्टेंट मैनेजर पद पर आसीन बता रहा तो कोई सीनियर एक्जीक्यूटिव. कोई कह रहा है कि वे सरकुलेशन मैनेजर की प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या को मजबूर हुए तो कोई उन्हें किसी घोटाले में फर्जी फसाए जाने व हर महीने सेलरी इसी कथित घोटाले के बदले में काटे जाने के चलते दुखी होकर मौत को गले लगाने को कारण बता रहा है.

वजह जो भी हो, पर किसी अखबार के दफ्तर में आंतरिक राजनीति से परेशान होकर आत्महत्या करने की यह संभवतः पहली घटना है. इस घटना ने जागरण के निकम्मे मैनेजमेंट, अंधे मालिकों, नाकारे वरिष्ठों की पोल खोलकर रख दी है. शुचिता, हिंदुवाद, नैतिकता, परंपरा की बातें करना वाला दैनिक जागरण अंदर से कितना गिरा हो सकता है, यह बताने के लिए राजेश वाजपेयी का आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना ही काफी है. कोई आदमी मरने के लिए तभी तैयार होता है जब वह यह मान ले कि उसकी सुनवाई किसी स्तर पर नहीं होनी है, मालिकों के लेवल पर भी नहीं. उम्मीद करते हैं कि राजेश की मौत के बाद जागरण अपने इंप्लाइज की मनोदशा व भावना को समझने वाले किसी सिस्टम को डेवलप करेगा ताकि आखिरी हथियार के बतौर कोई आत्महत्या को आजमाने के अलावा अन्य विकल्पों पर विचार कर सके, और न्याय पाने की उम्मीद उसके अंदर बची रहे. लेकिन जागरण के मालिकों के पास इतना कुछ सोचने के लिए वक्त कहां है. कंपनी व कंपनी के अंदर के सिस्टम को साफ्ट, ट्रांसपैरेंट, ह्यूमैनीटेरियन बनाने के लिए वक्त व विजन चाहिए. भगवान ने विजन दिया है तो सिर्फ रुपया गिनने भर, वक्त दिया है मजदूरों के बीच गंदी पालिटिक्स करने-कराने के लिए और एक मंदबुद्धि बॉस की माफिक खटने-खटाने के लिए.

दरअसल, जागरण के मालिक किसी प्रोफेशनल के हाथों में यूनिटों को सौंपने की जगह खुद ही किसी कार्यकर्ता की तरह, संपादकीय प्रभारी की तरह, प्रसार मैनेजर की तरह, मार्केटिंग हेड की तरह निचले लेवल पर जाकर काम करते हैं और इस प्रक्रिया में वे उन्हीं आग्रहों-दुराग्रहों के शिकार होते हैं, जैसा कोई उनका इंप्लाई होता. वे मनुष्य बने रहने की जगह घनघोर काम निकालू बास बन जाते हैं, और, शायद वह काम निकालू बास भी ठीक से नहीं बन पाते हैं क्योंकि उनके इर्द-गिर्द जो चापलूस मंडली इकट्ठी हो जाती है, उससे परे वे कुछ भी सुन-समझ नहीं पाते. और, भगवान ने वैसे ही इन बनियों को सोच-समझ सिर्फ इतनी भर दी है कि वे अपने धंधे में बिजनेस, नोट व पूंजी की मात्रा उच्च गति से बढ़ा सकें.

जिस दैनिक जागरण का चेयरमैन कानपुर में सड़क पर पीटा जाता हो, पुलिस द्वारा, उस दैनिक जागरण, कानपुर की हालत को खुद ब खुद समझा जा सकता है. जिस दैनिक जागरण, कानपुर का संपादक मीटिंग में गालियां बकता हो और बदले में अपने अधीनस्थों की तरफ से गालियां सुनता हो, जिस दैनिक जागरण, कानपुर का प्रसार मैनेजर लालावाद में अंधे होकर व पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर अपने गैर-लाला अधीनस्थों से व्यवहार करता हो, उस आफिस में अगर कोई आत्महत्या कर ले तो यह बहुत असंभव सी बात नहीं है. जाने कितनी निर्दोष व ईमानदार जानें व जन दैनिक जागरण, कानपुर के परिसर में मौत व जिंदगी के बीच हर रोज झूलती होंगी. लेकिन इन ईमानदार लेकिन डरपोक जानों-जनों की आत्मा किसी अज्ञात भय से अपना मुंह नहीं खोलती, राजेश वाजपेयी की शहादत के बाद भी. जी, शहादत ही कहेंगे इसे, भ्रष्ट व्यवस्था से आजिज आकर एक ईमानदार द्वारा जान दे देना. अगर राजेश थोड़ा भी बेईमान होता तो पहले उसको गोली मार देता, जिसके कारण वह दुखी था, फिर वह अपनी जान देता. लेकिन वह बेहद ईमानदार था, उसने किसी को नुकसान पहुंचाए बिना खुद के  प्राण ले लिए.

यह ईमानदारी अच्छी नहीं राजेश. इतने भले न बन जाना साथी, जैसे सर्कस का हाथी. राजेश के जान देने की खबर शायद कानपुर के किसी अखबार में न छपे क्योंकि लालाओं के बीच प्रबल एकता होती है. लेकिन हम मीडियाकर्मी राजेश की मौत को यूं ही नहीं ठंडा पड़ने देंगे. उसके ‘हत्यारों’ का पता लगाएंगे. उसे आत्महत्या के लिए मजबूर करने वालों को बेनकाब करेंगे. इसके लिए चाहे जो कीमत चुकानी पड़े. राजेश के परिजनों के आर्थिक संकट भी नहीं आने देंगे. जागरण राजेश के परिजनों को फूटी कौड़ी भी न दे, ऐसा भी संभव है. ऐसे में हमको आपको ही आगे आना पड़ेगा क्योंकि जागरण के मालिक जब मरेंगे तो अपने साथ ढेर सारा रुपया भी बांधकर ले जाएंगे, इसलिए वे किसी इंप्लाई को मरने-कटने पर बिना सूद का एक पैसा भी नहीं देते. चलिए, हम आप खुद को तैयार करें, राजेश के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ने के वास्ते.

इस प्रकरण के बारे में बहुत कम सूचनाएं हम लोगों के पास हैं. राजेश की तस्वीर, उसके बारे में विस्तृत जानकारी, उसकी मनोदशा, उसके अतीत के बारे में कानपुर का कोई साथी अगर विस्तार से हमें बता सके, तो हम उनके बहुत आभारी होंगे. वैसे भी ये लड़ाई कोई एक नहीं लड़ सकता. सबको अपने-अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार रहना चाहिए. आज पहली जरूरत यही है कि राजेश व उनकी मौत के कारणों के बारे में हम ज्यादा से ज्यादा जानकारी हासिल कर सकें. मेरा निजी संर्पक नंबर व मेल आईडी नीचे है. आपकी मेल का इंतजार रहेगा.

यशवंत सिंह

संपादक

भड़ास4मीडिया

दिल्ली

संपर्क- 09999330099, yashwant@bhadas4media.com

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Comments on “राजेश ने जान ली नहीं, खुद दे दी

  • dhirendra pratap singh says:

    mitra yashvant ji ye khabar pad kar bahut dukh hua dukh ki is ghadi me ham log apke sath h aur aap rajesh relif fund banao ham sab usame madad ki ahuti dalenge.
    bhai sahab aap ne jitni bate likhi h jagran me usase bhi kahi adhik gandgi h.khair over night koi kranti nahi hoti isliye aap is ko 1 muhim ke tour pr chhede nischit hi bhavisy me bejuban patrakar apne adhikaro ke liye khade honge aur aane vali patrakarita ki pidi apko iske liye dhanyavaad degi.—-dhirendra pratap singh

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  • shashank bajpai says:

    dear yaswant ji

    its very sad news after all this gental guy worked under my supervision also in DJ
    why its happened there is not only due to directors this is due to bad managers operating only self centered .
    my opinion is HOD is just like father of family but due to work pressure and news paper treated as product, bcz my opinion is its habbit it can not be changed by pcc modules by self estemmed proffesionals .
    BUT ITS VERY SHAMEFUL FOR MANAGERS OF INDUSTRY.ONE FAMILY SURVIVE FOR THE SAME DUE TO PERSONAL INTREST OF MANAGER LIKE DURGESH .
    IF ILLITERATE PERSONS PROMOTED LIKE THIS THAN GOD WILL SAVE THESES SUBORDINATES.
    I KNOW RAJESH VERY WEL & HE WAS VERY CLOSE TO ME ,HE WAS SO
    GENTEL & DISCIPLINED BOY I HAVE NOT SEEN IN MY LIFE & CARRIER BOTH.
    I AM VERY SAD TODAY CANT EXPRESS MY FEELINGS IN WORDS.
    RAJESH I AM VERY SORRY I TEACH U LESS .
    SHASHANK BAJPAI
    9415075160

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