गुडबाय दिल्ली (5)

धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने दिल्ली से उजड़ते वक्त अपनी राम कहानी तफसील से सुनाई। कैसे वे दैनिक जागरण आए और किस तरह उनकी तारीफ के पुल बांधे गए। पर समय बीतने के साथ ही सब उन्हें भूल गए। एक कर्मठ कार्यकर्ता की तरफ धर्मेंद्र दिन-रात लगे रहे। किसी गोल-गैंग के हिस्से नहीं बने। किसी का गलत माना नहीं, किसी से गलत करने के लिए कहा नहीं। जो भी था, उसी में खुशहाल रहना चाहते थे। साथ के लोग आगे बढ़ते गए पर धर्मेंद्र वहीं के वहीं बने रहे। न पद बढ़ा न पैसा। काम जरूर घटता-बढ़ता रहा। इंचार्ज जरूर बदलते रहे। खुद ही पढ़ लीजिए आप धर्मेंद्र की राम कहानी का अगला हिस्सा….

-एडिटर, भड़ास4मीडिया


बड़ी जिम्मेदारी के लिए तैयार रहो : संजय गुप्ता

शानदार सीवी और उसमें दर्ज विशेषज्ञता की तारीफ जागरण के संपादक संजय गुप्त जी ने भी 2004 में ज्वाइन करने के बाद की थी। उस वक्त उन्होंने बड़ी जिम्मेदीरियों के लिए तैयार रहने की बात सीजीएम श्री निशिकांत ठाकुर जी, प्रबंधक सतीश मिश्र जी, तत्कालीन समाचार संपादक श्री राजीव सिंह जी व प्रबंधन के ही अंग श्री अरुण सिंह जी व सुदामा पाठक के सामने कही थी। कहा था, राजीव, कहां से ढूंढ के लाए हो भाई, इस लड़के को, (मेरी तरफ देखकर) तन के खड़े हुआ करो, किसी के सामने ज्यादा झुकने की जरूरत नहीं है। इतनी डिग्रियां…., क्या एक के साथ एक फ्री थीं क्या!!!! बहुत दिनों के बाद ऐसा सीवी देखा….

चूंकि बड़ा स्टाफ था, लिहाजा यह बात सभी को भूलने में ज्यादा देर नहीं लगी और आई-गई हो गई, पर मेरा मानना है कि यह न्यूज एडिटर का विषय था। उनका मुझ पर एहसान है कि अमर उजाला, जालंधर में तत्कालीन समाचार संपादक के गिरेबां तक पहुंच जाने के बाद भी उन्होंने सीजीएम से मेरी ढेर सारी खूबियों का उल्लेख कर प्रशंसा करते हुए मुझे दिल्ली में बैठने की जगह दिलाई। लेकिन इस दौरान मेरे और उनके बीच में दलाल लग चुके थे। इन दलालों को मैंने कभी बर्दाश्त नहीं किया। कथित द्वितीय पंक्ति का शठे-शाठ्यम समाचरेत का कार्यक्रम जारी रखा। राजीव सर 1999 से 2000 के बीच करीब छह माह तक जालंधर में मेरे बास रह चुके थे। गलतियों को माफ करते थे और 24 घंटे में छह फोन करके दिल्ली बुलाया था। उनके जालंधर से लौटने के बाद मेरे लिए यही काम किया श्री शिव कुमार जी विवेक ने।

दलालों के कारण ही जागरण में साढ़े पांच साल तक न्यूनतम एंक्रीमेंट मिला और पदोन्नति एक भी नहीं। भले ही इसके लिए इमीडिएट को जितने लोगों के पैर छूने पड़े हों क्योंकि राजीव भैया इस दौरान भास्कर, लुधियाना जा चुके थे। उसके बाद जो भगदड़ मची थी, तब बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा था और सभी को एक प्रमोशन दिया गया था तो न जाने कौन-कौन डीएनई, चीफ सब और सीनियर सब एडिटर बन गए। आज मुझे लगता है कि काका के साथ ही जालंधर, उनके मना करने के बाद भी, छोड़ देना चाहिए था क्योंकि क्लर्कियल जर्नलिज्म में मैं सिर्फ तीन ही साल के लिए गया था। काका को शायद याद हो कि जाने के एक दिन पहले रात को ढाई बजे के बाद इस्तीफा भी लिखकर चरणों में रख दिया था। उन्होंने आंखों में आंसू भरकर कसम दी थी कि मुझे भावुक न करो, जरा-सा भी दिल में मेरे लिए सम्मान हो तो अमर उजाला अभी न छोड़ना। तुम्हारे लिए कुछ कर नहीं पाया। उन्होंने इस्तीफा फाड़कर डस्टबिन में फेंक दिया था। काका मेरे लिए मेंटर की तरह हैं और मेंटर को मरते दम तक भूलने की परंपरा मेरे यहां नहीं है।

दलालों से हार गया

काका के तीनों बेटे मेरे पैर छूते थे, पर दलालों ने उस दरबार से भी मुझे बाहर करवा दिया। काका को शक करवाया गया कि डा. अजय शर्मा जालंधर के उपन्यास की पांडुलिपि में सुधार कोठी नंबर तीन में (हमारा निवास) किए गए हैं। उसमें तीन लोग और भी रहते थे, चूंकि आज विभिन्न मीडिया घरानों में अच्छे पदों पर हैं, इसलिए नाम नहीं दे रहा हूं। हां, उन्होंने उपन्यास पढ़ा था, लेकिन मैंने नहीं। इस कारण डा. शर्मा नाराज भी रहे। काका शायद भूल रहे हैं कि उसमें एक पात्र (सुनी-सुनाई बात) है, जिसके बारे में कहा गया है कि वह 1000 किलोमीटर दूर से अपने आम के बागानों से पेटियां लाकर संपादक के घर पहुंचाता था। काका ने जिसे चाहा, उसे सीधे जूनियर सब एडिटर रखा। कुछ लोग जादूगर थे, जो चंद माह में ही जूनियर सब बन गए, पर मैं इतना भाग्यशाली नहीं था।

अमर उजाला के नियमों के मुताबिक उन्होंने मुझे पूरे दो साल में ही जूनियर सब बनाया। यह दीगर बात है कि उन्होंने 1/4 पंजाब का दायित्व मुझे चंद माह पहले से ही सौंप रखा था। काका निक नेम और प्रेम से अभिभूत होकर मैंने धैर्य का दामन नहीं छोड़ा और लगा रहा। इस दौरान संजीव क्षितिज जी को मैंने नोएडा कार्यालय करीब चार दर्जन लेख भेजे, पर उन्हें चार ही पसंद आए। संभवतः उनके मानक सख्त रहे होंगे। साथ ही बड़े-बड़े हस्ताक्षरों के साथ प्रतियोगिता भी थी। प्रियंका गांधी के बेटा पैदा होने पर सड़कों पर जो फूहड़ प्रदर्शन हुआ था, वह मेरी नजर में चाटुकारिता की हद थी, सो लिख मारा था…. राजनीतिक मामाओं का भांगड़ा। इस पर जम्मू से लेकर वाराणसी तक से परिचितों से चार फोन आए, चिट्ठियां आईं, तबीयत खुश हो गई। काका के जालंधर छोड़ते ही यदि मैं निकल लेता तो आज मैं भी दूसरे साथियों की तरह डीएनई होता, लेकिन यह सब अकु श्रीवास्तव और राजीव सर के बिना संभव नहीं था।

अकु के एक झूठ और पर्सनल लोन लेकर सेकेंड हैंड कार खरीदने के बाद पूछे गए एक सवाल ने अंदर से तोड़ दिया था, कथित अधिकारियों से विश्वास उठ चुका था, फिर भी राजीव सर की सारी बातें मैं मानता रहा, पर वह दूसरे के चश्मे से ही हमें देखते रहे, वरना प्रमोट हो गया होता। उनकी एक बात ने बहुत निराश किया। मैनेजमेंट को वह 10-11 अगस्त को ही अपने जाने के बारे में बता चुके थे और 13 अगस्त को सेक्टर-आठ के आफिस के गेट पर अपनी कार के पास हमसे कह रहे थे कि तो हुं-हुं–तुम्हारा प्रमोशन कर दिया जाए…। उन्हें कहना चाहिए था कि हां, धर्मेंद्र तुम्हारा प्रमोशन नहीं कर पाया। वैसे उन्होंने ऐसे लोगों को भी प्रमोट किया था, जो किसी कारपोरेट हाउस के चपरासी बनने लायक भी नहीं थे। हालांकि जागरण आज भी कारपोरेट हाउस नहीं बन पाया है।

तबादला नीति नहीं है तो बनाइए या फिर इस्तीफा लीजिए

रोज-रोज ग्रुप बदलना स्वभाव में नहीं था यानी पेशे में रहते हुए भी पेशेवर नहीं था, सो अमर उजाला की तरह जागरण में भी कई साल तक लगा रहा। इस दौरान वीओआई चैनल में 25000 रुपये पर सेलेक्शन हो गया, पर दिल्ली से मेरे बच्चे घर जा चुके थे। बेटे उत्कृष्ट वर्द्धन सिंह का एडमीशन भी उन्नाव में हो चुका था। माता-पिता और बूढ़े हो चले, लिहाजा दो जून 2008 को वीओआई ज्वाइन करने के बजाय काका से आग्रह किया कि अग्रज सदृश अवधेश गुप्ता जी की तरह वह मेरा भी कानपुर जागरण में ट्रांसफर ले लें। वह तैयार हो गए और बोले कि तुम्हारा काम मैंने इतने दिन देखा है, ले लूंगा। वीओआई सहित पूरा मामला नोएडा जागरण के वरिष्ठ समाचार संपादक विनोद शील सर के घर जाकर रखा तो उन्होंने साफ कहा कि मैं झूठा वादा नहीं कर सकता, सीजीएम साहब के सामने पूरा मामला रखो। वैसे सुझाव है कि पैकेज ठीक है तो माता-पिता को यहीं लाकर रखो।

मैंने विनम्रता से मना कर दिया क्योंकि सोच यही थी कि 60-70 साल के पुराने बरगद को एक जगह से उखाड़ कर दूसरी जगह रोपने की तकनीक अभी कम से कम अपने देश में नहीं है। मेरी शक्ल देखे बिना ही सीजीएम सर ने चिट्ठी को अग्रसारित कर दिया। वीओआई में ज्वाइनिंग को मैंने लिंगर आन किया और दीवाली तक खींचने में सफल रहा, तब तक वहां की बातें छनकर बाहर आने लगी थीं। बहुत इंतजार किया, पर वह दिन डेढ़ साल से अधिक समय बीतने के बाद आज तक नहीं आया और काका अब जागरण में लखनऊ भेज दिए गए। हालांकि जागरण मेट्रोपोलिटन एलाउंस नहीं देता है, फिर भी मैंने यहां तक लिखकर दे दिया कि 10 से 20 प्रतिशत तक वेतन काटकर भेज दिया जाए, फिर भी बात नहीं बनी। इस्तीफा देकर वहां ज्वाइन करने की बात आती तो भी मैं तैयार था। इससे ज्यादा मैं क्या कर सकता था।

अब जागरण नोएडा में साढ़े पांच साल हो चुके हैं तो जागरण में कर्मियों के एकमात्र हितैषी सीजीएम साहब से मैं यही कहना चाहूंगा कि किसी जरूरतमंद के लिए यदि तबादला नीति नहीं है तो तैयार करवाइए, वरना भड़ास के ही माध्यम से मेरा त्याग पत्र स्वीकार कीजिए।

मेट्रोपोलिटन जिंदगी, जागरण, दफ्तर के ईश्वर

दरअसल मैं इन तीनों ही चीजों से किशोरावस्था से ही एलर्जिक था। जागरण को कभी मैंने एक संपूर्ण अखबार नहीं माना क्योंकि उस वक्त भी संपादन पर ध्यान नहीं दिया जाता था। हैरत की बात है कि आज भी कोई संपादन पर जोर नहीं देता है। उप संपादकों की जरूरतें पूरी नहीं हो रही हैं, वे बच्चों की पढ़ाई और घर के खर्च का हिसाब लगाने में पड़े रहते हैं, फिर संपादन में मन कौन लगाएगा, राम लाल। इसके लिए प्रबंधन भी कम जिम्मेदार नहीं है क्योंकि दो गुट तो हैं ही, एक कानपुर, दूसरा बिहार। तीसरा गुट लखनऊ और अन्य का मान लीजिए, जो काम पर भरोसा करके चुपचाप आसमां के ईश्वर से प्रार्थना करते रहते हैं कि हे प्रभु, इस बार ठीक-ठाक एंक्रीमेंट लग जाए क्योंकि दफ्तर में उनका कोई ईश्वर नहीं होता है। मेरे और कानपुर के बीच में सिर्फ गंगा जी हैं, पर कानपुर ने कभी अपने गुट के लायक मुझे समझा नहीं और मैंने भी इसके लिए चरण वंदना नहीं की।

इसके अलावा प्रबंधन विज्ञापन और प्रसार विभाग वालों को सगा मुलाजिम मानता है और बाकी को सौतेला। अरे साहब प्रोडक्ट टीम वर्क का नतीजा है। बाकी मुलाजिमों में जोश कहां से आएगा, जब सगों को साल में दो एंक्रीमेंट मिलेंगे और सौतेलों को 19 माह में एक। अकु की अभद्रता व अराजकता (जालंधर) ने इन दो चीजों के निकट मुझे ला खड़ा किया। इसमें सर्वाधिक योगदान जिनका था, वह हैं वन ऐंड ओनली राजीव सर। मैं देसीपन छोड़ नहीं पाया और डेलहाइट बनने की न तो इच्छा थी और न ही क्यों-म्यों बनने की कोशिश की। यैंकी-शैंकी न लोग पसंद थे और न ही जीवन।

मेरा मानना है कि दिल्ली और पत्रकारिता में रहने व तरक्की के लिए थोड़ा सा कमीनापन, थोड़ी धोखाधड़ी, झूठा व फरेबी होना निहायत जरूरी है, जो कि खून में नहीं था और खून से समझौते का तो सवाल ही नहीं पैदा होता। चाहे नौकरी एटीन क्या एटी थाउजेंड की होती। यही सब अगर इमीडिएट बास के साथ किया होता तो यदि वह आज डीएनई हैं तो मैं भी चीफ सब जरूर होता और दिल्ली में रहने लायक पगार मिल रही होती। लिखना चाहूंगा कि दिल्ली हर एक के लिए नहीं है, जो गलती से इधर आ गया हो और जाना चाहे, उसे भेजने में कौन सी कला आड़े आती है, कम से कम मुझे नहीं पता। इतने कम पैसे में दिल्ली में जीना सभी नहीं सीख पाते हैं। आज 12 साल से अधिक समय पत्रकारिता में हो चुका है। किस-किस को खुश रखूं, किसकी-किसकी चिलांडुगीरी करूं और आखिर कब तक। उम्र हो चली है, बेटी मांडवी वर्द्धन सिंह भी तीन साल की हो गई है। 20 साल बाद शादी करनी है, इसी तरह दफ्तर के ईश्वरों पर निर्भर रहा तो कहां से तब आएंगे 20 लाख रुपये। जब बचत ही नहीं है तो फिर निवेश की बात करना ही बेमानी है।

पारदर्शिता का अभाव, अग्रलेख और शराब

मेरा मानना है कि जागरण क्या अधिकांश समूहों में पारदर्शिता का अभाव है और न जाने कैसे-कैसे लोग बैठा दिए जाते हैं ऊंची व गद्देदार कुर्सियों पर। पता नहीं कब का जमाना लद गया काम करके आगे बढ़ने वालों का। बचे हुए लोगों से यही कहूंगा कि अपनी मार्केटिंग कर पाओ सक्षम व्यक्ति के आगे तो इस फील्ड में रहो, वरना धंधा बदलने में बुराई ही क्या है। पत्रकारिता कौन सा मिशन रह गई है आज की तारीख में। करो तो करो, वरना मेरी तरह घर जाओ क्योंकि कहीं कोई पारदर्शी सिस्टम ही नहीं है। जागरण में तो वैसे भी चमचों का ही बोलबाला रहता है, काम का मूल्यांकन करने वाला कोई है ही नहीं। मुझे ही ले लीजिए, खेल भी देखता था, साथी के छुट्टी जाने या प्रायः बैक पेन के कारण बेड रेस्ट के दिनों में।

यूपी का ट्रैक (मेरठ से लेकर वाराणसी तक) तो हम पर ही पूरे 2007 में निर्भर रहा। इसके अलावा राजधानी का द्वितीय अग्रलेख भी साथ में रोज मैंने ही साल भर लिखा और जब एंक्रीमेंट हुआ तो मैं नीचे से नंबर दो पर था। डबल प्रमोशन व एंक्रीमेंट दूसरों का हुआ। झुंझलाहट में लिखना छोड़ दिया और राजीव सचान सर के निकट आने का मौका भी हाथ से चला गया, वरना प्रायः वह और शील सर पूछते थे कि आज किस पर लिख रहे हो, दरअसल एक दिन सचान सर और मैंने, दोनों ने ही शिक्षा पर ही लिख मारा था। जागरण प्रबंधन को सोचना होगा कि रीति और नीति से जुड़ा यह मामला दूसरी पंक्ति के लोगों का है या फिर तीसरी और चौथी के।

क्या जागरण का कोई डीएनई रोज यह जिम्मेदारी उठाने में सक्षम नहीं है। यदि नहीं तो फिर उनका टेस्ट होना चाहिए। प्रबंधन उन्हें मजबूर करे या मेरी तरह बाहर का रास्ता दिखाए। वे जूनियर से खुलकर, पूरी बेशर्मी से दारू मांगते हैं। यदि दे दो तो उल्टी-सीधी मदद के लिए भी तैयार रहते हैं। ठीक उसी तरह, जैसा शायद कभी किसी खूब भरी हुई ट्रेन में आपने भी देखा हो और टीटीई के पास एक भी बर्थ न हो, फिर भी एक घूंट यदि किसी तरह आप उसे गटकवाने में सफल रहे तो वह फिर गंतव्य तक शिथिलासन या शीर्षासन में जाएगा और आप उसकी बर्थ पर लेटकर। रात 11 बजे रघुवंशी सर के निकलने के बाद कम से कम 11 लोग दारू पीए हुए सेक्टर-63 नोएडा के आफिस में मिल जाएंगे, फिर न जाने कैसे यह कंपनी तरक्की कर रही है।

एडवरटोरियल, खास चेहरे, डिस्क स्लिप प्राब्लम

मेरे लिए एक इशू है, किसी के लिए हो या न क्योंकि जनरल डेस्क का एडवरटोरियल में कोई योगदान नहीं होता था। उनसे सौ गुणा ज्यादा परेशानी उठाते थे पुलआउट के लोग और मलाई काट ले गए वहां के चंद लोग। बोनस की परंपरा तो पहले से ही बंद है। गुड़गांव-रेवाड़ी की लोकसभा सीट साझा थी, सो वहां से 30 हजार रुपये एडवरटोरियल के रूप में चुनाव के बाद आए। दोनों डेस्क पर कुल पांच लोग थे। बीचो-बीच में मैं बैठता था। बाएं बैठने वाले दोनों लोगों को दो-दो हजार रुपये मिले और दाएं बैठने वालों को, पर मुझे नहीं। यह रकम केबिन में बुला-बुला कर जब दी जा रही थी तो एक डीएनई महोदय भी वहां बैठे थे, जिनकी करतूतों की वजह से अरसे से बोलचाल बंद थी। मैं उन्हें ही वजह मानता हूं। कई माह तक कुछ नहीं कहा, पर सोचा कि ठाकुर से ठकुरई कैसी तो वरिष्ठ समाचार संपादक श्री कमलेश रघुवंशी जी से पूरी बात बताई तो उन्होंने आश्वासन दिया कि विधानसभा चुनाव में व्यवस्था कर दूंगा। हालांकि तत्कालीन डेस्क इंचार्ज प्रह्लाद वर्मा जी ने बडे़ भाई होने का हवाला देकर 500 रुपये जेब में जबरन डाल दिए थे।

अब रुपये बचे 22 हजार, जिसका बंदरबांट जनरल डेस्क पर ऐसे लोगों के बीच हुआ, जिनकी जिम्मेदारी में दूर-दूर तक एडवरटोरियल छापना था ही नहीं। सुनते हैं कि इस पैसे से दारू की कई पार्टी हुईं, पर उस शख्स को पांच पैसे नहीं दिए गए, जो आज के सात साल पहले हरियाणा के लीडिंग पेपर हरिभूमि का डीएनई था और मेरे मना करने के बाद से आज तक द्वितीय अग्रलेख लिखने की जिम्मेदारी उठा रहा है। मुकेश पंडित जी सिर्फ सीनियर सब हैं और दो बच्चे कालेज जाते हैं या प्रोफेशनल कोर्स कर रहे हैं। तीसरे की गले में कैंसर होने के कारण साल भर पहले ही बड़ी मुश्किल से जान बची है। संपादकीय सहयोगियों ने यथा शक्ति चंदा दिया, तब कहीं घर चला। आपरेशन और इलाज के दौरान जागरण मदद कर सकता था, खाते में तीन माह तक वेतन भेजकर, जो कि प्रबंधन ने नहीं किया। नाम नहीं लिखूंगा, पर तीन साल में कम से कम तीन लोग ऐसे ही बीमार पड़े हैं तो दो-तीन माह तक उन्हें लीव विदआउट पे नहीं किया गया। ऐसे में मैं भी कोई उम्मीद नहीं पाल सकता।

करीब तीन माह से कमर दर्द (डिस्क स्लिप) से पीड़ित हूं और डाक्टर की सलाह पर बेड रेस्ट पर हूं। बीच में कुछ दिन ड्यूटी गया, पर दोबारा जांच कराने पर फिर रेस्ट की सलाह दी गई है। दो बार मेडिकल सर्टिफिकेट फैक्स करने के बाद भी एक भी मेडिकल लीव नहीं दी गई। यदि दी जाती और पगार के रूप में दिहाड़ी खाते में जाती तो उससे मेरा नहीं, जागरण का ही भला होता क्योंकि कंपनी का लोन मुझ पर भी चल रहा है।

तिरुपति बाला जी के चींटे और बदहाल जीवन

मैं कभी वहां गया नहीं, पर सुनते हैं कि भक्त उन्हें तभी छूकर प्रणाम कर सकता है, जब चींटे ऐसा करने दें। जागरण में भी ऐसा ही है। यदि आपको सीजीएम से मिलकर अपना दुखड़ा रोना है तो कई चींटों को पार करना पड़ेगा। ठीक उसी तरह जैसे नौकरी मांगते समय कई बार करना पड़ा था। कर्मचारी होने का कोई प्रिविलेज नहीं देते हैं ये चींटे। सामान गांव भेजने के बाद कुछ कपडे़ व अन्य सामान बचा था। उसी में सबसे पुराने, फटे और मैले कपड़े पहन कर मैं दो दिन तक इन चींटों के पास दो-दो घंटे खड़ा रहा, पर उन्होंने जैसे सीजीएम साहब से न मिलवाने की ही ठान रखी हो। उधर, सीजीएम सर के एक एसएमएस से, जो उन्होंने मेरे एक साथी को भेजे, तो उससे लगा कि मैं उनसे मिलने गया ही नहीं।

दरअसल शिवराम (पीए) जैसे लोग खुद को ही सीजीएम समझने लगे हैं। उन्हें संपादकीय विभाग से पहले नमस्ते चाहिए, नहीं करोगे तो जब उनकी बारी आएगी तो वे भी रौब दिखाएंगे। कहते हैं कि जागरण में सूट-बूट में प्रबंधन के किसी भी आदमी से नहीं मिलना चाहिए, सो मैंने भी सोच रखा था कि कोट बाहर ही रखकर जाऊंगा ताकि फटी व मैली शर्ट सामने दिखे और उन्हें मुलाजिमों की दशा पर कुछ दया आए और वह सोचें कि इन लोगों के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते होंगे या फिर प्राथमिक पाठशालाओं में। दरअसल गांव के स्कूल में पढ़ा हर व्यक्ति भी बच्चों को निजी स्कूलों में ही पढ़ाना चाहता है। वैसे गांवों की उन सरकारी पाठशालाओं में पढ़ा कौन नहीं है।

संपादकीय सहयोगियों का बदहाल जीवन के प्रदर्शन की वह नौबत ही चींटों ने नहीं आने दी और मैं सीजीएम साहब से मिले बिना ही चला अपने गांव की ओर, माता-पिता और बच्चों के पास। कार्मिक विभाग में एक हैं मुन्ना लाल। उनसे मिलो तो लगता है कि वेतन वही देते हैं अपनी जेब से। उनसे बीमारी का हवाला दिया तो वह बोले कि मेडिकल सर्टिफिकेट मिला ही नहीं। नोएडा आफिस में अधिकारियों की फौज के बावजूद कुछ ऐसे ही दोयम दर्जे व दोयम पंक्ति के लोगों के हाथों में है सत्ता की चाबी, जिसके इर्द-गिर्द मक्खियों (वैसे मन तो कुत्ता लिखने का था) की तरह भिनभिनाया करते हैं संपादकीय विभाग के लोग। जागरण में एक कालम छपता है, चलो गांव की ओर। यह सब लिखते हुए आज उसकी बड़ी याद आ रही है।

….जारी….

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