पांच साल में ही मीडिया का मर्म समझ गए विभोर

रिपोर्टर पद से इस्तीफा देकर डबल सेलरी में जिम इंस्ट्रक्टर का काम शुरू किया : अगर पांच साल बाद मेरी सेलरी सिर्फ साढ़े आठ हजार रुपये है तो मैं गलत जगह फंसा हूं. इतने समय तक मैं कुछ भी और काम करता तो इससे ज्यादा पाता. इसीलिए मैंने पत्रकारिता को बाय बोल दिया है. बाडी बिल्डिंग की शौक के कारण फिलवक्त मैं जिम इंस्ट्रक्टर के रूप में काम गाजियाबाद में काम करने लगा हूं. यहां मुझे मीडिया से डबल पैसे मिल रहे हैं और काम भी सिर्फ आठ घंटे का है, दिन में एक बजे से लेकर रात में नौ बजे तक. न कोई टेंशन न कोई फ्रस्ट्रेशन. बाकी समय में मैं बैंक और सिविल की तैयारी कर रहा हूं.

फाइनली, गुडबाय दिल्ली (7)

[caption id="attachment_16609" align="alignnone"]हम रोते भी हैं तो बताते हैं, वो हंसते भी हैं तो छिपाते हैं....हम रोते भी हैं तो बताते हैं, वो हंसते भी हैं तो छिपाते हैं….[/caption]

हम रोते भी हैं तो बताते हैं, वो हंसते भी हैं तो छिपाते हैं…. : कल अशोक चले गए दिल्ली से। दिल्ली से बहुत दूर। उस शहर का नाम हम किसी को पता नहीं है। उन तक पहुंचना संभव नहीं है। क्यों गए, किसलिए गए, कुछ पता नहीं। बस, चुपचाप चले गए। कल ही रात अलीगढ़ के एक पत्रकार को दिल्ली के एक चैनल के बाहर जमकर मारा गया। रात में गए थे हम लोग उससे थाने में मिलने। उसे सुना और महसूस किया। उसकी खबर आज दी जाएगी। आज धर्मेंद्र भी चला गया। दिल्ली छोड़ गया। सामान तो पहले ही जा चुका था। आज वो भी चला गया। धर्मेंद्र मरा तो नहीं, लेकिन एक मौत जीकर जा रहा है, जिंदगी जीने। ट्रेन में बैठा होगा। सुबह 11 बजे थी। जाने से पहले अंतिम लिखा दे गया। साथ में एक मोबाइल नंबर भी जो आज रात में चालू हो सकेगा। दिल्ली वाला नंबर, और जो चालू होने वाला है, दोनों नीचे डाल दिया है, पर प्लीज, उसे कोई नौकरी के लिए न बुलाए, उसे कोई सांत्वना न दे, उसे कोई सहानुभूति न दिखाए। उसे जाने दीजिए, चुपचाप, बिलकुल अकेले। उसी तरह जैसे कोई मरकर जाता है, बच जाने की खुशी और उम्मीद के साथ। उसे डिस्टर्ब न करें। उसे जीने दें, अपनी नई जिंदगी, शुक्र है इसी दुनिया में जिएगा, वरना लटक कर मरने के उसके पास हजारों बहाने थे, पर वो बहादुर है, एक मीडिया घराने द्वारा दिए गए स्लो प्वायजन मौत को उसने जीने और स्वीकारने से इनकार कर दिया। मैं निजी तौर पर इस जिंदा आदमी को दिल से प्रणाम करता हूं, चरण छूना चाहता हूं, चूम लेना चाहता हूं क्योंकि मुर्दों के इस दिल्ली देस में इतना हिम्मतवाला बहुत दिन बाद देखा है, शायद जरनैल सिंह के बाद कोई एक बंदा और मिला है जिसके लिए कह सकता हूं कि वो धर्मेंद्र हम लोगों के समय का हीरो है, एक बड़ा फैसला लेकर और उसके बारे में दुनिया को बताने का साहस करने के कारण। आज रोक नहीं सका खुद को रोने से, बहुत दिन बाद दिन में रोया हूं.

जीते जी मर जाना और करियर का मर जाना

दयानंद पांडेयअशोक और धर्मेंद्र के बहाने कुछ बातें : हम अभिशप्त हैं बीवी-बच्चों को लावारिस छोड़ जाने के लिए : चाहे एसपी हों या एसपी त्रिपाठी, सहयोगियों के हितों के खिलाफ अखबार मालिकानों को बुद्धि देने वाली इन प्रजातियों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है : ज़माने ने मारे हैं जवां कैसे-कैसे! धर्मेंद्र सिंह की पत्रकारिता में और अशोक उपाध्याय की जीवन में मौत मुश्किल में डालने वाली है। दोनों ही खबरें क्रिसमस क्लांत कर गईं। मैं दोनों साथियों से परिचित नहीं हूं पर दोनों की तकलीफों से खूब परिचित हूं। हालांकि पत्रकारिता में बंधुआ होने की परंपरा की यह दैनंदिन घटनाएं हैं।

गुडबाय दिल्ली (6)

ट्रक पर सामान लदवाते धर्मंद्र.

गोमती एक्सप्रेस और मैं : इस ट्रेन का ठहराव पहले उन्नाव में नहीं था। अभी दो साल पहले शुरू हुआ तो माता-पिता ने खुशी जताई कि अब एक और दिन तुम हमारे पास रुक सका करोगे क्योंकि यह ट्रेन सुबह वहां से चलकर ड्यूटी के समय तक दिल्ली पहुंचा देती थी, लेकिन यदि लेट हो गई किन्हीं कारणों से तो बास के चमचे ही ड्यूटी से लौटा देते थे। जाहिर सी बात है कि आपने जाते समय हाजिरी लगाई होगी तो पर्सनल कनपुरिया संबंधों के आधार पर उस दिन एब्सेंट दिखा देते थे। यह नर्क भी मैंने झेला है जागरण में और यदि खुद दारू पीनी हो और मैच खेलना हो तो हाजिरी लगाकर चाहे पूरे दिन गायब रहें, कोई पूछने वाला नहीं। शायद मैं 15 अगस्त 2006 की बात कर रहा हूं।

गुडबाय दिल्ली (5)

धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने दिल्ली से उजड़ते वक्त अपनी राम कहानी तफसील से सुनाई। कैसे वे दैनिक जागरण आए और किस तरह उनकी तारीफ के पुल बांधे गए। पर समय बीतने के साथ ही सब उन्हें भूल गए। एक कर्मठ कार्यकर्ता की तरफ धर्मेंद्र दिन-रात लगे रहे। किसी गोल-गैंग के हिस्से नहीं बने। किसी का गलत माना नहीं, किसी से गलत करने के लिए कहा नहीं। जो भी था, उसी में खुशहाल रहना चाहते थे। साथ के लोग आगे बढ़ते गए पर धर्मेंद्र वहीं के वहीं बने रहे। न पद बढ़ा न पैसा। काम जरूर घटता-बढ़ता रहा। इंचार्ज जरूर बदलते रहे। खुद ही पढ़ लीजिए आप धर्मेंद्र की राम कहानी का अगला हिस्सा….

-एडिटर, भड़ास4मीडिया


गुडबाय दिल्ली (4)

धर्मेंद्र से मैंने भी वही अटपटा और फालतू का सवाल किया जो टीवी वाले अक्सर हर किसी से पूछते दिख जाते हैं- यहां से आप जा रहे हैं, उजड़ रहे हैं, तो कैसा महसूस कर रहे हैं? धर्मेंद्र थोड़े असहज थे, घर की पैकिंग के दृश्य को शूट किए जाते देखकर, सवाल सुनकर वे पहले मुस्कराए, फिर बोले…. दिल्ली खानाबदोशों का शहर है… लाखों लोग आते जाते रहते हैं… कमाने-खाने आते रहते हैं…. हम भी पड़े हुए थे…. अब जा रहे हैं…. किसी के आने जाने से दिल्ली पर बहुत फरक नहीं पड़ता…. धर्मेंद्र को शिकायत है कि शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को पता ही नहीं है कि नीचे क्या खेल चल रहा है… किसका करियर तबाह किया जा रहा है, वे यह जानना ही नहीं चाहते … मुझे लगता है कि इन सब चीजों से अब कंपनियां मतलब भी नहीं रखतीं….. (देखें नीचे, पहला वीडियो)


गुडबाय दिल्ली (3)

धर्मेंद्र कहते हैं- गांव जाकर घास और गोबर का भी कारोबार करूंगा तो यहां से ज्यादा सुखी रहूंगा…… छोटे-छोटे शहरों से हम जैसे लोग सपने लेकर इन महानगरों में आते हैं…. उम्र बीतने के साथ जब सपने पूरे होते न दिखाई दें तो इस तरह के फैसले लेने पड़ते हैं…. दरअसल मैं बाबूगिरी से तंग आ गया था… (देखें नीचे का पहला वीडियो)


धर्मेंद्र के मुताबिक- परिवार साथ रहता था पर दो साल पहले उन्हें गांव भेजने का फैसला लेना पड़ा…. यहां दिल्ली में नर्सरी और कक्षा एक में बच्चों के एडमिशन के लिए 18 हजार रुपये, 20 हजार रुपये डोनेशन मांगा जा रहा था जो मैं देने की स्थिति में नहीं था…. तभी परिवार को गांव भेजने का निर्णय लिया… परिवार उन्नाव में रहता है अब…. मैं दिल्ली रहकर दैनिक जागरण की सेवा कर रहा था जिससे मैं कतई संतुष्ट नहीं था…. (देखें नीचे का दूसरा वीडिया)

गुडबाय दिल्ली (2)

[caption id="attachment_16573" align="alignleft"]अपने देवताओं को आखिरी प्रणामअपने देवताओं को आखिरी प्रणाम[/caption]धर्मेंद्र जब दिल्ली स्थित डेढ़ कमरे का अपना मकान खाली कर रहे थे तो उस दौरान कई वीडियो शूट किए गए। कुछ वीडियो हम दिखा रहे हैं। यह पहला है। इसमें आपको दिखेगा- धर्मेंद्र के सेकेंड फ्लोर के कमरे से सामान नीचे उतरता हुआ, धर्मेंद्र द्वारा अपने डेढ़ कमरे के मकान में स्थित छोटे से देवघर को आखिरी प्रणाम, पीने का पानी एकत्रित करने के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली मिट्टी की गगरी, सामान ले जाने के लिए नीचे खड़ा ट्रक……। यूट्यूब पर अपलोड किए गए इस वीडियो को देखने के लिए नीचे दिए गए वीडियो सक्रीन पर क्लिक करें।

गुडबाय दिल्ली (1)

[caption id="attachment_16568" align="alignnone"]धर्मेंद्र प्रताप सिंह दिल्ली स्थित डेढ़ कमरे वाले किराए के मकान में खाना खाते हुए.धर्मेंद्र प्रताप सिंह दिल्ली स्थित डेढ़ कमरे वाले किराए के मकान में खाना खाते हुए.[/caption]

बीत रहे इस साल और आने वाले वर्ष के संधिकाल में खुशियां मनाने में जुटे देश और दिल्ली वालों में एक शख्स ऐसा भी है जो टूटे दिल से दिल्ली को विदा बोल रहा है। ‘गुडबॉय दिल्ली‘ शीर्षक से पिछले दिनों भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित खबर में बताया जा चुका है कि एक पत्रकार दिल्ली और पत्रकारिता, दोनों को अलविदा कहने जा रहा है। वह गांव जा रहा है। सामान पैक कर चुका है। मकान छोड़ चुका है। किसी दोस्त के कमरे पर गेस्ट बन गया है। दिल्ली अभी इसलिए रुका है क्योंकि उसे दैनिक जागरण से अपना बकाया पैसा चाहिए। रुकी हुई सेलरी चाहिए। छुट्टियों का पेमेंट चाहिए। दिल्ली के मकान का किराया कुछ दोस्तों से उधार लेकर चुकाया क्योंकि वे दो महीने गांव में रह गए, कुछ पारिवारिक वजहों से और कुछ खराब स्वास्थ्य के चलते, इस कारण उनके एकाउंट में कोई सेलरी नहीं गई, मेडिकल लीव की अप्लीकेशन भेजने के बावजूद। आज हम उस पत्रकार का नाम, उनके संस्थान का नाम और उनके दिल की बात को यहां प्रकाशित करने जा रहे हैं। पत्रकार का नाम है धर्मेंद्र प्रताप सिंह। उनके संस्थान का नाम है- दैनिक जागरण। वे नोएडा स्थित मुख्यालय में सीनियर सब एडिटर पद पर कई वर्षों से कार्यरत हैं। धर्मेंद्र ने अपने दिल की बात तफसील से कही है, जिसे कई किश्तों में प्रकाशित किया जाएगा, आज पहली किश्त और कुछ तस्वीरें आपके सामने है। -एडिटर, भड़ास4मीडिया


गुडबॉय दिल्ली

वो जा रहे हैं। हम सबको छोड़कर। दिल्ली छोड़कर। दिल्ली से हारकर। पत्रकारिता छोड़कर। अपने देस। अपने गांव। दिल्ली आए थे करियर बनाने, काफी आगे जाने। पर उनकी गाड़ी ऐसी रुकी की वर्षों बीतने के बाद भी एक जगह से हिली नहीं। वे गुमनाम-से ही रह गए। एक बड़े मीडिया हाउस में दिल्ली में काम कर रहे हैं वो। उनके साथ के लोग जाने कहां-कहां चले गए। पर वे वहीं के वहीं रह गए। उम्र हर साल बढ़ती रही लेकिन पैसे व पद बढ़ने का नाम ही नहीं ले रहे। दिल्ली में किराए पर रहना हो नहीं पा रहा। कम पैसे के कारण परिवार को गांव से नहीं ला पाए। दो बच्चे हैं। इतने कम पैसे में क्या खाते, क्या बिछाते। बच्चों को कैसे पढ़ाते। सो, परिवार गांव में ही रखा। अब तय कर लिया है कि त्रिशंकु बनकर जिंदगी नहीं जीना। आर या पार। फैसला ले लिया। वे सामान पैक करने लगे हैं। दिल्ली छोड़कर कभी भी जा सकते हैं। दिल्ली को गुडबाय कभी भी कह सकते हैं।