गुडबाय दिल्ली (6)

ट्रक पर सामान लदवाते धर्मंद्र.

गोमती एक्सप्रेस और मैं : इस ट्रेन का ठहराव पहले उन्नाव में नहीं था। अभी दो साल पहले शुरू हुआ तो माता-पिता ने खुशी जताई कि अब एक और दिन तुम हमारे पास रुक सका करोगे क्योंकि यह ट्रेन सुबह वहां से चलकर ड्यूटी के समय तक दिल्ली पहुंचा देती थी, लेकिन यदि लेट हो गई किन्हीं कारणों से तो बास के चमचे ही ड्यूटी से लौटा देते थे। जाहिर सी बात है कि आपने जाते समय हाजिरी लगाई होगी तो पर्सनल कनपुरिया संबंधों के आधार पर उस दिन एब्सेंट दिखा देते थे। यह नर्क भी मैंने झेला है जागरण में और यदि खुद दारू पीनी हो और मैच खेलना हो तो हाजिरी लगाकर चाहे पूरे दिन गायब रहें, कोई पूछने वाला नहीं। शायद मैं 15 अगस्त 2006 की बात कर रहा हूं।

खुशी तो मुझे भी थी स्टापेज से, पर शर्म बहुत आती थी। चुपचाप मुंह बांधकर बैठ जाता था या काला चश्मा पहन कर। भले ही कोई न पहचानता हो हमें, पर खुद में शर्म लगती थी कि तालुकेदार के नाती और जमींदार के पौत्र होने के बाद भी गोमती, वह भी सेकेंड सिटिंग। कम किराये के कारण उसमें मारा-मारी भी बहुत होती थी और चेयर कार में आने-जाने भर का वेतन नहीं था क्योंकि हर माह जाना पड़ता था। मेरा हमेशा से मानना रहा कि गेहूं और गन्ने की कमाई से तब तक ऐश नहीं, जब तक नौकरी में हूं। आय बढ़ाने के लिए जागरण के लेखाधिकारी उत्तम गुप्ता जी की वैन खरीदी और प्रसार विभाग के ही एक आदमी के माध्यम से लगवा दी। लाख बेईमानी के बावजूद दो-तीन हजार रुपये मिलने लगे हर माह। कुछ गाड़ी पटरी पर आई, पर उसमें भी दलाल लग गए, जो सामने बैठने लायक नहीं थे, वे सामने बैठाकर हड़काने लगे क्योंकि मेरी गाड़ी हटने के बाद जो भी लगेगी, वह दो से पांच हजार रुपये कमीशन देगा। यह दीगर बात है कि मुझे नहीं देना पड़ा था, पर चलने भी नहीं दी गई। मैंने इज्जत नीलाम करने के बजाय घाटा उठाकर गाड़ी बेचना ज्यादा ठीक समझा। अप्रैल 2007 के 2600 रुपये आज भी सहायक प्रबंधक टाइप एक आदमी संजय दुबे ने आज तक नहीं दिए। एक दिन एक ट्रांसपोर्टर बच्चे व बीवी लेकर कार्यालय आया और इन्हीं सज्जन को घूसखोरी के कारण सौ गालियां सुनाकर गया। लाख सम्मान के बाद भी प्रसार प्रबंधक विद्या भास्कर त्रिपाठी जी अभी तक मेरे रुपये नहीं दिला पाए हैं। लगता है कि क्षेत्रीय प्रसार प्रबंधक श्री राजीव राजा जी से कहना पड़ेगा या फिर सीजीएम साहब से। बस कुछ ऐसे ही चल रहा है जागरण।

मंदी है भाई मंदी है और कमीशनखोरी है

दरअसल सबहेडिंग होनी चाहिए थी नौकरी बचा ली, क्या कम है…. तो भैया मंदी है तो सबसे पहले मुझे निकाल दीजिए। मैं तो अरसे से यही चिल्ला रहा हूं। गांव में दाल, दूध, मट्ठा, चावल, चना, गुड़, मक्का और गेहूं सब घर में पैदा होता है। वह भी इतना शुद्ध कि देश के किसी भी शहर में नहीं मिल सकता। तालाब में मछली के साथ ही बड़ी मात्रा में नाड़ी का साग भी लहलहा रहा है। चने का साग, बथुआ, हरी मटर और आलू खेतों में खड़ा है। वहां जीवन दिल्ली से लाख गुना सहज है। सिर्फ और सिर्फ एक ही समस्या है कि अच्छे निजी स्कूल दूर हैं। कुछ इसी तरह के सपने लेकर आदमी बड़े शहरों की भागता है। चूंकि डेस्क वालों का किसी भी चीज में कमीशन बनता नहीं है तो वे फ्रस्टेट रहते हैं। आफिस में जो कंप्यूटर (टीएफटी) लगे हैं, वे कमीशन के कारण महंगे बताए गए होंगे, पर हैं सस्ते क्योंकि लोड बढ़ते ही बोल जाते हैं। कुर्सी और मेज की ऊंचाई में इंजीनियरिंग फाल्ट (तालमेल की कमी) है, जिसके कारण संपादकीय विभाग के अधिकांश लोग कमर दर्द या फिर स्पांडिलाइटिस के मरीज हो चुके हैं। कुर्सी आराम करने वाली हैं, खरीदने वाला कमीशन की जल्दबाजी में खरीद लाया, पर एक बार यह भी नहीं सोचा यहां लोगों से काम लेना है, लिहाजा टेक खड़ी हो, न कि आराम कुर्सी की तरह अधलेटी अवस्था में लोगों को बैठाए रखना है। जागरण में जिनका वेतन छह से आठ हजार मात्र है, वह भी रिवाल्वर और मोटरसाइकिलें लेकर घूम रहे हैं। कोई नहीं है देखने वाला कहां से पैसा आ रहा है। ऐसे में अकु जी की बहुत याद आ रही है। काश, वह नोएडा जागरण में होते तो सभी के लट्ठ करते। कुछ नहीं करते तो सभी पर शक ही करते।

दिल्ली के शिक्षा मंत्री और मकान मालिक

आलम यह है कि संपादकीय जैसे उपेक्षित विभागों के 90 प्रतिशत से अधिक मुलाजिमों ने कंपनी से लोन ले रखा है या फिर पीएफ से पैसे निकाले हैं। कोई किसी को हजार-दो हजार देने की स्थिति में भी नहीं है। 15 हजार से नीचे वालों ने यदि 2010 में भी दिल्ली नहीं छोड़ी तो कई पंखे से लटके मिलेंगे या फिर गलत रास्ते पर चल पड़ेंगे क्योंकि बच्चों की फीस तो भरनी ही होगी। भले ही प्रापर अन्न न मिलने से कुपोषित हो जाएं। डटे रहो बेटा दिल्ली मत छोड़ना क्योंकि यहां पैसा बरसता है, पर ध्यान रहे यह सिर्फ उन्हें ही मिलता है, जो साप्ताहिक अवकाश में बच्चे के साथ फोल्डिंग पर कबड्डी नहीं खेलते हैं। छुट्टी के दिन कुछ होशियार मुलाजिमों की तरह अधिकारियों के घर जाओ, उनके बच्चों से घुलो-मिलो। अपने बच्चो को भले ही महीने भर चाकलेट न दी हो, पर अधिकारी के बच्चे के लिए ले जाओ व उसकी मां के सामने दो और चालाक द्वितीय पंक्ति के लोगों की तरह अपने सांसद व मंत्री के यहां जान-पहचान बढ़ाओ। लंबी-लंबी छोड़ो, कवरेज के सब्ज बाग दिखाओ। नार्थ व साउथ ब्लाक जाओ, विभिन्न मंत्रालयों से कमीशन लेकर किसी की भी फाइलें पास कराने का प्रयास करो जागरण के नाम पर। एनजीओ खोलो, उसे ऐड दिलाने में दिन-रात एक कर दो, तब तो रह पाओगे। यदि यह सब नहीं कर सकते तो निकल भागो यहां से नहीं तो मारे जाओगे। कृपया इसे तालीबानी व मराठी मानुष से न जोड़ें। यह नौबत आ गई है दिल्ली के तत्कालीन शिक्षा मंत्री, मकान मालिकों और जागरण जैसे संस्थानों के कारण। उसे लगा कि सिर्फ केंद्रीय कर्मियों के ही बच्चे पढ़ते हैं दिल्ली के निजी स्कूलों में और सरकार ने उनकी पगार तो दोगुनी कर ही दी है। इसी कारण उसने खुला लाइसेंस दे दिया स्कूल प्रबंधनों को। यह बयान देते वक्त उसने शायद घड़ी नहीं देखी होगी। यही आलम मकान मालिकों का भी है। पत्रकार होने के कारण सूर्य को नमस्कार भले ही आपने कितने ही दिनों से न किया हो, पर मकान मालिक को आंख खुलते ही नमस्कार जरूर करो। साले नंबरदार समझने लगे हैं अपने आपको, जितना मन हुआ उतना किराया बढ़ा दिया, दो या फिर खाली करो। जागरण प्रबंधन को इन दो बातों पर गौर करना चाहिए। दोस्तों, मकान मालिकों से निपटने का फंडा बताकर जाना चाहता हूं। एक बड़ा सा कैलेंडर तो दीवार पर तो होगा ही। उस पर मकान की हर हफ्ते एक कमी खोजकर लिखो और जैसे ही वह दरवाजे पर आए। उसे बैठाकर चाय लाना न बोलकर, मकान की कमियां उसे गिनानी शुरू कर दो। यही बाजार का फंडा है, चीज को बेचना हो तो पीला-पीला और उम्दा सिलसिला जैसी हजार खूबियां बताइये और यदि खरीदना हो तो गीला-गीला और पिल-पिला जैसी हजार कमियां या तो फिर बाई हुक आर क्रुक 20 हजार के ऊपर वेतन पहुंचाइए।

दलाली और दर्द

सामान पैक करवाते धर्मेंद्र

मैंने जागरण को सस्ते दामों में संपूर्ण ऊर्जा, पूरे 24 घंटे (बचे समय में कहीं दलाली नहीं की) और जवानी के बेशकीमती साल दिए हैं और बदले में पाया है कमर व गर्दन का दर्द, चश्मे का बढ़ता नंबर और एनीमिक पत्नी व बच्चे, जो पौष्टिक आहार गांव जाते हैं, तभी पाते हैं। 28 से 30 रुपये लीटर वाला जो दूध पाते हैं, वह भी है आक्सिटोसिन वाला और फल पाते थे सिर्फ डाक्टर द्वारा पर्ची पर लिखने के बाद। या यूं कह लीजिए कि कमर गई, नजर गई, अब सिर्फ और सिर्फ जिगर बचा है, जो कि घटी दरों पर बिकाऊ नहीं है। आज मेरे पास कुछ नहीं है, न बीमा है, न फंड है, फिर भी घमंड है और शुक्र है कि लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ है (भड़ास4मीडिया), जिस पर कम से कम अपनी बात तो कह सकता है, वरना अबके पहले ऐसी सुविधा कहां थी बिरादरी के लोगों के पास।

…जारी…

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