ग्रहण सूर्य पर या मीडिया पर !

शेष नारायण सिंहएक सूर्यग्रहण आया और चला गया। प्रकृति का नियम है। हर साल कई बार सूर्य और चंद्र ग्रहण लगते हैं। उसका खगोल शास्त्रीय महत्व होता है, वैज्ञानिक उस पर रिसर्च करते हैं, जो भी नतीजे होते हैं, संभाल कर रख लिए जाते हैं। हो सकता है कि उसका ज्योतिष पर भी कोई असर पड़ता हो, भविष्यवाणी करने या प्राकृतिक आपदा की पूर्व सूचना होती हो, साधारण आदमी के लिए कुछ कहना संभव नहीं है। साधारण आदमी के लिए जो संभव है, वह ये कि न्यूज के नाम पर टीवी चैनलों को देखना बंद कर दें क्योंकि वह उसके बस में है। इस बार के सूर्य ग्रहण की कवरेज में टीवी न्यूज की कमजोरी पूरी तरह से रेखांकित हो गयी है। आज के टीवी चैनलों के कुछ पुरोधा यह तर्क देते हैं कि अब पत्रकारिता वह वाली नहीं रह गयी है, जो पहले हुआ करती थी। कहते हैं कि पत्रकारिता अब आधुनिक हो गयी है, इसके मुहावरे बदल गये हैं, उसका व्याकरण बदल गया है। इसलिए अब टीवी चैनल पर जो कुछ दिखाया जायेगा, वह बिल्कुल आधुनिक होगा और उसके संदर्भ पुरानी पत्रकारिता से नहीं लिये जायेंगे। यह तर्क बहुत ही जोर-शोर से दिया जा रहा है और सूर्य ग्रहण लगने के तीन दिन पहले से जिस तरह की कवरेज शुरू हुई, लगता है कि अब इस पर अमल भी हो गया है…इस देश की पत्रकारिता देश के आम आदमी के लिए दुर्भाग्य की बात है, क्योंकि राजनीतिक नेताओं ने तो आम आदमी की खैरियत पूछना बहुत पहले बंद कर दिया था। वे उन्हीं मुद्दों पर ध्यान देते थे, जो मीडिया में उछल जाते थे। नेता बिरादरी की पूरी कोशिश रहती है कि वे मुद्दे मीडिया में न आयें जो उनके लिए असुविधाजनक हों।

अजीब विडंबना है कि मीडिया का एक प्रमुख स्टंप, टीवी न्यूज राजनीति के इस खेल में अनजाने ही शामिल हो गया है। सूर्य ग्रहण प्रकृति की एक ऐसी स्थिति है, जिसमें इंसान दखल नहीं दे सकता है। जो हो रहा है, वह होगा। कुछ चैनलों पर बैठे हुए ज्योतिष के विद्वान बता रहे थे कि इस सूर्य ग्रहण की वजह से किस राशि वालों पर क्या असर पड़ेगा, तो दूसरे वाले बता रहे थे कि पोंगापंथी टाइप ज्योतिषियों की बात पर भरोसा करने की जरूरत नहीं है। ऐसा कुछ नहीं होने वाला है। जाहिर है कि चैनल वालों को साफ पता नहीं है कि सूर्यग्रहण की वजह से क्या होने वाला है। तो अगर तस्वीर साफ नहीं है, चैनलों के कर्ता-धर्ता को खुद नहींमालूम है कि क्या होने वाला है तो अपना और चैनल का इतना वक्त क्यों बर्बाद किया जा रहा है? उनसे कोई पूछे कि भाई, जब आपको खुद ही कुछ नहीं मालूम है तो आप दर्शकों के धीरज की क्यों परीक्षा ले रहे हैं।

पिछले तीन दिनों में जब भी टीवी न्यूज देखने की कोशिश की, सूर्यग्रहण के असर के बारे में बहस ही देखने को मिली। लगता है कि प्रकृति की वजह से जो ग्रहण सूर्य पर लगा था, वह तो कुछ देर बाद खत्म हो गया लेकिन इसकी कवरेज के दौरान मीडिया पर जो ग्रहण लगा, वह पता नहीं कब खत्म होगा? टीवी न्यूज के नये महापुरुषों के जो भी तर्क हों, लेकिन सच्चाई ये है कि पत्रकारिता आज भी सूचना का ही माध्यम है, और अगर वह सूचना का माध्यम नहीं रहेगी तो वह सीरियल हो जाएगी, जहां एक तरह की पोशाक पहन कर तरह-तरह के अभिनेता शादी और साजिश की बातें करते रहते हैं। पत्रकारिता की बुनियाद में पक्षधरता का सवाल है। वह पक्षधरता किसकी तरफ है, उससे ही तो अखबार या टीवी चैनल की हैसियत तय होती है। लगभग सभी पत्रकारों को यह मालूम है कि उनको सही पत्रकारिता के लिए आम आदमी का पक्षधर होना चाहिए। यह स्थायी रूप से सच है। यह 1920 में निराला, अंबिका प्रसाद वाजपेयी और मुंशी नवजादिक लाल के लिये भी सच था और 1977 में प्रभाष जोशी और कुलदीप नैयर के लिएभी। एक बात और सच है कि आज की पत्रकारिता का कंटेंट सेठ तय करता है। इसलिए मामूली पत्रकार को अपराधबोध पालने की जरूरत नहीं है। उसकी जिम्मेदारी की बात आज भी उतनी ही अहम है, जितनी आदिकाल में थी। इसी पक्षधरता के सवाल पर आज की पत्रकारिता फिसड्डी साबित हो रही है। अगर इसे फौरन ठीक न किया गया तो समाचार के काम से जुड़े लोगों की वही औकात रह जायेगी, जो सीरियल बनाने वालों की है।

इसलिए यह जरूरी है कि पत्रकार के रूप में अपना अस्तित्व बचाने के लिए ही सही, टीवी न्यूज चैनलों में काम करने वाले आला पत्रकार आम आदमी की पक्षधरता के सवाल पर फिर से विचार करें, क्योंकि विकास के साथ साथ व्याकरण नहीं बदलते, भाषा बदलती है। और अगर पत्रकारों की भाषा सेठ की जय-जयकार वाली हो गयी तो वही सेठ उनको कान पकड़ कर बाहर निकाल देगा। और अगर पत्रकार के रूप में पहचान खो चुकी है तो कहीं कोई काम नहीं मिलेगा।

इस कठिन परिस्थिति में पत्रकारिता के पेशे से जुड़े लोगों को चाहिए कि फौरन असली मुद्दे पहचानें और अपनी आबरू बचाने में जुट जाएं। आज की तो सबसे बड़ी समस्या उत्तर भारत में सूखे का खतरा और अकाल की दहशत है। मीडिया को चाहिए कि इस तरह के मामलों में हस्तक्षेप करे और आसमान की तरफ देखना थोड़ा कम करे, जमीन की तरफ देखें, जहां मानसून की कमी की वजह से हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। महात्मा गांधी के युग में पत्रकारों ने आजादी की लड़ाई में योगदान किया था, 70 के दशक में कुछ पत्रकारों ने तानाशाही के खिलाफ मोरचा खोला था और आज जरूरी यह है कि पूंजीवादी आर्थिक विकास के दौर में पत्रकार सेठ की जीहुजूरी छोड़ कर आम आदमी का पक्षधर बनें और सूर्यग्रहण पर तीन दिन न लगाकर जरा सूखे के हालात पर भी गौर करें।  


लेखक शेष नारायण सिंह पिछले कई वर्षों से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय हैं। इतिहास के छात्र रहे शेष रेडियो, टीवी और प्रिंट सभी माध्यमों में काम कर चुके हैं। करीब तीन साल तक दैनिक जागरण समूह के मीडिया स्कूल में अध्यापन करने के बाद इन दिनों उर्दू दैनिक सहाफत के साथ एसोसिएट एडिटर के रूप में जुड़े हुए हैं। वे दिल्ली से प्रकाशित होने वाले हिंदी डेली अवाम-ए-हिंद के एडिटोरियल एडवाइजर भी हैं। शेष से संपर्क करने के लिए sheshji@gmail.com का सहारा ले सकते हैं। This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it

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