अलविदा ब्रायन हनरहन

बीबीसी के कूटनीतिक सम्पादक ब्रायन हनरहन की 61 साल की उम्र में लन्दन में मृत्यु हो गयी. उन्हें कैंसर हो गया था. 1970 में बीबीसी से जुडे ब्रायन हनरहन ने हालांकि क्लर्क के रूप में काम शुरू किया था लेकिन बाद वे बहुत नामी रिपोर्टर बने. भारत में उन्हें पहली बार 1984 में नोटिस किया गया जब वे मार्क टली और सतीश जैकब के साथ इंदिरा गाँधी की हत्या की रिपोर्ट करने वाली टीम के सदस्य बने.

उदयन के जन्मदिन पर आप निमंत्रित हैं

उदयन शर्माअगले रविवार को उदयन शर्मा के जन्म के 62 साल पूरे हो जांएगे. अस्सी के दशक में उनकी वही पहचान थी जो आज के ज़माने में राजदीप सरदेसाई और अरनब गोस्वामी की है. उदयन जी रविवार के संवाददाता और संपादक रहे. आगरा के उदयन एक बेहतरीन इंसान थे. छात्र जीवन में समाजवादी रहे और टाइम्स ऑफ़ इण्डिया का “ट्रेनी जर्नलिस्ट” इम्तिहान पास करके धर्मयुग से जुड़े. डॉ धर्मवीर भारती से पत्रकारिता का ककहरा सीखा और बहुत बड़े पत्रकार बने. फिर एक दिन अचानक और असमय इस दुनिया से चले गए.

ये बहादुरी मैंने साबुन रगड़कर पाई है

शेष नारायण सिंहप्रकाश झा की फिल्म ही नहीं लगती ‘राजनीति’ : प्रकाश झा संवेदनशील फिल्मकार हैं. एक से एक अच्छी फ़िल्में बनायी हैं उन्होंने. उनकी फिल्म ‘अपहरण’ और ‘गंगाजल’ को देखने के बाद अंदाज़ लगा था कि किसी नीरस विषय पर वे इतनी संवेदनशील फिल्म बना सकते हैं. ज़ाहिर है कि आम फिल्मकार इस तरह की फिल्म नहीं बना सकता. अब उनकी नयी फिल्म आई है, राजनीति. विश्वास ही नहीं हुआ कि इतनी चर्चित फिल्म को देखने के लिए मुंबई के इतने बड़े हाल में केवल १०-१२ लोग आये थे.

इस हिंदी वेब पत्रकारिता को सलाम

[caption id="attachment_17430" align="alignleft" width="89"]शेष नारायण सिंहशेष नारायण सिंह[/caption]पत्रकारिता के जनवादीकरण का युग : सच्चाई को कम खर्च में आम आदमी तक पहुंचाने का दौर : ये ऐसे अभिमन्यु हैं जो शासक वर्ग के खेल को समझते हैं : वेब मीडिया ने वर्तमान समाज में क्रान्ति की दस्तक दे दी है और उसका नेतृत्व कर रहे हैं आधुनिक युग के कुछ अभिमन्यु. मीडिया के महाभारत में वेब पत्रकारिता के यह अभिमन्यु शहीद नहीं होंगे.

‘हिंद स्वराज’ के सौ साल

महात्मा गांधी के जन्म को 140 साल हो गए। सौराष्ट्र के एक उच्चवर्गीय परिवार में उनका जन्म हुआ था और परिवार की महत्वाकांक्षाएं भी वही थीं जो तत्कालीन गुजरात के संपन्न परिवारों में होती थीं। वकालत की शिक्षा के लिए इंगलैंड गए और जब लौटकर आए तो अच्छे पैसे की उम्मीद में घर वालों ने दक्षिण अफ्रीका में बसे गुजराती व्यापारियों का मुकदमा लड़ने के लिए भेज दिया। अब तक उनकी जिंदगी में सब कुछ सामान्य था जैसा एक महत्वाकांक्षी परिवार के होनहार नौजवान के मामले में होता है। लेकिन दक्षिण अफ्रीका में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं जिसकी वजह से सब कुछ बदल गया। एटार्नी एम.के. गांधी की अजेय यात्रा की शुरुआत हुई और उनका पाथेय था सत्याग्रह। सत्याग्रह के इस महान योद्धा ने निहत्थे ही अपनी यात्रा शुरू की। इस यात्रा में उनके जीवन में बहुत सारे मुकाम आए।

भूख की जंग का अजेय योद्धा

[caption id="attachment_15768" align="alignleft"]डा. नार्मन बोरलागडा. नार्मन बोरलाग[/caption]डॉ. नार्मन बोरलाग नहीं रहे। अमरीका के दक्षिणी राज्य टेक्सॉस में 95 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया और पिछली सदी के सबसे महान व्यक्तियों में से एक ने अपना पूरा जीवन मानवता को समर्पित करके विदा ले ली। उन्हें 1970 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। डा. बोरलाग ने भूख के खिलाफ लड़ाई लड़ी और दुनिया के बड़े हिस्से में भूख को पराजित किया। पूरे दक्षिण अमरीका और एशिया में उन्होंने भूख को बेदखल करने का अभियान चलाया और काफी हद तक सफल रहे। प्रो. बोरलाग को ग्रीन रिवोल्यूशन का जनक कहा जाता है। हालांकि वे इस उपाधि को स्वीकार करने में बहुत संकोच करते थे।

सिंह साहब, शर्म तो आपको आनी चाहिए

उदय शंकर खवारेप्रिय यशवंत जी, आज अपने अखबार का काम ख़त्म करके रात को ग्यारह बजे बी4एम को देखा. लेखक शेष नारायण सिंह, वरिष्ठ पत्रकार, का आलेख पढ़ा, पढ़कर खुशी नहीं, मायूशी हुई. उन्होंने लिखा है कि “मोदी एक ऐसी जमात से ताल्लुक रखते हैं जो मुसलमानों को तबाह करने की राजनीति पर काम करती है।”  बहुत ही गलत लिखा उन्होंने। फिर आगे लिखा है- ”1925 में अपनी स्थापना के बाद आरएसएस. ने 1927 में नागपुर में योजनाबद्ध तरीके से पहला दंगा करवाया था। तबसे मुसलमानों के खिलाफ इनका ‘प्रोग्राम’ चल रहा है। गुजरात में सरकार बनी तो गोधरा कांड करके राज्य में मुसलमानों को तबाह करने की योजना पर अमल किया गया। जब अफसरों ने देखा कि मुख्यमंत्री मुसलमानों के खून से खुश होता है तो उन्होंने भी निरीह सीधे-साधे और गरीब लोगों को आतंकवादी बताकर मारने का सिलसिला शुरू कर दिया।”

मीडिया को शर्म से सिर झुका लेना चाहिए

शेष नारायण सिंहहत्यारी पुलिस, सांप्रदायिक सरकार, गैर-जिम्मेदार मीडिया : एक बहुत बडे़ टीवी न्यूज चैनल के न्यूज सेक्शन के कर्ताधर्ता, जो उस वक्त तक मेरे मित्र थे, ने जब इशरत जहां की हत्या को इस तरह से अपने चैनल पर पेश करना शुरू किया जैसे देश की सेना किसी दुश्मन देश पर विजय करके लौटी हो, तो मैंने उन्हें याद दिलाया कि खबर की सच्चाई जांच लें। इतना सुनते ही वे बिफर पडे़ और कहने लगे कि उनके रिपोर्टर ने जांच कर ली है और उन्हें अपने रिपोर्टर पर भरोसा है। मैं न सिर्फ चुप हो गया बल्कि उनसे दोस्ती भी खत्म कर ली। वे श्रीमानजी टीवी के सबसे वरिष्ठ पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं। टीवी के कारण उनकी संकुचित हो गई सोच पर मुझे घोर आश्चर्य हुआ। बात सिर्फ सबसे बड़े न्यूज चैनल की ही नहीं है। उस दौर में इशरत जहां को ज्यादातर टीवी न्यूज चैनलों ने पाकिस्तानी जासूस बताया।

सुधरिए, वरना बाबू लोग मीडिया चलाएंगे

शेष नारायण सिंहयह पब्लिक है, सब जानती है : समाज के हर वर्ग की तरह मीडिया में भी गैर-जिम्मेदार लोगों का बड़े पैमाने पर प्रवेश हो चुका है। भड़ास4मीडिया से जानकारी मिली कि एक किताब आई है जिसमें जिक्र है कि किस तरह से हर पेशे से जुड़े लोग अपने आपको किसी मीडिया संगठन के सहयोगी के रूप में पेश करके अपना धंधा चला रहे हैं। कोई कार मैकेनिक है तो कोई काल गर्ल का धंधा करता है, कोई प्रापर्टी डीलर है तो कोई शुद्ध दलाली करता है। गरज़ यह कि मीडिया पर बेईमानों और चोर बाजारियों की नजर लग गई है। इस किताब के मुताबिक ऐसी हजारों पत्र-पत्रिकाओं का नाम है जो कभी छपती नहीं लेकिन उनकी टाइटिल के मालिक गाड़ी पर प्रेस लिखाकर घूम रहे हैं।

‘उर्दू है जिसका नाम’ नहीं देख सकते

शेष नारायण सिंहकभी उर्दू की धूम सारे जहां में हुआ करती थी, दक्षिण एशिया का बेहतरीन साहित्य इसी भाषा में लिखा जाता था और उर्दू जानना पढ़े लिखे होने का सबूत माना जाता था। अब वह बात नही है। राजनीति के थपेड़ों को बरदाश्त करती भारत की यह भाषा आजकल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। वह उर्दू जो आज़ादी की ख्वाहिश के इज़हार का ज़रिया बनी आज एक धर्म विशेष के लोगों की जबान बताई जा रही है। इसी जबान में कई बार हमारा मुश्तरका तबाही के बाद गम और गुस्से का इज़हार भी किया गया था। आज जिस जबान को उर्दू कहते हैं वह विकास के कई पड़ावों से होकर गुजरी है। 12वीं सदी की शुरुआत में मध्य एशिया से आने वाले लोग भारत में बसने लगे थे। वे अपने साथ चर्खा और कागज भी लाए।

भ्रष्टाचार से जंग में मीडिया को साथ लें

[caption id="attachment_15225" align="alignleft"]शेष नारायण सिंहशेष नारायण सिंह[/caption]महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री नितिन राउत ने राज्य के पुलिस महानिदेशक एसएस विर्क को प्रेषित अपने तीन पृष्ठों के एक पत्र में राज्य के सभी आईपीएस और राज्य पुलिस सेवा के अफसरों की संपत्ति का ब्योरा मांगा है। विर्क से कहा गया है कि उस ब्योरे में अफसरों की चल और अचल, दोनों तरह की संपत्तियों की तफसील से जानकारी दी जाए। राउत को राज्य के पुलिस अफसरों के पास बहुत सारी जमीन होने की शिकायत मिली थी। महाराष्ट्र में नियम है कि कोई भी पुलिस अधिकारी महानिदेशक से लिखित अनुमति मिले बगैर जमीन-जायदाद नहीं खरीद सकता। इस मामले में मीडिया को भी साथ ले लिया जाए तो जनता के लिए यह जंग बहुत फायदे की हो सकती है। गृह राज्य मंत्री ने विर्क से पूछा है कि उन अधिकारियों के नाम बताएं, जिन्होंने जमीन खरीदने से पहले उनसे एनओसी ली हो। भ्रष्टाचार के छोटे मामलों पर भी जवाब मांग कर नितिन राउत ने अफसरों के बच निकलने की गली बंद कर दी है। मसलन, उन्होंने पूछा है कि उन अफसरों के भी नाम बताएं, जो सरकारी कार को घर के लोगों के इस्तेमाल लिए मंगवा लेते हैं।

ग्रहण सूर्य पर या मीडिया पर !

शेष नारायण सिंहएक सूर्यग्रहण आया और चला गया। प्रकृति का नियम है। हर साल कई बार सूर्य और चंद्र ग्रहण लगते हैं। उसका खगोल शास्त्रीय महत्व होता है, वैज्ञानिक उस पर रिसर्च करते हैं, जो भी नतीजे होते हैं, संभाल कर रख लिए जाते हैं। हो सकता है कि उसका ज्योतिष पर भी कोई असर पड़ता हो, भविष्यवाणी करने या प्राकृतिक आपदा की पूर्व सूचना होती हो, साधारण आदमी के लिए कुछ कहना संभव नहीं है। साधारण आदमी के लिए जो संभव है, वह ये कि न्यूज के नाम पर टीवी चैनलों को देखना बंद कर दें क्योंकि वह उसके बस में है। इस बार के सूर्य ग्रहण की कवरेज में टीवी न्यूज की कमजोरी पूरी तरह से रेखांकित हो गयी है। आज के टीवी चैनलों के कुछ पुरोधा यह तर्क देते हैं कि अब पत्रकारिता वह वाली नहीं रह गयी है, जो पहले हुआ करती थी। कहते हैं कि पत्रकारिता अब आधुनिक हो गयी है, इसके मुहावरे बदल गये हैं, उसका व्याकरण बदल गया है। इसलिए अब टीवी चैनल पर जो कुछ दिखाया जायेगा, वह बिल्कुल आधुनिक होगा और उसके संदर्भ पुरानी पत्रकारिता से नहीं लिये जायेंगे। यह तर्क बहुत ही जोर-शोर से दिया जा रहा है और सूर्य ग्रहण लगने के तीन दिन पहले से जिस तरह की कवरेज शुरू हुई, लगता है कि अब इस पर अमल भी हो गया है…इस देश की पत्रकारिता देश के आम आदमी के लिए दुर्भाग्य की बात है, क्योंकि राजनीतिक नेताओं ने तो आम आदमी की खैरियत पूछना बहुत पहले बंद कर दिया था। वे उन्हीं मुद्दों पर ध्यान देते थे, जो मीडिया में उछल जाते थे। नेता बिरादरी की पूरी कोशिश रहती है कि वे मुद्दे मीडिया में न आयें जो उनके लिए असुविधाजनक हों।

धर्मनिरपेक्षता के शहंशाह उदयन शर्मा

[caption id="attachment_15225" align="alignleft"]शेष नारायण सिंहशेष नारायण सिंह[/caption]उदयन शर्मा होते तो आज 61 वर्ष और एक दिन के हो गए होते। कई साल पहले वे यह दुनिया छोड़कर चले गए थे। जल्दी चले गए। होते तो खुश होते, देखते कि सांप्रदायिक ताकतें चौतरफा मुंह की खा रही हैं। इनके खिलाफ उदयन ने हर मोर्चे पर लड़ाइयां लड़ी थीं, और हर बार जीत हासिल की थी। उनको भरोसा था कि हिटलर हो या फ्रांका हो या कोई तानाशाह, हारता जरूर है। लेकिन क्या संयोग कि जब पंडित जी ने यह दुनिया छोड़ी तो इस देश में सांप्रदायिक ताकतों की हैसियत बहुत बढ़ी हुई थी, दिल्ली के फैसले नागपुर से हो रहे थे। यह उदयन के दम की ही बात थी कि पूरे विश्वास के साथ बताते थे कि यह टेंपरेरी दौर है, खत्म हो जायेगा। खत्म हो गयी सांप्रदायिक ताकतों के फैसला लेने की सियाह रात लेकिन वह आदमी जिंदा नहीं है जिसने इसकी भविष्यवाणी की थी। उदयन शर्मा बेजोड़ इंसान थे, उनकी तरह का दूसरा कोई नहीं। आज कई साल बाद उनकी याद में कलम उठी है इस गरीब की। अब तक हिम्मत नहीं पड़ती थी। पंडितजी के बारे में उनके जाने के बाद बहुत कुछ पढ़ता और सुनता रहा हूं। इतने चाहने वाले हैं उस आदमी के। सोचकर अच्छा लगता है। आलोक तोमर हैं और सलीम अख्तर सिद्धीकी, उदयन शंकर हैं तो ननकऊ मल्लाह भी। बड़े से बड़ा आदमी और मामूली से मामूली आदमी, हर वर्ग में उदयन के चाहने वाले हैं।