पीएम की पीसी के चापलूस पत्रकार

शेषजीकई ने घटिया सवाल पूछे : कुछ ने बेशर्मी से विश किया : कठिन सवाल पूछे ही नहीं गए : अब तक के किसी पीएम की सबसे घटिया पीसी : भाइयों ने भोजन किया और अपने-अपने ढर्रे चले गए : प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल की पहली पत्रकार वार्ता सकुशल संपन्न हो गयी. उन पर कुछ दैवी कृपा रही कि जो सवाल पूछे गए वे बिलकुल ऐसे लग रहे थे जैसे प्रधानमंत्री को मालूम था कि अब यह सवाल आने वाला है.

नयी दिल्ली के विज्ञान भवन के मुख्य सभाकक्ष में संपन्न हुई इस पत्रकार वार्ता के बाद खबर ढूँढने वाले लोगों को थोड़ी बहुत निराशा हुई. एक बहुत ही वरिष्ठ और आदरणीय पत्रकार से जब पूछा कि भाई साहेब हेडलाइन क्या है? तो फट उनका जवाब आया कि किसी प्रधानमंत्री की पहली पत्रकार वार्ता है जिसमें कुछ नया नहीं कहा गया. यह पत्रकार उस बिरादरी के हैं जिन्होंने जवाहरलाल नेहरू को भी कवर किया था. पत्रकार वार्ता की शुरुआत निहायत ही प्रोफेशनल तरीके से हुई. कोई भूमिका नहीं, प्रधान मंत्री के प्रेस सलाहकार ने कहा कि प्रधानमंत्री का शुरुआती वक्तव्य आप लोगों तक पहुंचा दिया गया है, उसे वे पढेंगे नहीं, इससे वक़्त बचेगा. वे सीधे सवालों पर आ गए.

पहला और दूसरा सवाल गंभीर था, महंगाई पर हिन्दी के एक नामी अखबार के ब्यूरो चीफ का सवाल और विदेश नीति पर एक आदरणीय अखबार के मुख्य सम्पादक का सवाल. उसके बाद हलके सवालों का सिलसिला शुरू हुआ. हालांकि इन फुलझड़ियों के बीच में एकाध सार्थक सवाल भी आते रहे. और बिना किसी जुम्बिश के पत्रकार वार्ता समाप्त हो गयी. सरकार की हर मामले में घोषित पोजीशन सामने आई. कहीं कुछ नया निकल कर नहीं आया. प्रधानमंत्री के आने के पहले सरकारी अफसरों ने उनके शुरुआती बयान की प्रतियां बांटीं, मैं उसे ध्यान से पढ़ने लगा तो मेरे बगल बैठे हुए एक पुराने और सम्मानित पत्रकार ने मुझसे कहा कि यह तो कुछ नहीं है, सरकार की घोषित नीतियों का लेखा जोखा मात्र है, असली खबर तो सवाल जवाब से निकलेगी. फिर भी मैंने सरसरी नज़र उस पर डाल ली. और जब पत्रकार वार्ता ख़त्म हुई तो मैंने इन मित्र से पूछा कि क्या कुछ निकल कर आया. उन्होंने कहा कि खबरें तो सरकारी पर्ची में ही हैं. सवालों का दायरा तो बहुत ही सीमित रह गया.

ऐसा शायद इसलिए हुआ कि सवाल पूछने में बहुत अनुशासन का ध्यान रखा गया था. सभी पत्रकारों को एक तख्ती दी गयी थी जिस पर एक नंबर लिखा हुआ था. सवाल पूछने की इच्छा रखने वाले को अपनी तख्ती उठाकार मीडिया सलाहकार को बताना होता था, सवाल वही पत्रकार पूछ सकता था जिसके हाथ की तख्ती का नंबर मीडिया सलाहकार बाआवाज़े-बुलंद ऐलान कर दें. यह सिलसिला करीब सवा घंटे चला और कहीं से कोई खबर निकल कर नहीं आई. बाद में सरकारी तौर पर अच्छे अल्पाहार की व्यवस्था की गयी थी, भाइयों ने भोजन किया और अपने अपने ढर्रे चले गए. शाम को पता चला कि टीवी न्यूज़ वालों ने पूरे देश में हाहाकार मचा रखा है, प्रधानमंत्री के बयानों की व्याख्या हो रही है, हर चैनल के ख़ास नेता, अपनी अपनी पार्टी की राय से बाकी दुनिया को अवगत करा रहे हैं. बातें वही सारी थीं जो सरकार की तरफ से हमेशा कही जाती थीं लेकिन आज वही सब दुबारा कही जा रही थीं.

निराश पत्रकारों की बात को बहुत ही गंभीरता से लिए जाने की ज़रूरत है. यह वह लोग हैं जिन्होंने बड़े-बड़े प्रधानमंत्रियों को प्रेस कान्फरेन्स के दौरान निरुत्तर किया है. उन्हें स्वर्गीय राजीव गांधी की वह पत्रकार वार्ता याद है जिसमें उन्होंने विदेश सचिव को हटाने की घोषणा कर दी थी. हुआ यह था कि राजीव गाँधी की इसी तरह की बड़ी वाली पत्रकार वार्ता चल रही थी, किसी पत्रकार ने सवाल  किया कि आप जो बात कह रहे हैं, आपके विदेश सचिव उससे अलग बात कहते हैं. राजीव गाँधी का जवाब आया कि बहुत जल्द एक नया विदेश सचिव नियुक्त कर दिया जाएगा. उस वक़्त के विदेश सचिव, ए पी वेंकटेस्वरन  सबसे अगली कतार में बैठे हुए थे. उनको भनक तक नहीं थी कि उनको हटाने का फैसला हो चुका है. पत्रकार वार्ता ख़त्म होने के बाद वे अपने आफिस गए और अपना इस्तीफ़ा भेज दिया. ज़ाहिर है प्रधानमंत्री की हैसियत के  मुताबिक एक बहुत बड़ी खबर सामने आई.

इसी तरह पीवी नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व के दौरान एक फोटोपत्रकार ने उन्हें अपशब्द कह दिया था, हालांकि यह वारदात खबर तो नहीं बनी लेकिन खबर थी तो हर हाल में यह पक्की. अटल बिहारी वाजपेयी के पत्रकार सम्मेलनों में भी खासी गहमा-गहमी रहती थी. लेकिन यूपीए-२ के प्रधानमंत्री की पहली राष्ट्रीय प्रेस वार्ता ढीली रही. यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि ज़्यादातर सवाल भी बहुत ही मामूली स्तर के थे. एक श्रीमान जी ने पूछा कि आपको कैसा लगता है जब आपको दो महिलाओं की सलाह मिलती है, उन्होंने प्रधानमंत्री की पत्नी और सोनिया गाँधी का नाम लिया. एक श्रीमानजी ने पूछा कि आप क्या विरासत छोड़कर जा रहे हैं. अरे कहां जा रहे हैं भाई. अभी तो उन्होंने कह दिया कि न रिटायर हो रहा हूँ और न ही गद्दी छोड़ रहा हूँ.

एक विद्वान पत्रकार पूछ रहे थे कि अफज़ल गुरू के बारे में कुछ बताएं. कुछ लोग निहायत ही चापलूसाना अंदाज़ में प्रधानमंत्री को एक साल पूरा करने पर बधाई दे रहे थे. कुल मिलाकर लग रहा था कि पत्रकार वार्ता का आयोजन अपनों के बीच ही किया गया था. बाद में आरोप भी लगे कि मीडिया सलाहकार ने चुनिन्दा लोगों से सवाल पुछ्वाये. यह बात इस से भी संभव लगती है कि पुराने पत्रकारों को सबसे पीछे बैठाया गया था और उनमें से एकाध के अलावा किसी को सवाल पूछने का मौक़ा ही नहीं मिला. कुछ घाघ किस्म के लोग जो कठिन सवाल पूछ सकते थे, उनका नंबर ही नहीं आया. जो भी हो, प्रधानमंत्री की पत्रकार वार्ता ‘सफल’ रही क्योंकि सरकार की सारी नीतियाँ खुलकर पब्लिक डोमेन में आ गयीं और कोई भी कठिन सवाल नहीं पूछा गया.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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Comments on “पीएम की पीसी के चापलूस पत्रकार

  • SACHIN KUMAR says:

    THESE DAYS MANY JOURNALISTS BECOME HAPPY TO ASK ANYTHING…NO MATTER WHAT HAS THEY ASKED? NO PREPARATION JUST GO AS IF I KNOW ALL…SO IS THE REASON….NO MATTER WHAT PEOPLE NEED FROM GOVT. NOT GOVT THINKING NOT OUR GREAT JOURNALISTS…

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  • भानु प्रताप शुक्ल says:

    क्ष्मण सिंह जी , अपने लेख में ही बेचारे ने लिख दिया है कि क्यों नहीं सवाल पूछ सका . तुम्हारे लिए मैं उस हिस्से को कॉपी करके पेस्ट कर दे रहा हूँ .सवाल पूछने में बहुत अनुशासन का ध्यान रखा गया था. सभी पत्रकारों को एक तख्ती दी गयी थी जिस पर एक नंबर लिखा हुआ था. सवाल पूछने की इच्छा रखने वाले को अपनी तख्ती उठाकार मीडिया सलाहकार को बताना होता था, सवाल वही पत्रकार पूछ सकता था जिसके हाथ की तख्ती का नंबर मीडिया सलाहकार बाआवाज़े-बुलंद ऐलान कर दें.

    वैसे आप प्रधानमंत्री के भक्त हैं क्या जो उनकी तरफ से गीत गा रहे हैं .

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  • Om Prakash says:

    सर…आप जानते होंगे कि पत्रकारिता अब कहाँ राह गई है. पीएम के संवाददाता संम्मेलन में जो ज्यादा सवाल करता है उसके अख़बार को पढो तो कुछ नहीं मिलेगा. लेकिन नोकर्शाहों ने ऐसे पत्रकारों को तरजीह देने का ठेका ले रखा है जो पत्रकारिता के नाम पर कलंक हैं. पीएम के सलाहकार ही इसका उधाहरण हो सकता है.मै भी राष्ट्रीय पत्रकारिता करता हूँ.जिसमें मै अपना अनुभव प्रकट कर रहा हूँ. ठीक है आपने लिखा चापलूस पत्रकार. लेकिन इसकी परिभाषा भी बतानी चाहिए थी. मै आपसे मिला नहीं, लेकिन नाम से जनता हूँ. संसद में देखता हूँ तो लोकसभा व् राज्यसभा कि कमेटियों में ऐसे लोग हैं जो केवल मटरगस्ती करने ही जाते हैं. और कामकाजी पत्रकारों से सड़ते हैं. मै किसी का नाम लेना नहीं चाहता लेकिन स्शायद आजकल चापलूसों कि अहमियत ज्यादा हो गई है.अक्षर लिखना नहीं चाहते पर नाम बना रहे यही काम उनका राह गया है.जाह्न तक पीएम से सवालों का मामला है. पीएम ही कहन गंभीर थे. केवल एक साल कि ओपचारिकता निभाई है.तो पत्रकार ही क्या करते बेचारे.

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  • Om Prakash says:

    सर…आप जानते होंगे कि पत्रकारिता अब कहाँ राह गई है. पीएम के संवाददाता संम्मेलन में जो ज्यादा सवाल करता है उसके अख़बार को पढो तो कुछ नहीं मिलेगा. लेकिन नोकर्शाहों ने ऐसे पत्रकारों को तरजीह देने का ठेका ले रखा है जो पत्रकारिता के नाम पर कलंक हैं. पीएम के सलाहकार ही इसका उधाहरण हो सकता है.मै भी राष्ट्रीय पत्रकारिता करता हूँ.जिसमें मै अपना अनुभव प्रकट कर रहा हूँ. ठीक है आपने लिखा चापलूस पत्रकार. लेकिन इसकी परिभाषा भी बतानी चाहिए थी. मै आपसे मिला नहीं, लेकिन नाम से जनता हूँ. संसद में देखता हूँ तो लोकसभा व् राज्यसभा कि कमेटियों में ऐसे लोग हैं जो केवल मटरगस्ती करने ही जाते हैं. और कामकाजी पत्रकारों से सड़ते हैं. मै किसी का नाम लेना नहीं चाहता लेकिन स्शायद आजकल चापलूसों कि अहमियत ज्यादा हो गई है.अक्षर लिखना नहीं चाहते पर नाम बना रहे यही काम उनका राह गया है.जाह्न तक पीएम से सवालों का मामला है. पीएम ही कहन गंभीर थे. केवल एक साल कि ओपचारिकता निभाई है.तो पत्रकार ही क्या करते बेचारे.

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  • bilkul sahi kaha aapne lag rahi thi ki sab kuch pehle se hi teh tha. had kar di hamare tv patrakaro ne chahe english channel ho ya phr hindi sare reporters aise ghatiya sawal puch rahe they ki afsos hone laga ki kya ho gaya hai hamari media ko.agar ek do logo ne kuch gambhir sawal kiye bhi to pm ko ya to woh samajh nahi aaye ya phr woh ye kehkar palla jhadte nazar aaye iska jawab me sansad me de chuka hun. i dont know hamari media aur sarkar ko aakhir ho kya gaya hai.

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  • दिलीप कुमार पाण्डेय says:

    और इस तरह एक बार फिर पप्पू पास हो गया

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  • कमल शर्मा says:

    शेष जी जिनको आप सवाल बता रहे हैं वे तो सवाल ही नहीं थे। असल में ऐसा लग रहा था ड्राईंग रुम में बैठकर कुशल क्षेम पूछ रहे हो। सर आपने आज दो रोटी खाई या तीन। सब्‍जी किसकी बनी थी। आपको रसगुल्‍ला अलाऊ है या नहीं। पिछली सर्दियों में आपने सरसों का साग और मक्‍के की रोटी खाई थी। लेकिन यह रोटी व साग घर पर खाया था या बाहर किसी रेस्‍तरां में। सर आपके पास नोकिया का मोबाइल है या किसी और कंपनी का। यदि नोकिया का है तो उसका मॉडल नबंर बता दीजिए प्‍लीज। मैं भी वही मॉडल लूंगा। सर आज आप यहां प्रेस कांफ्रेस में आते समय कार की अगली सीट पर बैठे थे या पीछे वाली पर। सर आज कौन ड्राइवर आपकी गाड़ी चला रहा था। सर, यहां गर्मी ज्‍यादा है, आप इससे राहत पाने के लिए यूरोप क्‍यों नहीं घूम आते। पता नहीं पत्रकारों को क्‍या हो गया है जो प्रधानमंत्री से उनके स्‍तर के सवाल ही नहीं पूछ पाएं। कईयों के सवाल में ही जवाब था। धन्‍य है ये पत्रकार और यह पत्रकारिता की भूमि। मेरा भारत महान कहिए।

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  • दिलीप कुमार पाण्डेय says:

    और इस तरह एक बार फिर पप्पू पास हो गया

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  • pradhanmantri kee aisee neeras press conference kabhi nahin hui.freelancers kee taraf to kharejee ko dekhna tak gawara nahin tha.

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  • sir namaskar, aapne sau fisdi sahi kaha……….. aisa lag raha tha mano circus dekh rahe ho…..sabhi BAAGH jaise patrakar ring mai bathe the , woh bhi gale mai patta bandhe or ring master ek-ek se kartab dikhane……….kartab waise hi dikaye ja rahe rahe the jiska aapne khul kar jikra kiya hai sir………….. darasal , patrakar khud hi apni is durdasha ke jimmewaar hai……… market mai aajkal patrakar kum or ‘media manager’ jyada ho gaye hai…….. PM ki tarah ey bhi apna jyada samay kursi bachane mai lage rahte hai…… phir patrakarita karne ka samay hi kaha hai?

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  • pankaj kumar singh etv bihar says:

    shesh narayan jee aap kisase kisaki tulna kar rahen hain, pm ke ke kud ke anusar hi pc hoga na,prakash dubey ne kai saal pahle likha diya tha manmohan singh india ke pahale CEO hain,jahir hai ceo ki pc kaisi hogi,kya chahate hain aap ki pc me we kuchh aisa bol den jisase unki naukari chali jaye,,,wo jabana gaya jab pm ke dinner se bhi badi badi khabaren nikalti thi,usake liye abhi intzar karna hoga,,,

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  • chandangiri Tulsigiri Goswami says:

    sir sabse pahle to aapko badhaie ki aapko loktantra ke sabse bade desh hindustan ke prdhanmatri ki patrkar varta mei shamil hone ka mouka mila,lekin dukh ki dukh ki LOKTANTRA desh ke prdhanmantri ki yeh patrkarvarta mano pahle se FIXING thee,jis desh ke krishmantri krishi ke aur dhyan nahi dekar CRICKET FIXING JAISE, SUGAR LOBBY,ETC.jairam ramesh ke kryklap.china ka atikrman,purvtirajyo mei ulfa ki badti gatividhi..sark desho ke sath gambhir subjeect pr batchit,usa ke dohri niti. urope se riste.home ministry ke kamo ka aklan,60 vrsho se zhopdpatti mei gujarti garibi.chote pradesh banana.500000 lakh chote vypario pr latkti dukane band hone ki talvare kyonki oonki jagah bade bade mall ne le li hei.jaise baut jwlant mudde. nahi oothe,ooska dukh,

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  • chandangiri Tulsigiri Goswami says:

    chaplusi ne es desh ko nicha dikha diea, yeh to patrkar hei. loktantra ke chouthee khambee ke patrkar.

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  • SN Pathak says:

    सर जी,
    राष्ट्रीय स्तर के पत्रकारों कि यह स्तिथि निश्चित ही शर्मनाक है. अपनी गरिमा का ख्याल करना ही चाहिए. सवाल में भी गंभीरता होनी चाहिए. न कि सिर्फ अपनी उपस्तिथि दर्ज कराने ओछे सवाल पूछें जाएँ. ऊँचे लेबल पर होने वाले मिडिया मेनेजमेंट का एक अच्छा उदारहण रही पीएम कि पीसी. बाजारवाद के इस युग में सब कुछ बिकता है हर किसी कि कीमत होती है. कुछ नहीं बिक सके, कुछ ऐसे रहे जो मेनेज नहीं हो सके पीछे बिठा दिए गए. यही हाल रहा तो आने वाले समय में पत्रकार देश को को कहाँ ले जायेंगे ? इस पर विचार जरूरी है. गंभीरता और भी जरूरी है.
    सत्यनारायण पाठक
    जगदलपुर (बस्तर) छत्तीसगढ़ 🙁

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