मीडिया ने क्यों फैलाया स्वाइन फ्लू का डर?

जिसे भी हल्का सा बुख़ार हो, बदन में दर्द हो, एक –दो बार उल्टी हो गई हो, आंखों में जलन हो, खांसी हो रही हो और हो सकता है कि नाक भी बह रही हो- पक्का मानिए स्वाइन फ्लू हो गया है। इन लक्षणों को डॉक्टर बेशक़ स्वाइन फ्लू न मानें लेकिन हमारी मीडिया ने इन लक्षणों को स्वाइन फ्लू मान लिया है। इस देश में कुछ अख़बारों और न्यूज़ चैनलों ने स्वाइन फ्लू का ऐसा हौव्वा खड़ा किया है, मानों पूरे देश में महामारी फैल गई हो। हर आदमी डरा सा नज़र आता है। इन लक्षणों में एक भी लक्षण दिखते ही वो डॉक्टरों के पास भागा-भागा जाता है सिर्फ ये पता लगाने के लिए उसे स्वाइन फ्लू है या नहीं? बीते शुक्रवार को बेटे को बुखार हुआ। पेट में दर्द भी था। एक दो बार उल्टी- दस्त की शिकायत भी हो चुकी थी। इस तरह से वो पहले भी बीमार पड़ता था। मैं उसे चैरीकॉफ और NICE सिरप देता था। वो ठीक हो जाता था। इस बार मैंने इन दवाओं को खुद देने का ज़ोखिम नहीं उठाया। डॉक्टर के पास ले गया । डॉक्टर ने फिर यही दवाएं लिखीं। मैंने डॉक्टर से परेशान होकर पूछा कि लक्षण तो स्वाइन फ्लू से मिलते –जुलते हैं। तो फिर आप टेस्ट क्यों नहीं करते ? डॉक्टर (जो मेरे घनिष्ठ मित्र भी हैं) ने कहा कि ज़रूरत पड़ी तो जांच भी कर लूंगा।

‘नहीं पता था सभा में फ्री रेसलिंग करानी है’

प्रिय यशवंत भाई, चर्चित और लोकप्रिय वेबसाइट भड़ास4मीडिया पर आपकी रिपोर्ट पढ़ने के बाद जवाब देने से नहीं रोक पा रहा हूं। ये पत्र आप छापे या न छापें, ये आपका लोकतांत्रिक हक़ है। ठीक वैसे ही, जैसे कि आपके लेख पर मेरा जवाब देना। ये कार्यक्रम एसपी की याद में था। ये आपके,  दिलीप मंडल जी, पुष्कर पुष्प जी और परवेज़ अहमद जी के सहयोग से ही हो पाया। उनकी बारहवीं बरसी थीं। ग्यारह बरस तक जिसको जैसे करना था, किया। आपने प्रोत्साहित किया। लिहाज़ा मैं आगे आया। ये श्रद्धाजंलि सभा थी, गोष्ठी या बहस का मंच नहीं था। पूरी दुनिया में (खासतौर पर भारतीय संस्कृति में) ये परंपरा है कि स्मृति या श्रद्धाजंलि सभा में मृतक की अच्छाइयों पर ही बात की जाती है। विवादास्पद बातें इसलिए नहीं होती क्योंकि जवाब देने के लिए वो हमारे बीच नहीं आ सकता। ‘एसपी की याद में’ स्मृति सभा में मुझे नहीं पता था कि नूरा-कुश्ती या फ्री रेसलिंग करवानी है। और न ही ये इरादा था नए पहलवान आकर पुराने पहलवानों को धोबिया पाट देकर हवा में हाथ लहराएं।

झूठ नहीं बोल सकते तो दिल्ली में बोलना बंद करो

[caption id="attachment_15101" align="alignnone"]चंदन का ब्लागचंदन प्रताप सिंह के ब्लाग पर प्रकाशित पोस्ट[/caption]

सत्ताइस जून को पापा को हमसे बिछड़े बारह साल पूरे हो जाएंगे। इन बारह साल के दौरान एक भी पल ऐसा नहीं रहा होगा, जब पापा की याद न आई हो। हर मोड़ पर पापा याद आए। चाहें वो मौक़ा ख़ुशी का रहा हो या फिर ग़म का। कभी अकेले में बैठकर सोचता हूं तो लगता है कि दुनिया में कितना अकेला हूं। एक –एक कर के वो सब साथ छोड़ गए, जिसकी कभी मैंने कल्पना नहीं की। चाहें वो मेरी बुआ (बाबा की बुआ) हों, बाबा हों, पापा हों, नाना हों या फिर मम्मी।

पापा को श्मशान छोड़ अकेले घर लौटा

[caption id="attachment_15099" align="alignright"]एसपी सिंहएसपी सिंह[/caption]दिल्ली में पत्रकारिता करने लगा तो शुरुआत में दैनिक आज के श्री सत्य प्रकाश असीम जी,  दैनिक हिंदुस्तान के के.के. पांडेय जी और साप्ताहिक हिंदुस्तान के श्री राजेंद्र काला जी ने बेहद प्रोत्साहित किया। लेकिन सहीं मायनों में मुझे श्री आलोक तोमर जी ने करंट न्यूज़ के जरिए ब्रेक दिया। पाक्षिक से साप्ताहिक बनने वाली अमित नंदे की पत्रिका की टीम में मुझे आलोक कुमार, कुमार समीर सिंह,  अनामी शरण बबल और फोटोग्राफर अनिल शर्मा जैसे दोस्त मिले। मैं दिल्ली में रहकर भी पापा के साथ नहीं रहता था।  शुरू में तकलीफ हुई। लेकिन पापा ने साफ कहा कि जहां मेरी मदद की जरूरत पड़े, आ जाना, लेकिन इस महानगर में तुम्हें अपने पैरों पर खड़ा होना है। तुम्हे आटा–दाल का भाव मालूम होना चाहिए। खैर, नब्बे के दशक में मुझे ढाई हजार रुपए पगार मिलते थे। पापा ने बस इतना ही कहा था कि कंक्रीट के इस महानगर में राजमिस्त्री भी इतना कमा लेता है। एक अच्छी लाइफ स्टाइल के लिए ये पैसे कम है।

दिल्लीवालों ने बेटा से भतीजा बना दिया

[caption id="attachment_15096" align="alignnone"]एसपी और चंदनएसपी सिंह के शव के साथ बैठे चंदन प्रताप सिंह.[/caption]

27 जून करीब है। एसपी इसी दिन हम लोगों से जुदा हो गए। उनकी याद में उनके पुत्र चंदन प्रताप सिंह का एक संस्मरण पेश है… 

एसपी को मैं पापा कहता हूं। वो मेरे सगे पापा नहीं हैं। न हीं उन्होंने समाज के सामने ढोल पीटकर और न ही लिखा-पढ़ी कर मुझे बेटा बनाया। रिश्तों की उलझन में समझना चाहें तो वो मेरे चाचा थे। जब मैं बोलना सीख रहा था तब मेरे बाबा (दादाजी), आजी (दादीजी) और मम्मी ने कहा कि ये पापा हैं। तब से उन्हें पापा कह रहा हूं। बचपन में बड़ी मुश्किल होती थी सगे पापा और पापा के संबोधन को लेकर। लेकिन घरवालों ने इसका भी तोड़ निकाल दिया।

3 और 4 दिसंबर का कनफ्यूजन अभी तक क्यों है?

(एसपी के जन्मदिन पर पिछले दिनों कोलकाता में हुए आयोजन का संदर्भ लेते हुए चंदन प्रताप अपनी पीड़ा का बयान कर रहे हैं। एसपी की कुछ दुर्लभ तस्वीरें व दस्तावेज मुहैया कराने के लिए भड़ास4मीडिया चंदन का आभारी है)

यशवंत भाई, कोलकाता में सुरेंद्र प्रताप सिंह यानी एस.पी. सिंह के जन्मदिन पर उनकी याद में पत्रकारों और बुद्धजीवियों ने संगोष्ठी का आयोजन किया, इसकी जानकारी आपके प्रतिष्ठित पोर्टल पर तारकेश्वर मिश्र जी के आदरणीय लेख से मिली। बहुत पीड़ा के साथ अपनी दिल की बात कह रहा हूं। आप मुझे जानते हैं। कम से कम एक बार पूछ तो लिए होते कि पापा का जन्मदिन कब होता है। यशवंत जी, हम लोग ऐसे परिवार से आते हैं, जहां पुरखों को जन्मदिन की तारीख याद करना जरूरी नहीं लगता था। मैंने कई विषयों पर अपनी दादी से बात की है।

सभी चैनलों पर आप देख रहे हैं टोटल टीवी

chandan pratap singh13 सितंबर 2008। शाम 6 बजकर 10 मिनट। दिल्ली के करोलबाग के गफ्फार मार्केट में जबरदस्त धमाका। टोटल टीवी पर गफ्फार मार्केट के मोबाइल बाजार से संवाददाता संदीप मिश्र और योगेंद्र लगातार धमाकों की जानकारी दे रहे थे। व्यापारी संघ के एक नेता के फोनो के दौरान टोटल टीवी का स्टूडियो धमाके से दहल उठा। ये सब कुछ लाइव था। जो लोग उस समय टोटल टीवी देख रहे होंगे, वो धमाके की गूंज सुन पाए होंगे। नीचे झांका तो नई दिल्ली हाउस के सामने कई लोग औंधे पड़े थे।