देखते हैं, वे कितना डराते हैं : निशीथ

[caption id="attachment_16784" align="alignleft"]निशीथ रायनिशीथ राय[/caption]सपोर्ट करने के लिए आप सभी का दिल से धन्यवाद कर रहा हूं : उस वक्त मैं दिल्ली में था जब लखनऊ स्थित मेरे आवास से पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों के निर्देश पर उनके लोग सामान फेंक रहे थे. कुछ ऐसे जैसे मेरा घर किसी चोर-डकैत का घर हो. यूपी में सच कहने वाले ही आजकल सरकार और प्रशासन की नजर में चोर-डकैत हो गए हैं और जो असली चोर-डकैत हैं, वे सरकार-प्रशासन के हिस्से बन शराफत का चोला ओढ़ चुके हैं. जब उनका चोला ‘डेली न्यूज एक्टिविस्ट’ (डीएनए) उतारता है तो उन्हें चुभन होती है. उन्हें तकलीफ होती है कि आखिर कोई क्यों उनकी काली दुनिया में खलल डाल रहा है. सब कुछ जो हुआ, वो एक बड़े झटके की तरह था लेकिन ऐसे झटके इतने लगे हैं कि अब ये मेरे जीवन के हिस्से हो गए हैं. सच-सच छाप देना इतना कठिन काम होता होगा, इसकी कल्पना मुझे अखबार प्रकाशित करने से पहले न थी. कई तरह के आरोप मढ़े गए. अखबार न छप सके, कई बहानों से कोशिश हुई. 

निशीथ का आवास किसी और को एलाट करने पर रोक

यूपी सरकार को नोटिस : इलाहाबाद और लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक ‘डेली न्यूज एक्टिविस्ट’ के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर प्रो. निशीथ राय का लखनऊ स्थित आवास जबरन खाली कराने के मामले में नया मोड़ आ गया है. हाईकोर्ट की खंडपीठ ने निशीथ राय की तरफ से दायर रिट को स्वीकार कर लिया है और यूपी सरकार को 15 दिनों के भीतर अपना जवाब दाखिल करने को कहा गया है. साथ ही, इस मामले की सुनवाई होने तक निशीथ राय का खाली कराया गया सरकारी आवास किसी को भी न आवंटित करने का निर्देश दिया है.

माया सरकार की टुच्ची हरकत मीडिया जगत के लिए चुनौती

‘डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट’ के चेयरमैन डॉ. निशीथ राय के लखनऊ में राजभवन कॉलोनी स्थित आवास को जबरन खाली कराए जाने, सामान सड़क पर फेंके जाने और घर के सदस्यों के साथ बदसलूकी किए जाने की घटना ने एक बार फिर अपने देश और प्रदेश में लोकतांत्रिक अधिकारों की हैसियत उजागर की है। डॉ. राय के साथ हुई यह घटना उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के चरित्र के मुताबिक ही है। हैरत इस बात पर जरूर है कि ऐसे राजनीतिकों को उत्तर प्रदेश का नागरिक कैसे सहन करता है और ऐसे शख्स को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक कैसे पहुंचा देता है। इससे प्रदेश के लोगों का विचार-स्तर ही तो जाहिर होता है।

नवनीत सहगल ने धमकाया था निशीथ राय को!

[caption id="attachment_16723" align="alignleft"]नवनीत सहगलनवनीत सहगल[/caption]यूपी शासन के ‘मूक-बधिर-चारण’ अफसरों ने ‘डीएनए’ को सबक सिखाकर अपनी नेता मायावती को दिया जन्मदिन का तोहफा : ‘अखबार को नियंत्रित कर लो अन्यथा जीवन तबाह कर दिया जाएगा…’। यह धमकी दी थी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के सचिव नवनीत सहगल ने। यह खुलासा किया इलाहाबाद और लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट (डीएनए) के चेयरमैन और मैनेजिंग एडिटर डा. निशीथ राय ने। उन्होंने बताया कि कुछ समय पहले ही नवनीत सहगल उनसे मिले थे और इस तरह की सीधी धमकी उन्हें दी थी। निशीथ राय के मुताबिक उनका आवास खाली कराने के लिए शासन के शीर्ष स्तर से साजिश हुई जिसके सूत्रधार सीनियर आईएएस नवनीत सहगल बने। डा. राय ने यह भी कहा कि बिना अपील का मौका दिए उनसे मकान खाली करवाया गया और यह कार्रवाई शाम पांच बजे के बाद की गई जो कि नियम विरुद्ध है।

अखबार मालिक पर फिर बरपा सरकारी कहर

[caption id="attachment_16720" align="alignleft"]प्रो. निशीथ रायप्रो. निशीथ राय[/caption]लखनऊ से बड़ी खबर है. माया सरकार के कारनामों का खुलासा करने के लिए चर्चित हिंदी दैनिक डेली ‘न्यूज एक्टिविस्ट’ (डीएनए) के चेयरमैन प्रो. निशीथ राय के लखनऊ स्थित सरकारी आवास को राज्य और जिला प्रशासन ने धावा बोलकर जबरन खाली करा लिया है. यह आवास उन्हें लखनऊ विश्वविद्यालय स्थित रीजनल सेंटर फार अर्बन एंड इनवायरमेंटल स्टडीज का निदेशक होने के चलते मिला हुआ था. इस सरकारी निवास का पता 31, राजभवन कालोनी है. प्रदेश सरकार के लोगों ने कई बार यह आवास खाली कराने की कोशिश की पर हर बार उन्हें कोर्ट के दखल से मुंहकी खानी पड़ी. इस बार गुपचुप तरीके से कागजी कार्यवाही पूरी कर धावा बोला. अखबार मालिक का सारा सामान सड़क पर फिंकवा दिया.

अखबार मालिक नहीं झुकता है तो झेलता है

प्रो. निशीथ रायप्रो. निशीथ राय के पीछे पड़ी माया सरकार : सरकारी आवास खाली करने का तुगलकी फरमान : यूपी के एक तेवरदार अखबार के मालिक निशीथ राय सत्ता के निशाने पर बने हुए हैं। सच बोलने-लिखने की जिद का खामियाजा उन्हें लगातार भुगतना पड़ रहा है। लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाले अखबार डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट (डीएनए) के चेयरमैन प्रो. निशीथ राय सरकार की पंगेबाजी, उत्पीड़न और दमन से लड़ते हुए कई बार कोर्ट की शरण ले चुके हैं, पर सरकार के आगे झुके एक बार भी नहीं। सत्ता को न झुकना हमेशा से बुरा लगता रहा है, और आज भी लग रहा है। अखबार जब बिजनेस बढ़ाने के माध्यम बन गए हों, सत्ता से सांठगांठ कर लाभ-दाम कमाने के उपक्रम बन चुके हों, ऐसे में कोई अखबार लाभ, प्रलोभन, बिजनेस को लात मार सिर्फ जनपक्षधर खबरों को अपना एजेंडा माने और उसे ही जिए तो उसे, सबको सत्ता के चरणों में देखने के आदी सत्ताधीशों का कोपभाजन तो बनना ही पड़ेगा।