अखबार मालिक नहीं झुकता है तो झेलता है

प्रो. निशीथ रायप्रो. निशीथ राय के पीछे पड़ी माया सरकार : सरकारी आवास खाली करने का तुगलकी फरमान : यूपी के एक तेवरदार अखबार के मालिक निशीथ राय सत्ता के निशाने पर बने हुए हैं। सच बोलने-लिखने की जिद का खामियाजा उन्हें लगातार भुगतना पड़ रहा है। लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाले अखबार डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट (डीएनए) के चेयरमैन प्रो. निशीथ राय सरकार की पंगेबाजी, उत्पीड़न और दमन से लड़ते हुए कई बार कोर्ट की शरण ले चुके हैं, पर सरकार के आगे झुके एक बार भी नहीं। सत्ता को न झुकना हमेशा से बुरा लगता रहा है, और आज भी लग रहा है। अखबार जब बिजनेस बढ़ाने के माध्यम बन गए हों, सत्ता से सांठगांठ कर लाभ-दाम कमाने के उपक्रम बन चुके हों, ऐसे में कोई अखबार लाभ, प्रलोभन, बिजनेस को लात मार सिर्फ जनपक्षधर खबरों को अपना एजेंडा माने और उसे ही जिए तो उसे, सबको सत्ता के चरणों में देखने के आदी सत्ताधीशों का कोपभाजन तो बनना ही पड़ेगा।

निशीथ राय प्रोफेसर हैं। आजकल लखनऊ विश्वविद्यालय स्थित भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय द्वार वित्त पोषित रीजनल सेंटर फार अर्बन एंड इनवायरमेंटल स्टडीज, लखनऊ के निदेशक पद पर कार्यरत हैं। उन्हें इस पद पर होने के नाते सरकारी निवास मिला हुआ है। इस सरकारी निवास का पता 31, राजभवन कालोनी है। माया सरकार के चारण नौकरशाह जब हर हथियार से निशीथ राय को झुकाने में असफल हो गए तो अब घर पर धावा बोलने का इरादा बना लिया है। निशीथ राय को 12 जून को लिखित फरमान सुना दिया गया है। आवंटन निरस्त किया जाता है, इस सरकारी आवास को 30 दिन में खाली करो। वजह?

वही पुराना राग- डीएनए अखबार का चेयरमैन होने के चलते निशीथ राय ने घर का पता लिखत-पढ़त में इस सरकारी निवास को बताया है, जो अनुचित है। ऐसी नोटिसें पहले भी आईं और निशीथ राय लिखित जवाब देकर समझा चुके हैं कि हे सरकारी भइयों, डीएनए अखबार इस 31, राजभवन कालोनी से नहीं निकलता बल्कि इसका संचालन दो जगहों से होता है। अखबार छपता है गोमतीनगर स्थित मशीन से और अखबार में प्रकाशित होने वाली खबरों को लिखने का काम होता है ‘मीडिया हाउस’ में जो 16/3 घ, सरोजिनी नायडू मार्ग पर स्थित है। 31 राजभवन कालोनी सरकारी काम करने के चलते नियमतः आवंटित सरकारी निवास है जहां से अखबार का कोई काम नहीं होता। पर सरकार सुने तब जब उसका इरादा नेक हो। सरकार ने 11 जुलाई तक आवास खाली करने का तुगलकी फरमान सुना दिया है।

जब कोई सरकार आपके पीछे हाथ धोकर पड़ जाए, पूरे फौज-फाटे को साथ लेकर आपको उखाड़ने में जुट जाए तो आप क्या करेंगे? आप जो करेंगे वही निशीथ राय ने भी किया है। वे हाईकोर्ट चले गए हैं। निशीथ राय और हाईकोर्ट का नाता कोई नया नहीं है। सरकारी दमनचक्र के खिलाफ उन्हें कई बार हाईकोर्ट में जाकर गुहार लगानी पड़ी है। प्रदेश सरकार ने निशीथ राय को सरकारी आवास से निकालने से पहले सरकारी पद से ही हटा देने की कोशिश की। निदेशक पद से हटाने के लिए राज्य सरकार ने अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करते हुए भारत सरकार द्वारा रीजनल सेन्टर को प्राप्त वित्तीय सहायता का राज्य सरकार के आडिट विभाग से स्पेशल आडिट की व्यवस्था कराके फंसाने की कोशिश की। निदेशक के रूप में कार्य करने के दौरान सरकार द्वारा प्रदत्त शासकीय आवास को खाली कराने हेतु लगातार कोशिश की गयी एवं आवास आवंटन का आदेश निरस्त कर दिया गया था।

राज्य सरकार ने तो इस अखबार को ही न छपने देने की तैयारी कर ली थी। अखबार प्रकाशन से पहले ही सरकार तक यह सूचना पहुंच चुकी थी कि एक जनपक्षधर अखबार मैदान में आ रहा है। सरकार और उसके नौकरशाह अखबार न निकलने देने के लिए साजिशें रचने व लागू करने में जुट गए। प्रकाशन की तय तारीख से पहले अखबार की प्रिटिंग मशीन को सील करा दिया। अखबार के कार्यालय की बिजली कटवा दी। काफी संकटों एवं दिक्कतों के बावजूद जब यह अखबार 13 अक्टूबर, 07 को लखनऊ से निकला तो लोगों ने एक बार फिर कहा- जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।

राज्य सरकार के उत्पीड़नों से आजिज अखबार के चेयरमैन एवं प्रबन्ध सम्पादक प्रो. निशीथ राय इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ पहुंचे। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप पर राज्य सरकार की दमनात्क कार्यवाही पर कुछ सीमा तक अंकुश लगा। शासन को प्रिटिंग मशीन की सील खोलनी पड़ी। कटी बिजली को जोड़ना पड़ा। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि निदेशक पद पर कार्य करने के दौरान प्रो. निशीथ राय के कार्य सम्पादन में व्यवधान नहीं डाला जायेगा एवं किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। चूंकि रीजनल सेन्टर भारत सरकार से वित्त पोषित है,  इसलिए राज्य सरकार का हस्तक्षेप गैर-वाजिब है। कोर्ट के आदेशों के चलते अखबार तो निकलता रहा लेकिन सरकार के निर्देश पर ब्यूरोक्रेसी ने परेशान करना जारी रखा। अखबार निकले कई वर्ष हो जाने के बावजूद लखनऊ जिला प्रशासन ने प्रबंधन को अखबार के घोषणापत्र की सत्यापित प्रतियां नहीं दीं हैं। इसके न मिलने से अखबार जेनुइन विज्ञापन के लिए डी.ए.वी.पी. में आवेदन तक नहीं कर सकता है।

इन हालात पर प्रो. निशीथ राय बी4एम से सिर्फ इतना कहते हैं- ‘वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमां, हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है’।


प्रो. निशीथ राय के बारे में और ज्यादा जानने के लिए क्लिक करें- ”वे अब समझ गए हैं, मैं भागने के लिए नहीं आया हूं”

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