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कुठियाला जी, हम सब आपके इरादे जानते हैं

भोपाल से आ रही आवाज़ें यहां दिल्ली से लेकर देहरादून, कोलकाता से कानपुर और रांची से रायपुर तक हम सभी पूर्व छात्रों के कानों में पिघलते लोहे सी भर रही हैं। इस बात से हममें से कम लोग ही असहमत होंगे कि हम सब पूर्व छात्रों के लिए भोपाल दूसरी मातृभूमि और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय दूसरे घर सरीखा है। एक परिवार में हमने जीवन का आरम्भ किया।

भोपाल से आ रही आवाज़ें यहां दिल्ली से लेकर देहरादून, कोलकाता से कानपुर और रांची से रायपुर तक हम सभी पूर्व छात्रों के कानों में पिघलते लोहे सी भर रही हैं। इस बात से हममें से कम लोग ही असहमत होंगे कि हम सब पूर्व छात्रों के लिए भोपाल दूसरी मातृभूमि और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय दूसरे घर सरीखा है। एक परिवार में हमने जीवन का आरम्भ किया।

एक इंसान बनने के गुण पाए। भोपाल के इस विश्वविद्यालय के परिवार में हम न केवल एक पत्रकार बल्कि एक इंसान के तौर पर और बेहतर हुए। ज़ाहिर है हम सबके बीच तमाम झगड़े और मतभेद रहते थे, जैसे कि हर परिवार में होते हैं। केव्स के तमाम छात्रों के लिए पी.पी. सर एक खलनायक सरीखे थे तो एमजे के लिए डॉ. श्रीकांत सिंह लेकिन परिवार तो एक ही होता है और हमेशा रहा। लेकिन अब कुछ बाहरी तत्व परिवार में आ गए हैं, जो पूरे परिवार की एकता, इसकी सामाजिक प्रतिष्ठा और इसकी ताकत में सेंध लगाने की कोशिश में हैं। कुठियाला जी हम सब आपके इरादे जानते हैं।

सम्भवतः एशिया का पहला विश्वविद्यालय, जो पत्रकारिता के प्रशिक्षण के लिए शुरू किया गया था। देश के सबसे प्रतिष्ठित, जुझारू और महान पत्रकार-साहित्यकार और स्वाधीनता सेनानी पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की स्मृति में इसको समर्पित किया गया। लेकिन भोपाल में जो कुछ हो रहा है वो शायद इससे पहले नहीं हुआ है। विश्वविद्यालय में कुलपति महोदय की तानाशाही चरम पर है और कुछ ही महीने में भोपाल भी वर्धा बनने की राह पर है। बल्कि कुठियाला जी विभूति नारायण राय से भी आगे निकलने के मूड में दिखते हैं।

कुठियाला जी के समर्थकों से एक अनुरोध करना चाहूंगा कि कम से कम वो लोग उनकी हिमायत न करें जो माखनलाल में न तो कभी पढ़े हैं और न ही उन्होंने वहां पढ़ाया है। एक और अनुरोध है इन सब से कि कम से कम शिक्षा के संस्थानों को किसी राजनैतिक विचारधारा की लॉबीइंग का अड्डा न बनने दें। हम पत्रकार बनने आए हैं, हमें खुद समझने दें कि हमें कैसा विश्वविद्यालय चाहिए और कैसे शिक्षक।

देश के सबसे बड़े पत्रकारिता विवि के नए कुलपति पर उनकी चयन प्रक्रिया से ही अंगुलियां उठती रही हैं। लेकिन फिर भी राज्य सरकार ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति का ताज प्रो. बीके कुठियाला के सिर पहना दिया। माना जाता है है कि इस मामले में राज्य सरकार पर संघ का दबाव था, क्योंकि कुठियाला की संघ से नज़दीकियां जगज़ाहिर हैं। उनके आते ही विवि के कामकाज से माहौल तक तमाम घालमेल शुरु हो गए और बात निकली तो दूर तलक आ गई। खैर अभी तो बात केवल कुठियाला के कुकर्मों की….

कुठियाला के कुरुक्षेत्र में रीडर से लेकर भोपाल कुलपति के सफर के अलग-अलग पड़ावों का फॉलोअप कई गंभीर तथ्य सामने लाता है। प्रो. कुठियाला के अकादमिक करियर और छवि पर दर्जनों बार गम्भीर आरोप लग चुके हैं। यही नहीं, प्रो. कुठियाला के खिलाफ कुरुक्षेत्र न्यायालय में आईपीसी की धारा 417, 420, 423, 465, 468 और 471 का मामला भी विचाराधीन है। आरटीआई में प्राप्त दस्तावेज में इस बात का खुलासा भी हुआ कि उन्होंने कुरुक्षेत्र विवि में रीडर बनने के लिए खुद को एक साल अधिक अनुभवी बताया और डायरेक्टर पद के आवेदन में अपने हस्ताक्षर ही नहीं किए।

हैरानी है कि इस धोखाधड़ी के ही दम पर आज वे पत्रकारिता एवं संचार विवि के कुलपति बन गए जबकि उनके पास पत्रकारिता के नाम पर पुणे एफटीआईआई से सिर्फ एक महीने का एक प्रमाणपत्र है। पर कुलपति महोदय इसे अपने खिलाफ़ साज़िश बताते हैं। ज़रा सोचिए जिस आदमी के पास पत्रकारिता की डिग्री नहीं और न ही वो कोई बड़ा पत्रकार है, सबसे बड़े पत्रकारिता विश्वविद्यालय का कुलपति बना बैठा है।

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति बनते ही प्रो. बीके कुठियाला ने अंधों की तर्ज पर अपनों में रेवड़ियां बांटनी शुरु की, कुठियाला ने सबसे पहले अपने अधीन पीएचडी करने वाले छात्र सौरभ मालवीय को विवि में 12000 रुपए मानदेय पर रख लिया। यह नियुक्ति विधिवत प्रक्रिया के तहत नहीं की गई। और अब सौरभ मालवीय विश्वविद्यालय में जूनियर कुलपति की तरह घूमते और आदेश देते दिखते हैं।

पर ये पहला वाकया नहीं था, इससे पहले प्रो. कुठियाला ने कुरुक्षेत्र विवि और गुरु जंबेश्वर यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी हिसार में अपने कई मुंहलगों को पीएचडी भी करवा डाली थी। 4 अप्रैल 2010 को हुई एलुमनी मीट में भी विवि के एक पूर्व छात्र को पुस्तक के संपादन के लिए 20,000 रुपए दे दिए गए, इस पर भी सवाल उठते रहे। कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र विवि में भी प्रो. कुठियाला ने रीडर और डायरेक्टर का पद गलत तरीके हासिल किया।

इसकी शिकायत सितम्बर 2009 में राष्ट्रपति से भी की गई। इसी शिकायत के आधार पर 10 मार्च 2010 को मानव संसाधन मन्त्रालय के अन्तर्गत उच्च शिक्षा विजिलेंस सचिव केएस महाजन ने अपने पत्र क्रमांक 36012/31/ पीएस/2010- पीजी में लिखा कि एक माह के अन्दर इस सिलसिले में जो भी कार्रवाई की जाए उससे शिकायतकर्ता को सूचित किया जाए। लेकिन समय अवधि गुजरने के बाद भी जांच का पता नहीं चला। और जब तक कुछ हो पाता कुठियाला साहब भोपाल चले आए….

कुठियाला साहब ने आते ही पुराने छात्रों को एक छत के नीचे मिलाने के लिए 4 अप्रैल को एलुमनी मीट करवाई। पूर्व छात्रों के अनुभव का संग्रहण एक पुस्तक के रूप में किया गया। इसे मीट में बिक्री के लिए उपलब्ध कराया गया। एक हजार पुस्तकें प्रकाशित की गई। इनमें से सौ पुस्तकें भी नहीं बिक पाई। पुस्तक का संपादन विवि के एक पूर्व छात्र ने किया। उन्हें इस काम के लिए बीस हजार रुपए का भुगतान किया गया। एक बात और बताते चलें कि पूर्व छात्रों के अनुभव के नाम पर इन महोदय ने ज़्यादातर केवल अपने जानने वाले पूर्व छात्रों के अनुभव संग्रहित किए जबकि कई पूर्व छात्र तमाम बड़े संस्थानों में शीर्षतम पदों पर हैं, उनका कहीं नाम भी नहीं है।

विवि में पीएचडी के लिए रजिस्टर्ड सौरभ मालवीय विवि में ही नौकरी करने लगे। सौरभ को यह नौकरी पाने के लिए किसी प्रतियोगी परीक्षा या साक्षात्कार का सामना नहीं करना पड़ा। सौरभ जिनके अधीन पीएचडी कर रहे हैं, वे विवि के कुलपति हैं और इसीलिए सौरभ पूरे विश्वविद्यालय में जूनियर कुलपति के तौर पर टहलते और नसीहतें देते नज़र आ सकते हैं। जिनको यकीन न हो वो एक बार परिसर में जाकर देख आएं।

एक और शिष्य है इनके, कुरुक्षेत्र में प्रो. कुठियाला ने डायरेक्टर पद पर रहते हुए राजवीर सिंह को रीडर पद शिक्षण के अनुभव को देखते हुए रखा। उन्होंने अपने शिक्षण अनुभव में कुरुक्षेत्र विवि व गुरू जंबेश्वर विवि हिसार का अनुभव दिखाया, जबकि राजवीर हरियाणा जनसंपर्क विभाग में डिस्ट्रिक पब्लिक रिलेशन ऑफिसर पद पर कार्यरत थे। रीडर पद के इस भर्ती की स्क्रूटनी और सलेक्शन कमेटी दोनों में प्रो. कुठियाला सदस्य थे। कुठियाला ने इस तथ्य को जानबूझकर नज़रअन्दाज किया, क्योंकि कुठियाला पिछले 1 वर्षों से इन दोनों विवि में विभागाध्यक्ष के तौर पर जुड़े रहे हैं। इन दोनों विवि में राजवीर नाम का कोई नियमित अध्यापक नहीं है। इसके खिलाफ कुरुक्षेत्र न्यायालय में मामला विचारधीन है। इसके अलावा कुरुक्षेत्र विवि में राजवीर सिंह के प्रोफेसर पद के नियुक्ति के खिलाफ न्यायालय में डॉ. प्रमोद कुमार जेना ने याचिका दायर कर रखी है।

प्रो. कुठियाला पर कुरुक्षेत्र विवि में अपने चहेतों को 2006 में पीएचडी कराने के भी आरोप लगे हैं। पीएचडी में अपनों को कम योग्यता पर रखने के लिए उमीदवार नीरज नैन और रविप्रकाश शर्मा ने कुरुक्षेत्र के अदालत में याचिका दायर की। विभागाध्यक्ष होने के नाते प्रवेश प्रक्रिया में गड़बड़ी के लिए प्रो. कुठियाला को कई बार पेशी में जाना पड़ा। अदालत में याचिका से चिढ़कर कुठियाला ने नीरज नैन को एमफिल में भी प्रवेश नहीं दिया। नीरज ने एमफिल में प्रवेश के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कोर्ट डायरेक्शन लेकर दाखिला लिया। प्रो. कुठियाला ने अपने डायरेक्टर पद के कार्यकाल में अपने ही पीएचडी छात्र देवव्रत सिंह को रीडर बनाया। इसके खिलाफ भी पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में केस नंबर 210/2008 के तहत पिछले दो वर्षों से केस चल रहा है। जिसकी अगली सुनवाई 20 अगस्त है।

प्रो. कुठियाला ने मैसूर यूनिवर्सिटी में पीएचडी के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया, लेकिन समय सीमा के अन्दर पूर्ण नहीं कर पाए और तो और प्रो. कुठियाला ने पंजाब यूनिवर्सिटी से एमएससी एन्थ्रोपोलॉजी और मेरठ यूनिवर्सिटी से एमए सोशियोलॉजी की उपाधि हासिल की है, लेकिन पत्रकारिता एवं संचार की कोई उपाधि नहीं है। इसके बावजूद उन्हें कुरुक्षेत्र विवि में रीडर बना दिया गया। 1993 में रीडर बने कुठियाला 1996 में ही गुरु जंबेश्वर विवि में प्रोफेसर बन गए। बाद में कुठियाला कुरुक्षेत्र विवि में प्रोफेसर तौर पर आ गए।

पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग को बन्द कर इन्हें मास कम्‍युनिकेशन इंस्टीट्यूट में डायरेक्टर बना दिया गया। आरोप है कि विभाग को इंस्टीट्यूट की शक्ल देने में इनके डायरेक्टर पद की महत्वाकांक्षा छुपी थी। कुरुक्षेत्र विवि के मास कम्युनिकेशन विभाग में रीडर बनने के लिए प्रो. कुठियाला ने 3 फरवरी, 1994 को आवेदन किया। फॉर्म में उनके हस्ताक्षर नहीं थे। दस्तावेज भी संलग्न नहीं थे।

रीडर पद के लिए कुरुक्षेत्र विवि में आवेदन के समय प्रो. कुठियाला ने खुद को अधिक अनुभवी बताया। प्रो. कुठियाला आईआईएमसी, दिल्ली में मार्च 1983 से दिसम्बर 1993 तक रहे, लेकिन उन्होंने बॉयोडाटा में खुद को 28 मार्च 1982 से कार्य करना बताया है अर्थात एक वर्ष का अधिक अनुभव बताकर लेक्चरर से रीडर बने। इस बात का खुलासा सूचना के अधिकार में प्राप्त उनके बायोडाटा से हुआ। प्रो. कुठियाला के कुरुक्षेत्र विवि इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन एण्ड मीडिया टेक्नोलॉजी के डायरेक्टर पद के फार्म पर भी खुद के हस्ताक्षर नहीं है, फिर भी यूनिवर्सिटी और कमेटी ने उन्हें डायरेक्टर पद पर नियुक्ति दे दी।

भोपाल आते ही कुलपति जी को जैसे मुक्ताकाश मिल गया, क्योंकि एक बड़े नेता का वरदहस्त सर पर जो था। तो आते ही तुगलकी फरमानों की झड़ी लगा दी, सौरभ मालवीय के अलावा भी कई ऊल जुलूल नियुक्तियां की, एक प्रभावशाली खास व्यक्ति की पत्नी कि परिसर में असिस्टेंट प्लेसमेंट अधिकारी के तौर पर नियुक्ति करवा दी, हालांकि उसके लिए प्रवेश परीक्षा हुई पर वो महिला उस परीक्षा के पहले ही विश्वविद्यालय ज्वाइन कर चुकी थी। इसके अलावा एक और बेहूदा फैसला ले डाला कि विश्वविद्यालय में बिना प्रवेश परीक्षा और साक्षात्कार के प्रवेश लिए जाएंगे। ज़रा सोचिए कि पत्रकार बनने की लालसा लिए छात्रों के लेखन और ज्ञान का स्तर भी नहीं देखा जाएगा…..बेटा बीएससी में फर्स्ट डिवीज़न हो, आओ बेटा पत्रकार बन जाओ……

इसके बाद तो एक एक कर के अनुशासन और न जाने किस किस चीज़ के नाम पर कुलपति हद से आगे बढ़ते चले गए। पुस्तकालय के अखबार तक सेंसर हो कर, ख़बरें काट कर छात्रों के पास पहुंचने लगे, किसी तरह के सामूहिक आयोजन के खिलाफ़ अघोषित फ़तवा जारी हो गया और तो और लड़कों से कुलपति महोदय परिसर में संघ की शाखा तक लगवाने की बात करने लगे….कम्प्यूटर लैब शाम पांच बजे बंद होने लगी….और पुराने कर्मचारियों के हितों के खिलाफ़ अजीबोगरीब निर्णय होने लगे। जो कुलपति अनुशासन और नीतियों कि बात करता है वो सरकारी खर्चे पर अमेरिका घूम आया और अपने लिए महंगा मकान किराए पर ले लिया….ज़ाहिर है कोई भी विद्रोही हो जाएगा फिर ये तो पत्रकारिता के छात्र ठहरे….शिक्षक भी विरोध में उतर आए तो रोज़ नए हथकंडे।

मैं नहीं जानता कि पी.पी. सर दोषी हैं या नहीं, पर उनको जिस वक्त पद से हटाया गया उसकी मंशा को लेकर संशय होना स्वाभाविक है। कुठियाला जी के अब तक के रिकॉर्ड को देखते हुए इसमें कोई शक़ नहीं रह जाता है। पर एक और ख़बर कि विश्वविद्यालय में जो नोटिस पत्रकारिता विभाग के मुखिया को भेजा गया है, वही नोटिस अब कुलपति और प्रशासन को भी भेज दिया गया है तो क्या इसी लीक पर चलते हुए कुलपति को भी इस्तीफा देकर जांच पूरी होने का इंतज़ार करना चाहिए? अपने सभी न्यायप्रिय मित्रों से इस सवाल का जवाब चाहूंगा….

तीसरी बात ये कि जिस तरह की अभद्रता पत्रकारिता विभाग के छात्रों ने संजय द्विवेदी जी के साथ की उसकी जितनी निंदा हो कम है, हालांकि अब चूंकि छात्रों ने सार्वजनिक माफ़ी मांगी है तो उनको क्षमा कर देना चाहिए। पर एक बात हमें समझनी होगी कि ये सारा घटनाक्रम इसीलिए पैदा किया गया कि छात्रों और शिक्षकों में फूट पड़े और ये आंदोलन राह से भटक जाए। इसलिए सभी से एक अपील करना चाहूंगा कि कम से कम इस आंदोलन को अपने उद्देश्य से न भटकने दें और इसे इसके अंजाम तक पहुंचाएं। कुठियाला जैसे लोग किसी भी शिक्षण संस्था में नहीं होने चाहिए और इसके लिए जो कुछ भी किया जाना चाहिए किया जाए।

भोपाल से कुछ ही घंटे की दूरी पर वर्धा में एक और आतंकवादी कुलपति विश्वविद्यालय को अपनी बपौती माने बैठा है और उसी का एक और तालिबानी भाई भोपाल में आ गया है। कुलपति कुठियाला आप ज़ाहिर तौर पर बेहद शातिर हैं पर याद रखें कि हम भी बेवकूफ नहीं हैं। जब जनता जागती है तो सिंहासन हिलते ही हैं। भोपाल और विश्वविद्यालय हमारे लिए घर है, और यहां के शिक्षक हमारे अभिभावक, किसी भी कीमत पर हमारे बीच के झगड़ों का फ़ायदा कोई बाहरी नहीं उठा पाएगा…..फूट डाल कर राज करना पुरानी नीति हो गई है…..अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कोई नहीं रोक सकता…..हम चीखेंगे…चिल्लाएंगे….शोर मचाएंगे….विश्वविद्यालय किसी की निजी संपत्ति नहीं है….ये आपको समझाएंगे…..हंगामा अभी तो शुरू हुआ है….ताबूत की आखिरी कील जड़ी जानी अभी बाकी है…..

जनता? हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली,
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।

जनता?हां,लंबी -बड़ी जीभ की वही कसम,
“जनता,सचमुच ही, बड़ी वेदना सहती है।”
“सो ठीक, मगर, आखिर, इस पर जनमत क्या है?”
‘है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?”

मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;
अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

-रामधारी सिंह ‘दिनकर’

लेखक मयंक सक्सेना युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार हैं. माखनलाल से पत्रकारिता की डिग्री लेने के बाद कुछ दिनों तक यायावरी की. जी न्यूज से जुड़कर करियर की शुरुआत की. वहां से सीएनईबी पहुंचे और फिर नौकरी छोड़कर कई महीने विचरण करते रहे. इन दिनों यूएनआई टीवी के साथ जुड़े हुए हैं. उनसे संपर्क [email protected]  के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. ravi

    September 28, 2010 at 12:16 pm

    sahi hai mayank ji. kuthiyala ne to ab apki jankari se aage jakar question paper bhi mp ke bahar chhapwaya hai. rahi bat dusron ke bolne ki to jara sochiye ki anil soumitra kyon nahi bolenge. aap bhi jante hai hai ki unki wife ko assistant placement officer bana diya kuthiyala ne. aisi mai bahut kartute janta hun vc ki jise mai likh pane me bhi sharmindagi anubhaw kar raha hun. waise ek chahat hai ki mcu par kalan na lage. phir apne jambeswar ki bat ki hai to wo to aaj bhi delhi ke bachhon ko khaskar iimc ke student ko paise ke bal par sidhe mass com second year me admissin deta hai. ab kya kahen taras aati hai aj ke mahol par…

  2. namit shukla

    September 28, 2010 at 1:07 pm

    aapne kuthiyala ji ki poori pol patti khol di hai. aab hakikat sabhi ke samne hai.
    virodhiyo ye socho ki PP Singh me aaisa kya hai. ki poore desh ke long unke liye Samne aa gaye hai. vo dusre Gandhi baba hai. ye samjlo. jeet ka bigol baj choka hai aur virodhi parast honge.
    aawaj do hum ek hai. jai pp baba ki

  3. मयंक सक्सेना

    September 28, 2010 at 2:14 pm

    रवि जी,
    आप अगर इतना जानते हैं तो दूसरों के लिखने की प्रतीक्षा क्यों कर रहे हैं….क्यों नहीं खुद कुछ लिखते हैं….नहीं तो मुझे ही तथ्य उपलब्ध करा दें….मैं ही उनको सामने ले आऊंगा…..अभिव्यक्ति के ख़तरे तो उठाने ही होंगे…

  4. मयंक सक्सेना

    September 28, 2010 at 2:17 pm

    नमित जी,
    पी पी सर गुरू हैं….वो सर माथे पर….लेकिन चापलूसी में अंधें न हों….अति न करें….क्या और कैसी तुलना कर रहे हैं ज़रा सोचा करें….अगर वर्तमान पत्रकार हैं तो भी…और अगर भविष्य के हैं तो और ज़्यादा…..आपकी ऐसी अतिरंजित बातों से पीपी सर की प्रतिष्ठा बढ़ेगी नहीं….बल्कि मज़ाक ही बनेगा….पी पी सर निसंदेह विद्वान हैं….अपने छात्रों के प्रति उनके समर्पण का मैं कायल हूं…पर आपकी गांधी वाली उपमा से खुद पीपी सर भी सहमत न होंगे….न यकीन हो तो पूछ कर देख लें….आंदोलन को सही दिशा में ले जाएं….किसी का महिमामंडन कर के इसे अजीबोगरीब शक्ल न दें….

  5. garima

    September 28, 2010 at 3:40 pm

    shabash mayank… bina lag lapet ke sach bata tumne apne gyan sthali ko sahi sandesh diya hai..

  6. Harendra narayan

    September 29, 2010 at 6:00 am

    Kuthial saab se itni khunnas hai to bloging chhor Jabalpur High Court jaye paltu patrakaro ka gang.,dayar karePIL. Kanuni ladai court me lade jaye,internet pe nahi.mitro mere patrakar sathiyo ! koi dhudh ke dhule nahi hai,aaj daroo evam shabaw paker kuch likh sakte hai.,buy…

  7. shekh Mudassar

    September 29, 2010 at 6:09 am

    apke khabro me jaan najar aati hai. PP sir gandhi hai but unke student ne vihyalay ke Garima ko thes pahuchaya hai. Unka andolan agar jayaj tha to unhe hinsa ka rasta to nhi apnana chaiye tha. but unke jeet hue hai. or main kahena chaoga ke ap in khabro ko media me aache se lae taki VC ke pole har koi jan sake.

  8. scam शिव

    September 29, 2010 at 6:33 am

    मयंक सर
    पत्रकारिता मे कलम हाथ में लेने पर इंसान जज की तरह हो जाता है. लेकिन अक्सर लोग भावनात्मक होकर भडाश निकलते है जिसके लिए यहाँ बेहतर मंच होता है. पिछले कुछ दिनों से जिसे जो लग रहा है लिख रहा है और अफवाह, भड़ास निकल रहा है इसे में आपका विश्लेषण और दूरदर्शिता काबिले तारीफ है. मै आपकी हर बात से सहमत हु क्योंकि सच है
    धन्यवाद

  9. मोहित पाण्डेय

    September 29, 2010 at 7:50 am

    मयंक जी मैं थोडा सा कुछ आप के कथनों के विषय में जानना चाहता हूँ……
    १- आप एक तरफ गुरु के सम्मान की बात कर रहे है और दूसरी तरफ कुलपति के लिए किस तरह के शब्द प्रयोग कर रहे है….. एकलब्य से गुरु ने अंगूठा मांग लिया था मगर उन्होंने फिर भी सम्मान नहीं छोड़ा……!!!
    २- प्लेसमेंट सेल में नियुक्ति किसकी होनी चाहिए आप के अनुसार…..??? जो विद्यार्थियों की नियुक्ति करा सके या सिर्फ पद भरने के लिए……???
    ३- संघ की भाषा में शाखा कहे या आप की भाषा में व्यायाम क्या इसको प्रोत्साहित करना गलत है…???
    ४- अगर आप मुझमे कुछ ऐसा देखते है की मै संस्थान के लिए कुछ अच्छा कर सकता हूँ तो क्या मुझको आप रख लेंगे या किसी ऐसे व्यक्ति को रखेंगे जिसको आप ठीक से जानते हे नहीं…….???
    ५- क्या आप ने कभी संघ परिवार के द्वारा किये गए अच्छे कार्यों को भी लिखा व पढ़ा है….????

  10. मोहित पाण्डेय

    September 29, 2010 at 8:14 am

    मयंक जी मैं आप से कुछ जानना चाहता था…….
    १- एक तरफ आप गुरु के सम्मान की बात कर रहे हैं और दूसरी तरफ कुलपति के लिए किस तरह के शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं….??? एकलब्य के गुरु ने उनसे अंगूठा मांग लिया था फिर भी सम्मान उन्होंने कम नहीं किया… क्या उन्होंने गलत किया था….???
    २- प्लेसमेंट विभाग में किसकी नियुक्ति होनी चाहिए…..??? जिसमे विद्यार्थियों को नियुक्त कराने की हैसियत हो या सिर्फ पद भरने के लिए…..???
    ३- आप के शब्दों में कहे व्यायाम या संघ के शब्द में कहे शाखा क्या इसको प्रोत्साहित करना गलत है…???
    ४- अगर आप मेरे अन्दर देखते है की मै संसथान के लिए कुछ कर सकता हूँ तो आप मुझको रख लेंगे या जिसको नहीं जानते उनको रखने के लिए परीक्षा लेंगे….???
    ५- आप ने कभी संघ परिवार की अच्छी बातोंको कही पढ़ा या लिखा है….??? संघ परिवार है किसी व्यक्ति का संघ नहीं है…. और हर बात में संघ का नाम लाना पूरी तरह गलत है….. माखनलाल में संघ के योगदान की भी चर्चा कभी कीजिये…. नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पहलुओ को देखिये…….

  11. मयंक सक्सेना

    September 29, 2010 at 9:25 am

    मोहित मैं भी आपसे कुछ जानना चाहूंगा,
    1. क्या कुठियाला जी के बारे में सारे तथ्य जानने के बाद भी आप उनकी तुलना द्रोणाचार्य से करेंगे…और द्रोणाचार्य का भी उनके पापकर्म के लिए सर उतार ही लिया गया था?
    2. क्या मैंने कहीं भी संघ के अच्छे कार्यों की बुराई की….क्या ये लेख संघ पर आधारित है, जो मैं ये विश्लेषण करूं?
    3. क्या कोई विचारधारा किसी को प्रिय है तो वो थोपी जाएगी?
    4. क्या आप कुठियाला जी को इतना महान मानते हैं ?
    5. क्या कुलपति द्वारा नियुक्त लोग संस्थान के लिए एक धरोहर हैं?
    6. जिन महिला को नियुक्त किया गया है उन्होंने प्लेसमेंट के लिए तीर मारे हैं, क्या आप बता सकते हैं कि अभी आप कहां काम कर रहे हैं…और क्या इसमें उन महिला ने कोई मदद की है….क्या उन महिला को बीते वर्षों में इस काम का कोई अनुभव है?
    7. शाखा में व्यायाम होता है तो उसे व्यायामशाला में लगाएं…पार्कों में लगाएं….बेहतर हो कि संस्थान को विद्यार्थियों की इतनी चिंता है तो बेहतर और निष्पक्ष पत्रकारिता सिखाई जाए….न कि व्यायाम कराया जाए…..विद्यार्थी स्वयं अपने स्वास्थ्य का खयाल रख सकते हैं….कुलपति अपने स्वास्थ्य का रखें।

  12. richa singh

    September 29, 2010 at 9:55 am

    अगर पी पी सर गांधी है तो केवल m.j. के लिए क्यों…गांधी ने किसी में भेदभाव नहीं करते थे..क्यों किसी और डिपार्टमेंट के लोग उनसे इतने प्रभावित नहीं हैं?????? सवाल किसी की महिमा का बखान करना या बखिया उधेड़ने का नहीं है.. सवाल है विश्वविद्दालय का…जो हमारा गौरव है और उसे बनाए रखना और आने वाले छात्रों को बेहतर से बेहतर माहौल मुहैया कराना..आपस में महान बनने की कोई प्रतियोगिता नहीं है यहां पर.वर्ना हमारा हाल वही होगा जो रोटी के लिए आपस में लड़ती बिल्लियों का हुआ था…हमें किसी के भटकावे में नहीं पड़ना चाहिए…आंदोलन करने के लायक क्या देश में और कोई बड़ी समस्याएं नहीं हैं पत्रकारजनो..उन पर आपका ध्यान क्यों नहीं जाता….खैर विषय से नहीं भटकना चाहिए…मेरी आप सबसे दरख्वास्त है कि एक जुट हो कर विश्वविद्यालय के हित में अपनी ऊर्जा का प्रयोग करें..

  13. richa singh

    September 29, 2010 at 10:22 am

    पीपी सर गांधी है ये सिर्फ एम.जे के छात्रों को क्यों लगता है…गांधी सबके लिए बराबर थे..यहां पर मुद्दा किसी को सही और या गलत स्थापित करना नहीं बल्कि विश्वविद्यालय की गरिमा को बनाए रखने का है..वर्ना हमारा हाल उन बिल्लियों की तरह होगा जो आपस में रोटी के लिए लड़ती रह जाती हैं और रोटी कोई और ले जाता है…आपस में हम आज से नहीं बल्कि दशकों से लड़ते आए हैं..लेकिन अब एक होकर विश्वविद्यालय के हित में जुड़ना चाहिए..असल में हमने आन्दोलन को गलत रूख में मोड़ दिया है..आप मेरिट के आधार पर पत्रकार नहीं खड़े कर सकते..कलाक्षेत्र में मार्कशीट के नम्बर कहीं नहीं टिकते..और विश्वविद्यालय किसी की बपौती नहीं है..हमें शासक नहीं बल्कि एक सही मार्गदर्शक चाहिए…और अगर आंदोलन करना ही है तो दिखावे के मान सम्मान नहीं बल्कि हमारे विश्वविद्यालय के लिए और तुगलकी शासन के खिलाफ नहीं…

  14. purnendu shukla

    September 29, 2010 at 11:18 am

    कुठियाला ने माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की छवि धूमिल कर दी है.कोई कैसे सोच सकता है कि कोई कुलपति एक पत्रकारिता विश्वविद्यालय में पिछली कक्षाओं के प्राप्तांकों के आधार पर छात्रों का प्रवेश करवाएगा.बिना किसी आधारभूत सरंचना के नए नए कोर्सेस कि झड़ी लगा देगा. और अगर विश्वविद्यालय के लोग इन सबका विरोध करें तो उन्हें एन केन प्रकारेण चुप कराने कि कोशिश करे. अब गुरुदाक्षिना चुकाने का वक़्त आ गया है . कुठियाला के खिलाफ हल्ला बोलने की जरुरत है. ऐसे व्यक्ति को विश्वविद्यालय से बहार निकलने की योजना पर काम शरू कर देना चाहिए. मैं तैयार हूँ. आप सबकी क्या राय है.

  15. devika

    September 29, 2010 at 1:42 pm

    ashcharya hota ye dekh k ki ye wahi university hai jahan maine 2 saal pehle padhai ki thi…jahan se maine itna kuch seekha, wo jagah ajj aisi ban chali hai…kya sach hai ya jhooth mujhe nahi pata par koi bhi imandaar admi apne pe is tarah k ilzaam bardasht nahi karega…to kulpati ji ya to apni begunahi saabit kijiye ya to istifa dijiye…kyunki hamara haq banta hai apse puchna aur agar kahin app k khilaf cheezen saabit ho gayi to aap bakshe nahi jayenge

  16. abhishek sharma

    September 29, 2010 at 3:06 pm

    अभी अभी समाचार प्राप्त हुआ है की श्री पी पी सिंह सर बहाल कर दिए गए है और उन्हें जोइनिंग करने के लिए कहा गया है..आखिर कुलपति को अपनी जिद छोडनी पड़ी…क्योंकि महिला आयोग के आदेशानुसार कुलपति को पी पी सर की बहाली का आदेश आज सुबह १०.३० बजे तक देना था..बहरहाल पी पी सर की बहाली से सच की जीत हुई है..साथ ही हजारों बच्चों के त्याग, समर्पण और अनेकों पत्रकारों, लोगों की भावनाओं को सम्मान मिला है..जय हो…

  17. मोहित पाण्डेय

    September 30, 2010 at 9:07 am

    मयंक जी….. मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि मुझको भारतीय न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है पर क्या आप को भी है रही बात विचारधारा कि तो किसी पर विचारधारा थोपी नहीं जा सकती है…… विचार धारा का अर्थ ही विचारों के प्रवाह से है…. नहीं तो विचार सिर्फ विचार रह जाते हैं विचारधारा नहीं बन पाती और विचारोसे लोग प्रभावित होते ही हैं….. इसमें थोपने की बात कहाँ से आ गयी… आपने अपने ब्लॉग पर अपने विचार लिखे है उसका भी प्रभाव दिख रहा है इसको थोपना नहीं मन जा सकता है क्या …….???

  18. Ashu pragya mishra

    September 30, 2010 at 10:04 am

    एक पत्र कुठियाला जी के नाम…
    आदरणीय कुठियाला जी,
    ये विश्वविद्यालय, दादा माखनलाल के नाम पर बनाया गया था, इस विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों ने कोहनियों के बल पर घिसकर संघर्ष करके, अपना मुकाम बनाया, और पूरे एशिया में इस विश्वविद्यालय को अलग पहचान दिलवाई, ये विश्वविद्यालय दो कमरों में शुरू हुआ था, जहाँ से लगायी गयी कलम बरगद का पेड़ बनी. और इसने पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवाया की हाँ ये हमने किया है, हमने पत्रकार तैयार किये हैं. जो समाज के आखिरी इंसान तक जाकर उनके दर्द को उनकी संवेदनाओं को सुन सकते हैं.महसूस कर सकते हैं.

    हे तात, इस विश्वविद्यालय ने अच्युतानंद जी के जैसा गुरु देखा है, जो हमारे विभाग के एक सहपाठी की जेब में फीस के पैसे ना होने पर अपनी जेब से फीस देने का माद्दा रखते थे, और उनके नाम पर जाने कितने लोग नौकरी पा गए, और उन्हें पलटकर बताने तक नहीं आये, लेकिन अच्युतानंद जी के ह्रदय में कभी ये बात ध्यान आई होगी, सोचना भी मूर्खता है.

    कुठियाला जी, बस अपशब्द नहीं कहूँगा, लेकिन आपने प्रवेश परीक्षा हटवाकर जो धक्का इस विश्वविद्यालय को दिया है. भाई मयंक जी ने जैसा कहा है आपने वर्धा से दूरी कम कर दी है, छोटा वर्धा भोपाल में बनाया है. और इस विश्वविद्यालय की गरिमा और प्रतिष्ठा को आपने अपने अहंकार और रसूख के तले जैसा रौंदा है, इससे इस विश्वविद्यालय की बुनियादें और पुख्ता हुई हैं.

    और याद रखियेगा, संपेरा बिच्छु की पिटारी में हमेशा अफीम रखता है की खाकर बिच्छु सोता रहेगा, पर आपने इस संस्थान के भावी पत्रकारों और पूर्व छात्रों को संघर्ष की एक वजह दे दी है, और इतिहास गवाह है की जब जब वजह पत्रकारों को मिली है,क्रांति हुई है, इंदिरा गाँधी नहीं बचीं तो ये कुठियाला कौन है भाई.. अब याद रखियेगा माखनलाल का ये आन्दोलन तब तक चलेगा जब तक आप भोपाल की सरजमीं पर हैं,

    आशु प्रज्ञ मिश्र
    पूर्व छात्र, माखनलाल विश्वविद्यालय

  19. मयंक सक्सेना

    September 30, 2010 at 2:36 pm

    मोहित शत प्रतिशत मुझे न्याय व्यवस्था पर भरोसा है….पर आप जानते हैं कि हमारी न्यायपालिका कितनी द्वुत गति से काम करती है….सवाल ये है कि जब तक कोर्ट इन मामलों में फैसला देगा….तब तक क्या हम एक कुलपति को कुल का नाश करते देखते रहेंगे…..देर से मिला न्याय…न्याय न मिलने जैसा है….

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