आम्रपाली शर्मा ने मुंबई मिरर ज्‍वाइन किया

सिनेमा और इंटरटेनमेंट से जुड़ी पत्रकार आम्रपाली शर्मा ने फिर टाइम्‍स ऑफ इंडिया ग्रुप से जुड़ गई हैं. उन्‍होंने इस ग्रुप का अखबार ‘मुंबई मिरर’ ज्‍वाइन किया है. इससे पहले आम्रपाली इसी ग्रुप के इंटरटेनमेंट चैनल जूम में इनपुट हेड थी, परन्‍तु तीन महीने पहले उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया था. ‘मुंबई मिरर’ में भी उन्‍हें इंटरटेनमेंट सेक्‍शन की जिम्‍मेदारी दी गई है. आम्रपाली इस ग्रुप के पहले लहरें टीवी, आईबीएन7, स्‍टार न्‍यूज तथा आजतक जैसे संस्‍थानों से जुड़ी रही हैं. इस संदर्भ में संपर्क किए जाने पर उन्‍होंने ‘मुंबई मिरर’ ज्‍वाइन करने की पुष्टि की.

टीओआई में विज्ञापन स्‍पेस के लिए ऑन लाइन बोली

टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने फेस्टिव सीजन में ज्‍यादा पैसा कमाने के लिए नया प्रयोग शुरु किया है. दीपावली के खास मौके पर अखबार ने अपने विज्ञापन स्‍पेस के लिए ऑन लाइन नीलामी शुरू की है. जो ब्रांड, जिस खास स्‍पेस के लिए सबसे ज्‍यादा बोली लगाएगा, उसे वह स्‍पेस दे दिया जाएगा. प्रबंधन ने इसकी शुरुआत बुधवार से कर दी है. तीन दिन तक चलने वाली यह बोली इंडियाटाइम्‍स डॉट कॉम पर लगाई जा स‍‍कती है.

अखबार प्रबंधन का मानना है कि दिवाली के दौरान अखबार में जगह की मांग बढ़ जाती है जबकि आपूर्ति कम हो जाती है, इसी को देखते हुए नया प्रयोग किया जा रहा है ताकि इच्‍छुक ब्रांड ज्‍यादा से ज्‍यादा बोली लगाकर मनोवांछित स्‍पेस खरीद सकें. विज्ञापन को लेकर इस तरह का प्रयोग पहली बार किया जा रहा है. ऑक्‍शन 12 अक्‍टूबर से शुरू हो चुकी है. 14 अक्‍टूबर शाम आठ बजे तक बोली लगाने की प्रक्रिया समाप्‍त हो जाएगी.

सूत्रों का कहना है कि यह प्रक्रिया पटना, भुवनेश्‍वर और गुवाहाटी संस्‍करण को छोड़कर अन्‍य सभी संस्‍करणों के लिए लागू होगी. टीओआई के लोकल एडिशनों देल्‍ही टाइम्‍स, बाम्‍बे टाइम्‍स, चेन्‍नई टाइम्‍स, बैंगलोर टाइम्‍स, कलकत्‍ता टाइम्‍स, पुणे टाइम्‍स, हैदराबाद टाइम्‍स के लिए भी लागू होगा. अंग्रेजी के साथ यह प्रयोग नवभारत टाइम्‍स के मुंबई और दिल्‍ली संस्‍करण के लिए भी किया गया है.

टीओआई के जोसी जोसेफ को प्रेम भाटिया पुरस्‍कार

: जेडे के साथ संयुक्‍त रूप से मिलेगा पुरस्‍कार : आदर्श हाउसिंग सोसायटी एवं कॉमनवेल्‍थ घोटाले का खुलासा करने वाले टाइम्‍स ऑफ इंडिया के पत्रकार जोसी जोसेफ को 2011 के प्रेम भाटिया पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया जाएगा. यह अवार्ड जोसी के साथ मिड डे के क्राइम रिपोर्टर जे डे को भी संयुक्‍त रूप से प्रदान किया जाएगा, जेडे की हत्‍या बीते 11 जून को मुंबई में गोली मारकर कर दी गई थी. जोसेफ ने अपने करियर की शुरुआत रेडिफ डॉट कॉम से शुरू किया था, इसके बाद वे डीएनए चले गए थे. वहां से इस्‍तीफा देने के बाद वे टाइम्‍स ऑफ इ‍ंडिया से जुड़ गए. 2जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले में भी कई सनसनीखेल लेख लिखे.

टीओआई, पटना कार्यालय पर प्रबंधन ने ताला जड़ा

टाइम्‍स ऑफ इंडिया, पटना ने अपने प्रिंटिंग प्रेस पर ताला लगा दिया है. प्रेस पर इसे बंद किए जाने की नोटिस भी चिपका दी गई है. कंपनी ने अपने कर्मचारियों को रिलीविंग आर्डर भी जारी कर दिया है. कंपनी ने यह कदम तब उठाया है, जब टाइम्‍स ऑफ इंडिया इम्‍प्‍लायी यूनियन की ओर से कोर्ट में दायर मुकदमा पर अक्‍टूबर में निर्णय आने वाला है.

टाइम्‍स प्रबंधन ने शनिवार की दोपहर प्रेस बंद करने के एलान के साथ ताला लगा दिया और सूचना चिपका दिया. 15 जुलाई की तारीख से कर्मचारियों को रिलीविंग आर्डर भी पकड़ाया जाने लगा है. गौरतलब है कि टीओआई के कर्मचारी यूनियन ने कोर्ट में वेतन भत्‍ता को लेकर मुकदमा भी कायम कर रखा है. पहले इस मामले में 21 फरवरी को 2011 को फैसला आना था, परन्‍तु बाद में कोर्ट ने इसे बढ़ाकर 31 अक्‍टूबर कर दिया था.

प्रेस बंद करने से कर्मचारियों में नाराजगी है. उनका कहना है कि फैसला आने के पहले ही प्रेस बंद करने प्रबंधन ने कानून का उल्‍लंघन किया है. कर्मचारियों का कहना है कि किसी भी इकाई को बंद करने से पहले राज्‍य सरकार की अनुमति ली जाती है परन्‍तु टीओआई प्रबंधन ने राज्‍य सरकार से अनुमति लिए बिना ही प्रेस बंद करने का फैसला ले लिया. उन्‍होंने कहा कि टाइम्‍स प्रबंधन ने इसके पहले भी इसी तरह नवभारत टाइम्‍स, पटना बंद करने का निर्णय ले लिया था. जिसे लेबर कोर्ट ने गैर कानूनी करार दिया था.

ईटी के पत्रकार ने रामदेव को दी ‘बीफ’ खाने की सलाह

जोजी फिलिप थामस
जोजी फिलिप थामस
: ट्विटर पर बवाल : जोजी फिलिप थामस. नाम से जाहिर है कि ये क्रिश्चियन हैं. पत्रकार भी हैं. इकोनामिक टाइम्स, दिल्ली में काम करते हैं. ट्विटर पर इन्होंने बाबा रामदेव को सलाह दी कि अनशन के दौरान जो कमजोरी आ रही है, उसे दूर करने के लिए और स्टेमिना बढ़ाने के लिए वे ‘बीफ’ का सेवन करें. बीफ माने गो मांस.

जो बाबा रामदेव गायों को अपनी मां के समाने मानते हैं, जो हिंदू धर्म गायों को पवित्र और पूज्य मानता है, उसका मांस खाने की सलाह जोजी फिलिप थामस दे रहे हैं. थामस के इस ट्विट के बाद कई लोगों ने कड़ी आपत्ति जताई तो उसने कुतर्क पेश करना शुरू कर दिया और कहा कि शाकाहारियों को भी बीफ खाना चाहिए. पर जब उसे लोगों ने चौतरफा दौड़ाया तो उसने यह कहकर माफी मांग ली कि उसने तो मजाक किया था, अगर किसी की फीलिंग हर्ट हुई हो तो वो सारी बोल रहा है. पर मामला इतने से शांत नहीं हुआ है. ट्विटर पर मौजूद कई पत्रकारों व चिंतकों ने जोजी फिलिप थामस की इस हरकत को बेहद घटिया, सांप्रदायिक और दंगे भड़काने को उत्प्रेरित करने वाला बताया है.

लोगों ने ऐसी घटिया मानसिकता के पत्रकार को नौकरी से बाहर निकाले जाने के लिए इकोनामिक टाइम्स के संपादक और मालिकों को पत्र भेजना शुरू कर दिया है. आइए यहां सिलसिलेवार ढंग से वो ट्विट दिखाते हैं, जिसे जोजी फिलिप थामस ने अपने ट्विटर एकाउंट के स्टेटस अपडेट पर डाला था और लोगों ने इसके स्क्रीनशाट ले लिए. उसके पहले एक पत्र, जिसे एक ट्विटर एकाउंट धारक ने भड़ास4मीडिया के पास भेजा… ”Dear Yash, An ET journalist of Delhi with tweeter handle as @JoiPhilip has been tweeting downright derogatory and communal tweets affronting the religious sentiments of Indians, suggesting that Baba Ram Dev should eat beef so that he improves his stamina. Please take this up in your write up. Tweeps are agitated and they are taking action on this erring journalist. All the proofs of his communal tweets are here for your reference. Kind wishes.”

ट्विटर पर जोजी फिलिप थामस ने अपने बारे में जो लिख रखा है, वह इस प्रकार है- ”Journalist with the Economic Times. dreamer & wannabe author! Plz remember, my views & opinions on Twitter are personal! Links & repeats are not endorsements.” इस शख्स ने खुद को ड्रीमर बताया है पर जिस तरह का ट्विट ये कर रहा है उससे लगता है कि इसका सपना दंगे कराना है. इसने लिखा है कि वह ट्विटर पर जो भी लिखेगा, कहेगा वह उसके परसनल विचार होंगे लेकिन इससे कोई पूछे कि तेरे परसनल विचार जब पब्लिक को हिंसा करने के लिए प्रेरित करें तो वह विचार कहां के परसनल रहे. जोजी फिलिप थामस के ट्विट पर कई लोगों ने उसकी निंदा की है. Sand9999 ने लिखा- This is bad man…such immoral person you are!!!Shame और anilkohli54 कहते हैं- This is offensive in extreme to the religious sentiments of Jains,Hindus,Bodhs & Sikhs disgraceful. ऐसे ही दर्जनों ट्विट हुए हैं.  एक सज्जन Piyush Kulshreshtha ने विरोध में कई ट्विट किया है… वे लिखते हैं.. Joji Philip, Journalist from ET, provoking Hindus by asking Baba Ramdev to eat Beef. Joji kept on provoking inspite of being reminded by this person. Joji Philip, unapologetic about sending hate tweets for Hindu Baba Ramdev, asking him to eat Beef. Works for Economic Times. Joji Philip hate monger…works for Economic Times. Joji Philip provoking Hindus by asking Baba Ramdev to eat Beef. Journo with ET. Joji Philip provoking Hindus by asking Baba Ramdev to eat Beef. Journo with ET.

जोजी फिलिप थामस ने क्या लिखा और कैसे उसने माफी मांगी, उसके स्क्रीनशाट नीचे दिए जा रहे हैं… पर जोजी के माफी मांगने से लोग शांत नहीं हुए हैं. बेनेट कोलमैन के सीईओ धारीवाल को फोन और मेल भेजे जाने का अनुरोध किया गया है ताकि ऐसी घटिया मानसिकता वाले पत्रकार को नौकरी से हटाया जा सके. आप भी अपनी तरफ से एक विरोध पत्र ईटी के सीईओ को भेज सकते हैं. उनकी मेल आईडी और मोबाइल नंबर नीचे दिए गए एक स्क्रीनशाट में है….

Edit Page Article “Muzzling The Media”

: TOI Newspaper Employees Union Patna Responds to BCCL CEO Dhariwal’s article : It was indeed a great event in the history of journalism to find the CEO of  Bennett, Coleman & Co –no less—to take up the cudgel on behalf of journalists while finding Statutory Wage Board  as a throwback to” license-permit raj” era tool to “manipulate” the newspaper business “fettering the freedom granted to media by Constitution”.

But the debatable point is  are the journalist complaining. Going by the trend witnessed not in distant past, journalists have no reason to claim that their Right To Information  and  Report has ever been target of attack by government and in fact the latter had been hapless target of media. As regards government control on the salary of mediamen is limited to receiving the recommendation and accepting or moderating the recommendation of an ex-Supreme or High Court judge. Here journalists can definitely complain against internal censorship or paid news phenomenon.

But, Mr Dhariwal, writing on wall is that Wage Boards can not be wished away : they have existed since 1966 or 1968 and will be constituted unless and until Working Journalists Act is held to be ultra vires. Even if government does not wish as per the whimsical and ill-advised declaration of  Mr  Ravindra  Verma, it can be forced through PIL or writ. It is not legally simple and so are the Recommendations of all Wage Board. The only thing that is required is “steely resolve” on the part of workers or union thereof. Not a single word of Wage Board Recommendations can be wished away and sooner or later every single rupee not given can be recouped with lot of penalty. Any day it can be invoked against any erring management.

When management of a newspaper establishment refers to Constitutiom and crying wolf on Freedom of Press and whining over imaginary un-viability of Press, one gets a dirty feeling that it is soon going to court against some order of the government, like for example the Majithia Wage Board Recommendations. Even for argument sake it is admitted that it has suggested 80% wage increase, would you in the name of fair play compare the hike that your own organizations gave to its contractual workers. Then you did not complain against un-viability of Press because of  “high entry level wages of workmen”.

Should we read, Mr Dhariwal, workmen as Wage Board employees only whereas there is no upper limit for contractual workers.  In case you suggest that Wage Board employees lacking in “skills and professional qualification” you will have to do a lot of home work to discount the fact that in your own organization a Triple MA has gone without promotion since 1987 and  a Tripple Patent-holder with certification of global originality by GOI is in journalistic wilderness.

As there exists no direct Line of Communication between union and the Management in your own organization, recourse is being taken to alternate media like the one being used so that better sense and wisdom prevails upon him in case he goes through all this written here — if at all brought to his notice — prior to judicial orders like the one below or being planned takes  him by surprise or with shock as “legal absolutism” seems stacked up  around or against his organization he has been called upon to head.

Mr Dhariwal should know that gone are the days when the preceding chairman of the company he now heads (late Mr Ashok Jain) used to break one-month strike with scotch on rocks. Now his company hates bonafide Trade Union activities and whenever any employee raises any point  of law, his  companies find devious ways like malafide transfer or supercession to get him out. They have shown the abominable inclination to hunt down its employee by issuing false and frivolous show causes and build up the file for future malafide use.

No wonder this ends up provoking “steely perseverance” on the part of workers or its union, as a top functionary of Bihar Government recently pointed out, which is sooner or later bound to create lot of problems through the hands of judiciary. Lest Mr Dhariwal does not appear to be crying wolves or shedding crocodile tears over the plight of Freedom of Press, it would certainly have been nicer, more fair and certainly ethical or just if he had looked within his own organization and had been aware of magnitude of crimes committed by organization he has called upon to lead especially the one that by blocking the payment of Right Wages to worker running in crores on the fictitious ground of being different all the accused managements made pots of money by way of misusing judicial hard process. As such legal tricks were followed by the primary employer company at all its 7 or so other Establishments across the country the money literally defalcated from the workers would run in crores and money made there from would no money becomes inevitable for any court to consider.

Has Mr Dhariwal been briefed about the following paragraph of the Patna High Court order which not only brings out the crux of the matter by neatly summing up the whole case but sends all the managements up for “instant prosecution” while picking big holes in their whole argument of “different companies” as not only being bogus-hollow but also false and frivolous which is evident right from the face of Patna High Court order dated 11.08.2010.

The above materials are prima facie sufficient to establish that all the three establishments under names and style (1) M/s Times Publishing House Ltd., M/s Pearl Printwell Ltd. and M/s Excel Publishing House Ltd. are the Units of one establishment M/s Bennet Coleman & Co. Ltd., having different names for internal convenience. The aforesaid High Court’s order is essentially a batch or composite order on following Writs separately filed by aforesaid companies: Cr. Misc  12876/2004, Cr. Misc 14046/2004, Cr. Misc 14344/2004, Cr. Misc 14624/2004) which were all rejected by High Court “without any merit”.

I would also like to assure Mr Dhariwal that if he cares to go through last Manisana Wage Board Recommendations he would surely find that it also has a unification clause of its own. It would not be necessary to clarify here that M/S Bennett, Coleman & Company happens to be the primary employer being the owner and publisher of brand “The Times of India” all over India and  operates through many other companies as committed ancillary or auxillary units of the former company. Mr Dhariwal may please be kind to let me correct your vision of Statutory Wage Board Award : it is in fact a Statutory Tripartite Wage Board Award which means the  company you have been called upon to head was a party to its hearing right since 1966.

As such BCCL had the sole or singular duty to implement Statutory Tripartite Wage Board Award uniformly all over its Establishments, especially when it was heard and reheard by the Wage Board authorities on the strength of Mumbai HC order, Being committed ancillary unit of their primary employer other companies do not have separate existence neither in the eye of aforesaid Award nor in law: they are just supposed to toe the line followed by their employer company: i.e. FACE THE TRIAL after the recent Patna High Court order. I would also like to attract the kind attention of new CEO of a so-called leader of newspaper establishments to another paragraph of the Patna High Court order which reads as hereunder: …The trial court without being restricted to the order taking cognizance for a particular offence, if find fit, may proceed with trial for other offences also if made out after framing proper charge.

This indeed would embolden the plant union to enumerate all other criminal acts of omission and commission perpetrated by the primary employer company in criminal conspiracy with its committed ancillary units to cheat and dodge an  “award of national importance  – to borrow the words of Patna High Court — while committing crimes bordering on felony, one after the other, like violations of ID Act/ Factory Act/W.J.Act/TU Act/PF Act, cheating workers, using workers money to make money for themselves, causing financial or mental injury to workers, denying Right To Equality, denying promotions for decades, denying Right To Livelihood, denying Right To Work, disturbing Right To Religion, breakdown of Labour laws, refusing cooperation to competent authorities, disregard for advices of competent authorities, contempt for law of land (IPC) or orders of court, false and frivolous pleadings and misuse of judicial process, swearing false affidavit in High Court and blatant lie before SC.

I would also draw the attention of new CEO to the number of dead and retired members who kept on hoping for Right Wages till the end of life or service as well as those forcibly retrenched staffs who had to go out solely for demanding the Right Wages in Patna branch of TOI itself. While the number of retired members have gone up by 3 since 2008, many more are likely to follow suit. In addition, the plant union i.e. The Times Of India Newspaper Employees Union has already received many petitions from its own members who are facing acute crisis and hardship due to non-payment of Right Wages by the above-named managements in league with its primary employer company.

There is one member who has just retired and could not arrange proper medical care for his 22-year-old sick son and the latter had to breathe his last as a result shattering his dream of any post-retirement help. There is another member who has to undergo dialysis every now and then because of continuing kidney failure:. There is one member who lost his daughter because of inability to pay hefty dowry. Then, there is another member who met an accident in truck-jeep collision while on duty and had his rib bone broken but had to go without wages during the period of convalescence. There are scores of members who have sick-old parents to look after and have marriageable daughters. Many of them have to pay educational loans for proper placement of their sons in the hope of post-retirement help.

In case the new CEO should be kind enough to take into account the denial of Right Wages right since 1989, as mentioned below, the data on aforesaid Annexure becomes terrifyingly high. Leave alone giving the Right Wages to workers, their increment has been denied for many years leaving them all at the mercy of continuously violated Wage Board Recommendations. Side by side are contractual workers who get annual increment of more than Rs 10,000 at least. When Wage Board workers demand what is duly recommended by the Central Government, they are threatened with prospect of closure of whole Patna Establishment.

The new CEO should also be aware that its organization  approached Mumbai High Court for direction to Manisana Wage Board to re-hear them, as would be evident from the aforesaid annexure quoted hereunder. The said Annexure 2 is nothing but a Press Communique published in Hindi daily of primary employer company of above-said managements by Labour and Employment Advisor to Ministry of Labour in 1999 and read as hereunder in Hindi जैसाकि न्यायलय ने यह निर्देश भी दिया है की समाचार प्रतिष्ठान न्यायालय के आदेश को वेतन बोर्ड के उद्येश में विलम्ब करन तथा उसे विफल करने के लिए इस्तेमाल नहीं करेंगे Yet, despite the existence of ”clubbing” clause not only in Working Journalist Act (mentioned below) but also in Manisana Wage Board Recommendation itself as mentioned below, his organization alongwith its ancillary units continue to claim dichotomy of companies engaged in the publication of a common product called Patna edition of The Times of India and are actually making a false and frivolous pleading in gross contempt of  Mumbai High Court order with the sole motive to “dilly-dally, dodge, delay or defeat” the very purpose of Wage Board for no less than a decade.

Acting purely on its own whim and fancy it gave grade 9 to non-journalist and grade 6 to journalists since 1989 and grade 2 to journalist and grade 6 to non-journalist since 1998 …but certainly not the Delhi grade as per law and their own admissions mentioned below.

In case the BCCL managements or their employer company try to seek refuge under any wrongly-interpreted  provision of Working Journalists Union, as they expectedly would, the union would like to quote below Sec 13 of the same Act reading as hereunder”. On the coming into operation an order of Central Government under Sec 12  every working journalist shall be entitled to be paid by his employer wages at the  rate which shall, IN NO CASE,  be less than rate of wages specified in the order.

The provision of “functional integrality” stands already introduced in Working Journalist.Act itself and  the introduction of words like “SAME OR SIMILAR TITLE” and “SAME LANGUAGE IN ANY PLACE IN INDIA” entitles TOI workers all over India to claim the same grade. Mr Dhariwal should also take  notice of the fact that his employer company possibly have a compulsion or tell-tale mensaria to fight against or ignore “clubbing” clause said above or working unification theory held by PF courts as it helps them cover up their continuous sin of not paying Right Wages and thereby defalcating workers’ money by UNDERSTATING and UNDERPAYING their PF contributions also.

It may be reiterated that the wages of journalists and non-journalists are decided by Tripartite Statutory Wage Board constituted by Central Government after hearing both the workers and management side. It follows as corollary that PF contributions will have to be calculated on the basis of wages stipulated by Central government even though not paid by recalcitrant managements as PF Act clearly uses the word ”PAYABLE” not “PAID”. PF  Department will have to pre-suppose PF contribution as a fixed percentage of Right Wages and by not doing so it will only end up causing great loss to our workers. The primary employer management in league with other ancillary units have deliberately under-stated and under-paid Employers Contribution in connivance with PF department also..

Thus, by not paying the Right Wage, the managements of Mr Dhariwal’s company have deliberately understated and underpaid  PF dues with the sole view to befool and cheat not only PF Dept but also the union’s workers, both…an act which is unpardonable sin under not only in PF Act but also under IPC. Pleading lack of record for their past employees is not only a contempt of Delhi High Court order and is tantamount to dodging cooperation to a statutory body investigating in the matter under hon’ble Delhi Court order It may be also pointed out here that  when the Delhi High Court fumed and glared at non-payment of workers’ PF dues for the period of 1986-1989 till date,  the employer company of Mr Dhariwal blinked and buckled to admit  that its Patna Establishment was very much “part and parcel” of  its Delhi Establishment.

Mr Dhariwal should also know that his own people have made his organisation  GUILTY OF BLATANT LIE before various courts including the hon’ble Supreme Court by asserting on sworn affidavit as hereunder.. …I further say that the union concerned is neither recognized or authorized by the employees in the matter and as such incompetent to institute the present proceeding State of Bihar would confirm the existence of as many as three Tripartite Agreements with the petitioner managements along with their primary employer company as it has filed prosecution case  against all above-said managements together with their primary employer company later had unleashed a mayhem that subsided only after mass-termination of as many 300 employees and also the illegal closure of its Hindi daily in Patna.

Mr Dhariwal should also know that there is complete breakdown of labour laws in all the companies and as the records available with state of Bihar would show that the above-said companies along with their employer company are freely committing unfair labour practices (vide clause nos. 1c,4a,4c,4d,4c,9,11,15 of Fifth Schedule) one after another.

Earlier, finding prima facie evidences of other unfair labour practies under different clauses of Fifth Schedule of ID Act, State complainant has filed cases against these companies which are pending adjudication in Civil Court.

The morale of such a long story is that Mr Dhariwal should at first clean his  own stable before throwing muck on the time-tested theory of Wage Boards  or think in terms of hitting court against any of it. “Clean breast” theory pre-supposed in judicial process would come in way of misadventure in this regard. Unions are now quite legally wise to thwart such attempts.

toi union patna

toipatnaunion@gmail.com

नई दुनिया से आलोक वानी एवं बिजनेस स्‍टैंडर्ड से जितेंद्र मिश्रा का इस्‍तीफा

नई दुनिया, जबलपुर से आलोक वानी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर एजीएम के पद पर कार्यरत थे. चर्चा है कि वे अपनी नई पारी सीनईबी के साथ शुरू करने वाले हैं. इसके पहले वे रायपुर में एक रेडियो स्‍टेशन के हेड थे. इसके पूर्व वे सीएनबीसी आवाज, इंडिया टीवी, दूरदर्शन को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

बिजनेस स्‍टैंडर्ड, भोपाल से जितेंद्र मिश्रा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सीनियर ऑफिसर मार्केट डेवलपमेंट के पोस्‍ट पर थे. वे भोपाल और इससे जुड़े क्षेत्रों में सर्कुलेशन की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. उन्‍होंने अपनी नई पारी टाइम्‍स ऑफ इंडिया के साथ भोपाल में शुरू की है. जितेंद्र पिछले आठ सालों से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं. 2008 में इन्‍होंने बिजनेस स्‍टैंडर्ड ज्‍वाइन किया था. इसके पहले ये दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

टाइम्स आफ इंडिया मुर्दाबाद, द हिंदू जिंदाबाद

: इन बनियों ने तो पैसे के लिए अब आत्मा तक बेच डाला : अखबार से संपादकों की औकात खत्म करने की शुरुआत किसने की? टाइम्स आफ इंडिया. भारत में पेड न्यूज की व्यवस्थित शुरुआत किस घराने ने की? टाइम्स आफ इंडिया. अखबार की आत्मा, मस्तिष्क और सिरमौर समझे जाने वाले मास्टहेड को बेचने की शुरुआत किसने कर दी है? टाइम्स आफ इंडिया ने.

और, जिस राह पर टाइम्स आफ इंडिया चलता है, उसी ओर चल पड़ते हैं हमारे हिंदी वाले बनिये. टाइम्स आफ इंडिया सारा खेल बेहद क्रिएटिव तरीके से खेलता है जिससे उसकी तरफ कम ध्यान जाता है, खासकर हिंदी वालों का कम ध्यान जाता है, इसलिए शोर कम मचता है. लेकिन यही काम जब हिंदी वाले अखबार शुरू करते हैं तो हो-हल्ला मच जाता है. बात यहां हिंदी अंग्रेजी की नहीं. बात शुरुआत करने की है. एक गंदे खेल की शुरुआत टाइम्स आफ इंडिया ने कर दी है. वो अब विज्ञापन कंपनियों को अपना मास्टहेड बेचने लगा है. जर्मनी की कार कंपनी वोल्क्सवेगन ने 31 मार्च के दिन टाइम्स आफ इंडिया का मास्टहेड खरीद लिया. सब कुछ ब्लू ब्लू था. द ब्लू टाइम्स आफ इंडिया.

यही कंपेन द हिंदू में भी था लेकिन द हिंदू ने अपने मास्टहेड से छेड़छाड़ करने की अनुमति मार्केटियरों को नहीं दी. कह सकते हैं कि द हिंदू ने एक बार फिर पत्रकारीय सरोकार और परंपरा की लाज रखी. इसके पहले यूनीनार और एमटीएस मोबाइल कंपनियों ने टीओआई के मास्टहेड को खरीदा था. जो टाइम्स आफ इंडिया अपने मास्टहेड के बारे में गर्व से कहता रहा है कि मास्टहेड आफ द नेशन, उसे टीओआई ने मार्केटियरों के हवाले अपने मास्टहेड को कर दिया है.

वैसे, आज के भयंकर मार्केट इकानामी में, बाजारू दौर में, पैसा पाने के लिए हर कोई अपना सबसे खास गुण बेचने पर उतारू है. कह सकते हैं कि जो कुछ विशिष्ट है, अनोखा है, बचा हुआ है, पवित्र है, सम्मानीय है उस पर निगाह मार्केटियरों की है. क्योंकि मार्केटियर माल बेचने कमाने के लिए नए नए प्रयोग करते रहते हैं. इस प्रयोग के आगे बड़े बड़े शूरमा ध्वस्त नजर आते हैं. कभी कोई नामचीन पत्रकार दलाली करता दिखता है तो कोई नामचीन अखबार अपना मस्तिष्क को बेचता नजर आता है. किसी भी प्रकार धन इकट्ठा करने का जो नैतिक मूल्य इस मार्केट इकोनामी ने स्थापित कर दिया है, वह सभी पवित्र संस्थाओं को भ्रष्ट और संवेदनशील मनुष्यों को धूर्त बनाता जा रहा है. जो इस आधुनिक नैतिक मूल्य को नहीं अपना पा रहा है, या इससे दूरी बनाए हुए हैं, उसे कथित मेनस्ट्रीम के लोग उल्लू, खिसका हुआ, बेचार मान लेते हैं और अंततः वह संवेदनशील मनुष्य या संस्था भी भ्रष्टाचार के राह पर चल पड़ती है.

ईटीवी से मनोज का इस्‍तीफा, पुरुषोत्‍तम पहुंचे टाइम्‍स ऑफ इंडिया

ईटीवी, राजस्‍थान से मनोज शर्मा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे पाली में ईटीवी के लिए रिपोर्टिंग करते थे. चर्चा है कि वे अपनी नई पारी इंडिया न्‍यूज से शुरू करने वाले हैं. मनोज पिछले पन्‍द्रह सालों से मुख्‍य धारा की पत्रकारिता कर रहे हैं. वे ईटीवी की लांचिंग टीम के सदस्‍य थे. वे भास्‍कर को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. माना जा रहा है कि पिछले दिनों हुए अमीन खान विवाद के चलते उन्‍होंने इस्‍तीफा दिया है.

अंग्रेजी दैनिक पायनीयर से पुरुषोत्‍तम अराधक ने इस्‍तीफा दे‍ दिया है. अब वे अपनी नई पारी टाइम्‍स ऑफ इंडिया के साथ शुरू करने जा रहे हैं. इसके पहले पुरुषोत्‍तम नवभारत टाइम्‍स, जागरण सिटी प्‍लस तथा हिंदुस्‍तान टाइम्‍स ग्रुप के साथ भी काम कर चुके हैं.

सड़क हादसे में टीओआई के फोटो जर्नलिस्‍ट की मौत, तीन करेस्‍पांडेंट घायल

: मीटिंग में भाग लेने चंडीगढ़ जा रहे थे : पंजाब में एक सड़क हादसे में टाइम्‍स ऑफ इंडिया के एक फोटो जर्नलिस्‍ट की मौत हो गई. अखबार के तीन करेस्‍पांडेंट गंभीर रूप से घायल हो गए. चारो लुधियाना से अखबार की मीटिंग में भाग लेने के लिए चंडीगढ़ आ रहे थे. उनकी मारुति जेन कार ट्रक से टकरा गई. हादसा नेशनल हाइवे 95 पर हुआ.

लुधियाना में पोस्‍टेड टाइम्‍स ऑफ इंडिया के फोटो जर्नलिस्‍ट आदित्‍य जेटली (27 वर्ष), करेंस्‍पांडेंट नवीन कालिया (27 वर्ष), वेकांत (30 वर्ष) तथा संदीप दुआ  (27 वर्ष) अखबार की मीटिंग में भाग लेने के लिए चंडीगढ़ आ रहे थे. खरार-लुधियाना मार्ग पर खानपुर के पास इनकी मारुति जेन कार की टक्‍कर एक तेज रफ्तार ट्रक से हो गई. इस हादसे में चारों गंभीर रूप से घायल हो गए.

सूचना के बाद पुलिस चारों को तत्‍काल पीजीआई चंडीगढ़ लेकर गई. इलाज के दौरान आदित्‍य जेटली की मौत हो गई. जबकि तीनों करेस्‍पांडेंट जीवन और मौत से जूझ रहे हैं. संदीप दुआ को उनके परिजनों के आग्रह पर पीजीआई से लुधियाना भेज दिया गया है. उनका वहीं इलाज चल रहा है.

मृत फोटो जर्नलिस्‍ट आदित्‍य लुधियाना के शिमलापुरी का निवासी था. वह टाइम्‍स ऑफ इंडिया का स्‍टाफ फोटोग्राफर था. आदित्‍य के पिता अश्‍वनी जेटली भी पत्रकार हैं तथा डेली अजीत, लुधियाना के ब्‍यूरोचीफ हैं. आदित्‍य के आकस्‍मिक निधन से पूरे लुधियाना के पत्रकारों में शोक की लहर है.

टाइम्स ऑफ इंडिया के फ्रंट पेज पर बासी खबर

देश का सबसे बड़ा मीडिया हाउस होने का दम भरने वाले ग्रुप का सबसे बड़ा प्रॉडक्ट टाइम्स ऑफ इंडिया भी बासी खबरें छापने लगा है. वह भी अपने फ्रंट पेज पर. टीओआई ने वो खबर अपने पहले पन्ने पर प्रकाशित की है जिसे एक दिन पहले एक हिंदी अखबार ने अपने फ्रंट पेज पर कार्यालय संवाददाता की डेटलाइन से प्रमुखता से प्रकाशित कर चुका है. टाइम्स आफ इंडिया में बासी खबर रिपोर्टर के नाम से बायलाइन और कार्टून के साथ बॉटम स्टोरी के तौर पर प्रकाशित हुई है.

यह सब इसी दिल्ली में हुआ जहां सारे प्रधान संपादक और मालिकान रहते हैं. ये खबरें दिल्ली एडिशन में ही प्रकाशित हुई हैं. मतलब यह कि अगर टीओआई के लोगों ने हिंदुस्तान अखबार पढ़ा होता तो शायद ये गलती न करते. 8 फरवरी का दैनिक हिन्दुस्तान उठाकर देख लीजिए. पहले पन्ने पर ”साहब मैं चोर बोल रहा हूं, प्लीज बचा लो” शीर्षक के तहत चार कॉलम की खबर है. यह खबर फोल्ड के ऊपर छपी है, दो इलस्ट्रेशन के साथ, नई दिल्ली डेटलाइन से. 9 फरवरी का टाईम्स ऑफ इंडिया उठा कर देखिए, ध्वजपायन घोष की बॉटम स्टोरी है, ”Caught in act, thieves call the cops” शीर्षक से. अब सवाल यह है कि टाईम्स ऑफ इंडिया वाले दूसरे अखबार उठा कर नहीं देखते या एक दिन पहले दूसरे अखबार में छपी फ्रंट पेज स्टोरी दूसरे दिन अपने फ्रंट पेज पर छापना उसे गलत नहीं लगता. फैसला पत्रकार बंधुओं और पाठकों को करना है.

दिल्ली से धीरज तागरा की रिपोर्ट

‘आधा किलो का टाइम्स आफ इंडिया बड़ा दुख देता है’

: ‘Today the News Maker itself is a Great News’, But no one is able to Write against it. why this discrimination is been done? Are we the slaver of Times of India? these are few questions, which we want to know?. But still no One is Available to Answer these questions! WHY? :

Respected sir/ Madam

I am SHUKLAJI, a newspaper vendor & a head of all newspaper vendor of Kalbadevi Newspaper Vendor Samiti, chira bazar, sending this mail with plea and request you to strengthen our Voice against Paper Media Gaint “Times Of India” and bring this news among the people of Mumbai, Maharashtra and rest of other people of the Country. (I please Urge you not to disclose my Name as it may Harm to me and my depot colleague working in the area mentioned above).

The problem is that Times of India is increasing the weight of newspaper day by day by giving advertisement in Bombay times, Times of India (Main Paper), Mirror, specially in Bombay Times. If you take any other local Newspaper it weights about 10gms to 50gms sometime at the maximum 100gms. But if you take “Time of India”  (any day ) its weights approximately 350gms to 500gms sometimes even more.

So if a vendor is having 50 or 100 copies & we have to deliver  on 4th or 5th floor or higher, its really a hard time for us,on the contrary they are not even bother to increase commission of Newspaper vendors. All the news paper of different places in Mumbai such as thane, Dadar, Bandra ,Goregoan,etc have been requesting them to increase our commission form the past 2-3 months. But they had turned deaf ears. If any Newspaper Vendor raises voice  against this humiliation done to us, then they cut the paper supply to that vendor.

Few of our  vendor have gone to other local paper media press to print this news on there newspaper, but they refused us. Non of them (Member of Times Group) are bother that it is us, who sell their paper on streets, footpath,in 10-15 floor building, going up and down from one building to other, taking lots of efforts to sell and deliver their newspaper to common people and they can’t raise our little commission , while they Earn lakhs and thiusand of rupees from their Advertisement. They increase their salaries, but they cant increase our commission.

And so we the local Newspaper Vendors ( lowest member of the paper media community) had taken big step, by Calling strike against ” BOMBAY TIMES” & against the Media Gaint “The Times Of India”  from past 2 days (We supply Times Main copy, but we don’t supply “BOMBAY TIMES ” and we urge you to raise our Voice against this humiliation done to Us.

“Today the News Maker itself is a Great News”, But no one is able to Write against it. why this discrimination is been done? Are we the slaver of Times of India? these are few questions, which we want to know?. But still no One is Available to Answer these questions!!!

WHY?? WHY??

I once again urge you to support us and spread this news among the common people  who read / listen /see NEWS,not only for NEWS but to fight against any discrimination and injustice.

Thanks & Regards,
ShuklaJI

(मेलप्रेषक के अनुरोध के कारण उनका पूरा नाम नहीं दिया जा रहा है)

सुधांशु मित्तल से जुड़ी खबर छापने पर फिलहाल रोक

: कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 11 जनवरी तक लगाई रोक : गलत हेडिंग लगाना टीओआई के गले की फांस बना : टीओआई वालों पर भारी पड़े भाजपा नेता : टाइम्स आफ इंडिया जैसा बड़ा ब्रांड भी बड़ी गलती करता है. सुधांशु मित्तल की मानें तो यह गलती नहीं, जानबूझकर की गई गलती थी जिससे उनकी प्रतिष्ठा चौपट हुई. भाजपा नेता सुधांशु मित्तल के ठिकानों पर पिछले दिनों जो छापे पड़े थे, वे छापे आयकर वालों ने डाले थे लेकिन टाइम्स आफ इंडिया में हेडिंग में सीबीआई छापों का जिक्र किया गया.  हालांकि खबर पीटीआई की थी लेकिन टीओआई वालों को जाने क्या सपना आया कि उन्होंने हेडिंग में सीबीआई छापे डाल दिए.

लेकिन मैटर में कहीं भी सीबीआई का नाम नहीं था. पूरी खबर में सिर्फ इनकम टैक्स छापे का जिक्र था. और तो और, टीओआई की वेबसाइट पर आज भी यह खबर गलत हेडिंग के साथ ही प्रकाशित है. हेडिंग में इतनी बड़ी गड़बड़ी से हड़बड़ाए सुधांशु मित्तल टाइम्स आफ इंडिया को सबक सिखाने के लिए कोर्ट चले गए. उनके वकील ने कोर्ट में टीओआई की खबर को पेश कर अदालत को जानकारी दी कि उनके मुवक्किल को यह मीडिया घराना जान बूझकर परेशान कर रहा है और ऐसी-ऐसी बेसिर-पैर की खबरें छाप रहा है जिससे उनके मुवक्किल की प्रतिष्ठा मटियामेट हो रही है.

कोर्ट ने इस मामले को संज्ञान में लेने और दोनों पक्षों के वकीलों को सुनने के बाद पिछले दिनों आदेश दिया कि टाइम्स आफ इंडिया खबरों को वेरीफाई करके ही छापे. खासकर सुधांशु मित्तल के मामले में अब टाइम्स आफ इंडिया कोर्ट के अगले आदेश से पहले कुछ ना छापे. कोर्ट ने मामले की सुनवाई की अगली तारीख 11 जनवरी 2011 तय की है. नीचे हम पहले वो खबर दे रहे हैं, जो टीओआई में छपी है और उस खबर के ठीक नीचे कोर्ट के आदेश की कापी प्रकाशित कर रहे हैं.


टाइम्स आफ इंडिया की वेबसाइट पर सुधांशु मित्तल के बारे में प्रकाशित खबर इस प्रकार है…

CWG scam: CBI raids BJP leader Sudhanshu Mittal’s house

: PTI, october 19, 2010 : NEW DELHI: The Income Tax department today conducted searches at the premises of businessman and BJP activist Sudhanshu Mittal and some other contractors as part of its probe to unearth alleged tax evasion in works related to the Commonwealth Games. More than 200 sleuths of the I-T department swooped down on the premises of Mittal and his relatives as the department has found a number of contracts to the tune of more than Rs 200 crore being bagged by them, sources said.

टीओआई की वेबसाइट पर आज भी खबर की गलत हेडिंग प्रकाशित है जिसमें सीबीआई छापे का जिक्र किया गया है जबकि मैटर में कहीं भी सीबीआई का उल्लेख नहीं है.
टीओआई की वेबसाइट पर आज भी खबर की गलत हेडिंग प्रकाशित है जिसमें सीबीआई छापे का जिक्र किया गया है जबकि मैटर में कहीं भी सीबीआई का उल्लेख नहीं है.

Mittal is considered to be close associate of former BJP President Rajnath Singh and late party leader Pramod Mahajan. The department also carried out searches at the premises of three-four big contractors at more than 20 locations in the National Capital Region including some foreign companies who have their consortiums in India, they said. Sources in the department said the I-T probe will specifically look into the contracts awraded by the Games Organising Committee and the role of its officials and contractors including charges of bribing.

The I-T department officials will be seizing documents related to all the tenders and contracts being granted to various consortiums for the Games to detect possible evasion of taxes through over-invoicing and under-reporting of accounts. The department is already in possession of documents related to award of contracts which were sourced from the OC and various other government agncies.

The I-T department is also scrutinising financial documents relating to the broadcast rights for the Games following charges of tax evasion. The department has conducted survey operations on the Indian arm of a London-based broadcast company and has found alleged discrepancies in the tax statements of the company. The department is investigating if the discrepancies to the tune of crores of rupees are related to the earnings of the company from its deal with the OC and possible tax evasion, they said.


कोर्ट के आदेश की कापी के मुख्य अंश इस प्रकार हैं…..

सौदा नहीं पटा तो टाइम्स ग्रुप ने चलाया अभियान!

कवर स्टोरी
कवर स्टोरी
: मीडिया घराने का काला धंधा : 15 सितम्‍बर 2010 को टाइम्‍स ऑफ इंडिया ‘कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स’ को लेकर कौन-सी खबर छापेगा? यह अभी से कहना नामुमकिन है. लेकिन, अगर नौ माह पहले ‘कॉमनवेल्‍थ आयोजन समिति’ के साथ ‘टाइम्‍स ग्रुप’ की डील हो गई होती तो 15 सितम्‍बर को टाइम्‍स ग्रुप के समाचार पत्र, न्‍यूज चैनल व एफएम चैनल विशेष तौर पर बताते कि दिल्‍ली व दिल्‍ली वाले किस तरह कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स के लिए पूरी तरह तैयार हैं.

ये बताते कि वे न सिर्फ तैयार हैं, बल्कि दुनिया के सामने पहली बार सबसे बेहतरीन आयोजन को अंजाम देने जा रहे हैं. 15 सितंबर को टाइम्‍स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्‍स, महाराष्‍ट्र टाइम्‍स, मुंबई मिरर, सांध्‍य टाइम्‍स दो से आठ पन्‍नों का विशेष परिशिष्‍ट छापते. इसके साथ इकनॉमिक्‍स टाइम्‍स में भी खास कवरेज रहता. दूसरी ओर टाइम्‍स ग्रुप के दोनों न्‍यूज चैनल कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स के आयोजन समिति के चेयरमैन सुरेश कलमाड़ी पर खास कार्यक्रम कर खेलों को सफल बनाने में जुटे हर वालंटियर के उत्‍साह दोगुना करने में जुटे होते.

अगस्‍त के पहले दो हफ्तों में जब ‘टाइम्‍स ग्रुप’ के अखबार और ‘न्‍यूज चैनल’ क्‍वींस बैटन के दौरान हुए घपलों की पोल पट्टी खोल रहे थे और सुरेश कलमाड़ी की फजीहत विदेश मंत्रालय से लेकर संसद के भीतर तक हो रही थी,  अगर ‘टाइम्‍स ग्रुप’  की नौ महीने पहले कॉमनवेल्‍थ के आयोजन समिति के साथ डील हो गई होती तो इन सारी खबरों के बदले कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स को लेकर सुरेश कलमाड़ी की तैयारी की वाहवाही यही ‘टाइम्‍स ग्रुप’ कर रहा होता.

14 अगस्‍त को जब कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में 50 दिन बचे थे और जिस दिन कॉमनवेल्‍थ की रुकी घड़ी अखबार से लेकर ‘न्‍यूज चैनल’ के पर्दे पर बार-बार दिखाई जा रही थी और दिल्‍ली को कॉमनवेल्‍थ के लिए सबसे नाकाबिल शहर बताया जा रहा था, अगर नौ महीने पहले वाली डील पक्‍की हो गई होती तो 14 अगस्‍त को ‘टाइम्‍स  ग्रुप’ इसी कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स को लेकर देश-दुनिया का उत्‍साह दोगुना करने के लिए इसमें शामिल होने वाले एथलिट्स को लेकर परिशिष्‍ट भी निकालता. साथ ही चैनल में कार्यक्रम भी करता.

डील हो गई होती तो दुनिया के टॉप मोस्ट एथलिटों के इंटरव्यू और उन पर केन्द्रित कार्यक्रम दिखाने और छापने का भी आइडिया था, जो कॉमनवेल्थ गेम्स में शामिल होने दिल्ली पहुंचने वाले हैं. यानी बीते डेढ़ महीने में कॉमनवेल्थ को लेकर जो भी खबर टाइम्स ग्रुप में आपने देखी या पढ़ी अगर कॉमनवेल्थ गेम्स का सहयोगी मीडिया पार्टनर ‘टाइम्स ग्रुप’ हो गया होता, तो यह सब देखने-सुनने को नहीं मिलता.

लेकिन मीडिया का मतलब तो ‘टाइम्स ग्रुप’ है नहीं. वह सबसे बड़ा ग्रुप है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता. फिर भी यह कैसे कहा जा सकता है कि कॉमनवेल्थ गेम्स के तमाम घपलों पर डील की कारपेट पड़ गई होती, अगर टाइम्स ग्रुप से डील हो गई होती. जाहिर है ऐसा होता नहीं. या कहें यह सोचना मुश्किल है. लेकिन मीडिया का चेहरा अपने आप में डील के लिए कैसे एक है और डील किस तरह ‘पेड न्यूज’ के आगे की सोच है… असल कहानी यही है. ठीक दस महीने पहले, कह सकते हैं कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू होने के करीब एक साल पहले कॉमनवेल्थ गेम्स की आयोजन समिति ने तमाम मीडिया हाउसों को यह कहकर आमंत्रित किया था कि कॉमनवेल्थ गेम्स को सफल बनाना है. इसमें मीडिया की भागीदारी बेहद जरूरी है.

जाहिर है कॉमनवेल्थ गेम्स का मतलब अरबों का बजट है तो इसके प्रचार-प्रसार में भी करोड़ों का खर्चा होना ही था. तमाम मीडिया हाउसों में पहली तरंग इसी बात को लेकर उठी कि प्रचार का बजट अगर उनके हिस्से आए तो बात ही क्या है. इसका असर पहली बैठक में नजर आया, जिसमें मीडिया संपादकों से ज्यादा मीडिया हाउसों के लिए विज्ञापन जुगाड़ने वाले या फिर उन डायरेक्टरों की फौज दिखाई पड़ी जो हर हाल में कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए अपने-अपने मीडिया हाउसों को सुरेश कलमाडी यानी आयोजन समिति का पार्टनर बनने को बेचैन थे. जाहिर है मीडिया पार्टनर बनने का मतलब एकमुश्त करोड़ों की डील और उसके जरिए कॉमनवेल्थ से जुड़ने वाले प्रोडक्टों से कमाई.

इस कमाई के लिए ही हर राष्ट्रीय अखबार और न्यूज चैनलों ने अपने-अपने टेंडर डाले. लेकिन सुरेश कलमाडी प्रचार के इस सच को समझते हैं कि अंग्रेजी मीडिया से उनका काम चल सकता है, क्योंकि देश में पॉलिसी मेकर अंग्रेजी मीडिया को ही देखता है. इसलिए टेंडर आने के बाद सुरेश कलमाडी ने आयोजन समिति के एडीजी कम्युनिकेशन को जो पहला निर्देश दिया. हिन्दी मीडिया को खारिज कर अंग्रेजी मीडिया के टेंडरों को देखने का काम हो. लेकिन सुरेश कलमाडी ने यहां भी यूज-एंड-थ्रो की पॉलिसी अपनाई.

हालांकि जानकारी के मुताबिक, आयोजन समिति में प्रचार-प्रसार देखने वाले कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट में इस बात को लेकर भी चर्चा हुई कि एक को पार्टनर बना कर दूसरे को खारिज करना कहां तक सही होगा. वह भी तब जब मीडिया अपने आप में गला काट खेल टीआरपी से लेकर विज्ञापन पाने तक के लिए कर रही है. पर सुरेश कलमाडी का कहना था, ‘लेकिन टेंडर सभी को नहीं दिया जाता.’  कलमाडी की इस थ्योरी के तहत चर्चा जो भी हुई हो, लेकिन अखबार के मीडिया हाउसों में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ को खारिज कर ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ को चुना गया. अंग्रेजी न्यूज चैनलों में एनडीटीवी को खारिज कर ‘सीएनएन-आईबीएन’ को चुना गया. प्रचार-प्रसार के लिए करोड़ों की इस डील में टाइम्स ऑफ इंडिया का 12 करोड़ 19 लाख रुपए का टेंडर खारिज हो गया. हिन्दुस्तान टाइम्स का करीब पौने दस करोड़ का टेंडर मंजूर हो गया. इसी तर्ज पर एनडीटीवी और सीएनएन-आईबीएन का भी खेल हुआ.

यहां सवाल उठाया जा सकता है कि जिन्हें सुरेश कलमाडी ने खारिज किया वह कॉमनवेल्थ गेम्स के पीछे पड़ गए. वे हर घपले को खोद-खोदकर निकालते चले गए. लेकिन घपलों में डूबी कॉमनवेल्थ लूट जब सामने आई उन मीडिया हाउसों की भी मजबूरी बन गई कि वह अपनी संपादकीय छवि के साथ कैसे समझौता करें. इसलिए जो तेवर और तल्खी ‘टाइम्स ग्रुप’ ने दिखाई वह हिन्दुस्तान ने नहीं दिखाई. हिन्दुस्तान टाइम्स ने सिर्फ सूचना के तौर पर कॉमनवेल्थ गेम्स के घपलों को पकड़ा. कुछ यही स्थिति एनडीटीवी और सीएनएन-आईबीएन की रही. एनडीटीवी की रिपोर्ट कॉमनवेल्थ गेम्स के घपलों को सूंड से पकड़ रही थी, तो सीएनएन-आईबीएन ने घपलों को पूंछ से पकड़ा. लेकिन ‘टाइम्स ग्रुप’ के पास चूंकि न्यूज चैनल भी हैं और उसने ‘हर दिन हर घंटे’ जब अपने समूह की खबरों के इनपुट पर सुरेश कलमाडी को घेरना शुरू किया तो उसके सामने कोई टिका नहीं.

यहां तक की टाइम्स की रिपोर्ट पर जदयू के सांसद शरद यादव ने लोकसभा में सुरेश कलमाडी को मोटी चमड़ी वाला तक कह दिया. और टाइम्स ग्रुप के उन डायरेक्टरों के लिए भी यह गर्व की बात हुई कि संपादकीय सोच और रिपोर्टरों की रिपोर्ट ने उस कॉमनवेल्थ गेम्स की आयोजन समिति या उसके चेयरमैन सुरेश कलमाडी को पूरी तरह नंगा कर दिया, जिसने उनके टेंडर को खारिज कर दिया था. यानी संपादकीय समझ अगर तेवर वाली और सच को उजागर करने वाली हो तो फिर विज्ञापन मांगने वालों की मूंछ कोई नीचे नहीं कर सकता.

लेकिन मीडिया के भीतर विज्ञापन के नाम पर कैसे संपादकीय सोच को गिरवी रखा जाता है, यह भी संयोग से ‘टाइम्स ग्रुप’ के उस टेंडर से ही उभरता है, जिसमें 12 करोड़ 19 लाख रुपए के बदले करीब 28 पेज विज्ञापन के और बिना विज्ञापन 16 पेज खबरों को देने की बात कही गई। अगर टाइम्स ग्रुप के साथ कॉमनवेल्थ की डील हो गई होती तो 26 जनवरी 2010 से यानी कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू होने के 250 दिन पहले से प्रचार-प्रसार शुरू होता. इसमें खासतौर से पांच पड़ाव ऐसे रखे गए थे जिस दिन टाइम्स ग्रुप कॉमनवेल्थ के लिए समूचे देश में धूम मचा देता. शुरुआत 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस से होती. फिर 8 मार्च यानी कॉमनवेल्थ दिवस, 25 जून यानी क्विन्स बैटन के भारत की सीमा में प्रवेश का दिन, फिर 14 अगस्त यानी कॉमनवेल्थ से ठीक 50 दिन पहले का जश्न और पांचवा 15 सितंबर यानी सिर्फ 18 दिन पहले कॉमनवेल्थ के लिए तैयार दिल्ली.

इन दिनों ‘टाइम्स ग्रुप’ अपने सभी अखबारो में खबरो के पन्नों पर कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए बिना विज्ञापन के दस पेज में ऐसी-ऐसी रिपोर्ट छापता, जिससे कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर ऐसी विश्वसनीयता देश में पैदा होती कि इससे सफल आयोजन और कुछ हो ही नहीं सकता है. लेकिन खबरों के पन्नों का बिकना यहीं नहीं रुकता, बल्कि टाइम्स ग्रुप छह पन्नें की रिपोर्ट उन 15 से ज्यादा स्टेडियम की तैयारी पर छापता. वह यह कि किस तरह शानदार आयोजन के लिए शानदार स्टेडियम तैयार हैं.

यानी अभी जो स्टेडियम की बदहाली की खबरें छप रही हैं और जिस तरह हर स्टेडियम में सीपीडब्ल्यूडी, एनडीएमसी, डीडीए, एमसीडी समेत तमाम संस्थान के घपले की परतें छिपी हैं. उनके बदले इन स्टेडियम को पूरा करने में लगे हुनर और इसमें इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय स्तर के उत्पाद का जिक्र होता. फिर स्टेडियम जब आयोजन समिति को सौंपा जाता तो स्टेडियम सौंपने के शानदार किस्से बतौर रिपोर्ट अखबारो के पन्नों पर छपते. यानी यह नहीं रहता कि जिस जवाहरलाल स्टेडियम के पुनर्सुंदरीकरण में साढ़े छह सौ करोड़ लग गए, उस रकम में तीन नए स्टेडियम बन जाते. और प्रत्येक स्टेडियम में बैठने से लेकर पार्किंग तक और सुविधाओं की भरमार स्टेडियम के हर कोने की तस्वीरें छपती. उसकी जानकारी दी जाती.

खास बात यह भी है कि संपादकीय समझ या खबरों का पन्ना विज्ञापन के लिए दांव पर लगाने से समाचार पत्र की छवि धूमिल होती है. इस सोच से इतर विज्ञापन के लिए दिए गए टेंडर में बकायदा यह लिख कर संकेत दिया गया कि विज्ञापन पार्टनर बनाने का मतलब हमारा संपादकीय विभाग भी आपके वाह-वाह में जुट जाएगा. ऐसा नहीं है कि यह समझ सिर्फ टाइम्स ग्रुप की है, बल्कि ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ ने भी कॉमनवेल्थ गेम्स में मीडिया पार्टनर बनने के लिए खबरों में कॉमनवेल्थ के वाह-वाह करने के संकेत दिए. संपादक को कितना अपाहिज एक झटके में बना दिया गया, यह इससे भी समझा जा सकता है कि घपलों या घोटालों के उभरने से पहले नवंबर 2009 यानी नौ महीने पहले ही कॉमनवेल्थ आयोजन समिति को बाकायदा लिखकर यह भरोसा दिला गया कि कॉमनवेल्थ खेल को लेकर सकारात्मक और सही भूमिका संपादकीय विभाग भी अपनाएगा. साथ ही सभी आम जनता की सोच को भी कॉमनवेल्थ गेम्स से जोड़ने में लगेंगे.

कह सकते हैं कि अभी जिस तरह टाइम्स ग्रुप ने समूचे देश को कॉमनवेल्थ लूट से परिचित कराते हुए, कांग्रेस तक को यह कहने पर मजबूर कर दिया कि सुरेश कलमाडी बतौर कांग्रेसी कॉमनवेल्थ नहीं संभाल रहे हैं. सोनिया गांधी को कहना पड़ा कि 15 अक्टूबर के बाद यानी कॉमनवेल्थ गेम्स समाप्त होने के बाद किसी भी घोटालेबाज को बख्शा नहीं जाएगा. फिर पीएमओ की तरफ से बयान आया कि अब सबकुछ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की निगरानी में होगा. अगर यह सारी खबरें संपादकीय विभाग की मेहनत से नहीं आती और टाइम्स के साथ नवंबर 2009 में ही डील हो गई होती तो 10 नवबंर 2009 को सुरेश कलमाडी के नाम ‘टाइम्स आफ इंडिया’ के डायरेक्टर सी.आर. श्रीनिवासन का पहला पत्र देखना जरूरी होगा.

इसमें उन्होने ‘टाइम्स ग्रुप’ को कॉमनवेल्थ आयोजन समिति से मीडिया पार्टनर बनाने की गुहार लगाते हुए अपने स्तर पर बिना कॉमनवेल्थ बजट के लंबी चौड़ी फेरहिस्त के आयोजन की जिम्मेदारी लेते हुए लिखा कि इससे कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर समूचे देश में चार-चांद लग जाएंगे. मसलन डील हो गई होती तो टाइम्स ग्रुप देश भर में पहले से ही कॉमनवेल्थ क्विज से लेकर सेमिनार तक आयोजित करता. इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के वक्ता शिरकत करते. देश के हर बड़े और प्रमुख शहर में ‘दिल्ली चलो’ के नाम से मैराथन होता. काफी टेबल बुक भी निकलती. देश का ऐसा कोई इलाका न छुटता, जहां टाइम्स ग्रुप के पांच अखबारों की पहुंच नहीं है. इस प्रकार वहां कॉमनवेल्थ पहले ही पहुंच जाता.

अब सवाल है कि क्या सुरेश कलमाडी को ‘टाइम्स ग्रुप’ के साथ समझौता न करना महंगा पड़ा. या फिर अगर वह टाइम्स ग्रुप के साथ समझौता करते तो कोई दूसरा ग्रुप जिसके साथ समझौता न करते वह उनके पीछे पिल पड़ता. ऐसे में यदि कलमाडी ही समझदार होते तो शुरू से ही हर मीडिया हाउस को मैनेज करते चलते, जिससे कॉमनवेल्थ लूट की पोटली कम से कम इस रूप में तो नहीं खुलती. हो कुछ भी सकता है. लेकिन इस खेल ने पहली बार यह खुला खेल जरूर सामने ला दिया कि ‘पेड न्यूज’ या उसके आगे का विस्तार अगर खबरों को ही मुनाफे के लिए विज्ञापन डील के जरिए खत्म करना है तो फिर विश्वसनीयता के साथ किसी मीडिया समूह के होने का मतलब महज विज्ञापन नहीं है, बल्कि इसके लिए संपादक और रिपोर्टर चाहिए. क्योंकि यह न होता तो कॉमनवेल्थ लूट का खेल बाहर भी न आ पाता. साथ ही टाइम्स की छवि भी बची न रहती और चौथा खम्भा भी उस लोकतंत्र की रक्षा नहीं कर पाता, जो लोकतंत्र वाकई खतरे में है.


टीओआई की खीझ

-राम बहादुर राय-

प्रधान संपादक, प्रथम प्रवक्ता

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ खोजी खबरों के लिए नहीं जाना जाता। उसकी छवि सरकार के मुखपत्र की रही है। गत 31 जुलाई को टाइम्स ऑफ इंडिया के पाठकों को नया अनुभव हुआ। उन्हें महसूस हुआ कि अपना अखबार नए अवतार में है। उसने भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ जैसा बड़ा अखबार जब खेल-कूद के एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन की तमाम गड़बड़ियों को उजागर करने पर उतर आया तो लोगों को चारो तरफ गड़बड़ ही नजर आने लगा। उन्हें क्या पता था कि यह वह खीझ है जो अखबार में इसलिए प्रकट हो रही है, क्योंकि सौदा पटा नहीं।

इसका दूसरा पहलू भी देखे बिना बात साफ नहीं होगी। कॉमनवेल्थ गेम्स की आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी हैं। वे कांग्रेस के नेता हैं। पार्टी में उनका महत्वपूर्ण स्थान है। वे साफ-सुथरी छवि के लिए नहीं जाने जाते हैं। भ्रष्टाचार की खबर उन पर आसानी से चिपकाई जा सकती है।

क्या किसी अखबार को सौदा न पटने पर भ्रष्टाचार के अभियान से रोका जा सकता है? यह तो नहीं हो सकता। लेकिन अखबार को अपने पाठकों को क्या यह सूचित नहीं करना चाहिए कि उसकी ओर से कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन में प्रचार-प्रसार और आयोजन को सफल बनाने के लिए एक प्रस्ताव दिया गया था जो नामंजूर हो गया। यह सूचना दे देने से उसके अभियान में वह बल नहीं रहता जो अखबार में दिख रहा है।

उदाहरण के लिए 31 जुलाई का अखबार सामने रख सकते हैं। उस दिन ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने पहले पेज पर ‘खास खबर’ दी। जिसका शीर्षक यह बताता था कि खेल के कर्ताधर्ता लालच के वश देश के सम्मान से खिलवाड़ कर रहे हैं। उसमें केंद्रीय सतर्कता आयोग और सीबीआई के हवाले से सभी सोलह प्रोजेक्ट में हुई धांधली की खबर थी। लंदन से ‘टाइम्स नाऊ’ की नाविका कुमार की खबर साथ में छपी थी कि अक्टूबर 2009 में जब क्विंस बैटन रिले का समारोह हुआ तो उसका इंतजाम जिस कंपनी को दिया गया वह एक फर्जीवाड़ा था। उसके लिए कोई टेंडर आमंत्रित नहीं किया गया। उस सामारोह में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल भी मौजूद थी। जिस ए.एम. फिल्म्स को प्रबंध करना था उसे एक करोड़ अड़सठ लाख रुपए का ठेका दिया गया था।

अगले दिन पहली अगस्त को टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पेज पर जो खबरें छपीं, उनमें खासतौर पर भारतीय उच्चायुक्त के हवाले से कहा गया था कि सुरेश कलमाड़ी का दावा सही नहीं है। सुरेश कलमाडी ने दावा किया था कि ए.एम. फिल्म्स को ठेका देने में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं की गई।

एक तरफ ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ अभियान चला रहा था, क्योंकि उसे मनचाहा ठेका नहीं मिला। लेकिन ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने एक अगस्त को ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के जवाब में सुरेश कलमाडी का इंटरव्यू छापा। उस लंबे इंटरव्यू में आरोपों पर सफाई है। ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के मनीष तिवारी की रिपोर्ट भी बताती है कि केंद्रीय सतर्कता आयोग भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रहा है।

आरोप तो आरोप ही है। उसे फैसला के रूप में तभी पेश किया जाता है, जब वह किसी खास मकसद से किया जा रहा हो। अगस्त महीने में करीब रोज टाइम्स ऑफ इंडिया ने तैयारी में किए जा रहे भ्रष्टाचार और घटिया तैयारी पर खबरें छापता रहा। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ अपने पाठक को 54 पेज का अखबार देता है। वह दो हिस्से में होता है। पहले हिस्से में 32 पेज रहता है। इन 32 पेजों में औसतन छह पेज पर अखबार ने खेल की तैयारी में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार को जगह दी।

(साभार : प्रथम प्रवक्ता)

फ्रंटपेज पर चार कालम में माफीनामा

: टीओआई, बेंगलोर में हुआ कारनामा : पहले किसी की जमकर इज्जत उतारो, उल्टा-सीधा लिख कर. कई पार्ट में छापो. छापते ही जाओ. और, जब जबरन व बिना वजह बेइज्जत हुआ शख्स कोर्ट-कचहरी करने लगे तो इतना बड़ा माफीनामा छाप दो कि माफी मांगने का नया रिकार्ड ही कायम हो जाए. बहुत बड़ा माफीनामा छापने का रिकार्ड कायम किया है टाइम्स आफ इंडिया ने. टीओआई ढेर सारे मामलों में रिकार्ड बनाता है. इस बार लंबा माफीनामा छापकर ही नया रिकार्ड बना दिया है.  

टीओआई, बेंगलोर में माफीनामे की खबर फ्रंट पेज पर पूरे चार कालम में प्रकाशित है. शीर्षक पढ़ने से ही जाहिर हो जाता है कि टीओआई वालों ने अच्छी खासी माफी मांगी है. ”Apologies, it wasn’t Govindraj”. वैसे, ये टीओआई की महानता है जो उसने गलत खबर छपने का एहसास होने पर बड़ा सा माफीनामा मांगकर डैमेज कंट्रोल किया. हिंदी वाले कई अखबार कई मामलों में तो जानबूझ कर गलत खबर छाप देते हैं और किसी हालत में माफी नहीं मांगते, चाहें गलत खबर छपने से किसी की दुनिया उजड़ जाए.

हिंदी वाले पत्रकारों व संपादकों की सामंती मानसिकता माफी मांगने में आड़े आती है. अंग्रेजी वाले पत्रकार संपादक ज्यादा रेशनल, लाजिकल व डेमोक्रेटिक होते हैं. अगर उन्हें ज्यों एहसास हुआ कि गल्ती हो गई है तो वे तपाक से सारी बोल देंगे, माफी मांग लेंगे. इसमें कोई हर्ज भी नहीं है. इससे शान घटती नहीं, बढ़ जाती है. अनजाने में गल्ती हो जाना और गल्ती का एहसास हो जाने पर माफी मांग लेना बड़प्पन की निशानी है.

पर हम हिंदी वाले, गांव से शहर आए देहाती दिल-दिमाग से गंवई ही रहते हैं, मूंछ और पगड़ी किसी हाल में नीची न हो, चाहे किसी की गर्दन लुढ़क जाए, ये भाव हम लोगों के रग-रग में है, जाने या अनजाने में. बात हो रही थी टीओआई के माफीनामे की. तो लीजिए, टीओआई के पूरे माफीनामे को पढ़िए. इस माफीनामे से मूल खबर के बारे में जानकारी भी मिल रही है. वो ये कि गोविंदराज, जो कर्नाटका ओलंपिक एसोसिएशन के प्रेसीडेंट हैं, के खिलाफ टीओआई में पूरे चार दिन लगातार खबर व फालोअप स्टोरी छपी कि उन्होंने किसी से छेड़छाड़ कर दी है. टीओआई में गोविंद राज को डर्टी राज कहकर खबरें छापी गईं.

माफीनामा पढ़ने के लिए क्लिक करिए— टीओआई का माफीनामा

टाइम्स समूह ने 1400 लोगों से नाता तोड़ा!

खबर है कि टाइम्स आफ इंडिया सहित इस ग्रुप की सभी मीडिया कंपनियों के कुल 1400 लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है! सूत्रों के अनुसार पिछले दिनों टाइम्स प्रबंधन ने पूरे ग्रुप का एक सर्वे कराकर खर्चे बचाने के लिए अतिरिक्त स्टाफ से मुक्ति पाने के लिए सर्वे कराया। बताया जाता है कि कुल 2500 लोगों की एक लिस्ट बनाई गई जिन्हें फालतू स्टाफ माना गया है।

शुरुआत में 1400 लोगों को बाय-बाय बोल दिया गया। छंटनी के शिकार ज्यादातर लोग कांट्रैक्ट पर थे और दिल्ली से बाहर कार्यरत थे। छंटनी की खबर की आधिकारिक रूप से पुष्टि नहीं हो पा रही है। मंदी का दौर शुरू होने के बाद टाइम्स ग्रुप द्वारा छंटनी किए जाने को मीडिया हलके में बेहद गंभीरता से लिया जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि इससे पता चलता है कि मीडिया हाउस पूरी तरह कमर कस चुके हैं।

आर्थिक मंदी के चलते मुनाफे में आने वाली कमी से निपटना इन दिनों प्रियारिटी पर है। इसके लिए कठिन और अलोकप्रिय निर्णय लेने में भी ये हिचक नहीं रहे हैं। इसी के चलते अब ज्यादातर बड़े मीडिया हाउस खुलकर छंटनी करने लगे हैं। बताया जाता है कि टाइम्स ग्रुप ने जिन लोगों की छंटनी की है, उनमें से ज्यादातर सूत्रों के मुताबिक दैनिक भास्कर ग्रुप में भी छंटनी की शुरुआत की जा चुकी है। कई एडीशनों से लोगों को हटाया जाने लगा है।