टीआरपी को फौरन बंद करें : आशुतोष

आशुतोषएक विदेशी वेबसाइट के हवाले से आंध्र प्रदेश के कई न्यूज चैनलों द्वारा वाईएसआर की मौत से जुड़ी अपुष्ट खबर दिखाने, इस भ्रामक खबर को सच मान गुस्साए लोगों का सड़क पर उतरने व हिंसा भड़कने, इसके बाद मीडिया, खासकर टीवी न्यूज चैनलों की भूमिका को लेकर देशव्यापी बहस शुरू होने के इस दौर में आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष ने स्वीकार किया है कि राष्ट्रीय न्यूज चैनलों से प्रेरणा लेकर क्षेत्रीय चैनल भी टीआरपी के लिए सनसनीखेज, अपुष्ट व अफवाह आधारित खबरें दिखाने लगे हैं। ‘हिंदुस्तान’ अखबार में आज प्रकाशित लेख में आशुतोष ने कई ऐसी बातें कहीं हैं जिसे टीवी एडिटरों द्वारा आत्मावलोकन करते हुए भविष्य के लिए सही राह तलाशने की गंभीर शुरुआत कहा जा सकता है।

आंध्र में न्यूज चैनलों ने जो कुछ किया, उसकी जड़ें तलाशते हुए आशुतोष लिखते हैं- ‘इन चैनल्स ने जो कुछ भी किया, उसकी प्रेरणा उन्हें कहां से मिली, राष्ट्रीय न्यूज चैनल्स से। निश्चित रूप से इस आरोप में दम है। और मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि मैं भी इस अपराध में बराबर का सहभागी हूं।’

उन्होंने अपने इस लेख में टीवी न्यूज चैनलों में गिरावट का दौर शुरू होन के बारे में कुछ यूं बताया है- ‘पिछले पांच साल में न्यूज चैनल्स में भयानक भटकाव दिखा। किसी का नाम लेना सही नहीं होगा लेकिन इसकी शुरुआत तब हुई जब 2004 में एक साथ कई चैनल बाजार में आये और उस वक्त के नंबर वन चैनल को मात देने का काम शुरू हुआ। नंबर वन होने के लिये जरूरी हो गया कि आपके पास सबसे ज्यादा टीआरपी हो। और जल्द ही ये पता चल गया कि न्यूज चैनल में टीआरपी न्यूज से नहीं आती। टीआरपी के लिये जरूरी हैं दो चीजें, या तो न्यूज को इस तरह से पेश किया जाये कि वो लोगों को बांध कर रखे यानी सनसनीखेज या फिर खबरों की नयी दुनिया तलाशी जाये।’

आशुतोष टीवी न्यूज चैनलों में हो रहे आंतरिक सुधार के बारे में इसी आलेख में एक जगह लिखते हैं-‘गलतियां इतनी ज्यादा थीं कि अच्छाई गौण हो गयी। लोगों का गुस्सा आसमान पर चढ़ने लगा। सरकारों ने भवें तानीं और टीआरपी की रेस में शामिल कुछ लोगों को शर्म भी आयी। समझ में आया ये सही नहीं है। फिर अंदरूनी सुधार की कोशिश शुरू हुई। बदलाव भी आने लगा। आज यह कह सकते हैं कि हालात काफी बेहतर हैं। खबरों को फिर से स्पेस मिलने लगा है, लेकिन अभी भी दिल्ली काफी दूर है।’

आशुतोष टीवी न्यूज चैनलों को रास्ते पर लाने के लिए कुछ सुझाव भी देते हैं, जो इस प्रकार हैं- ‘एक- रेटिंग सिस्टम यानी टीआरपी को फौरन बंद करना होगा। दो- न्यूज चैनल्स को मनोरंजन चैनलों की बरक्स न तौला जाये। तीन- हर न्यूज चैनल्स के कंटेंट की हर तीन या छह महीने पर स्वतंत्र एडीटर्स की संस्था आडिट करे। चार- चैनल्स को नो प्रोफिट नो लॉस की तर्ज पर चलाया जाये। पांच- न्यूज चैनल्स से जुड़ी शिकायत को सुनने और उसके निराकरण के लिए एक गैर सरकारी संस्था बने जो फैसला सुनाये और हर चैनल उसे मानने के लिये बाध्य हो।’

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Comments on “टीआरपी को फौरन बंद करें : आशुतोष

  • shakti_tripathi says:

    sir i was there in ur program MUDDA. The topic was KHABR YA TAMASHA ………. USME sandeep chaudhari sir ne kafi lambi bahas ki thi lekin uska kopi niskarsh nahi nikla . kya news chaannels k liye fir se naye niyam banane ki zaroort nahi hai?????????????????

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  • sandeep mishra says:

    ap bhi bhut bakwaas karte ho.kis tarah asaram bapu k khilaf bure shabdo ka use kiya apne.ek tarfa khabar dikhate ho ap.logo ki bhavnao k sath khelte ho.bakwaas editor ho ap .

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  • ruhi shaukat says:

    sir T.R.P ko lekar media ki jo aapsi jaang shuru hogaye hai vo vakai media kay asal matlab ko khatam karti ja rahe hai.ek journalist ki pheli zimadari khabar dena hai aam logo ko, na ki khabar bechnay ki jogath karna, hai jo ki ab zadatar dekha jata hai aj ka journalist t.r.p ki ladasi mai kahin .khota sa jaraha hai

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