निहत्थे होकर ही समाज को जान सकते हैं

उदय प्रकाशजयपुर में ‘लेखक-पाठक’ संवाद में उदय प्रकाश बोले…. : ताकतवर हों तो समाज बहुत अच्छा लगता है : ताकत से बदला जा रहा है भारत को : यह भारत माल संस्कृति के 28 करोड़ लोगों का है : गांधीजी की तरह गढऩे होंगे नए रूपक : कैसे बनता है कोई लेखक? कोई उदय प्रकाश कैसे बन जाता है? क्या होती है एक लेखक की रचना प्रक्रिया? कैसे देखता है वह दुनिया को? ये और ऐसे बहुत सारे सवालों-जवाबों का दरिया बहता रहा एक बरगद के पेड़ के नीचे। अवसर था जयपुर में जवाहर लाल केन्द्र के शिल्पग्राम में आयोजित पुस्तक मेले के समापन के दिन लेखक-पाठक संवाद का। पाठकों के सामने मुखातिब थे हमारे समाज के हिन्दी के सबसे बड़े कथाकार उदय प्रकाश। उदय प्रकाश के मुख से जैसे हमारे समाज की तस्वीर के अलग-अलग रंगों के झरने बह रहे थे। उदय प्रकाश से संवाद किया साहित्यकार दुर्गा प्रसाद अग्रवाल और युवा रचनाकार डॉ. दुष्यन्त ने।

जिन्दगी के सफर का सवाल आया तो उदय प्रकाश ने बताया- ”छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव में, जिसमें आज भी कुल जमा मिट्टी के 18 घर हैं, लालटेन और ढिबरी में पढ़ा। बारह साल की उम्र आते-आते माता जी और पिताजी का देहान्त हो गया। गांव में नदी बहती थी, लेकिन पुल नहीं था। स्कूल जाने के लिए नदी तैर कर पार करनी पड़ती थी। उन्होंने कहा- ”समाज को आप तभी जान सकते हैं, जब आप निहत्थे होते हैं। ताकतवर हों तो समाज बहुत अच्छा लगता है। राजेश जोशी की कविता की पंक्ति हैं- ‘सचिवालय की पांचवी मंजिल से पूरा भोपाल हरा दिखाई देता है।’ आप कहां खड़े हो कर क्या देख रहे हैं, यही आपके रचना कर्म को तय करता है।”

बहुत अंधेरा है…: अंतरराष्‍ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने वाले उदयप्रकाश की पीड़ा थी- ”आज भारत को शहर बनाया जा रहा है। वह भी ताकत के बल पर। गांवों के जंगल काट कर मॉल बनाए जा रहे हैं। जहां आम, अमरूद के पेड़ थे, वहां एटीएम खड़े किए जा रहे हैं। वहां एक बोर्ड लगा दिया जाता है- काम जारी है, सुनहरे कल के लिए। यह मानवीय त्रासदी है। केवल माल संस्कृति के 28 करोड़ लोगों के भारत को ‘इंडिया शाइनिंग’ कैसे कहा जा सकता है? देश के बहुत बड़े हिस्से में आज भी अंधेरा है। समाज को आगे ले जाने की हैसियत तो अब राजनीति में भी नहीं बची है। आधुनिक तकनीक हमारी संस्कृति पर हमला कर रही है और देश की दिशा तय कर रही है।”

अब अस्मिता छीनी जाती है : बात आई उदय प्रकाश की कृति ‘मोहनदास’ पर। वे बोले – ”यह एक वास्तविक कहानी है। गद्य की जडें वास्तविकता और यथार्थ में ही होती हैं। चाहे कोई कितना भी स्वप्नदर्शी हो, यथार्थ से रिश्ता बनाए बिना वह लिख नहीं सकता। पात्र खोजे नहीं जाते। वे हमारे इर्द गिर्द होते हैं। आदमी की एक आकांक्षा कभी नहीं मरती-न्याय की आकांक्षा। ‘मोहनदास’ के न्याय पाने की तड़प की यह कहानी है, जिसमें न्याय व्यवस्था भी उसका साथ नहीं देती। पहले जमीन और घर छीने जाते थे। अब अस्मिता छीनी जाती है। मनुष्य की उस पूरी सभ्यता में हम पहुंच गए हैं, जहां ताकत ही सब कुछ है। जिसके पास ताकत नहीं, वह कुछ भी नहीं। उसे न्याय भी नहीं मिलता। यही ‘मोहनदास’ है।”

गांधी के मुहावरे गढऩे होंगे : एक सवाल के जवाब में उदयप्रकाश ने कहा- ”आज की स्थिति में हिन्दी लेखक सेलीब्रेटी नहीं बन सकता। वह बनने की कोशिश भी करेगा तो हास्यास्पद हो जाएगा। फिल्म और क्रिकेट की दुनिया में सेलीब्रेटी बना जा सकता है। हिन्दी साहित्य में नहीं। यथार्थ के साथ हमें बदलना पडे़गा। केवल चश्मा ही नहीं आंखें भी बदलनी पड़ेंगी। क्रिकेट की दुनिया में कई लोगों ने प्रचालित खेल से हट कर नए ढंग के शॉट खेले, जो बाद में मिसाल बन गए। गांधी जी ने राजनीति को अपनी नई परिभाषा दी। उस जमाने में कोई सोच भी नहीं सकता था कि चरखे और नमक से दुनिया को बदला जा सकता है। ऐसे नए रूपक और संकेत हमें गढऩे होंगे। गांधीजी के महत्व को इससे ही समझा जा सकता है कि अमेरिका के राष्‍ट्रपति ओबामा ने नोबल पुरस्कार के भाषण में गांधीजी का पांच बार नाम लिया।”

भूख का भी भूमंडलीकरण : उदय प्रकाश ने एक सवाल के जवाब में कहा- ”विचार, कला और विज्ञान किसी एक देश के नहीं, सारी मनुष्यता के होते हैं। सभी देशों में मनुष्य रहते हैं। इसलिए केवल समृद्घि का ही ग्लोबेलाइजेशन नहीं हो रहा, बल्कि गरीबी और भूख का भी ग्लोबेलाइजेशन हो रहा है। लेखक ऐसा अभिशप्त प्राणी है, जो वहां होता है, जहां तकलीफें होती हैं।”

राज्य के महत्वपूर्ण कवि, कथाकार नंद भारद्वाज और राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव प्रेमचंद गांधी ने भी संवाद कार्यक्रम में उदय प्रकाश से सवाल किए।

कैसे शुरू करते हैं लिखना?

कवि, कथाकार उदयप्रकाश से रचना प्रक्रिया को लेकर दिलचस्प सवाल जवाब हुए। लिखने की शुरूआत के एक सवाल पर उदयप्रकाश ने गालिब को उद्धृत करते हुए कहा- ‘ते हैं गैब (अंतरिक्ष) से ये मजामीन खयाल में।’ राजस्थान के एक चित्रकार सीरज सक्सेना की पुस्तक के एक अंश से उन्होंने इस रचना प्रक्रिया को और स्पष्ट किया जिसमें चित्रकार ने कहा है- ‘खाली कैनवास मेरे लिए एक आकाश, शून्य की तरह है।’

लेकिन एक समुद्र की तरह भी है, जिसके लिए मैं सोचता रहता हूं कि किस किनारे से डुबकी लगाऊं? कैनवास पर पहले स्ट्रॉक के साथ ही डुबकी शुरू हो जाती है। फिर पता नहीं चलता कहां तक जाएंगे और कहां से क्या निकाल लाएंगे।”  बाल्‍जाक को केवल अंतिम वाक्य सूझता था और सैकडों पैज लिखने के बाद उस अंतिम वाक्य तक पहुंचता था। कई बार पहला वाक्य सूझ जाता है और वहां से लिखने का सफर शुरू होता हैं। रचना प्रक्रिया का कोई नियम और सिद्घांत तय नहीं हो सकते। हर रचनाकर हर समय हर नियम का पालन नहीं करता।

आप किस पाठक को संबोधित कर के लिखते है? इस सवाल के जवाब में उदय प्रकाश ने कहा- ”मैं लिखते वक्त कभी नहीं सोचता कि किस के लिए लिख रहा हूं। हो सकता है कोई एक पाठक तो होगा जो पृथ्वी के दूसरे छोर पर हो। आज न हो तो कल हो। हालांकि मैं भाग्यशाली हूं कि सामान्य लोग भी मेरे पाठक हैं। मेरे कहानी संग्रह ‘और अंत में प्रार्थना” के जर्मनी में अनुवाद होने पर मुझे जर्मनी के 21 शहरों में बुलाया गया जहां मैंने पाठकों से संवाद हिंदी दैनिक 'मार्निंग न्यूज'किया।”

जयपुर से प्रकाशित हिंदी दैनिक ‘मार्निंग न्यूज’ से साभार. इस अखबार ने उदय प्रकाश और उनकी बातों से संबंधित खबर को पहले पन्ने की लीड खबर के रूप में प्रकाशित किया. अखबार के संपादक इशमधु तलवार हैं.

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