काश, मृणालजी ने भी तब ऐसा किया होता

विनोद वार्ष्णेयटिप्पणी (2) : मृणाल जी के इस्तीफे की खबर के बाद से लगातार फ़ोन आ रहे हैं. मैं सचमुच चकित हूँ कि लोग इतने खुश हैं. निश्चित रूप से उनमें उनकी बड़ी संख्या है, जो उनके सताए हुए थे. कई की तो वे नौकरी ले चुकी हैं, मेरी भी. मुझे अपने लिए गम नहीं, मैं तो 36 साल से अधिक नौकरी कर चुका. अब मैं समय कां इस्तेमाल पढ़ने में कर रहा हूँ.  घर परिवार के लम्बे समय से उपेक्षित काम निपटा रहा हूँ, नियमित लेखन का सिलसिला शुरू होने वाला है़. पर उन्होंने कई ऐसे लोगों को निकाला जो यंग थे. पारिवारिक जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे हुए थे. अपना बेस्ट देकर पत्रकारिता और नौकरी के बीच संतुलन कायम किए हुए थे.

नौकरी से हटाए जाने के बाद उनके साथ काफी मुश्किलें पेश आईं. वो मुश्किलें किस तरह की थीं, अगर इस पर लिखूं तो एक उपन्यास बन जाए. आंखों में आंसू आ जाए. अपने अखबार हिंदुस्तान के पुराने दिनों पर नज़र डालता हूँ तो पाता हूँ कि निजी पसंदगी ना-पसंदगी के आधार पर नौकरी ले लेने का सिलसिला, मृणाल जी के सम्पादक बनने के साथ ही शुरू हुआ. इस मामले में योग्यता-अयोग्यता का कोई मानदंड नहीं रहा. एक कमजोर और आत्म-रक्त नेतृत्व किस तरह अन्याय का जरिए बन जाता है, यह इससे साफ़ हुआ. मृणाल जी के बारे में कहा जा रहा है कि उन्होंने इस्तीफा दिया, उन्होंने अपने सहकर्मियों को बताया कि मैनेजमेंट ने उन्हें धोखा दिया है, उन्होंने आपत्ति जताई कि उनकी जगह नया एडिटर इन चीफ कौन आ रहा है, इसके बारे में उनसे पूछा क्यों नहीं गया. इस किस्म की आपत्ति करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं. वे अपने वरिष्ठ सहयोगियों के साथ अपना अहंकारी व्यवहार खुद याद कर सकती हैं. पूछा जा सकता है कि आप कब अपने सहयोगियों से परामर्श कर फैसले लेती थीं.

अपने गिर्द चापलूसों पर ही आपको भरोसा रहता था. याद करिए, ब्यूरो चीफ के रूप में मैंने दिन-प्रतिदिन के अनुभव के आधार पर जिस-जिस के काम को अच्छा बताया, उससे ठीक उलट संवाददाताओं को आपने वेतन वृद्धि दी, उसमें पूरी तरह पक्षधरता दिखाई, मैंने जब ई-मेल भेज कर विरोध किया, तो कहा कि यह तो संपादक का अधिकार है. उसी तर्क पर अब मैनेजमेंट के फैसले पर आप उत्तेजित क्यों हुईं?  संवेदना जताने गए कुछ साथियों को उन्होंने कहा कि दिल्ली से 18 लोगों को नौकरी से निकालने में मैनेजमेंट ने मेरा इस्तेमाल किया. इस ईमानदारी के बयान की कोई भी प्रशंसा करेगा. पर यह शर्म की बात है कि मेहनती सहयोगी पत्रकारों के साथ खड़े होने की जगह उन्होंने गलत नीति का साथ देना ठीक समझा. वे भी हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक की तरह अड़ सकती थीं.

अगर कुछ नैतिकता थी, तो इस्तीफा उन्हें उस समय देना चाहिए था, जब मैनेजमेंट उन पर दिल्ली से उन 18 वरिष्ठ साथियों को निकालने के लिए दबाव डाल रहा था, जिनका काम ठीक पाने के बाद उन्हें दो या तीन साल का सेवा-विस्तार दिया जा चुका था. अन्य एडिशनों में भी बड़ी संख्या में उन्होंने ऐसा किया. मानव संसाधन की वाइस प्रेजिडेंट माला बाली ने तब नैतिकता का परिचय दिया था, जो एचआर मैनेजमेंट की आदर्श घटना है. काश, मृणाल जी ने भी तब ऐसा किया होता, तो उनके साथ मिलकर संघर्ष करने में कितना मज़ा आता.


लेखक विनोद वार्ष्णेय देश के जाने-माने हिंदी पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं। उन्होंने एचटी ग्रुप के साथ 36 वर्ष तक काम किया। वे हिंदुस्तान अखबार के नेशनल ब्यूरो के लंबे समय तक हेड रहे। उन्होंने कई देशों की यात्राएं की, रिपोर्टिंग में कई नए प्रयोग किए, कई तरह के पुरस्कारों से सम्मानित किए गए। उनसे संपर्क करने के लिए vinodvarshney@gmail.com या फिर 09810889391 का सहारा लिया जा सकता है।

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