जरूरत है कुछ ऐसे नौजवानों की जो….

यशवंत सिंह
यशवंत सिंह
झूठ से पटे बाजार, भ्रष्टाचारियों से भरी व्यवस्था और मुर्दा शांति से युक्त मीडिया से दो-दो हाथ करने वाले लड़ाकों की तलाश : 60 हजार करोड़ रुपये के घोटाले की जब वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर चर्चा करते हैं तो कई लोग आंखें फाड़ कर इसे सुनते-पढ़ते हैं. कुछ लोग सवाल पूछते हैं कि आखिर इस घोटाले की चर्चा नेशनल मीडिया, कारपोरेट मीडिया, दिग्गज मीडिया हाउस क्यों नहीं कर रहे?

किसी भी पार्टी के नेता लोग इतने बड़े घोटाले को मुद्दा क्यों नहीं बना रहे? 64 करोड़ के बोफोर्स घोटाले पर तो तूफान मच गया था. सरकार हिल गई और बदल गई थी. जनांदोलन खड़ा हो गया था. राजनीतिक ध्रुवीकरण हो गया था. पर बोफोर्स से हजार गुने बड़े 2जी घोटाले या टेलीकाम घोटाले पर कहीं कुछ नहीं हो रहा है. नेताओं के मुंह सिले हैं. सत्ता पक्ष के नेता सब कुछ दबाने-मैनेज करने में लगे हैं तो विपक्षी नेता शिखंडी बने बैठे हैं. उनकी जुबान पर भी जाने क्यों ताला लगा है. जाहिर है, घोटाले के तार विपक्षी नेताओं से भी जुड़े हैं. मतलब पूरा राजनीति जगत, सो-काल्ड मेनस्ट्रीम पालिटिक्स पर मुर्दनी छायी है इस मुद्दे को लेकर.

60 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के टेलीकाम घोटाले में, राजा-राडिया-मीडिया घोटाले में, सब शामिल दिखते हैं. पक्ष-विपक्ष के नेता, सच बताने का दावा करने वाले पत्रकार, ब्यूरोक्रेशी, कारपोरेट जगत. नीरा राडिया इस पूरे घोटाले की एक चरित्र भर हैं. वे चूंकि सबको मैनेज करने का धंधा करती हैं, नीतियां बदलवाने के लिए लाबिंग करती हैं इसलिए कई बार लगता है वही मुख्य मुजरिम हैं, प्रकट मुजरिम हैं. पर सही कहा जाए तो नीरा राडिया का धंधा ही जब दलाली का है तो वे तो अपना काम कर रही हैं. जिनका धंधा देश सेवा है, जिनका धंधा ईमानदारी है, जिनका धंधा सत्य और समाजसेवा है, जिनका धंधा सच का खुलासा करना है, वे कैसे इन दलालों के कहे अनुसार रंग बदलने लगे हैं?

रंग बदलते इस देश में कथित मेनस्ट्रीम मीडिया को सत्ताधारी नेता और कारपोरेट दलाल मैनेज करने में सक्षम हो गए हैं. कारपोरेट जगत अपने दलालों के जरिए सत्ता-विपक्ष के ज्यादातर नेताओं को मैनेज करना में सफल हो चुका है. पहले मैनेज करने-कराने का कम पांच से दस फीसदी हुआ करता था. अब पांच से दस फीसदी नेता, पत्रकार गिनने पर मिलेंगे जो मैनेज न होते हों. हर आदमी तैयार बैठा है मैनेज होने के लिए. कोई इसलिए नहीं मैनेज हो रहा है कि कीमत कम लग रही है. कोई इसलिए नहीं मैनेज हो रहा क्योंकि मुंहमांगी कीमत नहीं मिल रही.

जनता आराम से बैठी है. बाजार ने पहले सिस्टम को भ्रष्ट किया और अब भ्रष्ट सिस्टम के भ्रष्ट लोग जनता को भ्रष्ट बनाने में लगे हैं. हजार पांच सौ के नोट और शराब लेकर जनता वोट देने का काम करने लगी है. जनता को लग रहा है कि सब लूट रहे हैं तो कम से कम एक बार हम भी कमा लें. लगता है कि जो जनता पवित्र गाय मानी जाती है, ईमानदार दिखती है, दरअसल वह मजबूरी की ईमानदारी ओढे है. जब जनता को मौका मिलता है तो वो भी भ्रष्ट हो जाती है, मैनेज हो जाती है. पर यह आंशिक सच है. जनता का सिस्टम से यह रिएक्शन है. सिस्टम के प्रति गहरा अविश्वास है जो वह पैसे लेकर वोट देने लगी है. सबको भ्रष्ट व बिकाऊ मानने लगी है.

बाजार के उफान काल में यही होता है जब हर चीज मैनेज होने लगे. हर संस्था और व्यक्ति भ्रष्ट होने लगे. मानवीय मूल्य, सत्य, अहिंसा और श्रम वगैरह जैसी चीजें सिर्फ किताबों में कैद हैं. इनका असल जीवन से कोई लेना-देना नहीं रह गया है क्योंकि जिस व्यवस्था को हम ला रहे हैं, चला रहे हैं, बढ़ा रहे हैं, वह इन नैतिकताओं के ठीक उलट आपरेट करता है, कर रहा है. वह भ्रष्ट बनाता है, वह लचीला बनाता है, वह रीढ़विहीन बनाता है, वह मैनेज करता-कराता है, वह सिर्फ पूंजी केंद्रित होता है, वह झूठ आधारित होता है. वह हिंसक होता है. इसकी हिंसा प्रत्यक्ष दिखती नहीं पर अगर महसूस करें तो बहुत भयावह-भयानक हिंसा है. किताबी और बाजारू नैतिकताओं के अंतर्विरोध के बीच कनफ्यूज से लगते हैं हम सब लोग. दिमाग चकरघिन्नी की तरह चलते हुए तय नहीं कर पाता है कि आखिर करना क्या चाहिए.

कई बार बाजारू नैतिकता का हिस्सा बन जाने का मन करता है तो कई बार किताबी नैतिकता को जीवन में उतारकर जीते रहने को जी चाहता हैं. पर हम न पूरी तरह उधर जा पाते हैं और न पूरी तरह इधर. दोनों नैतिकताओं को लाभ-हानि और मौके के हिसाब से जीते-ढोते रहते हैं. ऐसे में स्प्लिट पर्सनाल्टी बनती है. जाने-अनजाने में ही भ्रष्ट व्यक्तित्व का निर्माण, पतित व्यक्तित्व का निर्माण, अनैतिक व्यक्तित्व का निर्माण, कनफ्यूज पर्सनाल्टी का निर्माण होता रहता है. इस तरह के व्यक्तित्व बनने के बाद हम गलत-सही के बीच अंतर करना बंद करने लगते हैं. ‘सब ऐसे ही चलता रहता है…’ के दर्शन को मानने लगते हैं. आदर्श को किताबी बात ही मानने लगते हैं. विरोध और हस्तक्षेप को नाजायज मानने लगते हैं. आंदोलनों को जिंदगी में खलल डालने वाला समझने लगते हैं. कायर बनने लगते हैं हम सब.

ऐसे कायरों के देश में किसी बड़े आंदोलन की उम्मीद करना बेमानी है. आंदोलन और विरोध का काम हमने माओवादियों व नक्सलवादियों के उपर छोड़ रखा है. बाकी जो हिंसक नहीं है, लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करना चाहते हैं, उन्हें जंतर-मंतर पर अंतहीन मौत मरते रहने के लिए छोड़ दिया है. पर दिक्कत ये है कि सरकारी मशीनरी के प्रचार तंत्र को सच मानकर हम माओवादियों और नक्सलवादियों के आंदोलन के प्रति नफरत से भर जाते हैं. हिंसक-अहिंसक के दर्शन में पड़ जाते हैं. इतना भी समझ में नहीं आता कि अगर अहिंसक आंदोलन से देश सुधर रहा होता तो जाने कबके जेपी, लोहिया सुधार गए होते. या गांधी जी का सुराज आ गया होता. सत्ता, सरकार विनम्रता की भाषा नहीं समझती. इनके पास फुर्सत नहीं है किसी की भाषा समझने के लिए. इनके पास देश के दुख को महसूस करने वाली संवेदना नहीं है. जिस देश में काली कमाई करने वाले लोग विधायक का चुनाव लड़कर नेता बनने के लिए 64 करोड़ रुपये खर्च कर जाते हों तो उनसे देश व जनता के प्रति संवेदना रखने की कल्पना कर भी कैसे कते हैं.

बाजार और सत्ता की चहुंओर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हिंसा हमें दिखाई नहीं देती क्योंकि हम बाजार और सत्ता के मुताबिक सोच बना चुके होते हैं और उन्हीं के दर्शन से संचालित होते हैं. एलीट क्लास तो राज भोगने के लिए होता है, इसलिए वह कभी सत्ता के खिलाफ जाएगा, सत्ता की बुराई करेगा, सिस्टम को कोसेगा, यह उम्मीद नहीं कर सकते. वह प्रभु वर्ग है जिसे सत्ता, भ्रष्टाचार, बाजार से सीधे ऊर्जा मिल रही है. सारे लाभ इन्हें ही मिल रहे हैं. पूंजी का प्रवाह इन्हीं तक है. पर जिस देश का मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास भी भ्रष्ट और बाजारू हो जाए तो किसी जनांदोलन की उम्मीद कैसे कर सकते हैं. जिस देश के नौजवानों का आखिरी सपना अच्छी नौकरी और गाड़ी-बंगला हो, किसी भी कीमत पर, तो उनसे त्याग-बलिदान की उम्मीद कैसे कर सकते हैं.

जिस देश की मीडिया मुर्दा शांति से भर जाए, वहां किसी जनज्वार की कल्पना कैसे कर सकते हैं क्योंकि मुर्दा शांति से भरी मीडिया कोई मुद्दा खड़ा ही नहीं होने देगी. सत्ता के भयानकतम खेलों को उजागर ही नहीं होने देगी. आर्थिक लाभ लेने की होड़ के कारण सत्ता से मीडिया की सांठगांठ पत्रकारों के कलम की घिग्घी बंधा देती है. जो भूमिहीन हैं, गरीब हैं, मजदूर हैं, उनकी दिक्कतें, समस्याओं कुछ और हैं. वे महंगाई से परेशान हैं, खुद की खेतीबारी न होने से परेशान हैं. भ्रष्टाचार से परेशान हैं जिसके कारण विकास योजनाओं का लाभ उन तक नहीं पहुंच पाता. पर यह गरीब, मजदूर, भूमिहीन सीधे आंदोलन खड़ा करने की स्थिति में नहीं होता. उन्हें बौद्धिक नेतृत्व देना पड़ता है.

बौद्धिक नेतृत्व देने का काम ऐसा बुद्धिजीवी कर सकता है जो एक्टिविस्ट हो, जनोन्मुख भी हो, पोलिटिकल विजन वाला हो, साहस रखता हो, आत्मविश्वास रखता हो. नेतृत्व करने का माद्दा रखता हो. गांधी, जयप्रकाश नारायण, लोहिया जैसे लोग इसी श्रेणी के हुआ करते थे. अब तो मीडिया के जो बौद्धिक हैं वे बाजार के दलाल हो गए दिखते हैं. राजनीति के जो दिग्गज हैं, वे बाजार के हाथों बिककर बाजार को बढ़ाने, खाद पानी देने का काम करने वाले लोग हो गए हैं. मीडिया, राजनीति और उद्योग जगत के दिग्गज उस लोक से कट चुका है जिसकी भलाई, मुक्ति और विकास के नाम पर इस देश में इतना बड़ा आजादी का आंदोलन चला. इतना बड़ा तंत्र खड़ा किया गया. इतना बड़ा लाव-लश्कर फैलाया गया. वही जनता, वही लोक इन दिनों सबके एजेंडे से गायब है. अजीब त्रासदी है. फिजूल के मुद्दों को मुख्य मुद्दा बनाकर उठा रहे हैं हम. असली मुद्दों को दबाने-छिपाने के हिस्से बनते जा रहे हैं हम. किससे उम्मीद करें.

सोचता हूं कि फिर से एक जंग की शुरुआत करनी चाहिए. पर लगता है कि जंग के जो योद्धा हैं वे तो दुश्मन खेमे के समर्थक बने हुए हैं. तो फिर लड़ाई में हार तय है. बावजूद इसके, इतिहास उन उदाहरणों से भरा पड़ा है जब जुनूनी, मिशनरी एप्रोच के लोग अपने अदम्य साहस और दृष्ठि के कारण असंभव को संभव में तब्दील करने में कामयाब हुए हैं. अपने आसपास तलाशता हूं तो नहीं कोई दिखता जो अपने जीवन, करियर, परिवार से उठ कर सोचता हो और उस पर कभी-कभार अमल भी करता हो.

सोचता हूं कि एक विज्ञापन प्रकाशित कराया जाए जिसमें अपील किया जाए कि जरूरत है कुछ ऐसे नौजवानों की जो बिलकुल खाली हों, जो नौकरी नहीं करना चाहते, जिनकी पैसे कमाने में कोई खास रुचि न हो, जो वर्तमान राजनीति से घृणा करते हों पर बेहतर समाज व देश के लिए अच्छी राजनीति करने की कल्पना करते हों, जो देश के आमजन से जुड़ना चाहते हों, उनके दुखों-सुखों को अपना दुख-सुख बनाना चाहते हों, जो मरने से डरते नहीं हों और धमकियों से परेशान न होते हों, जिनके स्वभाव में सच बोलना हो और साहस के साथ जीना हो. ऐसे नौजवानों की जरूरत से संबंधित विज्ञापन निकालने पर कितने नौजवान आएंगे, इसकी ठीक-ठीक कल्पना नहीं कर पाता.

पढ़ा लिखा नौजवान पेट व परिवार के लिए परेशान है. अपढ़ नौजवान भी पेट व परिवार के लिए जूझ रहा है. ऐसी व्यवस्था बन गई है जिसमें सब अकेले हैं. सब परेशान हैं. सब जूझ रहे हैं. किसी के पास दूसरे के लिए वक्त नहीं है. फिर भी. उम्मीद पर दुनिया कायम है. मैं मानकर चलता हूं कि जरूर कोई ऐसा नौजवान एक दिन आगे आएगा जो नेतृत्व करेगा आम जन का. जो डरेगा नहीं. जो मरेगा नहीं. ढेर सारे लोगों के जिस्म में उनका आदर्श बनकर समा जाएगा. वो नौजवान कहीं आप तो नहीं? अगर हैं तो जरूर चिट्ठी भेजिएगा. मैं आपसे जुड़ना चाहता हूं, इस देश के भ्रष्ट बाजार, घटिया सिस्टम और मुर्दा मीडिया से तौबा करते हुए.

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं. उनसे संपर्क 09999330099 के जरिए किया जा सकता है.

Comments on “जरूरत है कुछ ऐसे नौजवानों की जो….

  • yaayaawar says:

    saadar namaskaar! yashwant ji…
    mai aapkae saath hun…kahiae sachaai ko sthapit karnae kae liyae (jismae kisi ka niji swarth n ho) kahana marna hai or kisae maarna hai…

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  • pet kee chinta kise nahin hoti, lekin agar is tyag se desh ka kuchh bhala hona ho to main aage aane ko taiyaaar hun. bataiye kaise kadam aage badhana hai?

    Reply
  • rahuladityarai says:

    yaswantji…
    aaj ke halat or rajneeti ko lekar naujavano me behad gussa hai.lekin jaisa ki aapne kha har kisi ko pet ki chita hai.bhraston ko chhod kar har koi aapke saath hai

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  • aap bilkul sahi kah rahen hai yaswant ji. aj janta sirf chillati hai ki ye neta kharab hai ]bharst hai lekin mauka aane per wo bhi chand rupyon ki khatir andhi ho jaati hai . main aapke is baat ka samarthan karta hun aur aapke saath hun meri puri iksha hai ki rajniti ko kam se kam thoda bhi swakshniti bana sakun. ho sakta hai aane wale samay me jaroor kuch kar sakun taki apne saath nyay kar sakun. aaj koi sahi nahi milta jo yuva desh aur samaj ko badalne ki baat karten hai wo sirf samay ki najakat ko dekhkar kar rahen hai ,sahi man se agar koi kaam kare to INDIA kya WORLD kya UNIVERSE badal jayega . ab dekhten hain ki main bhi sirf kori baat hi kar ke rah jata hun ya kuch kar bhi pata hun. waise main aapki bahut si baate se purntah sahmat hun.
    aapko aapke naye muhim ki subhkamnayen aur agar aap jaroorat mahshush karen to saath dene me main pichhe nahi hatunga.

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  • तिलक राज रेलन says:

    विगत 40 वर्षों से ऐसी चर्चाओं से जुडा हूँ, यही सुनता आया हूँ देश की स्थिति बिगडती जाती है ; फिर से एक भगत सिंह चाहिए किन्तु वो भगत सिंह हमारे घर से 10 घर छोड़ कर होना चाहिए. हम सभीने अपने अपने घर से 10 घर दूर करते हुए उसे इस देश से तड़ी पार कर दिया.इस देश की राजनीति, तंत्र,न्यायपालिका ही नहीं इन सब पर कीचढ़ उछालने वाला मीडिया का सच यह है कि जहाँ से हड्डी मिल जाये वहां पूंछ हिलाते हैं जहाँ हड्डी नहीं मिली वहां स्टिंग आपरेशन कर दिया.जब हमारे आंख नाक कान ही गलत सूचना देने लगें तो दुर्घटना निश्चित ही है .ऐसे मीडिया का विकल्प समाज को देने हेतु 10 घर दूर नहीं अपितु स्वयं पहल करते हुए 10 वर्ष पूर्व युग दर्पण का संकल्प प्रस्तुत किया गया.कछुआ की चाल ने दो बातें स्पष्ट कर दीं , हमारी दिशा व सोच सही है किन्तु साधन व संसाधन की कमी है. अब अंतरताने की दुनियां में बड़ा कदम रख दिया है.aggregator–deshkimitti.feedcluster.com + 25 blogs alag alag theme/ subjects yugdarpan samooh ki prastuti dekhen.

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  • Sonu Tyagi says:

    Yashwant Ji,
    Interesting and inspirational read. Its easy to detest politics but hard to change the system specially when we all are part of it. We all, as the society are responsible for a corrupt system and on sale politicians as we people give them our votes based on their castes, religion and what not. Don’t forget the role of media in this scam and more scams which are never made public.However, as i believe in honesty and a corruption free world, i am there for any initiative and would go to any extent to support the program.As you have got a powerful tool Bhadas in your hand, use it to change the mind set of the media people and therefore the public.

    Thanks.
    Sonu Tyagi Approach Communications.
    9650984422
    Visit us at http://www.approachcom.com

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  • vivek khare says:

    Yashwant bhai hum indian ki sab se badi kami ye hai ki hum kisi ke aage aane ka wait karte hai. hum sochte hai ki koi Bhagat singh ya KOi gandhi aage aaye aur woh paper ya news chanenl dekh kar aapne wife se bole” DARLING aab iss desh ka kuch hoga”

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  • sushil Gangwar says:

    yaswantji – aapne lekh achha hai , yah aaj ka media hai Aane vale media ka kya haal hoga . Koyele ki dalali me sabke hath kale hai. Neta to pahle se chore the . Kuchh patrakaar bhi Neera Radia ke sath milkar kushal dalal ban gaye hai. Sab ek thali ke chatte batte hai. ye nahi sudharne vale hai .
    http://www.sakshatkar.com

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  • Chandan Singh (Patna) says:

    Yashwant J
    Bahut achhi apki soch hai or apn e likha hai…… kiya mai ye kah sakta hu ki kahi ap to in corrupt System se hat na m ila le ? kiya ye system apke es muhim ko chalne degi

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  • Dilip singh sikarwar says:

    yaswant g, mere sath mera chota sa pariwar hai but wo aisi jang me aapka sath dene k liye taiyar ha. hamare yogya aadesh dijiyega. im waiting 4 u.- Dilip sikarwar- 9425002916

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  • कमल शर्मा says:

    खूब लिखा यशवंत भाई। आम जनता खासकर नौजवानों को जगाने की जरुरत है। जनता को जगाया नहीं गया तो इस देश को दीमक की तरह पूरा चट कर देने के बाद ये भ्रष्‍ट नेता और अधिकारी चीन जैसे किसी देश के हाथों बेच देंगे या ठेके पर दे देंगे। देश चलाओं और हमें रॉयल्‍टी व कमीशन देते रहना। आपकी इस मुहिम में मैं आपके साथ हूं।

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  • Amit Kumar says:

    क्या सचमुच ! आपके इस लेख को पढ़कर बस यही दो शब्द मेरे सामने आया। आपने जो लिखा है वह बहुत आसान है…लेकिन क्या आप ये करने के लिए तैयार हैं। मैं अपने स्तर से कर रहा हूं….ज़रूरत पड़ेगी तो बोलूंगा…उस समय मुकड़ मत जाईयेगा… लेकिन अगर सच्चाई है तो मुझे नहीं लगता बोलने की ज़रुरत भी पड़ेगी…आखिर अंत में सभी धाराओं को तो एक ही जगह मिलना है…
    धन्यवाद

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  • kumar hindustani says:

    यशवंत भईय्या मान गए आपको।

    इतना सशक्त और आंदोलनकारी आलेख वो भी उत्साह और कटु सच्चाई से भरा हुआ। हर एक शब्द दूसरे को अपने साथ खींच कर पूरे लेख को जबर्दस्त ढंग से बांधे हुए है। शायद ही कोई हो जो पहला पैराग्राफ पढ़कर बाकी का लेख न पढ़ सके। गर्मजोशी, कटाक्ष, सीधी बात, फाड़ू अंदाज, जुझारूपन और सबसे बड़ी बात कि लक्ष्याधारित सोच के साथ लिखा यह लेख किसी भी बुत में जान डालने के लिए काफी है। जिस किसी पत्रकार में भी अभी जरा सा •ामीर जिंदा होगा उसे तनिक भी देर नहीं लगेगी एक नया अध्याय लिखकर आपके साथ जुडऩे और लोगों को अपने साथ जोडऩे में।
    लेकिन मैं इस पर विश्वास नहीं करता कि किसी विज्ञापन या फिर जगाने से एक युवा नेतृत्वशाली व्यक्ति आगे आएगा और समाज को नई दिशा देगा। आपके लेख की मांग समयानुकूल नहीं है लेकिन यथार्थपरक है। मैंने आपको नीरा-वीर-बरखा और नए नेतृत्व और आंदोलन की जरूरत संबंधी एक लेख भेजा है जिसमें इस संबंध में ही मुद्दा उठाया गया है। एक बात कहना जरूरी है कि आज यदि मीडिया अपने भ्रष्ट पथ को छोड़कर राष्ट्रहित के उद्देश्य के साथ सही दिशा में लौट आए तो फिर ऐसे किसी आंदोलन की जरूरत नहीं। मीडिया ही भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए तब आंदोलनकारी रूप एख्तियार कर लेगी। इसके लिए मीडियाकर्मियों को एकजुट होकर पहले खुद से तय करना होगा कि हकीकत में वे खुद से और देश से क्या चाहते हैं? क्या वे करप्ट सिस्टम का हिस्सा बनकर करप्शन बढ़ाना चाहते हैं या फिर नीट एंड क्लीन सिस्टम बनाकर इमानदारी और भाईचारा बढ़ाने में यकीं रखते हैं।
    मैं नेतृत्व के लिए आज कुछ दशक पहले की तरह भाषणबाजी, लोगों के हुजूम के बीच बोलने वाला या फिर हिंसात्मक कार्रवाई के पक्ष में नहीं हूं। बल्कि नेतृत्व के लिए आज वेब मीडिया के रूप में एक ऐसा मंच खड़ा करना चाहता हूं जिसपर सभी एक जुट होकर भविष्य की योजना तैयार करें और फिर हो आरपार की लड़ाई। जैसे आज का समय गोली बंदूक से लड़ाई का नहीं बल्कि सूचना प्रौद्योगिकी के जरिए युद्ध का है ठीक उसी तरह नए नेतृत्व के लिए जरूरत है कि पहले एकजुटता हो फिर कार्रवाई की जाए।
    आपके सहमत और असहमत होने के दोनों रास्ते खुले हैं। लेकिन यदि सहमत हों तो फिर बैठकर एक ऐसा मंच तैयार करते हैं जिससे सारे मीडिया को जोड़कर अगले कदम की योजना बनाई जाए। आपके जवाब के इंतजार में।

    आपका अनुज

    कुमार हिंदुस्तानी
    #9410097227
    http://funtadoo.blogspot.com/

    Reply
  • zareensiddiqui says:

    yaswantji namaskar aaj media dhanda karne wali aurat ki tarh ho gaya hi paisa dikha nahi ki nachana chalo ho jata hai apko jaise naujawano ki talash hai uahe aap tak pahuchne se pahle hi khatm kar diya jata hai itna loota jata hai ki media jaise shabd unhe gaali lagne lagta hai aur jo nai nasal ke patrkar aarahe hai unse immandaari ki ummeed nahi ki ja sakti hai

    Reply
  • vineet kumar gkp 09936809770 says:

    Yaswantji,
    hum yuva reporter aapke saath hain. Mil kar ladenge. jab jaruraat ho aawaj leejiyaga.

    Reply
  • यायावर says:

    सादर नमस्कार! चन्दन बाबु…
    हमारी सबसे बड़ी यही विडम्बना है कि हम विश्वाश से पहले अपने मन में संदेह को स्थान देते हैं| जरा सोचिए अगर न्याय और सच्चाई को स्थापित करने का जिसमें सहसा हो, क्या वो सचमुच हमारे संदेह का पात्र है?..अगर नहीं भी होगा तो वह यह जानकर कर ही कि उसकी निष्ठा को समाज की सकारात्मकता से नहीं बल्कि संदेह से आंका जा रहा है तो निश्चित रूप से उसकी आत्मा आहत होगी और समाज में स्थापित की जानेवाली न्याय की नींव अपनी पूर्णता से भटक जाएगी| अंतिम सत्य यह है कि हमारे बाद आने वाली हमारी नई नस्लों के लिए हमारा यह विश्वास उन्हें कितना आत्मबल देगा ताकि सत्य को स्थापित करने की यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी अजेय और अमर हो सके| आपसे प्रार्थना है कि इस मनोरथ को पूर्ण करने के लिए अपने ह्रदय में केवल मात्र विश्वाश को ही स्थान दें…यह आह्वान केवल आपसे ही नहीं बल्कि हमारे सभी नौजवान साथिओं से है|
    वन्दे मातरम!
    शुभकामनाओं समेत!
    आपका शुभेक्षु!
    यायावर

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  • satya prakash "AZAD" says:

    yashwant ji dharti veeron se khali nahin hai….dibbe taiyar khade hain engine ki jarurat hai……lekin sachchai sun lijiye- bina aadami ke khud badle vyawastha nahi badlne wali hai…….aap purvanchal se hain, purvanchal ki kya sthiti hai aapse chhupi nahi hai…..jis janapad se aap aate hain, wahan ki sthiti se bhi aap achchhi tarah wakif hain…..kis gaon se hain main nahi janta lekin uski sthiti bhi bahut behtar nahi hogi, aisa dawa kar sakta hun….. lekin kya aapne kabhi purvanchal, apne janpad, apne gaon ke bare me socha, agar socha to kya kabhi kuchh kiya…..aap BHU jaise sansthan se padhe hain, jo kabhi apne jujharu netritwa ke liye jana jata tha(hindi andolan se lekar chhatra andolan tak). jab aap apni mati ke liye kuchh nahi kar sakte to aage……lekin jahan chah wahan rah….agar aap aaj kuchh badhiya soch rahe hain aur karna chah rahe hain to ham aapke sath hain, apni team ke sath….main ek chhatra neta raha hun….ek sangthan “AZAD HIND MANCH” ke madhyam se ek chhota prayas kar rahe hain…..main aapki tv media me bhi naukari(patrakarita to katai nahi kah sakte) kar chuka hun, lekin apne siddhanton se samjhauta na karne ki wajah se chhodna pada……law graduate bhi hun….sangharsh ke liye har tarike se taiyar hun……

    -Satya Prakash “AZAD”
    D-223, AZAD HIND MANCH, Natiniyadai, Baralalpur, Varanasi-221007
    Contact:09453520853, http://azadhindmanch.blogspot.com,
    azadsatya@gmail.com

    Reply
  • v k srivastava says:

    mai batana chahta hoon ki janta itni bholi nahi hai, vah sab kuchh free men chahti hai, sabun vahi khardti hai jisme 2 per eak free ho, sare charitra isi janta se aate hain, jab taq vah apna role theek se play nahi karegi, kuchh nahi hone vala hai, sari vyvastha atrikta per tiki hai, janta bholi nahi hai vah behad swarthi hai, vah sirf apne niji labh ke liye kisi bhi star taq gir sakti hai. dukh hai ki hamara koi rasthriya charitra. koi rastriya soch viksit nahi ho paya hai, paise kamane ki machine hamne banayee, parantu ek behtar nagrik ke nirman men hamara ghar, samaj asfar raha.

    Reply
  • raghwendrasahu korba says:

    sachmuch aaj jarurat hai aise aandolan ki. media se jude kuch bhrast logon ke karan pure mediajagat ko sharmshar hona padta hai. yuvaon ko hi aage aakar satya ki ladai ladani hogi. main aapke sath hoon.

    Reply
  • Rajesh Tripathi says:

    Yashwant Bhai
    Namaskar.
    aapki chinta bilkul sahi hai. rajniti ke is krishnapaksh ne poore mulk ko andhere me dubo diya hai. us per turra ye ki andhere ke saudagar roshanion me nahaye aur jashan me dube hain. unhe na jan ki fikra hai na jantanra ki, fikra ha to sirf apane pad aur position ki. aise me ek aisi yuvashakti ki jaroorat hai jo is andhere me prakash kiran ban sake khud jal kar desh ko roshan ker sake. aap bhrastachar ke khilaf bhadas ke madhyam se jo jehad chhere hueye hain voh positive disha me utha kadam hai.aapne agar yuva shakti ko jagane aur nek kaam se jorne ki iksha ki hai to yeh jaroor poori hogi. yeh poori ho yehi hamari kamna hai kyonki desh ko bhrastachar ke pank se nikalne ke liye koi prayas ab hona hi chahiye.
    Shubhkamnayein
    Rajesh Tripathi/ Kolkata

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  • raghwendra says:

    yashwant g, yadi aap kuchh khaas karne ki soch rahe hain to bataiye, aapki yojna me jaan huyee to kuchh bhi kiya aur karwaya ja sakta hai parantu yadi aap yoon hi tatol rahe hain to badi nirasha hogi

    Reply
  • Pramod Kumar says:

    Aapki Baat Kaafi Had Tak Theek Hai, Waqai no jawan patkaron ki humare samaj ko jaroorat hai, lekin sochne wali baat hai ki nojawan kyon ish chetra se apne ko bachatey hain, mere hishaab se iske kai karan hain or jab tak ye rahenge tab tak nojawaan ish chetrame aage nahi aayenge.
    1- Chahe wo electronic media ho ya print media dono me itna curruption bad gaya hai ki sahi aadmi ko mouka hi nahi milta.
    2- bade patrakaro ki upeksha ka shikaar
    3- Jeene ke liye do roti
    ………………………………………………………………………………………
    Pramod Kumar

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  • यशवंत जी, मैं आपकी वेबसाइट समय-समय पर खोल कर देखता हूं। मीडिया के बारे में बहुत कुछ पढ़ने को मिलता है। मीडिया के कड़वे सच्च का पता लगता है। आपके इस ताजे लेख को पढ़कर कोई हैरानी नहीं हुई, क्योंकि मैं मीडिया से जुड़ा हूं और इस तरह की दलाली से अच्छी तरह से वाकिफ हूं। वीर संघवी के दलाल होने पर कोई हैरानी नहीं होती लेकिन कारगिल में रिपोर्टिंग करके देशभक्ति व अदमय साहस का परिचय देने वाली बरखा दत्त का नाम सुन कर हैरानी होती है। आज मीडिया हाउस को चलाने वाले कार्पोरेट जगत के दिग्गज लोग हैं, ऐसे में वह अपने अखबार या चैनल पर वही लिखेंगे या दिखाएंगे, जो सीधे तौर से उनके बैंक बैलेंस में इजाफा करने का काम करता हो। चुनाव के दिनों में पैसे लेकर खबर लगाना अब आम बात हो चुकी है। छोटे-छोटे शहरों में तो पत्रकारिता ब्लैकमेलिंग का धंधा बन चुकी है।
    बात अगर आर्थिक हित्त की भी न हो तो टीआरपी या रीडरशिप को नहीं भुलाया जा सकता। मीडिया की भूमिका बदलती जा रही है। किसी जगह सुना था कि मीडिया के लिए सबसे बुरी खबर ही सबसे अच्छी खबर है, इसीलिए आजकल न्यूजमैन किसी भी छोटी घटना को इतना बढ़ाचढ़ाकर पेश करते हैं कि उसकी ंिचगारी आग का रूप धारण कर लेती है और कब कई लोगों की जिंदगी स्वाह कर देती है पता ही नहीं लगता।
    हमारा देश एक चीज के लिए जाना जाता है, जो जुगाड़ के नाम से मशहूर है। हम देशवासी खुद को जुगाडु कहलाना पसंद भी करते हैं। राजनीति, व्यापार, उद्योग, सरकारी तंत्र या मीडिया के क्षे़त्र मंे हर कोई जुगाड़ करने की फिराक में रहता है। इसी जुगाड़ ने आज देश ही हालत ये कर दी है कि आज से आने वाले 20 साल के बाद के हालत सोचकर रूह तक कांप उठती है। भ्रष्टाचार तो हमारे जीवन में बच्चा पैदा होने से लेकर शुरू होता है और उसके मरने तक जारी रहता है। ऐसे जीवन में एक मीडिया बचता है, जिससे कुछ उम्मीद की जा सकती है। ऐसा नहीं है कि 100 फिसदी मीडिया गलत है, आप जैसे कुछ लोग अब भी उम्मीद कायम रखे हुए हैं। मगर, किसी के बदलने से कोई नहीं बदलने वाला है। अगर हम अपना भविष्य उज्जवल भारत में देखना चाहते हैं तो हमें दूसरों को बदलने का प्रयास करने के बजाए खुद को बदलना होगा। किसी दूसरे से उम्मीद करने के बजाए खुद शुरूआत करनी होगी। ऐसा होना संभव नहीं है कि देश का हर नागरिक खुद को बदल ले लेकिन बिना खुद को बदले कुछ भी नहीं बदलने वाला।
    यशवंत जी आपकी इस मुहिम में मैं आपके साथ हूं। किसी भी तरह आपको लगे कि मैं आपके काम आ सकता हूं तो कहिएगा, मेरा पूरा प्रयास रहेगा कि मैं अपना 100 प्रतिशत इस देश के लिए कुछ करने मंे लगा दूं।
    संयम जैन, 9813500100
    sanyamjain@gmail.com

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  • aapko aise naujawano ki jaroorat kyo pad rahi hai.. kya aap aapne aap ko naujawan nahi samjhte ya phir es kary k liye upukt…. aur ager aap mi dono hai to bas puri samrthy se jut jaiye apki ek aawaz pe sir katane wale bhi milenge aur katne wale bhi… lakchy avasy purn hoga!!!!!!!!!!!

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  • aaj loktantra par se aam janta ka wishwass puri tarah se khatm ho gaya hai… vo jant hai ke har niyam ke piche desh ke netao ka he labh chhipa hua hai… is karan itne vishal loktantra me koi bolne ki himakat nahi karta… kuch ko bolne se pehle he labh miljata hai to koi bolna he nahi chahate hai kyo ki unki samjh par parda dal gaya hai jo nahi hat sakta kyoki kisi ke pass itna wakt nahi hai ki koi desh ke liye soche sab apni he jebe bharne ki firaak me lage hue hai…khair agar mai aapke is muhim me kaam aa saki to ye mere liye bahut he garv ki baat hogi…

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  • ''यायावर'' says:

    लड़ना है शेष! अभी यारों!
    लड़ना है शेष! अभी यारों!
    बढ़ना है शेष! अभी यारों!

    बेइमानों को आज़ादी है,
    चाटुकारों के घर चाँदी है|
    बदकिश्मत मिहनत-कश जनता,
    जनता के घर बर्बादी है|
    गढ़ना है देश! अभी यारों!
    बढ़ना है शेष! अभी यारों!

    डंडेवालों का झंडा है,
    धनवालों का हथकंडा है|
    मजलूमों को है कफ़न नहीं,
    जीवन जीना ही फंदा है|
    मढ़ना है वेश! अभी यारों!
    बढ़ना है शेष! अभी यारों!

    अस्मत दो नंबरवालों की,
    किश्मत दो नंबरवालों की|
    बाकी की इज्ज़त बिक रही,
    बदत्तर हालत श्रमवालों की|
    भरना है शेष! अभी यारों!
    बढ़ना है शेष! अभी यारों!

    सब दो नंबर का भाषण है,
    झूठा-झूठा आश्वासन है|
    मजबूर निगाहों में आँसू,
    सोना-सा महँगा राशन है|
    जीना है शेष! अभी यारों!
    लड़ना है शेष! अभी यारों!

    छिना-झपटी है कुर्सी की,
    सब खेल है खूनी कुर्सी की|
    भाई-भाई का कत्ल करे,
    यह “फूट” करिश्मा कुर्सी की|
    बनना है एक! अभी यारों!
    बढ़ना है शेष! अभी यारों!

    सत्ता की अदला-बदली है,
    पर नीति बड़ी ही दोगली है|
    हालत बद-से, बदत्तर ही है,
    जनता भी खूब ही पगली है|
    दूँढना हल शेष! अभी यारों!
    बढ़ना है शेष! अभी यारों!

    ———————————-”यायावर”

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  • Dr. Rakesh says:

    यशवंतजी, नमस्कार।
    आपकी भावनाओं की कद्र करता हूं। सच है कि देश में बदलाव के नाम पर मुर्दनगी पसरी पड़ी है। जिनसे उम्मीद थी वे सारे के सारे रंगे सियार निकले हैं, दम नहीं है, बेदम दिख रहा है देश।

    एक बात, अधिकांश पत्रकार जानते हैं, वही आपको भी याद दिलाता हूं। जो बात आप कह रहे हैं, वही बात गांधी ने 100 साल पहले बिना किसी लाग-लपेट के कह दी थी। गांधी ने कहा था कि इस मीडिया से परिवर्तन की उम्मीद करना बेमानी है। हिंद स्वराज में बहुत स्पष्ट शब्दों में उन्होंने अपनी बात कही थी। बांझ और वैश्या बनी संसद की जारज यानी अवैध संतान है मीडिया। अपने प्रारंभ से इसका जन-सरोकार से कोई लेना-देना कभी नहीं रहा। उन देशों की बात छोड़ दीजिए जो पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े थे, ऐसे देशों ने मीडिया का उपयोग साम्राज्यवाद के खिलाफ अवश्य किया लेकिन जब सत्ता बदली तो साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ने वाले झंडाबरदार भी अपनी असल औकात में आ गये।

    दरअसल में क्रांति-क्रांति का नाम जपने से तो क्रांति नहीं हो जाती। जिन देशों में क्रांति सफल हुयी भी तो साधारण आदमी को क्या मिला। दो जून की रोटी के लिए आज भी उन देशों में जनता मोहताज है। चीन हो या सोवियत रूस…परिवर्तन के पुरोधा यदि बढे भी तो उसी साम्राज्वादी मॉडल की बदौलत जिसको गरियाते-लतियाते वे सत्ता में आ गये।

    क्या है कि आम आदमी की अद्यमिता को जगाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। उसे बेकार के बहस-मुबाहिसों, तोड़-फोड़, चक्का जाम-आंदोलनों में डालना गैर-मुनासिब बात समझता हूं मैं। आम आदमी क्या रचनात्मक कर सकता है, उस पर गौर किया जाना चाहिए और जहां ऐसे काम हो रहे हैं, उन्हें सबके सामने लाकर इस सरकार के बगैर जिंदगी कैसे चलती है, जीवन कैसे खुशमिजाज बनता है, इस पर हमें ध्यान केंद्रित करना होगा।

    सरकार में तो साले दल्ले और भड़वे ही जा रहे हैं। मैं नजदीक से देख रहा हूं, देश भी नजदीक से देख रहा है। चुनाव प्रणाली… ग्राम पंचायत से लगायत संसद तक देख लिजिये, क्या कहीं काले और अवैध धन के बिना किसी का बेड़ा पार हो रहा है। मीडिया वाले भी इसी में डूब-उतर रहे हैं। याद रखिये कि हिंदुस्तान का बनिया वर्ग मीडिया को चला रहा है। और इस बनिया वर्ग की नकेल अभी साम्राज्यवादियों के हाथ में है। एक बात मैं जानता हूं कि यदि हिंदुस्तान के बनिया वर्ग ने साम्राज्वाद की नकेल अपने हाथ में ले ली उस दिन से दुनिया का भाग्य बदलना शुरू हो जायेगा।

    जाहिर सी बात है कि हिंदुस्तान के आम आदमी में बनियत्व अर्थात उद्यमिता का भाव जगाना होगा। इस मिट्टी में पैदा हुए रत्नों ने सारी दुनिया का भरण-पोषण किया है कभी…हमारी संसद बांझ हो सकती है लेकिन यह मिट्टी बांझ नहीं हो सकती।

    एक बार फिर आपकी भावनाओं की कदर करता हूं। जैसे आपने अपनी छुपी प्रतिभा का परिचय देकर पत्रकारिता जगत में एक इनोवेटिव, उद्यमी पत्रकार बनकर ख्याति अर्जित की, वैसे करने के लिए बड़ी संख्या में युवाओं को प्रेरित करना होगा। और केवल पत्रकारिता में ही क्यों, आज जीवन के हर क्षेत्र में उद्यमी चाहिये जो अपनी जिंदगी बदलें, हजार हाथों को निराशा-कुंठा के गर्त से बाहर लाकर उन्हें काम दें, स्वरोजगार के लिये प्रेरित करें, इसी में से भविष्य के भारत की खुशहाली का रास्ता निकलता है।

    देखिये, हमारी युवा शक्ति के परिश्रम का परिणाम है कि आरटीआई जैसी शक्तिशाली चीज कानून के रूप में हमारे हाथों का अचूक हथियार बन रही है। इसके समुचित इस्तेमाल की जरूरत है।

    एक महत्वपूर्ण बात जो मैं कहना चाहता हूं कि वामपंथ या दक्षिणपंथ के वाद में न फंसकर युवकों को अपने गांव, कस्बे और मित्रों के लेवल पर ही सोचना होगा कि क्या सार्थक हो सकता है। इसमें से चीज आगे बढ़ती हो तो उसका दायरा जनपद, प्रदेश, देश और राष्ट्र की सीमाओं को तोड़कर आगे निकल जाता है। लेकिन पहला कदम तो स्थानीय स्तर पर रखना होगा।

    नितांत भावनाओं के आवेग से कोई चीज सफल नहीं होती। उसी प्रकार यदि कार्य के पीछे भावना ना हो तो कार्य गति नहीं पकड़ सकता। भावनाओं का प्रवाह सार्थक उद्देश्य के साथ जुटता है तो व्यक्ति सफल होकर ही रहता है।

    इसलिए भावनाओं के साथ अनिवार्य रूप से उद्देश्य होना ही चाहिये।

    अंतिम बात कि भूखे भजन न होयी गोपाला, इ लो आपन कंठी माला। भूख, बेकारी को बनाये रखी वाली बातें चाहे कितनी धारदार क्यों ना हों, उनसे युवाओं को दूरी बनानी होगी। यहां पर अपने देश के बनियों से प्रेरणा लेनी होगी।

    कुछ अर्थों में सच्चाई यही है कि चाहे वामपंथ हो या दक्षिणपंथ या फिर मध्यमार्ग, इन सबने अपने स्वार्थों के लिए युवाओं को भटकाया है, उनके जीवन से खिलवाड़ किया है। जीवन में जब अध्ययन और पुरूषार्थ पूर्वक, स्वावलंबी होकर धन कमाने का काम युवा कर सकता है, उस समय में उसे बेकार के आंदोलनों में भटकाने और चंदा उगाही के काम में ढकेलने का काम वैचारिक आंदोलनों ने किया है।

    सही बात है कि इन वैचारिक आंदोलनों से निकल कर अनेक लोग देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित हो गये हैं लेकि मौलिक सवाल यही है कि वे स्थापित होकर कर क्या रहे हैं। एक लाइन में कहूं तो उनकी औकात टका भर की नहीं है, उनका जीवन खोखला है, उनके आदर्श मर चुके हैं, उनके जीवन में परिवर्तन के नाम पर पैसे और अय्याशी की सड़ांध उठती दिखती है, जिसके बूते वे अपने बड़प्पन का ढिंढोरा देश में पिटते घूमते हैं। उनकी सफलता का रास्ता उनके आदर्शों की लाश पर चलकर निकला है।

    वे ऊपर से नैतिक दिखते हैं लेकिन अनैतिकता के पैमाने पर कसो तो उनका जीवन कहीं से भी नैतिक तो नहीं ही दिखता है। आज का सच तो यही है कि दिल्ली और मुंबई का रास्ता अनैतिकता से होकर आगे बढ़ता है।

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  • यशवंत भाई,
    आप मुझसे परिचित तो होंगे ही, आपकी इस पोस्ट को पढने के बाद अपने को नहीं रोक सका और मैं आपसे जुड़ना चाहता हूं, इस देश के भ्रष्ट बाजार, घटिया सिस्टम और मुर्दा मीडिया से तौबा करते हुए. लेकिन जब सारा तालाब ही गन्दा हो गया है तब इसमें कितना ही पानी बदलो कोई फर्क पड़ना संभव दिखाई नहीं देता.

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  • Arun Kumar says:

    Sir,
    raat ko phone nahi uthate, demand kar rahe hain kuch aise nojvano ki. sir pehle aap nojvano jaise baniye, media ki jimmedari samjhiye aur raat ko phone uthana shurru kariye, naujvan aapke sath kharre hain. aapne jo paryas kiya hai, ve aapke andar baithe 200 gm. ke master mind ne kiya hai, jisse hum salam bolte hain. aisa paryas naa to kisi ne pehle kiya hai, naa kar sakega.

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  • chandra kant says:

    karna hai woh kar daliye, varna fhir der ho jaygi hum hi kya bahut log sath kadey honge aap ke sat yaswant ji

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  • Ravi Shukla Bilaspur Chhattishgarh says:

    yaswant ji aap mujhse parichit nahi hai lekin aapka lekh read karne k baad mai apne ko rok nahi paya hum apke sath hai apke har sangarsh hume apne sath khara paige

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  • केके चौहान says:

    यशवंत जी नमस्कार, झूठ से पटे बाजारए भ्रष्टाचारियों से भरी व्यवस्था और मुर्दा शांति से युक्त मीडिया से दो.दो हाथ करने वाले लड़ाकों की तलाश पढ़ कर वास्तव में लगा कि यह देश मुर्दो का बनकर रह गया है। भ्रश्टाचार हमारे खून में शामिल हो गया है। हर कोई लूटने में लगा है। जिसे मौका नहीं मिल रहा वही ईमानदारी का राग अलाप रहा है। पर ऐसा नहीं है कि हिम्मत रखने वालों की दुनिया में कमी है। पहले भारतीयों ने अंग्रेजों से देश को आजाद कराया था। अब रिश्वतखोर, काला धन कमाने वाले देश और देश की जनता को बेचने वाले नेताओं और ब्यूरोक्रेट से देश को आजाद कराने की बारी है। आतंकी भी इतने बड़े देशद्रोही नहीं है जितने कि नेता और ब्यूरोक्रेट देशद्रोही हैं। अपने देश का धन दूसरे देश में जमा करना भी देशद्रोह से कम नहीं है। सवाल यह है कि अगर मरने के बाद आदमी अपनी दौलत साथ ले जाता तो इस देश का क्या हाल होता? वह तो जब मरता है तो नंगा ही जाता है। फिर बेइमानी की दौलत के लिए क्यों भ्रश्ट क्यों बन रहा है? क्यों अपने चेहरे पर कालिख पोत रहा है? क्यों बदनाम हो रहा है? क्यों बिकाऊ हो गया है? क्यों जमीर बेच रहा है? यह मेरे समझ में नहीं आ रहा।
    केके चौहान
    मुरादाबाद

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