एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ का प्रेम

ये प्रेम 17 हजार करोड़ का प्रेम था। आजाद हिंदुस्तान में भ्रष्टाचार की भट्टी से निकले 2जी नाम के इस सबसे बड़े जिन्न के पीछे न सिर्फ मंत्रियों, कार्पोरेट्स, लाबिस्टों और पत्रकारों के बीच चल रही दुरभि संधि थी, बल्कि एक प्रेम कहानी भी थी, ये प्रेम कहानी, बार बार अपने स्वप्नपुरुष को पाने में असफल रही। कनिमोझी और जल्द से जल्द आसमान छूने की हसरत रखने वाले बेहद महत्वाकांक्षी राजा की प्रेमकहानी थी।

ये प्रेम ऐसा था कि जिसके लिए अपने लेखों और अपनी कविताओं में बेहद ईमानदार दिखने वाली कनोमोझी ने अपने सारे आदर्शों और रिश्तों को ताक पर रख दिया, पति से बिगाड़ कर लिया, पिता को जहर खाने की धमकी दी, भाई से लड़ाई की और अपने राजा को देश के पैसे को हड़प खाने की खुली छूट दे दी। कहते हैं राजा, कनिमोझी की वो कमजोरी थी जिसका फायदा न सिर्फ नीरा राडिया ने बल्कि खुद रतन टाटा ने उठाया, राजा भी अपने प्यार की इस दीवानगी को जानता था। अपनी सारी चाल कनिमोझी के आँचल की छाँव में चलता रहा। यहाँ तक कि जेल जाने से पहले तक वो अपनी प्रियतमा को अपनी गिरफ्तारी की कीमत, कांग्रेस से जरूर चुकता करने की हिदायत देता रहा, लेकिन दूसरी चार्जशीट में अपना गला फंसते देख कनिमोझी और उसके मुख्यमंत्री पिता के पास कांग्रेस के सामने आत्मसमर्पण के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं बचा था।

चलिए पहले कनिमोझी को जान लें, बेहद खूबसूरत करूणानिधि की बेटी का स्वप्नपुरुष कभी कोई अरबपति नहीं रहा। एक वक्त “द हिन्दू” की रिपोर्टर रह चुकी कनिमोझी ने जब शिवकाशी के अतिभान बोस से १९८९ में शादी की तो उसे पैसे की नहीं उसके कवि मन को समझने वाले साथी की जरुरत थी, जिसमे अतिभान असफल रहा। नतीजा तलाक के रूप में सामने आया। कनिमोझी ने १९९७ में एक बार फिर शादी की। इस बार उसे जाने माने तमिल लेखक जी. अरविन्दन मिले। ये आँखों-आँखों का प्रेम था जो विवाह में तब्दील हो गया। लेकिन विवाह के बाद कनिमोझी एक बार फिर अकेले हो गयी। अरविन्दन को सिंगापुर ज्यादा पसंद था। वो चाहता था कि कनोमोझी साथ चले मगर कनिमोझी धीमे धीमे राजनीति में अपने पाँव आगे बढ़ाना शुरू कर चुकी थी। अरविन्दन को ये पसंद नहीं आया।  कनिमोझी की लाख कोशिशों के बावजूद अरविन्दन ने उसे फिर से अकेला कर दिया।

फिर कनिमोझी की जिंदगी में राजा आया। ये कोई २००५-०६ का समय था, जब आम तौर पर शर्मीले स्वभाव के राजा से कनिमोझी की आँखें चार हुई। फिर कभी दिल्ली तो कभी चेन्नई में मुलाकतें फोन पर घंटों बातें। इस प्यार में जहाँ कनिमोझी अपना सकून ढूंढ़ रही थी, वही राजा ये जानता था कि कनिमोझी के दम पर वो सत्ता के शिखर पर पहुँच सकता है और वो उसकी संवेदनाओं का बेहद चालाकी से इस्तेमाल करने लगा। कनिमोझी के भाई अलगिर को राजा के इस चरित्र का पता था। उसने कनी को कई बार समझाया भी था कि राजा उसे इस्तेमाल कर रहा है यहाँ तक कि एक बार दिल्ली एयरपोर्ट पर उसने राजा को कालर पकड़ कर धमकी भी दे डाली थी। लेकिन कनी की जिद्द के आगे सबको झुकना पड़ा। २००७ में मंत्रिमंडल के विस्तारीकरण में जब कनिमोझी ने करूणानिधि से राजा को केबिनेट मंत्री बनाने की जिद्द की तो करूणानिधि उससे इनकार नहीं कर सके। विभाग भी उसे वही मिला जो वो चाहता था, ये वो समय था जब नीरा राडिया का भ्रष्ट भारतीय राजनीति के  चकलाघर में प्रवेश हो चुका था।

राजा ने नीरा का परिचय कनिमोझी से कराया। राजा ये जानता था कि नीरा और कनी के सीधे सम्बंध में उसे ज्यादा फायदा होने वाला है। फिर नीरा ने कनी से अपनी नजदीकियां और बढ़ानी शुरू कर दी। कनी को राजा के बारे में सुनना, जानना और उसके लिए हदें पार करना अच्छा लगता था। और राजा को कनी के बारे में। नीरा उन दोनों की इस कमजोरी को अच्छी तरह से जानती थी। २ मार्च २००९ से कैबिनेट के गठन तक नीरा ने कनिमोझी से जो बातचीत की वो कन्नी के बेइन्तहा प्यार को समझने को काफी है। करूणानिधि की जिद्द और बालू समेत डीएमके के अन्य नेताओं के तगड़े विद्रोह के बावजूद कनिमोझी ने हार नहीं मानी और लड़ाई झगडे़ से लेकर आत्महत्या तक की धमकी देकर अंतिम समय में पिता को राजा को शपथ दिलाने के लिए राजी कर लिया।

मंत्रिमंडल के गठन के बाद जब दिल्ली से चेन्नई तक राजा और कनी के प्यार के किस्से सत्ता के गलियारों में दबे स्वरों में गूंज रहे थे ठीक उसी वक्त नीरा ने टाटा से बातचीत में इस प्रेम कहानी का जिक्र किया. बातचीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इस प्रकार है…

नीरा- जानते हैं रतन, राजा कह रहा था कि आजकल इस बात कि अफवाह जोरों पर है कि मेरे और कनिमोझी के बीच कुछ चल रहा है, जो कि सच नहीं है।
टाटा- कौन
नीरा- जानते हैं उसके लिए सबसे नयी बात ये है कि उसके और कनिमोझी के बीच प्रेम बढ़ रहा है
टाटा – किसके लिए नयी बात
नीरा- अरे दिल्ली में उड़ रही सबसे ताज़ी अफवाह
टाटा- ओह आई सी
टाटा- लेकिन ये सब फैला कौन रहा है
नीरा- अरे वही मारन, और कौन फैलाएगा, लेकिन समस्या ये है कि जब कोई मीडिया का व्यक्ति या और कोई व्यक्ति राजा से मिलता है तो राजा उसे ये दिखाने लगता है कि कनी के प्रति उसके दिल में कितनी जगह है। राजा से कनी के बारे में कोई कुछ पूछता है तो राजा शर्माने लगता है।
टाटा- हा हा हा हा हा
नीरा- वो कुछ ऐसा दिखाता है कि जैसे उसके और कनी के बीच प्रेम प्रसंग चल रहा है, ये बातें एक से दूसरे तक पहुँच रही है, और लोग इस पर खूब चटकारे ले लेकर बातें कर रहे हैं।
टाटा -हा हा हा हा हा हा
नीरा- उसने मुझसे आज कहा “मैं क्या करूँ जो लोग बार बार इस तरह की अफवाह उडा रहे हैं” मैंने कहा “तुम लोगों से ये मत कहो कि तुम्हारे दिल में कनिमोझी के लिए जगह है और ये भी कि तुम उसको लेकर चिंतित रहते हो”। मैंने ये भी बोला कि तुम जानते हो, तुम उसका नाम आने पर शर्माते हो। इस पर राजा ने कहा कि “तुम ये नहीं कह सकती कि उसका नाम लेने पर मै शर्माता हूँ। इस पर मैंने कहा कि “तुम्हारी आँखें बोलती हैं, और तुम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि तुम्हारा कनी के साथ प्रेम है।”

नीरा, टाटा को सिर्फ इस प्रेम कहानी से जुडी किस्सागोई नहीं बता रही थी, वो उन्हें वो रास्ता दिखा रही थी जिस पर चलकर देश के सबसे बड़े घोटालों को जन्म दे दिया गया, बताते हैं कि नीरा को जब कभी राजा से कुछ करवाना होता था तो वो पहले कनिमोझी की चर्चा करती थी फिर राजा को मनचाहे डील के लिए तैयार कर लेती थी। उधर कनिमोझी भी प्यार के इस कार्पोरेट खेल में जो घुसी तो फिर निकलने के सारे रास्ते बंद हो चुके थे। दिलों की राह से देश के सबसे बड़े घोटाले की नीव रखी जा चुकी थी।

लेखक आवेश तिवारी कई अखबारों में काम कर चुके हैं. इन दिनों नेटवर्क6 पोर्टल के संपादक के रूप में काम कर रहे हैं.

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