क्या ‘बकचोदी’ वाकई बुरा शब्द है?

एचटी के सीईओ राजीव वर्मा के नए साल के संदेश को प्रकाशित करने के साथ मैंने अपनी जो टिप्पणी लिखी, उससे कुछ लोग आहत हैं. वे आहत इस बात से हैं कि मैंने ‘बकचोदी’ और ‘बौद्धिक मैथुन’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल क्यों कर दिया. अंग्रेजी के एक पत्रकार साथी अश्विनी भटनागर ने और एक किन्हीं महेंद्र कुमार ने अपनी तल्ख टिप्पणी इस पोस्ट पर दी. अश्विनी ने ‘बकचोदी’ और ‘बौद्धिक मैथुन’ जैसे शब्द हटाने का अनुरोध किया जबकि कथित महेंद्र कुमार ने तो मुझे इतना भला-बुरा कहा है कि पढ़कर लगा कि अगर मैं उनके सामने होऊं तो वे मुझे गोली मार दें. खैर, जाके रही भावना जैसी. राजू नाम से एक साथी ने टिप्पणी की है कि उन्हें राजीव वर्मा के पत्र में कुछ गलत समझ में नहीं आया. मैं पहले अश्विनी, महेंद्र और राजू के प्रकाशित कमेंट को नीचे फिर प्रकाशित कर रहा हूं, फिर उसके बाद अपनी बात रखूंगा.


written by Mahendra Kumar, December 31, 2010

दया आती है भड़ास के संपादक यशवंत पर. माफ़ कीजिये संपादक शब्द को उनके नाम मस जोड़ना ही इस शब्द kee touheen है. यह आदमी ज्ञान शून्य तो है ही इसकी मति भी भ्रष्ट हो गई है. अंग्रेजी तो वह पेदल है ही हिंदी के नाम पर भी कलंक है. इस मंद बुद्धि को इतना भी नहीं पता ki इतने गिरे हुए शब्द इस्तेमाल कर वह खुद के लिए कब्र खोद रहा है. राजीव वर्मा के पूरे लेख में कहीं भी एसा नहीं लिखा जो गलत हो. इस बात को केसे भूला जा सकता है कम्पनी मुनाफा नहीं कमाएगी तो बाजार me टिकेगी कैसे ? हार्ड वर्क, क्रियेटिव आईडिया और न्यू इन्नोवेसन किसी के भी कामयाबी के मूलमंत्र हैं. लेकिन नकारात्मक सोच के कुएं me डूबे यशवंत को यह सब कभी दिखाई नहीं देगा. दिकेगा भी कैसे? आखी चोर को चोर ही तो नजर आते हैं. वी आर डिफरेंट फ्रॉम अदर … जैसे उत्साह बढ़ने वाले वाक्य के लिए बौधिक मैथुन जैसे शब्द का इस्तेमाल करके यशवंत ने अपने दिमाग का दिवालियापन ही बताया है. ईश्वर उसे बिलकुल भी सद्द्बुधि नही दे. ताकि पत्रिकारिता को कलुषित करने वाले यैसे बुधिहीनों kee तथाकथित पत्रिकारिता का क्रियाक्रम जल्दी हो सके. अश्वनी भटनागर जी आप इस उम्मीद का पोषण बिन्ल्कुल मत कीजिये ki वह उन अप्पति जनक शब्दों के माफ़ी मांगें.


written by raju, December 30, 2010

यशवंतजी, इसमें गलत कौन सा वाक्‍य है, मुझे अबतक समझ नहीं आया। थोड़ा बता देते तो अच्‍छा होता। मैं भी थोड़ी अंग्रेजी समझ लेता हूं। अगर कुछ खराब लगा तो आपका लिखा हुआ। बहुत खराब भाषा है। आलोक तोमर जैसा बनने की कोशिश करना अच्‍छा है। पर, आलोक तोमर बनने के लिए कुछ जन्‍म लेने होंगे आपको। अपने अच्‍छे-खासे पोर्टल को खराब न करें। अपने कमेंट को तुरंत हटाएं। धन्‍यवाद।


written by Ashwini Bhatnagar, December 30, 2010

Dear Editor Yashwant Sahib,

Thank you for providing the text of Mr Rajiv Verma’s mail to his colleagues in HT, preceded by your own comments on its tone and content. If you have any claim to be a journalist, please refrain from using obscene language. I’m much senior to you in this profession and words like ‘bakchodi’ are used at gutter level discussions. You have shamed journalists and journalism by using such a word in your comment posted on a public platform. I dont think a person who has no control over his language can be a journalist, let alone an editor. Please apologise for this grave lapse and withdraw your remarks immmediately.

For your information, I have no love for corporate media. If you ask around, you will come to know my role in TOI, Lucknow, union and the Bachchawat Wage Board battle in the late 80s and early 90s.

However, I cannot let you use your freedom of speech to lower the dignity of journalistic comment and practice. Regards.


तो ये रहे कमेंट. अब मेरा पक्ष सुन लीजिए, मानिए या न मानिए, ये आपके उपर है.


सबसे पहले महेंद्र कुमार से मुखातिब हूं.

आपने लिखा है कि ”कम्पनी मुनाफा नहीं कमाएगी तो बाजार में टिकेगी कैसे?” महेंद्र जी, आपकी यही एक लाइन बताती है कि आप किस बौद्धिक दिवालियेपन के शिकार हैं. अगर मीडिया भी मुनाफा कमाने वाला कोई सेक्टर है तो फिर ज्यादा अच्छा है कि शोभना भरतिया से कहिए कि ये मीडिया वाला काम बंद करके कोई कोयला खदान या सीमेंट फैक्ट्री ही चलाएं. पर वे नहीं मानेंगी क्योंकि उन्हें मीडिया को भी एक मुनाफाखोर उपक्रम बनाए रखना है और इस मीडिया से मुनाफा कमाने के साथ-साथ मीडिया की ताकत का इस्तेमाल कर ढेरों और लाभ लेने हैं. जाहिर है, सेलरी के कड़कड़ाते लाखों रुपये के नोट की चमक के चक्कर में आप जैसे बकचोद और बौद्धिक मैथुन करने वाले उनकी मीडिया कंपनियों में बड़े पदों पर आसीन किए जाएंगे और वे अपनी सेलरी की खातिर यह साबित करने में पूरी जिंदगी गुजार देंगे कि मीडिया के नाम पर जो कुछ काला काम हो रहा है, सब जायज है क्योंकि कंपनी मुनाफा नहीं कमाएगी तो बाजार में टिकेगी कैसे.

आप कोई एक आदमी नहीं हैं बल्कि पेड न्यूज और मुनाफाखोरी को जायज ठहराने वाले पत्रकारों की लंबी-चौड़ी जमात के एक अदने सदस्य भर हैं. मेरा विरोध आप लोगों से पहले भी था, और आगे भी रहेगा. आप मुझे संपादक न मानें और मेरा क्रियाकर्म करने को तत्पर रहें, यही मेरी जीत है. और, इसके ठीक उलट, मैं आप लोगों को पत्रकार और आप लोगों की कंपनियों को मीडिया कंपनी मानने से इनकार करता रहा हूं और करता रहूंगा क्योंकि आप लोग कभी पत्रकार व मीडिया हुआ करते थे लेकिन अब पैसे उगाहने वाली किसी फैक्ट्री व भ्रष्ट सत्ता और बेलगाम ब्यूरोक्रेसी के दलाल से ज्यादा कुछ नहीं हैं. आप लोग जनता का नाम लेकर सिर्फ अपना और अपनी कंपनियों व कंपनी के मालिकों के हित को साधते हैं, इसलिए आपको भी खूब पता है कि राजीव वर्माओं टाइप के संदेश में क्या छिपा है लेकिन नौकरी की मजबूरी ये है कि आपके खिलाफ आवाज उठाने वालों की आवाज बंद करने और कमतर करने के अलावा आपको कुछ समझ में नहीं आता. आपको आपकी नौकरी मुबारक और हमें हमारी अराजक भड़ास.

ज्यादा अच्छा होता दोस्त की असली नाम और पहचान के साथ सामने आते. खैर, ईश्वर आपको भी सदबुद्धि दें कि आप कभी अपनी कांच की दीवारों से परे की असली दुनिया, असली भारत के दुख-दर्द को समझ सकें और उसे साहस के साथ लिखने-छापने का हौसला कर सकें. पर मुझे पता है कि तेरी दो टकिये की नौकरी और मेरा लाखों की जनता के बीच कभी तालमेल नहीं हो सकता, सो, आप हमें निपटाने को तत्पर रहें और हम आप सबों की कंपनियों को.


अब बात राजू भाई से,

अगर आपको राजीव वर्मा के पत्र से कुछ समझ में नहीं आया तो आपको क्या बताऊं. चलिए, आपको एक क्लू देता हूं. मान लीजिए कि राजीव वर्मा कोलगेट पामोलिव के सीईओ हैं और अपने मैनेजरों, वर्करों, मजदूरों को एक पत्र भेजते हैं, तो वो पत्र कैसा होगा. आप राजीव वर्मा के इसी पत्र से एचटी और मीडिया शब्द हटाकर कोलगेट पामोलिव डाल दें और पूरा पत्र पढ़ें. कहीं भी नहीं लगेगा कि ये एक मीडिया हाउस के सीईओ का पत्र है और सीईओ ने इस पत्र को अपने संपादकों व पत्रकारों को भी मेल किया है. ज्यादा अच्छा होता कि राजीव वर्मा ये पत्र सिर्फ अपने मैनेजरों, बिजनेस डेवलपमेंट में लगे एक्जीक्यूटिव्स आदि को भेजते पर वे तो सुप्रीम हैं सो उन्होंने सारे संपादकों व पत्रकारों को भी ये पत्र भेज दिया है. अब बेचारा हिंदुस्तानी पत्रकार, वो कहां समाज, सरोकार और जनता के पक्ष में खड़े होने, सत्ता के दलालों का पर्दाफाश करने, भ्रष्ट तंत्र को दुरुस्त करने के सपने के साथ मीडिया में आया था और अब कहां उसे अपने सीईओ के जरिए बिजनेस बढ़ाने, प्रसार व पैसे में नंबर वन बनने आदि के बारे में सुनने को मिल रहा है. वो इस पत्र से क्या अर्थ निकालेगा.

पर, गलती राजू भाई आपकी नहीं है. हम हिंदी पट्टी वाले कम पढ़े लिखे और भदेस ज्यादा हैं, इसलिए हाथी के सूंड़ या पूंछ को पकड़ने के बाद ‘सच पा लिया, सच को खोज लिया, ये मिल गया’ जैसे नारे लगाने लगते हैं और आत्ममुग्ध भावुक की भांति सूंड़ या पूंछ के परे के व्यक्तित्व को समझने से इनकार कर देते हैं क्योंकि हम मनभावन तरीके से सूंड़ या पूंछ के जरिए ही अंतिम सच पा चुके होते हैं.


आखिर में अश्विनी भटनागर जी को प्रणाम करना चाहूंगा.

भाई, हम बकचोदी, हरामखोर, साले, कुत्ते, कमीने, दोगले आदि शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग करेंगे क्योंकि आपकी मुख्यधारा की पत्रकारिता को हम पत्रकारिता मानने से इनकार करते रहे हैं और करते रहेंगे. आपसे किसने कहा कि आप हमें पत्रकार मानें. समय और परिस्थिति के हिसाब से पत्रकारिता की परिभाषाएं बदलती हैं और आज की ये जरूरत है कि पत्रकारिता के काले भेड़ियों को उनके उचित सम्मान से नवाजा जाए ताकि उन्हें एहसास हो सके कि वे क्या कर रहे हैं. आपको बकचोदी शब्द पर आपत्ति है लेकिन आपको बकचोदी का अर्थ नहीं पता. हिंदी के कई ऐसे शब्द हैं जिन्हें अंग्रेजी वालों ने पनपने नहीं दिया क्योंकि वे शब्द ओरीजनल और जमीनी होते हुए भी अंग्रेजी वालों के कथित साफ्ट इगो को हर्ट करते हैं. आपको पता नहीं होगा लेकिन बता दूं कि हिंदी वाले अब अंग्रेजी वालों की छुच्छी खोलने पर आमादा हैं. अब आप ये मत कहिएगा कि ये ‘छुच्छी’ क्या बला है. छुच्छी का मतलब होता है किसी पहिए या आदमी के भीतर भरी हुई हवा को निकालने का स्रोत. छुच्छी को हवा भरने के लिए भी ढीला किया जाता है और निकालने के लिए भी. तो बकचोदी का अर्थ सिर्फ इतना है कि जो लंबी लंबी फेंके लेकिन उसके फेंकने का वृहत्तर संदर्भ में कोई मतलब नहीं हो.

यहां आपको ज्यादा दिक्कत ‘चोदी’ शब्द से है, न कि ‘बकचोदी’ से. बुरबक, लड़बक, गड़जर्रा शब्द तो आपने सुने ही होंगे. इनमें से कुछ कुछ एक शब्द तो गाहे-बगाहे टीवी पर भी सुनाई दे जाते हैं- वाया मिमिक्री, लालू यादव प्रसंग. क्योंकि अंग्रेजियत से लबरेज हिंदी-अंग्रेजी चैनलों के लिए लालू जैसे लोग मिमिक्री से ज्यादा कुछ नहीं, सो उनके भदेस शब्द, देसी हिंदी के शब्द भी मिमिक्री माफिक लगते हैं. बुरबक,  लड़बक, गड़जर्रा जैसे शब्दों के वे अर्थ नहीं होते हैं जो इन शब्दों के शुरुआती दो अक्षर समझकर लगते हैं. इसी तरह बकचोदी शब्द का सिर्फ एक अर्थ नहीं होता.  उसी तरह जैसे पेलने शब्द का एक ही अर्थ नहीं होता. आप अंग्रेजी में पेल बोल देते हो, हग बोल देते हो तो हम लोगों को बुरा नहीं लगता है क्योंकि ये आपके भाषा के पवित्र शब्द हैं.  हम भी पेलमपेल बोलते हैं, ज्यादा भीड़ व धक्कामुक्की के हालत को बयान करने के लिए. तब आप कहेंगे कि ये क्या बोल लिख दिया. सो अब आप समझिए कि हमारी भाषा के बेहद पवित्र शब्द हैं बकचोद, बुरबक, लड़बक, गड़जर्रा, पेलमपेल आदि आदि.

आप प्लीज अपनी अंग्रेजियत के चश्मे को उतारिए और हिंदी की आत्मा व मन को बूझने की कोशिश करिए. आप ‘फक’ शब्द ऐसे बोलते हैं जैसे आप च्यूंगम चबाते हैं, लेकिन हम हिंदी में फक शब्द जैसा समानार्थी शब्द कभी नहीं लिखते. पर हम जो लिखते हैं वो आपको भाता नहीं. एक बात साफ कर दूं कि अगर आप गुडी गुडी पढ़ने के आदी हैं तो आप ढेरों मीडिया पीआर पोर्टलों पर जा सकते हैं जो हमेशा अच्छा और बहुत अच्छा ही छापते हैं, कंपनियों और कंपनियों में काम करने वाले बड़े-बड़े बकचोद धंधेबाजों के बारे में. पर यहां भड़ास है. भड़ास का मतलब ललित कला या छायावदी कविता नहीं. ये वो खरा सच है जिसे बोलने-लिखने-कहने में आप जैसे ढेरों सभ्य पत्रकारों को अक्सर दिक्कत हुआ करती है.

फिर भी, निंदक नियरे राखिए की तर्ज पर मैं आप सभी को प्रणाम कहता हूं कि आपने कम से कम अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया. बहुत सारे लोग तो पढ़कर चुपचाप यूं निकल लेते हैं जैसे वे हमें जानते नहीं, पहचानते नहीं, उनसे तो आप लोग अच्छे हैं 🙂

आप सभी का धन्यवाद. मेरी कोई बात बुरी लगी हो तो माफ करिएगा, उसी तरह जैसे आपकी किन्हीं बुरी बातों के लिए मैंने आप लोगों को माफ कर दिया.

आप लोगों की टिप्पणी का इंतजार रहेगा.

नये साल में आप लोगों को सदबुद्धि आए, ऐसी मेरी प्रार्थना है.

आभार

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

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Comments on “क्या ‘बकचोदी’ वाकई बुरा शब्द है?

  • arvind kumar shukla says:

    Sahi kahavat hai, sut na kapas julahoon me lattham latth. Yasvant ke likhane ka andaj accha hai. Samjhdar aur imandar hai.

    Reply
  • Very funny!!! Yashwant, Apne Blog se website kyo banai? popular to blogs bhi hote hai. yakinan fayde ke liye!! Apni maa ko mayawati ki maa se compare kyo kiya? journalism se itar khabar to apke blog me rahti nahi? wahi sub aap karte hai fir Media se munafe ki bat pe tunakte kyo hai aap! wahi hazaro logo ka ghar chala rahi haisorry to say You are neither a social worker, nor a such human type INSAAN!! Jb ap pe bhi ati hai to ap bhi aam PSUDO type journailists ki tarah bakne-jhakne lagte hai. apne contacts ka USE karte hai. galat hamesha galat hota hai, chahe wo kisis bhi bhasha me ho!

    Reply
  • Lage rahiye Yashwant Ji…………pade-likhe patrakar english mein galiyaan ya phir khabro mein F**** chhap kar apni boddik kshamta ka parichaya dete hain aur agar koi apni bhasha (hindi) mein use doharata bhi hai to uska man-mardan karne mein koi kor-kasar baaki nahi chodte hain, shayad in pade likhe patrakaron ko kaun samjhaye ki ab dOxford dictionary mein bhi Gunda jaise shabdo ko jagah de di gayi hai.

    Reply
  • harish pandey says:

    sir m aapki baat se bilkul sahmat hu maine aapke portal m kabhi apni origanal id se or naam se comment nahi kiya m uttarakhand ka rahne vala hu or media m work krta hu. aajkal sb media gharano ne paper ko kamaiyi ka jariya bna liya hai kisi bade galat kaam krne valo ke khilaf ye advertiesment ya apne niji hit saadh kr uske khilaf khabar nahi chapte hai. is waqt uttarakhand m itne galat kaam chal rahe hai. koi paper uske khilaf chapne ka sahas nahi kr raha hai. news paper apne hito tk simit ho gya hai.

    Reply
  • shravan shukla says:

    raman singh…aapko sabse pahle aapke apne baudhhik maithun ki jarurat hai…taaki ek nai soch viksit kar sake…aur ha…aapke poore camment me jo wakya hai…unke aadhar par aap mere saamne aane ke baad do-char khakar hi jaa sakte hai..ab yah mat poochiyega ki kya khilaunga..bas ishara kaafi hai..galat samjhenge to yeh aapki manodasha…yahi viraam

    jay bhadas

    Reply
  • Betaaj BAADSHAH says:

    यार यशवंत जी कमाल के आदमी हैं आप, ये पढ़कर हंस हंस कर मज़ा आ गया, पूरे दिन की थकान उतर गयी. लड़बक, गाड़जर्रा, बक्चोद जैसे शब्दों को सुनकर जिनकी जल रही है उनके लिए एक संदेश है की कम से कम ये सारे शब्द जिनके लिए प्रयोग किए जाते रहे हैं या जिनके द्वारा प्रयोग किए जाते हैं, दोनो को ही निहितार्थ का पता होता है परंतु अँग्रेजिदा लोगों के द्वारा प्रयोग किए गये शब्दों का अर्थ कुछ और होता है और निहितार्थ कुछ और. उपर मे एक भाई ने अति उत्साह मे आपको दल्ला भी कहा है और आपके इलाक़े को भी कोसा है, स्वयं को शायद बुद्धिमान भी मानते हैं. उनके और उनके जैसे और ग़लतफहमी के भगन्दर से पीड़ित लोगों से बस यही कहना है की इस देश मे अँग्रेज़ी के पत्रकारों पर जीतने घिनौने आरोप लगे हैं उसके बाद तो समाज मे पत्रकारों को दलाल ही समझा जाने लगा है,ये लोग पत्रकार नही स्क्राइब्स हैं जो कभी टाटा और मुकेश की दलाली करते हैं तो कभी देश के दुश्मनों को सूचनायें देते हैं.और रही बात इलाक़े की तो वहाँ पर हिजड़े होते ही नही, जो बोलना होता है, खुलकर बोलI जाता है, ये नही की मूह दबाकर खखारने के बहाने पाद लिया और एक्सक्यूस मी कह कर चूतिया टाइप का मूह बना लिया.

    Reply
  • bahut der bakchodi hui, chalo, in angrej ke puchhallo ko kaho ki kabhi feild me nikal kar patrakarita karen , …..hath me aa jayegi[b][/b];D

    Reply
  • कमल शर्मा says:

    मुझे रमन सिंह की टिप्‍पणी पर एतराज है। रमन सिंह मैं आपसे एक बात जरुर करना चाहूंगा कि आप भडा़स पढ़ें या न पढ़े लेकिन हिंदुस्‍तान में शायद इक्‍का दुक्‍का पत्रकार ही होंगे जो भाई यशवंत जी की तरह सीना चौड़ा कर सब कुछ लिख रहे है, पैसो के अभाव के बावजूद समझौता न कर सब कुछ धडल्‍ले से छाप रहे हैं। मुकदमे झेल रहे हें। आप दो मुकदमे झेल कर देख लीजिए सारी पत्रकारिता का जोर लगा लेना, पता चल जाएगा कि कितने दम से सब कर पाते हों। एक एक मीडिया हाउस में जमकर शोषण है लेकिन कितने पत्रकारों ने अपने ही मीडिया हाउस के खिलाफ आवाज उठाई वहां नौकरी करते हुए, जरा बताना। और नौकरी छोड़ने के बाद भी आग उगली हो तो बताना। बहादुरी से आम आदमी को कहेंग, जानता नहीं, मैं पत्रकार हूं और जब खुद नौकरी पर जाते है तो अपने मालिक के सामने भीगी बिल्‍ली की तरह लोट जाते हैं। कई मीडिया हाउस ने तो डर कर भडा़स को अपने कार्यालयों में ब्‍लाक कर दिया है। यह एक क्रांति है जिसकी दिशाएं तय होती रहेगी लेकिन पहली बार कोई ऐसा आदमी (यशवंत सिंह) है जो ताल ठोक कर पत्रकारों के लिए खड़ा हुआ है। रुप रंग पर न जाएं हिम्‍मत पर जाएं। आपमें दम हो तो इससे बेहतर कुछ कर दिखाओ।

    Reply
  • Raman Singh says:

    यशवंत और यशवंत के दल्लों (अब ये मत कहना कि दल्ला शब्द क्यों उपयोग किया) को मैं यह बताना चाहता हूं कि चोदी तो चोदी होती है फिर चाहे वह अंग्रेजी मैं हो या हिन्दी में. किसी ने अंग्रेजी में इस शब्द का उपयोग किया तो इसका मतलब ये कतई नहीं है कि यशवंत को भी इसका लायसेंस मिल गया, लेकिन यशवंत जिस इलाके से हैं वहां ऐसा ही होता है. यह गलती किसी संपादक की नहीं है उस परवरिश की है जो यशवंत को मिली. बेहतर होगा कि यशवंत क्षमायाचना कर ले नहीं तो उसकी भड़ास निकालने का यह जरिया उसके लिए जी का जंजाल बन जाएगा. लोग चोदी ही चोदी करेंगे और कोई सामान्य बुद्धिजीवि ऐसी सामग्रियों को पढऩे नहीं आएगा.

    Reply
  • आपने सही लिखा है. कोई तो है जो सही बात कहने की हिम्मत रखता है. अदिकतर टीवी चैनल
    सिर्फ खबर दूंदते है . जैसे सलमान ने आज कटरीना से मिला तो यह एक खबर , अगर किसी सांस ने बहू को डाटा तो खबर
    अगर किसी अदाकारा ने फिल्म के लिए हा की तो खबर. लकिन मेरे हिसाब से यह सब आम बाते है . जो आज नहीं हजारो साल से होती आ रही है
    पर यह मीडिया वाले रोज़ मर्रा की बातों के ऐसे दिखाते है की लगता है बहुत बड़ी खबर मिल गयी.
    मुझे आपका लिखना बहुत पसंद है

    Reply
  • आपने सही लिखा है. कोई तो है जो सही बात कहने की हिम्मत रखता है. अदिकतर टीवी चैनल
    सिर्फ खबर दूंदते है . जैसे सलमान ने आज कटरीना से मिला तो यह एक खबर , अगर किसी सांस ने बहू को डाटा तो खबर
    अगर किसी अदाकारा ने फिल्म के लिए हा की तो खबर. लकिन मेरे हिसाब से यह सब आम बाते है . जो आज नहीं हजारो साल से होती आ रही है
    पर यह मीडिया वाले रोज़ मर्रा की बातों के ऐसे दिखाते है की लगता है बहुत बड़ी खबर मिल गयी.
    मुझे आपका लिखना बहुत पसंद है

    Reply
  • shravan kumar shukla says:

    aapki samajh me nahi aayega….kyuki aa hindi bhasha ke jaankaar nahi hai..hindi me sirf hindi hi nhi aati .. uske saath kai bhashaaye aati hai …hindi o bas devnaagiri lipi ko vyakt karne ka saadhan maatra hai..jaise awadhi, maraathi, bhojpuri ,,,…aur ha..agar hindi vidhao ki jaankaari hai to tarksangat kasauti par taul le..pata chal jayega…ab mai aap jaisa nahi hu isliye aapne budhhi wo wo jo aapne likha hai..chuk ya wagairah wagairah..wo nahi kahunga…

    Reply
  • kranti kishore Mishra says:

    An unnecessaru arguement….Yashwant ji is a literate journalist and he knows his responsibility towards society thus he cant publish any thing which comes under immoral category but my sinciere advise is to avoid such cheap words.

    Reply
  • suresh chiplunkar says:

    यशवन्त जी से पूरी तरह सहमत हूं…
    अंग्रेजी प्रेस वाले बौद्धिक, हिन्दी के देशज शब्दों के उपयोग से घबरा जाते हैं… खुद भले अंग्रेजी में माँ-बहन एक करते रहते हों… बकचोदी से भी ज्यादा मजेदार शब्द है “बौद्धिक मैथुन”…
    सत्ता की दलाली करने वाले “पत्रकार” ज़मीनी पत्रकारों और ज़मीनी भाषा, दोनों से बहुत दूर जा चुके हैं…
    आप लगे रहें यशवन्त भाई… उन्हें बकचोदी करने दें… हाल ही मैंने भी एक लेख में “बौद्धिक खतना” शब्द का उपयोग किया है…

    Reply
  • कुमार गौरव says:

    यशवंत जी आपने कुछ भी गलत नही लिखा , इन अंग्रेज के जनो से , शाले दिन भर
    “फक ” , ” शीट” , “बास्टर्ड ” और न जाने क्या -क्या कहते हैं , और बकरचोदी से बुरा मान गये . अंग्रेज चले गये पर इन्हें छोड़ गये.

    Reply
  • मैं अपने कमेंट को वापस लेता हूं। आपकी हर बात तर्कसंगत है। मेरी निगाह में आपकी और आपके पोर्टल की इज्‍जत और बढ़ गयी है। आपके सभी तर्कों से मैं सहमत हूं। पहले नहीं था। पर, आपने अपनी बात बहुत अच्‍छे तरीके से रखी। आपकी बात में दम है। अंग्रेजी के हजार नॉवेलों में ये शब्‍द आराम से प्रयुक्‍त होते हैं, तो हमें खराब नहीं लगता। कृपया अपना तेवर बनाये रखें। शुभकामनाएं।

    Reply
  • mahendra kumar says:

    ‘ Bhagwan tumhe bilkul bhi sadbudhi na de ‘, mene yah yunhi nahi likha tha. Thmhare dimag ki pemaish (naptol) to tumhare kuch likhne par hoti hi rahti hai lekin aaj to tumne had kar di. Darasal, tum sankeern mansikta ke shikaar ho. kuch badaa, kuch achaa, netative me se positive nikalne or dedhne ki tumhari chuk (end) gai hai. Lihaja is portal ki anthesti nishchit hai. kutarkon se apni galat bat ko sahi batane ki kargujari antatogtva dhooldhoosrit hoti hee hai. Jansatta ki patrkarita ko harkoi naman karta hai. ak din uska sampadkeey nahi padhte the to chatptahat hone lagti thi. vah akhbaar aaj bhi apne usoolon par tika hai. usne badlav ko tarjeeh nahin di or di bhi to tab jab samay nikal gaya. That is why Mr Yashvant Munafa tika hai compny ke swasthya par. swasthya tab theek rahega jab hava ka rukh pachanoge, samay ke lath chaloge. badlav ko angeekar nahi karoge to jameedoj ho jaoge. Fir patal(rakshason ka nivas sataan) me bagharte rahna apni shekhi, mujdon ke saath. Ab tum to nagetivity ki kahan ho. kutark doge ki ye usoolon ko tilangali dene valye … ( I can’t write the work that Yashvant is useing it as freely as he uses it in him home too.) Astavakr ki geeta ke aage krashn ki geeta kahin naheen tikti ( tumne to padhi hi nahi hai) . jo sahas, jo sachaai or jo yatharth, astavakra ki geeta me hai uski koi krashn ki geeta me kalpna bhi nahi kar sakta. Magar krshan marketing jante the. unhe pata tha ki log kis se khush rahenge or koun se baat unhe pasand nahi aayegi. yah sab devlok ki marketing thi. ‘ man is made by his belive as he belive so is he’ ka mantra dekar krishna ne ache-bure sab ko es yukti me samahit kar diya.Astabakra ne yese samjhotebadi yuktiyan kabhi nahin gadhi. Achche ko achcha or bure ko bura hi khaa chahe uske astitva par kuch bhi asar pade. Aaj astavakra geeta to door unka naam tak ginti ke lon jante hai. Lakir ke fakeer mhashay tumare bheje men yah bhi nahi bethega. Is liye havaa ka rukh dekhkar agar sabhi akhbaron ne bajaronmukhi rukh akhtiyar kiya hai to vah galat nahi hai. Jab unka astitva rahega tabhi to ve kich karenge. Yesa nahi hai ki jin akhbaron ka tumne jikra kiya hai ve logon ki dukh-dard ki khabren hani chapte. Arry…main bhi kise gyan dene laga. Tumhare bheje main to kuch bethta hi nahin hai. pata hai fir tum kutarakon ki jhadi lagakar bor karoge magar ab me apna samay barbad nahi karoonga.

    Reply
  • विनीत says:

    ये आपत्ति शब्दों पे नहीं है ..ये आपत्ति है परंपरागत मीडिया की नव तकनीकी मीडिया के तेज़ी से बढते प्रभाव की..ये घबराहट ,ये विरोध ,और ये [i]लौंडई हड्बोंगपन[/i] ही इस माध्यम की सफलता की निशानी है.
    winit /swennews/ newszone broadcom/ Lko

    Reply
  • akhilesh akhil says:

    yashwant bhai bakchodi shabd ko jitne tarike se aapne in murkho ko samjhane ki koshish ki hai wah lajabab hai. darasal galti inki nahi hai,aise logo ki paidaise me khamiya hoti hai. inhe rape likhne me sharm nahi aati ,lekin balatkar likhne me sharm aati hai. ye agent kahlana chahte hai lekin dalal banna nahi chahte. ye double standard likhenge lekin dogla shabd se parhej hai. ye log khate to hindi ke hai lekin gaate hai angreji ke. yehi doglpan hai. aise hi doglo ke karn media badnam hai aur hum sab uska dansh jhel rahe hai.

    Reply
  • कमल शर्मा says:

    अंग्रेजी पत्रकार मेरे भी दोस्‍त हैं जो बात बात में दूसरों से और अपने साथियों से अनेक ऐसे शब्‍दों के साथ बात करते हैं जो सीधे सीधे गाली होते हैं। जिन लोगों को बौद्धिक मैथुन और बकचोदी शब्‍दों पर एतराज हैं वे अपने अंदर झांक कर देखें कि अंग्रेजी संपादकीय और मैनेजरियल विभागों में गुस्‍सा आने पर क्‍या शब्‍द बके जाते हैं। हिंदी शब्‍द समझ में नहीं आते हैं तो बकर बकर न करें। पहले हिंदी भाषा के साथ विभिन्‍न बोलियों के शब्‍दों को समझिए इसके बाद बहस करें। यशवंत जी आपको शब्‍दों के अर्थ समझा दिए हैं। उम्‍मीद है अब आगे से ऐसी नादानी नहीं करेंगे।
    रही बात पत्रकारिता समझाने की तो यह समझ लीजिए हिंदी व भाषाई पत्रों ने ही हमेशा जन आवाज को उठाया है जबकि अंग्रेजी प्रेस हमेशा प्रो गर्वमेंट रही है। अंग्रेजों का साथ दिया हो या इमरजेंसी का। हिंदी व भाषाई पत्रकारों से न भिडे तो ही बेहतर होगा। सिगरेट, कॉफी का प्‍याला लेकर बकवास चिंतन व बैठक करते रहो, हर किसी से उलझो मत, इस साल के लिए इतना ही।

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  • Ashwini Bhatnagar says:

    Yashwant, our comments amuse me. I take them to be that of a brat rather than a committed and balanced journalist. Please carry on with your ‘style’ of writing and speaking in Hindi. Let more reasonable professionals judge you over a period of time. I had only commented on your selection of words because I care for Hindi and its journalism.
    For your information, my relationship with Hindi journalism and its big and small names is perhaps as old as your age. I have written extensively for Swatantra Bharat, Dharmyug, Dinman, Nav Bharat Times, Maya, Dainik Tribune (editorials) etc while working with people like Rajendra Mathur, SP Singh, Ganesh Mantri, DharamVir Bharti, Nandanji, Gulzar, etc etc. I have translated Prem Chand and Chandrakanta series and dont need lessons in Hindi usage from you.
    I wish you would explore this beautiful language and express your strong sentiments on issues without diving into a gutter and handing out filth as gems of your wisdom.
    Thank you for your time and patience with me. Regards.

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  • Nahin Nahin Bakchodi bilkul galat shabd nahin hai. apni website ka naam badalkar bakchod4media.com rakh len. aaj hi register kara len.
    Lekin hamen bakchodon ki ladhai se door rakhen.

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  • shravan kumar shukla says:

    ashani, mahendra, raju,

    bhai ek baat to kahunga ki aap log ho sakta hai patrakaarita ke purodha khud ko samajhte ho..ho sakta hai aisa ab aapke man me nahi ghusa..lekin sachchai sirf bolne ya kahne se koi fark nahi padta jabtak ki uska aabhas sabhi ko na ho…maanta hu aap hindi ko hindi aur english ko english nahi samjhte aur dono ko milakar bhedchaal wali bhasha me ek naye bhasha jise ham hindlish kahte aa rahe hai abtak..usme jeene wale hai…

    ha baat par aata hu.. jo baat ach kahne se kisi ko na samajh me aaye..yani ki shaleenta se..jaisa ki aap karna chah rahe hai..uska kisi par koi fark nahi padta..wo bas ek bina prabhaav wali baat bankar rah jaati hai….aur yahi khasiyat hai bhadas4media.com ki wo sachchai ko usi bebaak tareeke se rakhti hai jaise ki sachchai hoti hai…yaani ki jo asar daal sake…

    aur ha..bahre logo ko sunaane ke lie jaise dhamake ki jarurat hoti hai kuch aisa hi maan lo..jab sachchai apne sachche aukaat par aakar kahi jaati hai tabhi aap log chaukte hai…dinbhar apne gharo, eristedaro, aur yaro me .yah kahte nahi thakte ki …i to sala burbak hai be.. etc, to sachchai batane ke mamle me aisa kyu?
    aur ha..aapne इसकी मति भी भ्रष्ट हो गई है jaise shabdo ka prayog kiya hai..agar yah sach ke hora sa kareeb hai tabhi isne asar kiya….aur ha..sachchai ka asar dekhne ke lie sachchai ko dharatal par utaar kar hi dekha jana chahiye…waise ek baat poochna chahunga…agar aap hote to us patra ki vyakhya kin shabdo me karte????????

    soch kar jawaab deejiyega..ek baat aur..us patra ko apne shabdo me jyada shaalinta se jawaab dene me .. pita ji, ya dear chacha ji ne kaha jaise shabdo ko prayog mat karna..warna sachchi fir se bhatk sakti hai…

    Dhanyawaad
    shravan shukla
    epatrakaar@gmail.com

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  • shravan kumar shukla says:

    waise mahendra ji..jo bat aapne paidal wali kahi hai wo aappar jyada sateek baithti hai..ekbaar fir se apna camment padhiye aur dekhiye ki koi aisa wakya hai jo shudhh hindi ya english me likha gaya ho..?
    mere pass thodi si hindi me type na kar paane ki majboori hai..isilie roman me likh raha hu..aur ha….yashwant jaisa sochna jis din shuru karne ki koshish bhi karoge..i think uske baad kya hoga..yah upar wala hi jaane..

    jai ho..guru..hahahaha

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  • Yashwant ji , Very true. Hard hitting comments especially when they are made to prove a point is always welcome. Congrats.

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  • संजय कुमार सिंह says:

    यशवंत जी अच्छा हुआ कि आपने न जानने वालों को बकचोदी, बौद्धिक मैधुन के साथ-साथ ये भी बता दिया कि हमलोग हर बात में फकऑफ नहीं कहते। और किसी शब्द का पूरा मतलब होता है उसके शुरू के दो या आखिर के दो अक्षरों से बनने वाले शब्द के लिए किसी शब्द को अंग्रेजी के चार अक्षर से बनने वाले शब्द की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता है।

    राजीव जी के पत्र को पूरा बांचने के बाद मैंने जो लिखा था उसका सार संक्षेप यही था कि यह बकचोदी और बौद्धिक मैथुन से ज्यादा कुछ नहीं है। और यह आपने लिख ही दिया था। इसलिए मैंने उसे डिलीट कर दिया।

    अब आपने कमेंट न करने वालों से कमेंट करने वालों को बेहतर कहा है तो एक कोशिश मेरी भी।

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