खबरों का पीछा करता एक संपादक

पुण्य प्रसून बाजपेयीखबर को जब हाशिये पर ढकेलने की जद्दोजहद हो रही हो… खबरों को लेकर सौदेबाजी का माहौल जब संपादकों के कैबिन का हिस्सा बन रहा हो तब कोई संपादक खबर मिलते ही कुर्सी से उछल जाये और ट्रेनी से लेकर ब्यूरो चीफ तक को खबर से जोडऩे का न सिर्फ प्रयास करें बल्कि फोटोग्राफर से लेकर मशीनमैन और चपरासी तक को खबर को चाव से बताकर शानदार ले-आउट के साथ बेहतरीन हैडिंग तक की चर्चा करें तो कहा जा सकता है कि वह संपादक, संपादक नहीं जुनून पाल कर खबरों को जीने का आदी है। और यह जुनुन सरकारी रिटायमेंट की उम्र पार करने के बाद भी हो तब आप क्या कहेंगें. जी, एसएन विनोद ऐसे ही संपादक हैं।

नवंबर 1988 को बतौर ट्रेनी पत्रकार के तौर पर एस. एन. विनोद की लोकमत समाचार की टीम का हिस्सा बना था और ट्रेनी रहते हुये ही खबरों को परोसने से लेकर खबरों को लाने और अखबार छपने के बाद उसकी ताजी महक को सांसों में बसाने का जुनुन मेरे भीतर बिना किसी ट्रेनिंग के कैसे-कब घुसा, इस बारे में 22 बरस बाद आज जब सोचता हूं तो एहसास यही होता है कि विनोद जी की पत्रकारिता किसी को औपचारिक ट्रेनिंग देने के लिये नहीं है बल्कि खबरों को लेकर उनके अंदर ही इतना उल्लास-उत्साह हमेशा रहता है कि अखबार के दफ्तर का माहौल ही खबरों में गुम हो जाता है। उस वातावरण में जिसे जो दिशा तय करनी है वह कर लें। अगर कोई उस वातावरण में नहीं भी जुडऩा चाहता है तो रास्ता उसके लिये भी है, यानी स्वच्छंदता के साथ किसी भी पत्रकार के लिये एक ऐसा वातावरण हमेशा मौजूद रहेगा, जिसमें हर किसी में खबरों को लेकर एक कुलबुलाहट हमेशा रेंगती रहे।

नागपुर के कस्तूरचंद पार्क में बारिश के बीच बिजली गिरी और वहां सीमेंट के छाते तले सात लोग मर गये। यह 1989-90 की बात है।  संयोग से उस वक्त मै भी पार्क में ही मौजूद था। आफिस लौटा और विनोद जी को पता चला तो कहा- जो महसूस किया उसे लिख डालो। पहले पेज पर छपा और अगले दिन दोपहर में अचानक डेस्क पर बोले- खबरों में मानवीयता झलके तो लगता है सरोकार बचे हुये हैं। अच्छा लिखा प्रसून।

कमाल है, सरोकार की इतनी छोटी और मजबूत व्याख्या नागपुर छोडऩे के बाद के 15 बरस में मुझे किसी संपादक ने नहीं कही। प्रभाष जोशी सरोकार के लिये कुरेदते थे। एसपी सिंह एसएन विनोदखबरों में सरोकार का पुट जरूर रखते थे। लेकिन एसएन विनोद सरोकार को ही खबरों में तब्दील कर देते थे। शंकर गुहा नियोगी की हत्या की खबर के साथ-साथ पूरा एक पन्ना उनके संघर्ष पर। दिल्ली-राजहरा के मजदूरों के संघर्ष से लेकर ट्रेड यूनियन के तमाम प्रयोगों को जब छापा तो विनोद जी लगे किस्सा सुनाने- कैसे झारखंड के धनबाद में कोयला मजदूरों को लेकर नियोगी संघर्ष से जुड़े। यानि हर सांस ही अगर खबरों को जीने लगे तो क्या होगा। यकीनन ऐसे संपादक को खबर चाहिये और वह दलित आंदोलन से लेकर संघ परिवार और नक्सल मुद्दों से लेकर मजदूर-रिक्शा खिंचने वालों के दर्द में भी उभर सकता है और बेहद शिद्दत से हर खबर को पकड़ना।

मोवाड़ की बाढ़ हो या अमरावती में कुपोषण से मरते दुधमुहे बच्चे। हर खबर को नागपुर शहर के कैनवास से बड़ा कर राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में रखना। उसके बाद किसी बच्चे की तरह खबरों की नब्ज पकडऩे पर इतराना। कमाल है। और जब विनोद जी के नये अखबार 1857 को देखता हूं और वह जानकारी देते हैं कि एक साल पूरा हो गया तो पता नहीं क्यों, अखबार के नाम ‘1857’ में भी मुझे कई बिंब विनोद जी के ही नजर आते हैं। जो पचास साल से खबरों को जीते हुये अब भी किसी ना किसी खबर की तलाश में रहता है और 2010 में भी 1857 सरीखे संघर्ष का सपना जिलाना चाहता है.  यह जानते हुये कि 1857 को अंग्रेजों ने विद्रोह करार दिया गया था और अब के संपादक जब खबरों को किसी सौदे या करार में बदल समझौता कर लेते हैं, तब भी एसएन विनोद में खबरों को निकालने और उसे छापने का माद्दा है।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ मशहूर टीवी जर्नलिस्ट / एंकर हैं. वे इन दिनों जी न्यूज से जुड़े हुए हैं.

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Comments on “खबरों का पीछा करता एक संपादक

  • Bikash Kumar Sharma says:

    sir jee main mass communication ka kshatra hun or kai mahino se bataor trainee kaam bhi kar raha hun klekin mujhe aisa kabhi bhi mehsus hua or shayad kahi na kahi mere kisis bhi mitra ko nahi hua.
    Baat wahi aati hai ki ab na wo daur hai na woh log. Prasun jee apne bahut accha likha hai khaas kar ke is daur me jab sarokar or samachar dono hasiye par hai.

    Dhanyawad

    Reply
  • ur training under Vinodji reflects in every news u undertake…. i must add the short duration i worked with you was a similar training…. May u remain the way u are… sanjeev

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  • संजय says:

    निश्चय ही श्री एस.एन. विनोद वन मेन आर्मी की तरह हैं। कुछ महीने उनके नेतृत्व में काम करने बाद पता ही नहीं चला कि कब हमारे अंदर भी नेतृत्व क्षमता विकसित हो गई। अखबारी दुनिया की विषम परिस्थितियों में धैर्य व सहजता के साथ बेहतर कंटेंट वाले तेवरभरे खबरों को पाठकों के सामने परोसने की कला कोई श्री विनोदजी से सीखे। पत्रकार चाहे नया हो या पुराना, श्री विनोदजी खबरों को पीछा करने के लिए खुला मौका देते हैं।
    कई प्रतिकूल परिस्थितियां आईं। लोगों ने अफवाहें उठाई कि दैनिक 1857 बंद हो जाएगा। बदनामी की भी हर संभव कोशिश हुई। लेकिन ऐसी तमाम कोशिशें और परिस्थितियां श्री विनोद सर के सामने बौनी हो गई।
    संजय
    कोटा
    🙂

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