‘छतिग्रस्‍त’ और जागरण, भास्‍कर व पत्रिका

देश के तीन बड़े अखबार यानी दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण एवं पत्रिका में हिंदी के जानकारों की कमी होती दिख रही है। ऐसा हम नहीं कह रहे हैं बल्कि इस कमी को आप उनकी वेबसाइटों में देख सकते हैं। इस पर पब्लिश होने वाली खबरों को लगता है कोई पढ़ना जरूरी नहीं समझता है। तभी तो इन लोगों को ‘छतिग्रस्त’ और ‘क्षतिग्रस्त’ के बीच में कोई अंतर नहीं लगता है।

हिन्‍दी मीडिया के महारथी होने का दावा करने वाले तीनों अखबार इस गलती को किया है। इस आप नीचे दिये खुद देख सकते हैं।

गलती1

गलती2

गलती3

एक पत्रकार की तरफ से भेजे गए पत्र पर आध‍ारित.

Comments on “‘छतिग्रस्‍त’ और जागरण, भास्‍कर व पत्रिका

  • Patrika group ka desh bhar me yahi haal hai. Wo bade shan se MP or Bhaskar ke lead areas me apni presentation dikha raha hai, lekin uske pas patrakar hai hi nahi. Vaise bhi patrika me Journalists ki nahi, informers ki jaroorat hoti hai. Editor to waha koi hote hi nahi. Jinko Editor ki post mili hai, wo to management ke aadmi nai, jinhe sirf is baat ki salary milti hai ki wo kitne kam paise me akhbar nikal sakte hai. Aise haal me upar wali galtiyan koi badi baat nahi hai.

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  • अमित गर्ग. जयपुर. राजस्थान. says:

    ये कॉपी और पेस्ट की कहानी है. सभी जगह एक सा हाल है. दसवीं और बारहवीं जमात तक पढ़े-लिखे अधकचरे लोग आज के टेलेंटेड युवा पत्रकारों को ज्ञान बाँट रहे हैं. और बड़े संस्थानों के प्रबंधन ना केवल ऐसा करने में इन अधकचरों की मदद कर रहे हैं बल्कि इनके काले-पीले कारनामों पर मूक-बधिर भी बने हुए हैं. ऐसे लोगों से पत्रकारिता की उम्मीद करने वाले लोग भुलावे में जी रहे हैं. ऐसे आधे-अधूरे पत्रकारों से स्वस्थ पत्रकारिता की उम्मीद करना निहायत बेमानी है.

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  • दलाल, होकर, ब्लेकमेलर, चमचे(किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के) आदि प्रकार के सज्जन पत्रकारिता करगें तो ऐसे ही उदाहरण बार बार लगातार ऐसे ही उदाहरण सामने आते रहेगें और मुझ जेसे विघार्थी हिन्दी सुधारने की जगह ओर बिगाडते चले जाऐगें।

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  • yashovardhan nayak tikamgarh. says:

    किस-किस तरह के लोग ब्यूरो कार्यालय के प्रमुख बनाये जा रहें है .इसका एक उदाहरण मेरे साथ घट चुका है .मध्यप्रदेश के एक अख़बार में एक जिले का ब्यूरो कार्यालय सम्भालने के लिए उस अखवार के सम्पादक जी ने मुझे भोपाल बुलाया मैंने दस हजार प्रतिमाह के मानदेय पर कम करने की हामी भर दी .ज्वायन करने के पहले मुझे उस अखवार के मालिक से भेट करने को कहा गया .सलाम -दुआ के बाद मालिक बोला यार हर महीने कितने के विज्ञापन दोगे ? मेरा उत्तर था जो अधिक से अधिक बन पड़ेगा .मालिक के शब्द थे “तीन-चार लाख ” रूपये प्रतिमाह तो कम से कम हर माह आना चाहिए !! नहीं तो मै ब्यूरो की ————. इसके बाद मेरी जगह अन्य की नियुक्ति हो गई . उन महाशय ने कलेक्टर को शीशे में उतार कर मालिक की ख्वाहिश पूरी कर दी .इनका सूत्र वाक्य है”कि लिखने वाले तो चार-चार हजार में मिल जाते है .असली बात तो विज्ञापन की है.इन महाशय को एक वाक्य भी शुद्ध लिखना नहीं आता .मैने संपादक जी से कहा तो उनके जबाब था “यार विल्डर का अख़बार है ,मै खुद हर माह दो लाख का विज्ञापन जुगाड़ कर अपनी सैलरी निकलता हूँ . यशोवर्धन नायक टीकमगढ़ (मध्य-प्रदेश)

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  • sir jahan bhar ke akhbaaro se mujhe koi matlab nahi lekin rahi baat patrika ki to suniye dusro ki galti nikalne se pehle aap khud ki galti khojiye…… ki aapki khabro me hindi ki kitni galtiya hoti he………..

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  • Ramanand Soni says:

    Bhasha ke star par yeh agyanata kshama karne yogya nahi hai. Kisi Hindi akhbar main to katai nahi. Hindi desh mein sabase jyada boli aur samjhee jane wali bhasha hai. Akhabaron se log aaj bhi bhasha seekhate hain aur samajhate hain ki jo akhabar mein chhapa hai voh sahi hai. Hindi English ki khichari wali web patrakarita main aisee garbari isliye bhi ho rahi hai kyonki aaj bhi purani pirhee ke patarakar internet aur computer se poori tarah parichit nahi hain aur jo in sabase se parichit hain voh shuddha hindi likhane nahi janate.

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  • tasleem ahmed says:

    bhai sahab hindi to aapki Bhi sahi nahi lagti. udaharan ke liye- aapne likha hai, “तीनों अखबार इस गलती को किया है।” jabki likha jana chahiye tha- “teeno akhbaaro ne yah galti ki hai!” aapne agle vakya me bhi galti ki hai..

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