तेरा क्या होगा अमर उजाला!

अतुल जी चले गए. किसी के जाने के बाद कुछ दिन तक चीजें थम जाती हैं. लेकिन राजुल माहेश्वरी ने एक प्रोफेशनल टीम लीडर की भांति कुछ भी थमने नहीं दिया. बड़े भाई के अचानक चले जाने से अंदर से अपार दुखी होते हुए भी बाहर से अपनी टीम के सभी लोगों को प्रेतिर-उत्प्रेरित करते रहे और ऐसे नाजुक मोड़ पर भावुक होने की बजाय ज्यादा ऊर्जा से काम कर अतुल जी के सपने को पूरा करने का आह्वान करते रहे. राजुल के इस स्नेह और प्रेरणा से सभी विभागों और सभी यूनिटों के लीडर्स ज्यादा एक्टिव हो गए और एक मुश्किल घड़ी को सबों ने अदभुत एकजुटता से पार कर लिया.

लेकिन अब जो संकट है वह पहले से ज्यादा बड़ा है. अतुलजी के चले जाने के बाद एक उम्मीद बंधी थी कि अमर उजाला परिवार के मालिकों का आपस का झगड़ा निपटेगा, अशोक अग्रवाल को जोड़ा जाएगा, सब मिल-जुलकर फिर सक्रिय होंगे. पर यह उम्मीद व्यवहार में सच साबित नहीं हुआ. अग्रवाल परिवार की पहले से चली आ रही उपेक्षा कायम रही और राजुल माहेश्वरी ने कुछ निर्णयों के जरिए इशारा कर दिया कि अब एका किसी कीमत पर संभव नहीं है, जो होगा वो कंपनी ला बोर्ड के फैसले के आधार पर ही होगा. इसी बीच वो जिन्न निकल आया जिसने अतुल माहेश्वरी को परेशान कर रखा था.

और, अतुल माहेश्वरी इस बड़े जिन्न से लड़ने की पूरी तैयारी हर तरह से कर चुके थे लेकिन उनके निधन से यह सारा काम तब तक लो प्रोफाइल में रहे राजुल माहेश्वरी के कंधों पर आ पड़ा. वह जिन्न है डीई शॉ का. दुनिया की यह एक बड़ी इनवेस्टमेंट कंपनी है और इससे अतुल माहेश्वरी ने अमर उजाला के शेयर गिरवी रखकर करीब सवा सौ करोड़ रुपये कर्ज लिए थे, अजय अग्रवाल को अमर उजाला से अलग करने के लिए एकमुश्त रकम अदा करने के लिए. अजय अग्रवाल को रकम देकर अमर उजाला से दूर करने में अतुल माहेश्वरी सफल हो गए लेकिन डीई शॉ को अपने से काफी नजदीक कर लिया. नजदीक इस मायने में कि वे डीई शॉ का लिया कर्ज चुकता नहीं कर पाए और डीई शॉ वाले नोटिस आदि भेजने लगे. निवेशक कंपनी डीई शॉ को ठेंगा दिखाने की तैयारी अतुल माहेश्वरी ने जीते जी कर ली थी.

उसी नक्शेकदम पर राजुल माहेश्वरी आगे बढ़ रहे हैं.  डीई शॉ से हुए समझौते को गैर-कानूनी करार दिया गया और इस बाबत अमर उजाला निदेशकों को सूचित कर दिया गया. सूत्रों के मुताबिक डीई शॉ जैसे इन्वेस्टर्स को जो अधिकार निवेश करते समय हासिल थे, उसे खत्म (नल एंड वायड) करने की कोशिश की गई है. जो आर्टिकिल आफ असोसियेशन है, उसे बदलने की कवायद की गई है. इन्वेस्टर्स को जो असीमित अधिकार प्राप्त है उसे निरस्त करने की तैयारी हुई. इसी को लेकर 21 दिसंबर को कंपनी के बोर्ड आफ डायरेक्टर्स की मीटिंग थी. कंपनी लॉ बोर्ड उर्फ सीएलबी में अमर उजाला के मालिकानों के बीच का झगड़ा होने के कारण अमर उजाला के निदेशकों की मीटिंग में कंपनी ला बोर्ड के चेयरमैन द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षक मौजूद रहता है. पर, अचानक पत्नी की तबीयत खराब हो जाने की सूचना आ जाने पर पर्यवेक्षक को मीटिंग से जाना पड़ गया. लिहाजा, मीटिंग स्थगित हो गयी.

यहां उल्लेखनीय यह भी है कि 21 दिसंबर की मीटिंग के जो एजेंडे थे, उसके एक्स्पेलेनशन नोट मीटिंग की नोटिस के साथ नहीं भेजे गए थे. किसी को पढ़ने का मौका दिए बगैर एक्स्पेलेनशन नोट डायरेक्टर्स को दिए गए थे, ताकि इन्हें हड़बड़ी में पास किया जा सके. दुर्भाग्य से अतुल जी का 3 जनवरी को निधन हो गया. यही एजेंडा 5 फरवरी को प्रस्तावित मीटिंग के लिए फिर से भेजा गया. इसमें वह सब बिंदु थे जिनके जरिए इन्वेस्टर्स को अधिकार विहीन किया जाना था. इन्वेस्टर डीई शॉ ने 1 फरवरी को ही केंद्रीय ला बोर्ड में एक याचिका डाल दी. इसपर 3 फरवरी को सुनवाई होनी थी. 3 फरवरी को कोर्ट का नजारा गहमागहमी वाला था. अमर उजाला की ओर से वकीलों का पूरा फौज फाटा था. इन्वेस्टर की ओर से भी वकील खड़े किए गए थे. इसमें चेयरमैन कंपनी ला बोर्ड ने साफ कह दिया कि वे 4 को इस मामले में गौर करेंगे. 4 फरवरी को वह इस निर्णय पर पहुंचे कि जिस एजेंडा को लेकर लोग कोर्ट में आए हैं उन पर दोनों ही पक्षों को जवाब देने का मौका वे दे रहे हैं.

इसका तात्पर्य यह निकला कि स्टेटस-को यानि स्टे लागू होगा. यानी यथास्थिति कायम रहेगी और इन्वेस्टर्स को असीमित अधिकार फिलहाल लागू रहेंगे. ऐसे में अमर उजाला समूह अभी बहुत बड़ी मुश्किल में फंसा हुआ है. एक तरफ अशोक अग्रवाल से विवाद वाला मामला सीएलबी और हाईकोर्ट में है, सीएलबी में बंटवारे का मसला है तो हाईकोर्ट में रिश्वत देकर सीएलबी से फैसला कराने की कोशिश का प्रकरण चल रहा है. दूसरे अमर उजाला के पास अब अतुल माहेश्वरी नहीं हैं जो बड़े से बड़े संकट से अखबार को बचाने की रणनीति बनाने में माहिर थे. ले-देकर सारा दारोमदार राजुल माहेश्वरी पर है. अब देखना है कि मालिकों का आपसी झगड़ा और अमर उजाला का डीई शॉ से विवाद इस चमचमाते अखबार को कहां पहुंचाता है.

फिलहाल मीडिया इंडस्ट्री के लोग अमर उजाला के हश्र की सांस रोके प्रतीक्षा कर रहे हैं. कई बड़े मीडिया हाउसों ने अमर उजाला पर गिद्ध दृष्टि भी गड़ा दी है. साथ ही इन बड़े मीडिया हाउसों की तैयारी ये भी है कि मुश्किल की घड़ी में फंसे अमर उजाला को एक निर्णायक चोट पहुंचाई जाए और इसके लिए उत्तर प्रदेश में अखबार की लांचिंग की जाए. इसी क्रम में भास्कर, पत्रिका और पंजाब केसरी जैसे अखबार यूपी में दस्तक देने की रणनीति बना रहे हैं. कुल मिलाकर आने वाला वक्त अमर उजाला के लिए बेहद मुश्किल व निर्णायक साबित होने जा रहा है. अगर डीई शॉ और अशोक अग्रवाल वाले विवाद में अमर उजाला को झटका मिलता है तो इस अखबार का इस झटके से उबर पाना मुश्किल होगा.

Comments on “तेरा क्या होगा अमर उजाला!

  • बेनामी says:

    बेशक अमर उजाला संकट में है लेकिन ये भी सच है कि राजुल जी जैसे मालिकान इसको हर संकट से निकाल ले जायेंगे। लेकिन उनके सामने बड़ी समस्या है अखबार के कलेवर और स्तर की जो दिनों दिन बिगड़ता ही जा रहा है। राजुल जी को अपनी तरह से ऊर्जावान और खुले दिमाग के प्रोफेशनल पत्रकार लाने होंगे। उम्रदराज, इधर-उधर से निकाले गये, सेमी रिटायर्ड और अहंकारी किस्म के पत्रकारों से कोई अखबार चला है भला आजतक। लेकिन जो भी करें सोच समझकर करें और अतुल जी की तरह हर किसी पर आंख मूंदकर यकीन ना कर लें। गिद्ध मंडराने लगे हैं आसपास।

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  • मदन कुमार तिवारी says:

    अखबार को सिर्फ़ माल कमाने का जरिया बनाओगे तो यह सब तो झेलना हीं पडेगा । यार तुम लोग हर व्यवसाय को बनिया की नजर से क्यों देखतो हो । बुरा न मानना लेकिन अखबारों और पत्रकारों के गिरते हुये स्तर का बहुत बडा कारण बनियागिरी भी है । कुछेक को छोडकर अधिकांश अखबार बनिया मानसिकता वालों का है और उसका दुस्परिणाम सामने है । अच्छा हो यह अमर उजाला , मर उजाला बन जाये । नाम बदल लो क्या अंतर पडेगा । काम तो एक हीं रहेगा पैसा के लिये देश को बेच देना । तुम लोगों ने तो पत्रकारिता की ऐसी की तैसी कर दी है । बंद हो जाये यह अंधेरा फ़ैलानेवाला उजाला तो ज्यादा अच्छा है ।

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  • Abe madan jitne safal akhbar nikal rahe hain sab baniya hi to nikal rahe hain. panditon me itna dam kahan. bheekhmangi mansikta ke log, parjivi kahin ke

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  • बेनामी says:

    जहां तक मेरी समझ है राजुल जी को खतरा बाहर वालों से नहीं अंदर वालों से है। क्योंकि मीडिया के बाज़ार में ये सुना जाता है कि कई लोग अब भी अपने निजी नंबरों से उन लोगों के निजी नंबरों पर हॉट लाइन रहते हैं जिनको अमर उजाला की दुर्गत के लिये दोषी माना जा सकता है। राजुल जी, थोड़ा संभलकर चल रहे हैं लेकिन रेलवे स्टेशन से पहले के हर चौराहे पर हरी बत्ती के लिये भी बार-बार ये इत्मीनान करने पर कि कहीं ये लाल बत्ती तो नहीं है, बहुत देर हो जायेगी..ट्रेन निकल जायेगी। राजुल जी, बस बहुत हो गया। गम से बाहर निकलिये और अमर उजाला को वहीं रंग दे दीजिये जो 8-9 साल पहले हुआ करता था। चुके हुए लोगों को बाहर कीजिये और नये लोगों को मौका दीजिये। अमर उजाला को हिंदी मीडिया का ऑक्सीजन रूम बनाइये…बेकार-बेजार-बूढ़े-बीमार-अयोग्य-बेरोजगार-तिकड़मी-दलाल-चारण-निर्लज्ज पत्रकारों का ICU नहीं। इनके इलाज के चक्कर मे कहीं अमर उजाला कोमा में ना चला जाये। उठ जाग मुसाफिर भोर भई।

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  • May apani baat Rajul ji taka pahuchana cahata hu ki (JO MUJHA MALUM HAI KI PAHUCHA GI HI NAHI) “Amar ujala” nahi iska nam badal kar “DAD LIGHT ” Rakhna acha hai ,kyo ki aap ko kuch log gumraha kar raha hai .,Nark ho gaya hai ,Agar “DEAD UJALA ” Ko :AMAR UJALA ” Banana Ho Too, Jago Rajul ji Jago ,……

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