बरखा दत्त और वीर संघवी प्रकरण में सीबीआई क्यों नहीं दे रही सवालों के साफ-साफ जवाब?

बरखा दत्त - वीर संघवीराजा प्रकरण ने कई सफेदपोशों की पोल खोल दी है. मनमोहन भी लपेटे में हैं. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी व सीएजी की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार के बारे में सब कुछ जानकर चुप रहने वाला भी भ्रष्ट है. ईमानदार बनने की कोशिश में रतन टाटा बोल गए कि उनसे घूस मांगी गयी थी लेकिन किसने मांगी थी, ये बताने में वे भी मनमोहन हो गए. इतने बड़े लोग जब भ्रष्टाचार को होते देखकर, खुद इसे झेल-सहकर चुप हैं तो छोटे आदमियों की क्या बिसात.

लेकिन ईमानदार बन रहे रतन टाटा के दामन भी कम दागदार नहीं हैं. उन पर नीरा राडिया नामक एक कुख्यात दलाल को पालने का आरोप है जो मंत्रियों, पत्रकारों, नौकरशाहों को साधती थी और टाटाओं-बिड़लाओं-अंबानियों के काम निकालती थी. बरखा दत्त, वीर संघवी तथा रतन टाटा जैसे कई अत्यंत महत्वपूर्ण तथा आम-तौर पर बहुत ही ईमानदार माने जाने वाले लोगों से राडिया का सीधा संपर्क था. इन्हें वह गलत ढंग से उपकृत करती थी या उपकृत होती थी. इससे संबंधित बातें वेब मीडिया में उठी थीं. तब कई सारे सनसनीखेज दस्तावेज़ भड़ास4मीडिया ने प्रकाशित किए थे. इनमें एक महत्वपूर्ण अभिलेख विनीत अग्रवाल नामक तत्कालीन सीबीआई अफसर द्वारा लिखित एक पत्र था जिसके अनुसार नीरा राडिया के साथ उपरोक्त लोगों का लेन-देन का सम्बन्ध होने के बारे में उचित जांच किये जाने की बात कही गयी थी.

मैंने नेशनल आरटीआई फोरम की तरफ से सीबीआई से विनीत अग्रवाल के उसी पत्र के परिप्रेक्ष्य में कुछ जानकारियाँ देने का अनुरोध अपने पत्र 10/05/2010 के माध्यम से सूचना के अधिकार के तहत किया था. साथ ही यह भी पूछा था कि क्या टेलीकाम से सम्बंधित यूएएस लाइसेंस मामले में कोई केस दर्ज हुआ है और इसमें किन के-किन के नाम आये हैं. आरटीआई एक्ट को लेकर सीबीआई नामक देश की सर्वोच्च जांच इकाई कितनी सजग और जागरूक है, इस सम्बन्ध में बताने के लिए ये व्यक्तिगत अनुभव काफी काम के हैं.

पूछे सवाल के बदले हमें एसपी सीबीआई मुख्यालय, नई दिल्ली का एक पत्र आया जिसमें लिखा था कि इस बारे में एक एफआईआर दर्ज हुआ है पर शेष बातों के बारे में जानकारी यह कहते हुए मना कर दिया गया कि सूचना अधिकार धारा 6(1) के अनुसार एक बार में एक ही सूचना दी जा सकती है. हमने इस पर अपना ऐतराज अपने पत्र दिनांक 10/06/2010 के माध्यम से किया. इस पर हमें 29/06/2010 का संयुक्त निदेशक का पत्र मिला जिसमें यह बात कही गयी कि जन सूचना अधिकारी की बात गलत है और सारी जानकारी दी जाए. लेकिन 27/07/2010 का जो पत्र हमें सीबीआई से मिला उसमें मात्र विनीत अग्रवाल के 03/04/2010 को सीबीआई में आने और 02/04/2010 को यहाँ से जाने की बात कही गयी, शेष सारी बातों पर वे चुप्पी लगा गए.

अब हम लोगों ने इन सारे मामलों को बताते हुए द्वितीय अपील केंद्रीय सूचना आयोग नई दिल्ली को भेजी है पर आप इन बातों से समझ ही गए होंगे कि सीबीआई किस प्रकार छोटी-छोटी सूचना देने से परहेज करती है. किसी गंभीर और उच्च-स्तरीय भ्रष्टाचार से सम्बंधित मामले में सीबीआई का इस प्रकार का आचरण पूरे मामले को अत्यंत संदिग्ध बना देता है. इससे जाहिर है कि टालमटोल का ये रवैया देश की सुरक्षा और संरक्षा के लिए नहीं बल्कि भ्रष्टाचार के कार्यों को जान-बूझ कर छिपाने के उद्देश्य से है.

साथ ही ये सारी बातें मिला कर एक ऐसा भयावह परिदृश्य भी सामने लाती हैं जिनमे यह कहना मुश्किल हो जा रहा है कि बरखा दत्त, वीर संघवी तथा रतन टाटा जैसे कई अत्यंत महत्वपूर्ण तथा आम-तौर पर बहुत ही ईमानदार माने जाने वाले लोगों की वास्तविक स्थिति कैसी है. राजा और करूणानिधि के बारे में तो हम परेशान नहीं हैं क्योंकि हम सब उन नूतन ठाकुरलोगों को जानते हैं पर  बरखा दत्त, वीर संघवी तथा रतन टाटा जैसे लोग भी इस खेल में आ जा रहे हैं, यह बात चौंका रही है, हैरान कर रही है और दिक्कत तलब भी है. ऊपर से सीबीआई का ऐसा रवैया पूरे मामले को और अधिक रहस्यात्मक तो बना ही देता है.

लेखिका डॉ. नूतन ठाकुर नेशनल आरटीआई फोरम की कन्वीनर तथा आईआरडीएड की सचिव हैं.

Comments on “बरखा दत्त और वीर संघवी प्रकरण में सीबीआई क्यों नहीं दे रही सवालों के साफ-साफ जवाब?

  • “वीर तुम बढे चलो धीर तुम बढे चलो” नूतन ठाकुर जी और अमिताभ ठाकुर जी पर ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं! आप लोग चाहते तो आराम से इस दलदल में डूबकर चैन की जिंदगी गुजार सकते थे!

    ये तो मानना ही पड़ेगा के आप लोग थोडा हटके हो इसीलिए आपके लिए दो शब्द लिखने का साहस जुटा पाया!

    के. ठाकुर

    Reply
  • भ्रष्टाचारियों को देश घोषित करो, चाहे वे पत्रकार ही क्यों न हो……फिर तो सभी चैनलों को यह खबर चलानी ही होगी, या फिर हो सकता है इस खबर की तरह वे भी उस खबर को पी जाये…..डा. नूतन ठाकुर….बेस्ट रपट……..शेम शेम…..

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *