आंख खुलने – जगने से ठीक पहले चेतना लौटने के क्रम में अवसाद का भाव मन-मस्तिष्क में था. दिल-दिमाग रो-रो कर कह रहा था, सक्रिय हो रही चेतना-चैतन्यता से, कि तुम, प्लीज, यूं ही कुछ मिनटों पहले जैसे निष्क्रिय पड़े रहो, चुपचाप रहो, सक्रिय न हो, पड़े ही रहने दो, वो जो भी अवस्था थी, ठीक इससे पहले, अर्द्धमूर्छित-मूर्छित, कथित सोया हुआ, मुझको, मेरे नश्वर शरीर को, बेतुके दिमाग-दिल को, उसी मोड में रहने दो.
पर वो कहां मानता. रोज की तरह आज भी नौ-सवा नौ बजे सुबह जग जाना पड़ा. न जगने की जिद में इधर-उधर लोटता-डोलता रहा, कंबल शरीर पर डाले-सरकाते-तोपते, पर कोई राहत नहीं. सोचता हूं कि शायद कोई ऐसी दवा हो, ड्रग्स हो, इंजेक्शन हो जो सुबह सुबह लगा लेने के बाद फिर अचेतन में डाल दे. लेकिन इस प्रक्रिया को तो गलत-खराब माना जाता है समाज में. खराब तो बहुत कुछ माना जाता है और धन्य यह कि अच्छा-अच्छा सच्चा-सच्चा दुर्लभ होता जा रहा है, गच्चा देता जा रहा है खराब-खराब सभी को. फिर बकवास, वही चिरकुट बहस, बेहूदगी भरा. क्या है यह सब. कांय कांय कांय कांय. चुप्प. बुझे दिल-दिमाग से बिस्तर से बाहर निकल रेंगता हुआ टायलेट, बाथरूम, ब्रश, मंजन, तौलिया, कपड़ा, कंघी, जूता से मिल-जुलकर स्वच्छ-सुंदर बन निकल पड़ा, मनुष्यों की दुनिया द्वारा बनाई गलियों-सड़कों पर. पों-पां हे-हो म्यूजिक स्कूल बच्चे बारिश टप टप से निकलता आफिस पहुंचा, बेमन से.
कई दिन बाद आफिस पहुंच रहा हूं. सो के उठे और शुरू हो गए लैपटाप पर.. की परिघटना आज न दुहराई थी. आज सचेत जिम्मेदार नौकरीपेशा की तरह समय से आफिस के लिए बनठन कर निकल पड़ा था. आफिस के गेट पर पहुंचने से कुछ मीटर पहले ठिठक गया. कुत्ता मरा था. कुत्ते को घूरते हुए थोड़ा भयाक्रांत स्तब्ध सा आगे बढ़ता रहा फिर पीछे लौटने लगा. मोबाइल कैमरा आन किया और क्लिक. सामने एक मैडम लंबे-लंबे डग भरतीं चली जा रही थीं, शायद बच्चों को अब तक के मनुष्यों द्वारा किए गए महान खोजों, दर्शनों, चिंताओं, साहित्यों को पढ़ाने के वास्ते स्कूल भेजने के रोजाना के रूटीन काज को पूरा करते हुए और घर पर पक चुकी लेकिन कुकर में कैद दाल को पलटकर चावल चढ़ाने के ग्रेट इंडियन किचन कढ़ाही डेली प्रोग्राम को निपटाने की जल्दी से उत्प्रेरित. मैडम को मरा हुआ कुत्ता कहां नजर आवेगा, चिंताएं बहुत ज्यादा हैं इस लोक की.
और, मुझ आवारा को, दीन-दुनिया से बेमतलब को, सुबह नींद खुलने, चेतन होने की शुरुआत के वक्त की गई और न पूरी हुई प्रार्थना के किसी और पर सच हुए देखने का संयोग-दुर्योग मिला. मैं भी तो यही चाहता हूं कि जहां पड़ जाऊं, पड़ा ही रहूं, पड़े ही रहने दो चौकट पर इस बंदे को साहब…. इसे न होश में लाओ कि रात-दिन के चूतियापे के चक्र के चालू रहने का दौर बाकी है….. मुझे पता नहीं क्यों ये कुत्ता ज्यादा अच्छा और सफल दिखा, हम मनुष्यों से. पर दूसरे कई उसे देख जुगुप्सा से भर जा रहे थे, मुंह के पास निकले खून से, यूं ही सोते रहने अर्थात मर जाने को देख-जान कर. हम सब बचते हैं खून-खच्चर से, अनजान-गुमनाम मौत से, दुख-दर्द से, जीते रहने की अदम्य लालसा और कभी न मरने के ऐतिहासि नारे का आलाप करते हुए सब कुछ अच्छा बेहतर होने की उम्मीद के साथ.
लेकिन यह सच है कि बहुतों की मौत बहुतों को कथित जीवन प्रदान कर देती हैं और बहुतों का दुख-दर्द बहुतों के सुख-चैन का सबब बनता है. आजादी आजादी आजादी…. 1857 से लेकर 1947 तक… जाने कितने आजादी के नाम पर अपने नौजवान मरे. और एक सदी तक चले युद्ध में लाखों-करोड़ों नौजवानों की मौत की नींव पर जो आजादी का महल बनाया हम लोगों ने उससे लाखों-करोड़ों सुख-चैन की रोटी खा रहे हैं, भोग-विलास कर पा रहे हैं. लेकिन फिर भी हालात कहां बदले. सिस्टम, पुलिस, प्रशासन, नेता, मंत्री सब अंग्रेज हो गए हैं. सब ताकत से मदांध हैं. और इस आजाद देश की वो पावर विहीन जनता, किसी भी पावरफुल से कभी भी लात खाकर भों भों करके रोने को मजबूर…. उफ्फ.
मनुष्य जब अपने मनुष्य की दुनिया को नहीं संभाल पा रहा तो उसे किसी दूसरे जीव के जीने-मरने की चिंता कहां होने लगी और जो चिंताएं भी हैं वो उस भारतीय संविधान और कानून की तरह जिसे इसे लागू करने वाले पढ़ते-बताते-बोलते खूब हैं लेकिन मानता साला कोई नहीं. कभी कानपुर में ढीठ कुत्तों को देर रात नशे की अवस्था में दौड़ा-दौड़ा कर मारता था. वो भी सत्ता का नशा था, मीडिया का नशा था, और उपर से पेय पदार्थ का नशा था, और खुद के सुपीरियर, जीनियस होने का बोध था.

पर जाने क्यों ये मरा हुआ कुत्ता आज की उदास सुबह, बारिश के बूंदों से टपटपाते दिन, कम रोशनी वाले अलसाये मार्निंग को मेरे लिए कई तरह के मायने से भर गया. मोबाइल से फोटो खींचकर आगे बढ़ा तो लगा- नहीं, अभी नहीं. फिर वापस लौट पड़ा. इधर-उधर देखकर जब सुनिश्चित हो गया कि कोई नहीं देख रहा मेरे इस नादान काम को, तो दोनों हाथ जोड़कर इस साथी को प्रणाम किया. फिर, ज्यादा गहरे अवसाद और मनःस्थिति से आफिस में दाखिल हुआ. मन बोलता रहा- मैं न सो सका, ये प्यारा बुजुर्ग कुत्ता सरेराह खूब मजे से सो रहा है, दीर्घ और छितराए आसमानी कंबल को ओढ़े, स्विचआफ सूरज के चलते शाम सरीखे अंधेरे में और बारिश के बूंदो रूपी टप टप मंगल गान के बीच. इनको श्रद्धांजलि.
लेखक यशवंत इसी दुनिया के हैं, सांस-धड़कनों से युक्त एक जीव हैं. और, इन जैसे जीवों को मनुष्य कहा जाता है. और ये वही मनुष्य हैं जो खुद जैसे जीवों के साथ-साथ अन्य जीवों और प्रकृति-ब्रह्मांड की बर्बादी के सबब बने हुए हैं.












Rajeev Verma
February 15, 2011 at 6:50 am
Great philosopher u r…..
mahandra singh rathore
February 15, 2011 at 5:03 am
yashwant ji,
aap bahut baar nirash kyon ho jate hain. wahi lekh ke madhyam se sabhi ka pass pahunchta hai. aasha se bhere rehe or khub likhte rehe. aapne office jate samay mere hue kutte ke bare socha or intna kuch likh diya. aapse pehle kitne log waha se gujre honge or baad mai bhi aate jatte rehnge per kisi ka dhyan uss or nahi jayega. ho sakta hai log duri banaker niklene lag jaye. swagat hai aapke lekh ka.
divakar mishra
February 15, 2011 at 10:23 am
bhai manana padega………….
मदन कुमार तिवारी
February 16, 2011 at 12:49 pm
बहुत गहरे तक पैठ गई बात । अवसाद के क्षण तो आता रहता है , कुछ दारु का भी योगदान होता है , सुबह – सुबह के अवसाद और जिवन की निर्र्थकता की सोच को बढाने में । इस कुत्ते को तो आपने नही न मारा था ? बहुत बार कुछ न कर पाने की बेबसी , कहीं बहुत गहरे बैठ जाति है और एक गांठ की तरह टीसती है । लेकिन डीयर जिवन को समझना शायद इतना आसान नही । एक पल लगता है बहुत कुछ समझ गया , दुसरे पल फ़िर जहां था वही खडा नजर आता हूं । मुझे लगता अवसाद निराशा और खुशी के बीच हीं छुपा है जिवन , जिने का अर्थ और उसी की तलाश मकसद है । शायद वही सत्य है जिसकी खोज ने सिद्धार्थ को बुद्ध बना दिया ।