राहुल की राजनीति से मायावती चित!

राहुल गांधी उस भट्टा परसौल गांव के ठीक बगल में बसी दिल्ली में रहते हैं जहां पुलिस-पीएसी वालों ने एक रात हर घर में घुसकर कोहराम मचाया था, बच्चों, बूढ़ों, बीमारों, महिलाओं, युवतियों, युवाओं को पीटा था, पैसा लूटा था, बेइज्जत किया था. राहुल गांधी तक खबर अगले दिन सुबह पहुंच गई होगी. अखबार और टीवी में खबरें आ चुकी थीं. आ रही थीं. उत्पीड़न की दास्तां को बताया जा रहा था.

नेताओं के जाने का सिलसिला शुरू हो चुका था. लेकिन राहुल गांधी आज सुबह अचानक भट्टा परसौल गांव पहुंचे. थोड़े ड्रामेटिक तरीके से. बाइक से. कहा गया कि मीडिया को बिना बताए वे पुलिस को चकमा देते हुए पहुंच गए. लेकिन न्यूज चैनलों पर राहुल के फुटेज चल रहे हैं. बाइक सवार युवकों के झुंड के बीच राहुल गांधी. ध्यान से देखने पर बाइक सवार कई युवक सुरक्षा एजेंसी के लोग लग रहे थे. जाहिर है, एसपीजी वाले होंगे, सिविल ड्रेस में रहे होंगे, ताकि युवक के रूप में दिखें. बिलकुल फिल्मी सीन था. जैसे किसी गुंडे से मार खाई और भयाक्रांत जनता को बचाने अपना नायक अपने दलबल के साथ चला आ रहा हूं… कमीने, रुक, मैं आ रहा हूं…. तूने मेरे लोगो को मारा है, मैं आ रहा हूं… कमीने, मैं तेरा खून पी जाऊंगा…. वाले अंदाज में.

न्यूज चैनलों पर कांग्रेसी नेताओं के फोनो चल रहे थे. कहीं दिग्विजय सिंह का तो कहीं रीता बहुगुणा का. माननीय राहुल जी की तारीफ हो रही थी. उनकी प्रशंसा के पुल बांधे जा रहे थे. उन्हें बाकी नेताओं से अलग बताया जा रहा था. पर आप सोचिए. राहुल गांधी आज क्यों पहुंचे भट्टा परसौल गांव. उस घटना के ठीक अगले दिन वे क्यों नहीं जा सकते थे गांव में. या खुद न जाते तो केंद्र सरकार के जरिए या फिर मानवाधिकार आयोग के जरिए या फिर किसी भी सरकारी, गैर सरकारी संस्था, एजेंसी के जरिए उस उत्पीड़न की जांच कराने की पहल कर सकते थे. लेकिन नहीं. नेता लोग पहले घटना को बिगड़ने देते हैं ताकि उन्हें दूसरों को गरियाने और राजनीति करने का मौका मिल सके. मायावती ने जो कराया, वो क्रूरतम है. इसकी सजा मायावती को समय देगा. लेकिन राहुल गांधी जो कर रहे हैं, वो फिल्मी स्टंट, शुद्ध सियासी चालबाजी से अलग नहीं है.

पर अपने देश की जनता नायकों के सहारे, भगवानों के नाम पर जीती है और उम्मीद करती है कि जनता को दुख देने वाले रावणों का विनाश करने राम जरूर आएगा. जनता में ये सोच नहीं है कि राम वह खुद है. जनता राम तलाशती है दूसरों में. और, राहुल ने जिस तरह की कलाबाजी की है, उसके कारण ढेर सारे लोग राहुल में राम देखने लगे होंगे. सुरक्षा व्यवस्था को चकमा देकर राहुल जिस तरह से भट्टा परसौल गांव पहुंचे हैं, और बाइक पर जाते हुए व गांव वालों के दुख सुनते हुए जो वीडियो फुटेज चैनलों पर चलने लगे हैं, उससे यह साबित हो गया है कि राहुल ने राजनीतिक रूप से मायावती को चित कर दिया है. जो मायावती सरकार किसी भी नेता को गांव में जाने से पहले पकड़ लेती थी, उस सरकार के सिपाही राहुल को न रोक पाए. राहुल अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब हैं लेकिन सवाल ये है कि क्या जनता, किसान, गांव वाले सिर्फ दुख झेलने और उनके दुखों पर होने वाली राजनीति को निहारने के लिए हैं या वाकई उनको न्याय मिलेगा, वाकई उन्हें सम्मान और आजादी मिलेगी.

भट्टा परसौल कांड के बाद से मैं बार-बार सोच रहा हूं कि आर्थिक रूप से गरीब रहना बड़ा अभिशाप है. गांव में रहना बड़ा दंड है. किसान होना कितना घटिया काम है. ऐसा इसलिए कि यूपी की पुलिस-पीएसी ने अपने सत्ताधारी नेताओं-अफसरों के इशारे पर ग्रेटर नोएडा से लेकर आगरा तक के कई गांवों में घुसकर घर-घर की औरतों, बच्चों, युवकों, बुजुर्गों को जमकर पीटा, पैसा लूटा, छेड़छाड़ की. ग्रेटर नोएडा के भट्टा गांव की घटना ने तो हिलाकर रख दिया है. पुलिस ने कर्फ्यू लगा रखा है. कोई अंदर नहीं जा सकता, पीएसी पुलिस वालों ने गांव के बाशिंदों पर रात भर कहर बरसाया, उसका लेखा जोखा लेने कोई नहीं जा सकता. जबरा मारे और रोए भी न दे.

यूपी सरकार किसान नेताओं को अपराधी बताकर उन पर इनाम घोषित कर रही है. ऐसी हरकत हर उस गांव की पुलिस करेगी जहां के लोग अपनी जमीन छीने जाने का विरोध करेंगे और आंदोलन करेंगे. पर क्या यह पुलिस कभी किसी शहर की एलीट कालोनियों में घुसकर भी लोगों को इस तरह कभी पीटती है. बिलकुल नहीं. बड़ी गाड़ियों में घूमने वाले दलालों, चोट्टों को तो ये पुलिस रोकने तक की हिम्मत नहीं कर पाती, भला सामूहिक तौर पर किसी कालोनी में धावा बोलकर किसी को कैसे पीट सकती है. लेकिन गांव में घुसकर वह सब कुछ कर सकती है क्योंकि एक तो वह गांव है, इसलिए गांव है क्योंकि वहां गरीब रहते हैं और गरीब इसलिए रहते हैं क्योंकि वे किसान हैं मजदूर हैं. बहुत सारी बातें है. क्या क्या कहूं जो मन दिल दिमाग में उमड़ घुमड़ रहा है.

अंततः मुझे यही लगता है कि एक संवेदनशील नागरिक होने के नाते अपने लोगों पर हो रहे अत्याचार का मुझे विरोध करना चाहिए और कहना चाहिए कि मैं यूपी में कितानों पर हो रहे अत्याचार का विरोध करता हूं. इसी सोच के तहते एक ब्लैक विज्ञापन बनाकर भड़ास4मीडिया पर प्रमुखता से लगवाया है. इस विज्ञापन में किसी संस्था, साइट या संगठन का जिक्र नहीं है. यह एक आम आदमी का विरोध है और चाहता हूं कि आप भी एक सचेत नागरिक के बतौर इस विरोध की आवाज को आगे बढ़ाएं. इस विरोध के विज्ञापन को अपनी साइट, अपने ब्लाग, फेसबुक, ट्विटर, मैग्जीन, अखबार, चैनल… जहां जहां संभव हो, लगाएं दिखाएं, टैग करें, अपलोड करें….. याद रखिए, हमारी आपकी छोड़ी सी एकजुटता बड़े बड़ों को घिग्घी बांध देगी. और हमारी आपकी उदास चुप्पी इन उत्पीड़क शासकों के हौसले को और बढा देगी.

राहुल गांधी बहुत देर से जगे हैं. भट्टा गांव के लोगों के आंसू सूख चुके हैं. आदमी अब भी भागे हुए हैं. न्याय कहीं मिलता दिख नहीं रहा है. राहुल गांधी ने ऐलान किया है कि वे किसानों की लड़ाई लड़ेंगे, उन्हें न्याय दिलाएंगे. लेकिन लगता नहीं है कि वे गंभीर हैं. गंभीर होते तो अगले ही दिन गांव पहुंचकर पुलिस की बंदूकों के आगे अपना सीना कर देते. राहुल गांधी मर्द होते तो ऐसा करते. पर राहुल गांधी नेता हैं. नेता बनने की ट्रेनिंग ले रहे हैं. वे उस गांधी खानदार के युवराज हैं जहां बेटे के जन्म लेते ही मान लिया जाता है कि वह या तो प्रधानमंत्री होगा या केंद्रीय मंत्री. तो, राहुल गांधी गांव के आदमी नहीं है. वे गांव वालों पर राज करने के लिए बने हैं.

और गांव इसलिए बने हैं कि कोई भी मुंह उठाए जाए और गांव वालों के चूतड़ पर दस लाठी बरसा आए. जी, यही स्थिति है. अगर आप किसी भी तरह से पैसा कमा चुके हैं, शहर में मकान बनाकर रह रहे हैं और बड़ी गाड़ी से चल रहे हैं तो अफसर, नेता, प्रशासन, सिपाही सब आपको तवज्जो देंगे, सलाम करेंगे, आपकी सलामती के लिए काम करेंगे, आप जहां जहां फंसेंगे आपके नोटों के बल पर ये लोग आपको सकुशल बाहर निकाल लेंगे, बचा लेंगे. लेकिन गांव वालों के साथ ऐसा नहीं है. चूंकि गांव वाले गरीब होते हैं, किसान होते हैं, ग्रामीण होते हैं इसलिए सरकार से लेकर सिपाही तक, सब उन्हीं को चूसते लूटते हैं.

राहुल जी, राजनीतिक रूप से सफल दांव खेलने के लिए आपको बधाई. मायावती को चित करने की बधाई. यूपी के पुलिस प्रशासन को पटखनी देने की बधाई. पर हमें आपसे कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि भट्टा कोई एक गांव नहीं है. यह देश गांवों का देश है और हर रोज किसी न किसी गांव में पुलिस वाले किसी न किसी ग्रामीण को पीटते हैं, उनके परिजनों से बलात्कार करते हैं, उन्हें थाने में बिठाते हैं और उन पुलिस वालों का कुछ नहीं बिगड़ता. हां, हर रोज कई ग्रामीण जरूर इस देश को अपना देश मानने से इनकार करते हैं क्योंकि ये देश ग्रामीणों और गरीबों के लिए नहीं है, इस देश की व्यवस्था किसानों और मजदूरों के लिए नहीं है. यह देश धनी लोगों द्वारा धनी लोगों के लिए संचालित किया जाता है. आम जन में भ्रम कायम रहे, इसलिए जनता और लोकतंत्र के मुलम्मे को बहुत खूबसूरती से संविधान और सिस्टम के नाम पर बुना गया है, जो अब फट-छीज रहा है. आइए, इस मुलम्मे को फाड़ने, नोचने, काटने, खत्म करने के लिए एकजुट हों.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

Comments on “राहुल की राजनीति से मायावती चित!

  • sachin gupta bulandshahr says:

    abhi tak rahul ko chodkar kisi bhi parti ka neta bhatta/parsool nahi pahuch saka. kyuki veh ek drama tha. choro-chipe gaw me rahul ka pahuchna kabil-e-tareef h.

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  • महेश यादव says:

    बेहद सुंदर पोस्ट के लिए यशवंत जी आपको बधाई !!!!

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  • PAWAN LALCHAND says:

    JRA CONGRESS KE IS YUVRAJ SE KOI YE BHI TO POOCHHE KI PICHHLE SAAL TAPPAL BHI TO GAYE THE..KITNE KISHANO KE AANSHUN PONCHH AAYE WAHAN…KISANON KO LEKAR MILE THE PM MANMOHAN SINGH SE…LEKIN KYA PM RAHUL KO KIYE APNE WADE PAR KHRE UTRE..KYA JIS 1894 KE ANGREJI KANOON KE SAHARE RAJYA SARKARE YE JAMIN HADPANE KA KHUNI KHEL RAHI HAIN USME SANSHODHAN HO SKA…SHRIMAN RAHUL GANDHI JI KYA AAP SUN PA RAHE HAIN KISANO KE BHEECH PATHKAR UNKI AAWAZ…

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  • ये राजनीति की रोटी ही ऐसी है,बिना श्मशान और चिता की आग के ढंग से सिंकती ही नहीं है ,आग ढंग की ना हो तो कौन आएगा .देखिए खुद से दंतेवाडा में कोई नहीं गया ये पुलिस तो मात्र आग जलाने वाले नौकर है ,जो मालिक कहेगा करेंगे ,चाहे मायावती नोएडा में कराये,या मुलायम मुज्जफरनगर नगर में कराये .

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  • anand kushawaha says:

    grameno ki durdasha dk fclkul sagi chirran kiya gai yasvant ji. ishi tarah ki awajen charon or se uthni chahia

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