वो पगलाए महान संपादक अब दुहाई दे रहे

पदमपति शर्मा: ये पन्ने मैं नहीं पलटता अगर एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक के समूह संपादक ने अयोध्या कांड के फैसले को लेकर आदर्श पत्रकारिता की दुहाई न दी होती :  ये वही महान शख्स हैं जिन्होंने अयोध्या कांड के समय आगरा के पागलखाने के किसी बदतर पागल की तरह आचरण किया था और शर्म आ गयी थी पत्रकारिता की मूल भावनाओं और उसके आदर्शों को : तब ‘आज’ अखबार के आगरा संस्करण ने वो-वो कुकर्म किये थे कि मत पूछिए : तब अखबारों की उपासना के मानक स्थल भी टूटे थे : सच कहूं तो हम सभी लोग मौका-परस्त कमीने हो गए हैं :



…सब अपनी कहने को व्याकुल, मैं अपनी किसे सुनाऊँ, हर घर लंका, हर घर रावण, इतने राम कहाँ से लाऊं, सब अपने घाव मुझे दिखाएँ, मैं अपना घाव किसे दिखाऊँ…. गणेश सिंह मानव की यह कविता अर्से पहले जब पढ़ी थी तब इसका तात्पर्य कुछ और था. आज जब फिर से पढ़ रहा हूँ तो अर्थ कुछ और हो जा रहा है. स्वतंत्रता के बाद देश में एक विचित्र स्वदेश उन्मूलन का दौर चला है. अंग्रजों के ज़माने में हम भारतीयों का परिचय था – गुलाम, आधे हिन्दुस्तानी. मगर स्वतंत्र होने के बाद नए परिचयों की फेहरिस्त निकली- उत्तरप्रदेशी, बिहारी, मराठी, पंजाबी, तमिली, तेलगू आदि आदि. इन भाषाई और प्रादेशिक विभाजनो से मामला कहीं धार्मिक, कहीं सामुदायिक खेमों में बँटा. एक भारत था जिसे लोगों ने धार्मिक बंटवारे में विखंडित किया. विडम्बना देखिये कि उसी भारत में उस विखंडन प्रक्रिया को जिंदा रखा गया.

भारत मानो मौत की भट्टी पर रोटी सेकने का तवा हो जिस पर जितने लोग 190 साल के दौरान भुने गए थे, उससे सौ गुना ज्यादा साम्प्रदायिकता में अपने-अपने पंथ के लिए उस तवे पर कुर्बान हुए होंगे. अजीब लगता है पर यह एक सच्चाई है कि इस बात ने पिछली ३० सितम्बर को मुझे नए सिरे से कुरेदा. अयोध्या के मसले पर उच्च न्यायालय के आने वाले फैसले को लेकर जिस कदर पूरे मुल्क ने सरोकार और संवेदनशीलता दिखाई, जिस कदर पूरे मुल्क में अनजानी आशंकाओं का घना कुहासा छाया, जिस कदर हर लब पर बहस छिड़ी थी, उससे लगा कि मुल्क परेशां है और मैं यही सोच कर परेशां हो उठा था कि यदि यही इसका आधा भी सरोकार देश ने 1857 के सिपाही विद्रोह और बंग-भंग आन्दोलन में दिखाया होता तो  अंग्रेज उपनिवेषवाद बेंत खाए कुत्ते कि तरह तभी दम दबा कर भाग लिया होता.

कुल मिलाकार एक बात समझ में आई कि हम मौका-परस्त कमीने हैं. भले ही हम जननी जन्मभूमिश्च का पारायण करते रहते हों, फिर भी धर्म की उंगली पकड़े स्वर्ग जाने की अभिलिप्सा में अपनी इसी जन्मभूमि की बलि चढाने के लिए तैयार रहते हैं. वह जो दिमाग में बैठा है, वह जो मन के पीपल पर विश्वास का प्रेत बैठा है, वह हमें हरकतों से बाज आने को रोकता नहीं है तो मौके-बेमौके हम धर्म से रोटी सेंकते हैं, धर्म की रोटी सेंकते हैं और धर्म पर रोटी सेंकते हैं.

इस बीच देश में incashmentism  यानी ‘भुनानावाद’ की जो नयी प्रवृति चली है, उसने गत 30 वर्षों में देश को किसी दीमक की तरह जम कर चाटा. उदहारण देने का मन तो नहीं कर रहा था परन्तु अयोध्या प्रसंग में कुछ सत्य बयां करना इसलिए जरूरी हो गया है कि 1988 से लेकर 1992 के दौरान के कई ‘रत्नाकर ‘ इन दिनों बाल्मीकि बन बैठे हैं. बार-बार कह रहे हैं – ‘मां निषाद’ . ये वही लोग हैं जिन्होंने अपनी उकसावे भरी हरकतों से अनगिनत लोगों को लहूलुहान किया था. स्वार्थ कहीं कहीं पैसे में रहा, कही सत्ता में तो कहीं अख़बार का प्रसार बढ़ाने में. सोचने पर ऐसे हजारों महापुरुषों के नाम सामने आ रहे हैं.  ये पन्ने मैं नहीं पलटता अगर एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक के समूह संपादक ने अयोध्या कांड के फैसले को लेकर आदर्श पत्रकारिता की दुहाई न दी होती.

ये वही महान शख्स हैं जिन्होंने अयोध्या कांड के समय आगरा के पागलखाने के किसी बदतर पागल की तरह आचरण किया था और शर्म आ गयी थी पत्रकारिता की मूल भावनाओं और उसके आदर्शों को, तब आज अख़बार के आगरा संस्करण ने वो-वो कुकर्म किये थे कि मत पूछिए. एक समाचारपत्र जिसका सम्पादकीय पढ़े बिना जवाहरलाल नेहरु सोते नहीं थे और जिसकी पहचान हिन्दू और केसरी जैसी थी, क्षुद्र स्वार्थ में उस समय राम भक्त और कारसेवक की भूमिका में आ गया था. सच तो ये है कि उस दौरान उपासना स्थल ही नहीं टूटा, समाचारपत्रों की उपासना के मानक स्थल भी धराशायी हुए थे.

परिणाम यह हुआ कि दैनिक जागरण जैसे बड़े अख़बार के स्वामी-संपादक भी विचलित हो कर इस बहती गंगा में हाथ धोने को विवश हो गए. क्योंकि मैं नौकरी करता था इसलिए इस ‘पाप लालसा’ में मैं बलि चढ़ गया. दुर्भाग्य देखिये कि मैं तब खेल संपादक था और जिसे राजनीतिक और आपराधिक खेल में उनके मुताबिक खेल खेलने को कहा गया.

असल में पहले मुझसे 30 अक्टूबर 1990 को होने वाली कारसेवा की कवरेज की कमान संभालने को कहा गया. पर 26 अक्टूबर की शाम को मोहन बाबू  (स्वर्गीय नरेन्द्र मोहन गुप्त) ने कानपुर से फोन पर पूछा, ‘क्या तुमने ‘आज’ का आगरा संस्करण देखा है और नहीं देखा तो देखो और इस अभियान में तुम सेनापति हो. खुद जाओ.’

मैंने ‘आज’ का वो संस्करण देखा और हिल गया ये देख कर कि बजरंग दल के एक फायर ब्रांड नेता के ऐसे बयान को पहले पन्ने की दूसरी लीड बनाया गया था और जिम्मेदार संपादक ने जो हेडिंग लगायी थी वो किसी भी कीमत पर नहीं लगायी जा सकती थी मैं चाहूं भी तो नहीं दे सकता. एक कौम को विशुद्ध गाली दी गयी थी. खैर मैं अपनी टीम ले के गया जिसमे आशीष बागची के अलावा दो फोटोग्राफर थे. यह बताने की जरूरत नहीं कि हम दोनों आज जीवित हैं ये बताने के लिए मगर हमारे साथ खड़ा वह अधेड़ दरोगा इतना भाग्यशाली नहीं रहा. 30 अक्टूबर से दो नवम्बर के बीच जो कुछ हुआ और जो कवरेज हमने की वो हम दोनों के जीवन की निकृष्टतम स्मृतियाँ हैं. वो शीर्षक जो 2 नवम्बर को लगा था, सर्वथा अनुचित, पत्रकारिता की मूल भावनाओं और मूल्यों की सरासर अवमानना था. ‘कार्तिक पूर्णिमा को किया सरयू ने रक्त स्नान’ जैसी हेडिंग को आप और क्या कहेंगे!

राजनेता हों या मीडिया सभी ने वक़्त के तंदूर पर अपनी रोटियां सेंकी थीं. किसी को उस समय सहअस्तित्व का बोध नहीं हुआ और सभी इतिहास बदलने में लगे थे. आज 20 साल बाद इतिहास तो अपनी जगह कायम है पर बाकी चरित्र नाबदान में हैं. यह लिखना इसलिए भी जरूरी रहा कि लोग इतिहास से सीखें,  जैसे उक्त संपादक महाशय ने सीख लेकर जिम्मेदाराना बयान दिया,  नहीं तो वे भी कूड़ेदान की ही शोभा बढ़ाएंगे.

बदसूरत चेहरे मेकअप लेने से खूबसूरत नहीं बनते. जब-जब वक़्त की बारिश होगी, उनके असली चेहरे उभर कर सामने आ जायेंगे. इसलिए आज जरूरत  संभल कर सोचने, संभल कर बोलने और संभल कर आचरण करने की है. इतिहास ने एक नया विहान, एक नयी सुबह और एक हसीन मौका दिया है, हम सभी को इसे झपट लेना है. नहीं तो आने वाली नस्लें हमें कभी भी माफ़ नहीं करेंगी.

लेखक पदमपति शर्मा जाने-माने हिंदी खेल पत्रकार हैं. बनारसी ठाठ के धनी पदमजी जहां भी रहे, अपनी तबीयत से रहे, जो भी किया डंके की चोट पर किया. हिंदी खेल पत्रकारिता की दशा-दिशा बदलने वाले पदम ने दर्जनों खेल पत्रकारों को ट्रेंड कर पत्रकारिता में बड़े जगहों पर पहुंचाया. साठ साल की उम्र में भी पदमजी इन दिनों दिल्ली मे दनदना रहे हैं. वेब जर्नलिज्म से लेकर इलेक्ट्रानिक, प्रिंट, रेडियो सभी मीडिया माध्यमों में सक्रिय हैं. वे अपनी आवाज, विजन, लेखन, विश्लेषण से तेज-तर्रार युवा पत्रकारों को पछाड़े हुए हैं.

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Comments on “वो पगलाए महान संपादक अब दुहाई दे रहे

  • bahut kheeje hue lag rahe hain adarniya padam ji…..Bhai apki agar kisi sampadak se vyaktigat khundak hai to milkar nikal len…..news ka space kyon barbaad kar rahe hain????? samman sahit

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  • avinash aacharya says:

    वही महान शख्स हैं जिन्होंने अयोध्या कांड के समय आगरा के पागलखाने के किसी बदतर पागल की तरह आचरण किया था>….Ye bhasha padmpati sharma ki hai to wo pagla gaye hai. Ye vyatigat kheez hai ya muddey ki baat likh rahey hai ya apne anubhav baant r5ahey hai. shalinata ki chadar se dhakney ke liye naam nahi likha magar aisa likha ki kaam bhi chal jaaye. ye kaun si boldness hai. Ye padampati sharma naam ke praani matalab per gadhon ko baap banatey aaye hai. Mahan kehlaaney aur aashirvaad deney ki bimari hai enko.

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  • rajesh singh says:

    ये आलेख उन लोगों के लिए एक सबक है जो दीवार का रंग देखकर अपना रंग बदलते हैं और दुहाई सिद्धांतों की देते हैं। राजनीति या हो पत्रकारिता आपकी कारगुजारियां एक न एक दिन आपको कटघरे में खड़ा कर ही देंगी और आपको जवाब देते नहीं बनेगा। इसलिए उपदेश देनेवालों सावधान ! पदमजी को साधुवाद !

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  • Hindu Hindi Hindustani says:

    पदमपति जी! उस कलंकी के दोगले चरित्र को कौन नहीं जानता
    वह श्रीमान तो भड़ैत थे, भड़ैत हैं और भड़ैत ही रहेंगे। कभी इसके, कभी उसके।
    ऐसे ही व्यक्ति अपनी तमाम नीचताआ को प्रोफेशनलिज्म से विभूषित करने और कराने में अपना नीचे तक का जोर लगा देते हैं।
    ऐसे ही मौकापरस्त लोगों के लिए कहा गया है—खुदा मेहरबान, गधा पहलवान।

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  • Hindu Hindi Hindustani says:

    पदमपति जी! उस कलंकी के दोगले चरित्र को कौन नहीं जानता। वह श्रीमान तो भड़ैत थे, भड़ैत हैं और भड़ैत ही रहेंगे। कभी इसके, कभी उसके।
    एसे ही व्यक्ति अपनी तमाम नीचताआें को प्रोफेशनलिज्म से विभूषित करने और कराने में अपना नीचे तक का जोर लगा देते हैं।
    यह अफसोस की कम और शर्म की बात ज्यादा है कि एेसे घटिया और साम्प्रदायिक व्यक्ति को एक बड़े और सम्मानित हिन्दी दैनिक का सम्पादक बना दिया गया। और तो और, राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में नामित करने से पहले उस व्यक्ति के घृणित अतीत को खंगालने की जरूरत तक नहीं समझी गयी।
    एेसे ही मौकापरस्त लोगों के लिए कहा गया है—खुदा मेहरबान, गधा पहलवान।

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  • sundeep aur avinash bhai, padam ji ki baat se apko mirchi kyo lag rahi hai? bhaiyo, agar bhadas4medie par bhi bhadas nahi nikali jayegi to kahan nikali jayegi? padam ji, achcha hota ki aap us paagal sampaadak ka naam bhi de dete. kahi wo aaj ka hindustani to nahi hai? aajkal to paagal wohi kahlata hai.

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  • shri v. saran ji aur ye hindu hindustani…jinhe apna naam tak bataane me sharam aa rahi hai inse itna hi kahna hai ki jis mirchi ka sawal ye hamse utha rahe hain..wahi to inhe bhi mahsoos ho rahi hai…..hamne bhasha ka sawaal uthayya hai..bhadaas kewa gandi bhaasha me hi nahi nikali jati..aap kalamkar iseeliye hain ki kalam ka sahi istemal jaane….rahee baat gaaliyon ki to log aap logon se badh-chadhkar galiyan nikal sakte hain….dusre ko katghare me khada karne se pahle apne gireban me jhanke…patthar tab uthaen jab khud koi paap na kiya ho….koi sampadak agar samay ki nabj pahchan aage chala gaya hai to aapko dikkat kyon hai??????? sawal mera bhi hai—kya aap padam ji ke chamche hain????
    regards
    sundeep

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  • padam ji lagta hai aap khud pagla gaye hain. man ki bhadaas nikalne ka arth shaalinta se baahar jana nahin hota..logon ke paas to aapke liye bhi bahut kuch kahne ko hai par abhi vo aapki tarah pagalpan ki seema par nahin kiye hain……ek sampadak akhbaar ke liye kaam karta hai..jis bhi sampadak ne aisa kiya hoga nishchit taur par uske peeche bahut kaaran honge..ek sampadak ko katghare me khada karna uchit nahinummeed hai aap shabdon ka beja prayog band karenge..bhadas ke kuch shaleen pathak bhee hain…………aparna

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  • shiv prasad narayan singh says:

    एक जातिवादी का धमॆनिरपेक्ष होना
    ———-
    ये पद्मपति नाम के महोदय पंडित जी बने रहने और पैर छुवाने का सुख लेने और अखबार के दफ्तरों में मुसलमानों को गालियां देने, दलितों के लिए अपशब्द कहने के लिए कुख्यात रहे हैं। अयोध्या से इनकी रिपोटिॆग आज पापबोध करा रही है, तब तमगे तलाश रहे थे। बाल काले करने से और दूसरों को काला कहने से आपके चरित्र की कालिख नहीं जाएगी पंडित जी। आपको किसी के लिखने से ज्यादा समस्या है या उसके सफल होने से या खुद के कुछ न उखाड़ पाने से। चैनल-चैनल और अखबार-अखबार अब भी जुगाड़ बैठाने और बुढ़ापे के कारण हर जगह से खािरज होते-होते आपको समझ नहीं आया कि हरिभजन की उम्र आ गई। आप कपास ओटने के लिए व्याकुल बने है। आप तो शाम को एक चैनल के एडीटर से काम मांगने जाने से पहले उसकी तारीफ से कसीदे पढ़ते िमलते हैं, सुबह काम बिगड़ने पर पूरे दिन उस संपादक को गालियां देते फिरते हैं। याद आया? आपका ये चरित्र है, पता नहीं कल किस अखबार में कालम लिखते नजर आए और किसी और बेवसाइट पर ऐसी ही प्रायश्चित की एक लंबी पोस्ट। बेचारे
    कमेंटबाज मुफ्त की पैराकारी में ठगे रह जाएगे।
    शिव प्रसाद नारायण सिंह, वाराणसी

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  • Rajat Sharma says:

    श्री पदमपति जी आपकी राय से मैं पूरी तरह सहमत हूं। मैं इस पूरे घटनाक्रम का साक्षी रहा हूं। चूंकि मैंने भी इस रावण के साथ कुछ समय बिताया है। यहां मैं एक बात और बताना चाहता हूं कि इस शख्श ने पत्रकारिता को ही तार-तार नहीं किया पत्रकारिता के पेशे में काम करने वाली महिलाओं से भी इसने दूशासन जैसा व्यवहार किया है।

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  • Adarniya Padam Ji,
    Bahut sahi likha hai aapne …. Meri smritiyo me bhi wo heading taja hai (JAB ?….. ?… JAYENGE TAB ?.. ?.. CHHILAAYENGE ) Jo vastav me patrkarita or lekhan k siddhanto k vipreet thi… Ya shayad un kahe ki danga bhadkau thi, or purnataya gair jimmedarana , jabki samachar patra samaj ko disha pradan karte hai (Jiski koi parwah nahi ki gai thi)… Mai bhi yaha likhne ki himmat nahi juta pa raha hun aksharsha . Lekin manana hoga is baar sabhi media ne puri jimmedari se apne dayitva ka nirwah kiya , jiske liye un sabhi ka aabhr vyakt karna chahiye.

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  • ओमनाथ शुक्ला says:

    पद्मपति जी, आजकल जो श्रीमान बिरला जी के अखबार में कांग्रेस की चमचई कर रहे हैं.. यह लेख उनके बारे में ही है न

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  • leejiye accha khel ho gaya…kisi bhi sampadak ke khilaf kuch bhi and–band likh leejiye aur batoriye apne chamchon ki wah wahi……chee padam ji….jis sampadak ko aap anaap–shanaap likh rahe hain vo hamare bhi sampadak rahe hain..unka bartav hamesha shaleen aur prem bhara raha hai….hamare purv sampadak ke liye itna hi kahna hai…..ham sab aapko pyar karte hain sir……aap aaj bhi best hain
    s….s….

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  • sundeep bhai, dil par mat lo yaar. loktantra hai mere bhai. jab tumhara likha sab bina mirchi ke pad rahe hain to tum hi kyo mirchi ko bahar nahi nikal pa rahe? na mai padam ji ko alag se janta hu, na hi us sampadak ko. jo kuch aap jaise bhai inke bare mai bhadas par likhte hain, use pad kar hi jaan leta hu ki kaun kitne paani mai chal raha hai. itna manta hu ki na to kisi ka yu hi naam hota hai aur na hi koi bewajah badnaam hota hai. us sampadak ke bare mai aapke anubhav achche honge, padam ji ke anubhav achche nahi honge.aap apni baat kaho aur dusro ka apni baay kahne do… unke kapde mat fado bhai aur dil par to bilkul mat lo yaar.

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  • sanjay yadav says:

    bahut sahi likha aapne aise chehro ko to benkaab hona hi chahiye..
    aap vaakai sadhuwaad ke paatra hai…lekin aapne bahut der kar di yeh kahne me, khair der aaye durust aaye…aapka sanjay

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  • obaid akhtar says:

    Adarniya Padam Ji,
    aap ne mera zakham kured diya.Ayodhya kand ke waqt mein Gorakhpur ke ek samacharpatr mein tha.Sampadak/malik ne kaise bhagwa pahena ye vistar se jald.
    Obaid

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  • t. vivek, varanasi says:

    Priya Yashwant ji, maja nahi aaya Padamji ke uthaye Gaye sawal per jis Tarah ki sarthak bahas honi chahiye the wo nahi hui uske sthan per charitra hanan ka daur shuru ho Gaya… Ye to har koi manta hai ki Ayodhya kand me UP ke Hindi akhbaron ke bhoomika sharmnak rahi the aur Padamji ke sawl ka jawab ukta sampadakji ko apne column ke madhym se Dena chahiye tha aur sweekar karna chahiye tha ki Han pap kiya tha media ne par Padamji ki Tarah ham bhi majboor the… Ye khel to malikon ka tha aur hame Jo kaha Gaya tha , wahi kiya,,,,, paid news ke liye patrakar nahi Malik jimmedar hain..bas wahi bat thee
    pichhle 20 varshon me duniya badal gayi hai aur media bhi jyada jimmedar hua hai,,,,, aage koi aisa pagalpan nahi karega.
    Ukta sampadak ji ka ye kathan unka maan ghatata nahi, badhata… Lekin isko dil per Lena kahin se bhi uchit nahi tha….. Padamji ko bhi aage se apani bhasha me thodi vinamrata rakhni chahiye… Ham unko mahan khel patrakar ke roop me jante hain aur ye bhi ki unke bare me Jo likha ja raha hai, wo behudagi ke alawa aur kuch nahi hai

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  • padam ji ko mai nahi jaanta lekin inke baare me bahut padaha or suna hai..inki kitaab “khel patrakarita maine mumbai me dekhi to inke baare me jaanne kaa mauka mila..taarif karni hogi inki apne kaam ke prati nistha ki..or yeh aalekh kisi par vyaktigat prahar nahi balki us daur ki sachhai hai..aap vaakai taarif ke kaabil hai sir …
    girish times of india mumbai

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  • jo log padam ji ke baare me galat likh rahe hai vo khud jaante hai ki sahi kya hai or galat kya? agar aaj padam ji us sthaan par baithe hote jahan aaj ukt sampadak baithe hai to yeh sabhi log aaj unki taarifo ke pul baandhte nazar aate..dosto maukaparasti band karo or sahi galat ko pehchano.

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