‘स्वतंत्र चेतना’ अखबार की गुलाम चेतना

नूतन ठाकुर बेशक एक आईपीएस की पत्नी हैं, लेकिन वे स्वतंत्र व्यक्तित्व व सोच-समझ की स्वामिनी हैं, इसी कारण वे ज्यादा सक्रिय और संघर्षशील दिखाई पड़ती हैं. ऐसे में कई बार लोगों को भ्रम होता है कि उनकी सक्रियता के पीछे उनके आईपीएस पति हैं पर जिन लोगों ने उन्हें नजदीक से नहीं देखा उन्हें नहीं पता होगा कि नूतन ठाकुर बाकी आईपीएस पत्नियों की तरह सोने, गहने, कपड़े-लत्ते, गाड़ी, बंगले, नौकर-चाकरों के सलाम ठोंकने वाली सड़ियल दुनिया में जीने-मरने की बजाय समाज और सिस्टम के सुखों-दुखों के साथ जीना, संघर्ष करना, सुधार की संभावना तलाशना, न्याय और अधिकारों के लिए लड़ते रहना ज्यादा पसंद करती हैं.

और, ये सब अचानक नहीं, धीरे-धीरे घटित हो रही परिघटनाओं का नतीजा है, जो चेतना के स्तर को ज्यादा व्यापक और जनपक्षधर बनाता जा रहा है. बल्कि कहा जाए कि कई बार उनके बताए रास्ते पर उनके आईपीएस पति चलते नजर आते हैं, तो गलत न होगा. करप्ट ब्यूरोक्रेशी व सिस्टम के शिकार उनके पति आईपीएस अमिताभ ठाकुर के कोर्ट-कचहरी के मामले हों या शीला-मुन्नी से संबंधित अश्लील गानों के लिए अदालत में गुहार लगाने का मुद्दा या फिर आरटीआई एक्टिविस्टों की सलामती व सुरक्षा के लिए सक्रियता या फिर आरटीआई के जरिए सिस्टम को जगाने-झकझोरने का प्रकरण, सबमें नूतन ठाकुर नेतृत्वकारी भूमिका में होती हैं. किस तरह एक आईपीएस की पत्नी अपने को ट्रांसफार्म कर एक एक्टिव जर्नलिस्ट बनने का प्रयास करती हैं, आरटीआई एक्टीविस्ट बन जाती हैं, कानून के किताबों को खंगालकर कोर्ट-कचहरी की जानकार हो जाती हैं, इसे समझना वाकई प्रेरणादायी होगा, उनके लिए जिनके दिमाग की खिड़कियां खुली हों और किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित न हों.

और, नूतन ठाकुर का ये सब होना जबरन नहीं, लगातार सीखते जाने की प्रक्रिया का नतीजा है जिसमें वे अपनी हर गलती को मानने व उसे आगे फिर न दुहराने जैसी साफगोई रखने के कारण सफल हो पाती हैं, सीख पाती हैं. जाहिर है, जब कोई अपने बने-बनाए खोल से बाहर निकल किसी नई दुनिया, किन्हीं नए लोगों, नए-नए क्षेत्रों-इलाकों में खुद को सक्रिय करता है, कुछ कर गुजरने के लिए संघर्ष करता है तो कइयों को यह समझ में नहीं आता कि आखिर कोई एक आदमी या एक महिला इतना कुछ भले कैसे कर सकता है, एक साथ, बिना निजी लाभ पाने के उद्देश्य से. जाहिर है, निजी स्वार्थ व निजी लाभ के गुणा-गणित से जीवन जीने वाले अफसरों, पत्रकारों, नेताओं को ऐसे लोगों की ऐसी सक्रियता पल्ले नहीं पड़ेगी. तब वह अपनी सीमित सोच के जरिए कई तरह के कयास लगाने लगेंगे. कुछ को इस सबमें साजिश नजर आएगी तो कुछ को इस सबमें दूरगामी रणनीति. ऐसा इसलिए क्योंकि निजी लाभ-हानि से जीने वाले लोग खुले दिमाग के लोगों के मूवमेंट्स को समझ ही नहीं सकते. इसी तरह का एक कयास लखनऊ से प्रकाशित होने वाले एक अखबार ‘स्वतंत्र चेतना’ के गुलाम चेतना वाले एक पत्रकार ने लगाया है.

वैसे, कई चीजें इस पत्रकार ने अवचेतन में सच लिख मारी हैं, इसलिए कि उन्हें शायद सच का अर्थ सच-सच नहीं पता. जैसे, ”एनजीओ बनाकर अफसरों पर करती है सीधा प्रहार”.  अब भला उस पत्रकार से पूछें कि किस डाक्टर ने कहा है कि किसी आईपीएस की पत्नी को ‘भ्रष्ट, कामचोर, कमजोर, पूंछ हिलाऊ और पतित’ अफसरों पर प्रहार नहीं करना चाहिए. खबर पढ़ने से समझ में आ जाता है कि बसपा सरकार के किसी बसपाई पुलिस अधिकारी ने ब्रीफ करके इसे चेतना अखबार में सचेतन इरादे से प्रकाशित करवाया है ताकि मानवाधिकारों के हनन करने वाले, महिलाओं की इज्जत से खेलने वाले और बच्चियों के बलात्कारियों को बचाने वाले बड़े पदों पर बैठे घृणित व नारकीय किस्म के पुलिस अधिकारियों को भावी कानूनी फंदे से निकालने में आसानी हो सके.

और, इस गुलाम चेतना अखबार में काम करने वाले मूर्ख चेता पत्रकार की अक्ल तो देखिए कि उनकी कलम सत्ता में बैठकर खून चूसने वाले घृणित अफसरों की स्याही से सरासर चल रही है, बिना सोचे-समझे. कायदे से इस पत्रकार की कलम को त्राहि त्राहि कर रही यूपी की आम जनता की पीड़ा से संचालित होना चाहिए लेकिन ”जी भाई साहब” वाली पत्रकारिता कहां जनता के बारे में सोचने देती है क्योंकि जिस दिन पत्रकार जनता के पक्ष में सोचना शुरू करेगा उस दिन सबसे पहले शिकार ”जी भाई साहब” कहे जाने वाले अफसर लोग ही होंगे. चलिए, पहले आप ‘स्वतंत्र चेतना’ में घटिया चेतना से लिखी गई व फिर छाप भी दी गई खबर को पढिए फिर नूतन ठाकुर के उस पत्र को पढ़िए जिसे उन्होंने स्वतंत्र चेतना के संपादक को लिख भेजा है, ताकि उनकी मंद पड़ चुकी बुद्धि के दरवाजे को खटखटा कर खोला जा सके. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

इस खबर पर नतून ठाकुर द्वारा अखबार के संपादक को भेजा गया जवाब..

सेवा में,
संपादक,
स्वतंत्र चेंतना (हिंदी दैनिक),
लखनऊ

विषय- प्रेस काउंसिल एक्ट 1978 की धारा 14(1) तथा इसी से जुडी उसकी धारा 26 के तहत प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा विनिर्मित प्रेस काउंसिल (प्रोसीजर फॉर इन्क्वायरी) रेग्युलेशंस 1979 के नियम तीन के अंतर्गत शिकायत किये जाने के पूर्व समाचार पत्र के संपादक महोदय को प्रस्तुत तथ्य

महोदय,

कृपया निवेदन है कि स्वतंत्र चेंतना (हिंदी दैनिक) के दिनांक 23 जनवरी 2011 (वर्ष 22 अंक 111) लखनऊ, रविवार- महानगर संस्करण के मुखपृष्ठ पर मुझ से सम्बंधित एक समाचार प्रकाशित हुआ है जिसका शीर्षक है- “पुलिस के लिए सरदर्द बनी आइपीएस की पत्नी”. यह सत्य है कि इस समाचार में मेरा नाम सीधे तौर पर नहीं दिया गया है पर जितने सारे तथ्य प्रस्तुत किये गए हैं वे सब साफ़ तौर पर मेरी ओर ही इंगित करते हैं..

यह तथ्य स्पष्ट करने के बाद मैं आपसे यह निवेदन करना चाहती हूँ कि जिस प्रकार से यह रिपोर्ट लिखी गयी है वह प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा स्थापित नोर्म्स ऑफ जर्नलिस्टिक कंडक्ट (Norms of journalistic conduct) 2010 संस्करण के पूर्णतया विपरीत है, जो इन नोर्म्स की शुरुआत, बिंदु संख्या एक, बिंदु संख्या 2 , बिंदु संख्या तीन के उपभाग (x)  आदि में साफ़ तौर पर इंगित है.

आप सहमत होंगे कि उपरोक्त लेख इन सारी गाइडलाइन्स का पूरे तौर पर उल्लंघन करते हैं. पहली बात तो खबर के सत्यापन की ही है. यह खबर किसी प्रकार से सत्यापित नहीं है, मात्र चर्चाओं, कपोल-कल्पनाओं और एक पुलिस अफसर के कथित बयान पर आधारित है, जिसका नाम तक नहीं दिया गया है. अतः पहली और सबसे बड़ी त्रुटि तो वहीं पर है. फिर शीर्षक भी ऐसा दिया गया है जिससे यह जान पड़ता है कि मैं ऐसे किसी कार्यों में लिप्त हूँ जो किसी प्रकार से गलत और असंवैधानिक हों. यह दुर्भावनावश मेरे प्रति कार्यवाही करने को उकसाने वाला शीर्षक है. खास कर के तब जब आईआरडीएस संस्था का यह कार्य मासूम बच्चियों के बलात्कार और हत्या जैसे दो अत्यंत जघन्य मामलों में पीड़ितों को न्याय दिलाने और दोषियों को दण्डित कराने की दिशा में किया जा रहा एक सद्प्रयास है, साथ ही इस बात की कोशिश भी है कि इस प्रकार के सभी मामलों में पुलिस के उच्चाधिकारियों की भी जिम्मेदारी नियत हो, जिससे वे आज तक बचते रहे हैं और अपने दायित्व से विलग होते रहे हैं.

मैं एक बार पुनः यह बात कह दूं कि इस रिट याचिका में कहा गया है कि यद्यपि बाहरी तौर पर अभियुक्त गिरफ्तार हो चुके हैं पर असलियत में जिस प्रकार से पुलिस के अधिकारियों ने इस मामले में हीला-हवाली की और जान-बूझ कर मामले पर चुप्पी साधे रहे, वह दंडनीय अपराध है.  याचिका में इनकी पुष्टि के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 36, जो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की शक्ति और कर्तव्य के विषय में है और पुलिस एक्ट की धारा  4 तथा धारा 23, जो डीजीपी को प्रदेश पुलिस के सक्षम नियंत्रण और प्रशासन के लिए उत्तरदायी बनाते हैं, के उल्लेख किये गए. साथ ही  अपने कर्तव्यों में लोप सम्बन्धी पुलिस एक्ट की धारा 29 तथा अपने कर्तव्य में अवहेलना एवं जान-बूझ कर विधि के निर्देशों का पालन नहीं करके किसी व्यक्ति तो क्षति पहुचाने सम्बंधित आईपीसी की धारा 166 का भी उल्लेख किया गया.

साथ ही आईपीसी की धारा 32, जो अवैध लोप से सम्बंधित है, को भी सामने रखा गया. याचिका में यह भी कहा कि यह करमवीर सिंह और बृज लाल की सीधी जिम्मेदारी थी कि वे विधि के अनुरूप अपना कर्तव्य करते और न्यायोचित कदम उठाते क्योंकि आज जब इन अधिकारियों को जिले के अधिकारियों से प्रात-कालीन ब्रीफिंग, इंटेलिजेंस विभाग की रिपोर्टें, एक अंत्यंत सक्रीय मीडिया, 24×7  न्यूज़ चैनल तथा स्वयं डीजीपी कार्यालय में एक जन सूचना अधिकारी (पीआरओ) उपलब्ध हैं तो यह मानना असंभव है कि इन दोनों अधिकारियों को इन दोनों घटनाओं के बारे में सही सूचनाएं नहीं मिल सकी होंगी.  ऐसे में यह उनकी न्यूनतम जिम्मेदारी थी कि वे इन मामलों में सही मार्गदर्शन करते और दिव्या प्रकरण में कानपुर पुलिस पर इतनी सारी उँगलियों के उठने के कारण इसे तत्काल सीबी-सीआईडी के सुपुर्द करते. इसी प्रकार शीलू प्रकरण में कम से कम एफआईआर दर्ज कराना उनका विधिक कर्तव्य था.

याचिका मे इनके आधार पर यह अनुरोध किया गया कि सीबी-सीआईडी इस सम्बन्ध में अपने ही वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध जांच करने में सक्षम नहीं हो सकेगी. अतः इन दोनों प्रकरणों एवं इनसे सम्बंधित पुलिस वालों के खिलाफ दर्ज कराये गए या आगे दर्ज होने वाले सभी प्रकरणों की विवेचना सीबीआई के सुपुर्द की जाए अथवा एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) बनायी जाए और इसके साथ एक न्यायिक जांच समिति बनायीं जाए जो डीजीपी और एडीजी (अपराध) सहित पुलिस के वरिष्ठ अफसरों की भूमिका की जांच के साथ-साथ सभी पीड़ितों को दिए जाने वाले क्षतिपूर्ति और किस-किस व्यक्ति से ये क्षतिपूर्ति की भरपाई हो के बारे में अपनी रिपोर्ट प्रेषित करे. वर्तमान में यह प्रकरण मा० उच्च न्यायालय के विचाराधीन है और जिस प्रकार से आपने यह खबर लिखी है वह मा० न्यायालय को गुमराह करने और उसके कार्यों में बाधा उत्पन्न करने का भी प्रयास जान पड़ता है क्योंकि आपके द्वारा जो समाचार प्रकाशित किया गया है वह कुछ इस प्रकार का भान कराता है जैसे मैं किसी एनजीओ का सहारा ले कर पुलिस अधिकारियों पर कोई सीधा हमला कर रही होऊं. इसी प्रकार से आपने इस खबर के साथ जिस प्रकार मेरे पति और उनके शासकीय सन्दर्भों को जोड़ा है, उसका मुख्य समाचार से कोई मेल नहीं है.  जाहिर है इस तरह की बातें जानबूझ कर सन्दर्भरहित लिखी गयी हैं.

साथ ही यह तथ्य भी गलत प्रस्तुत किया गया है कि मैंने “एनजीओ बना रखा है”, क्योकि विधि की जानकारी रखने वाला हर व्यक्ति यह बात जानता है कि एनजीओ कोई एक व्यक्ति नहीं बनाता है और यह किसी एक व्यक्ति का नहीं होता है. संक्षेप में, इस समाचार के पढ़ने मात्र से यह साफ़ जाहिर हो जाता है कि यह सनसनी फैलाने के लिए लिखी गयी है और इसमें तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर, दुर्भावना से प्रेरित हो कर और किसी व्यक्तिगत हितों को ध्यान में रख कर मनगढंत तरीके से प्रदर्शित किया गया है. जिस प्रकार से मेरे इष्ट-मित्रों ने भी इस सम्बन्ध में अपने विचार मुझ तक रखे उससे साफ़ जाहिर होता है कि उन्होंने भी इसका बिलकुल वही आशय लिया है जो मैंने लिया था. साथ ही आपके द्वारा इस समाचार के प्रकाशन के समय ना तो मुझसे मेरा पक्ष पुछा गया और ना ही मेरे पक्ष को रखा गया बल्कि एक-पक्षीय रूप से समस्त तथ्यों को पेश किया गया जो पत्रकारिता के मूल सिद्धांत के विपरीत है. इन सभी तथ्यों और नियमों के आधार पर मैं आपसे अनुरोध करती हूँ कि कृपया मेरे द्वारा प्रस्तुत यह पत्र उसी प्रमुखता के साथ अपने समाचारपत्र में प्रकाशित करने की कृपा करें जिस प्रकार से उपरोक्त भ्रामक और हानिपरक समाचार को प्रकाशित किया है.

नूतन ठाकुर

गोमतीनगर

लखनऊ

Comments on “‘स्वतंत्र चेतना’ अखबार की गुलाम चेतना

  • Ajit Kumar Pandey says:

    Madam..apke..himmat ko salam
    eak chor aur bikauo jiski jamir mar chuki ho aise chutiye ke lekh aur farji khabar se apne andolan ko kam mat kariyega….hathi apne mast chal se jati hai aur kutto ke bhaunkane se rasta nahi badalti vah chahe to apne soond me lapet kar inka kam tamam kar sakti hai… magar dhyan nahi deti…..meri subhkamnayen

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  • madan kumar tiwary says:

    शुरुआत में भडास पर नूतन जी को पढकर मुझे भी लगा था की वह भी बाकी अधिकारियों की पत्नियों की तरह दिखाने के लिये सोशल एक्टिवीस्ट बनी हैं , लेकिन अपनी आदत के मुताबिक नूतन जी के साईट पर गया , पढा ,समझा , कुछ तस्वीरे प्रदर्शन वगैरह की देखी । इनका लिखा भी पढा जहां कुछ मसलों पर अमिताभ जी से भी विचारों की असहमति देखी । आज यह कहने की स्थिति में हूं की नूतन ठाकुर एक स्वतंत्र व्यक्तित्व की मालिक हैं। बहुत सारे मुद्दों पर यह संघर्ष कर रहीं हैं। अब यह तो हिंदी भाषी अखबारों का दुर्भाग्य है की उनके पास योग्य पत्रकार नही हैं या वो रखना नही चाहते । चमचों की जमात है दोस्त लिख लोढा पढ पत्थर वालों की , एक बार अर नूतन जी के साईट पर भी लेखक महोदय चले जाते तो शायद उनका ग्यान कुछ बढता । एक तो महिलायें इन सभी कामो के लिये सामने नही आती , अगर एक महिला कुछ कर रही है तो गदहे उसके कार्यों का आकलन , उसके कार्यों के आधार पर न करके किसकी पत्नी है , यह देख रहे हैं और अप्रत्यक्ष धमकी भी दे रहे हैं ।

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  • Ajit Kumar Pandey says:

    Swantra chetna akhbar ka malik beiman usne har jagah office kabja kar liya hai choron ki tarah…..ab ap samajh sakte hai ki iska akhbar kaisa khabar chhapega…..black maler …………… kaho sahab…. hamka hau chahi….

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