‘हां, डीजीपी तो मेरा पुराना साथी है’

नूतन ठाकुर “ओहो, तो आप अमिताभ की वाईफ हैं. हाँ, परसों मिला था विक्रम भाई के ऑफिस के सामने.” ये वे शब्द हैं जो आम-तौर पर मुझे तब सुनने को मिले जब मैं लखनऊ में किसी पत्रकार से मिली और मेरा परिचय कराया गया. यहाँ अमिताभ हुए मेरे पति अमिताभ ठाकुर, जो उत्तर प्रदेश में एक आईपीएस अधिकारी हैं और विक्रम भाई हुए विक्रम सिंह या कोई भी वह आदमी जो उस समय उत्तर प्रदेश पुलिस में डीजीपी हों.

यानी कि एक बार में ही मुझे यह एहसास करा दिया जाना कि वे हलके आदमी नहीं हैं, उनकी पहुँच और दायरा बहुत बड़ा है. जब डीजीपी साहेब, जो मेरे पति के विभाग के मुखिया हुए और पुलिस जैसे अनुशासनिक महकमे के एक प्रकार से सर्वे-सर्वा हुए, इस सामने वाले व्यक्ति के मित्र और भाई हैं तो फिर बाकी लोगों की क्या औकात होगी. लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं होगी.

उस सज्जन के पास समय होगा तो वे लपेटने का काम आगे जारी रखेंगे- “असल में विक्रम भाई की गद्दी जाने वाली थी, परसों रात बहन जी बहुत नाराज़ हो गयी थीं, कह दिया था कि आज ही इसको हटाओ. रात ही में विक्रम भाई ने मुझे फोन किया और तुरंत घर बुलाया. मैंने कहा कि अरे अब इस समय रहने दो भाई, कल सुबह आ जाउंगा पर उनकी तो हालत खराब थी, अभी के अभी बुला रहे थे. उसी समय गाडी आई और उनके घर गया. बहुत कुछ ऐसा बताया जो कहा नहीं जा सकता है. अंदरूनी बातें थी, अरे आप तो समझ ही रही होंगी. मैंने भी उनको समझाया कि ऐसा काम क्यूँ करते हो. अपनी गलती माने. लेकिन उस समय तो उनको बचाना जरूरी था. तुरंत शशांक भाई से संपर्क किया. बोले कि अभी बहुत रात हो गयी है, कल आना. पर मैंने भी कह दिया कि दोस्ती की बात है, आना जरूरी है. गया और सब कुछ ठीक किया.”

शशांक भाई का मतलब होगा शशांक शेखर सिंह से, जो वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार के कबिनेट सेक्रेटरी हैं और प्रदेश के सबसे रसूखदार सरकारी ओह्देकार माने जाते हैं. इस समय शशांक शेखर होंगे, पिछली मुलायम सिंह यादव के सरकार में अनीता सिंह या चन्द्रमा प्रसाद थे, उनसे पहले बहन जी की सरकार में पीएल पुनिया थे, उससे पहले राजनाथ सिंह की भाजपा सरकार में अनंत कुमार सिंह और इसी तरह हर सरकार में कोई ना कोई ताकतवर ब्यूरोक्रेट होता है जो ऐसे पत्रकारों का ख़ास मित्र होता है और जिसके जरिये वे दूसरे दोस्त अधिकारियों के प्राणों की तथा-कथित रूप से रक्षा करते हैं.

फिर उससे भी मजेदार बात तब होती है, जिस समय ये पत्रकार बंधु अपनी वीर-गाथा सुना रहे हों और वहां कोई और पत्रकार साथी भी उपस्थित हों तो पहले सज्जन के रहते हुए तो वे बिलकुल शांत रहेंगे या फिर हाँ में हाँ करते रहेंगे, पर पहले वाले के जाने के बाद से ही एकदम सक्रिय हो जायेंगे. एक बानगी देखिये- “झूठ बोल रहा था साला. विक्रम भाई तो उसे देखते ही चिढ जाते हैं. दलाल जो है. दिन भर विभाग में घूमता रहता है, अपना राग अलापता रहता है. कभी किसी आईजी के पास, तो कभी किसी डीआईजी के पास. फिर कोई इन्स्पेक्टर या दारोगा पकड़ लिया, अपना रिश्तेदार बता दिया और ट्रान्सफर-पोस्टिंग के नाम पर पैसे कमा लिए. विक्रम भाई ये सब जानते हैं. इसीलिए बैठने भी नहीं देते. लेकिन फिर भी जबरदस्ती लबर-झबर करता रहता है. और कुछ ना कुछ कमा ही लेता है.”

इसके बाद ये भाई-साहेब अपनी तारीफ़ शुरू कर देंगे- “विक्रम भाई असल में तो मेरे मित्र हैं. और आज से नहीं हैं, तब से हैं जब वे एसएसपी थे. तब से भाई साहेब और भाभीजी से मेरा घर का सम्बन्ध रहा है.” और ये कह कर वे अपनी ही बात कहना शुरू हो जायेंगे.

मैं ये कहानी किसी भी अफसर विशेष के लिए नहीं कह रही और ना ही किसी एक पत्रकार साथी के लिए. मुझे लगता है ऐसा ये लोग लगभग सभी अफसरों के साथ ही करते होंगे. आखिर सचिवालय और पुलिस विभाग में कोई ना कोई तो आईएएस या आईपीएस अधिकारी ही बैठेगा. जो भी ताकतवर जगह बैठा, उसके ये लोग स्वयंभू मित्र-बंधू हो जायेंगे और फिर अपनी राम-कहानी का सिलसिला यहाँ-वहां जारी रखेंगे.

मैं पहले नहीं जानती थी पर पत्रकार साथियों के बीच रह कर ही यह बात सुनने और जानने का मौका मिला कि इनमें से कई ऐसे लोग भी हैं, जो अपने पत्रकार साथियों के बीच में पत्रकार कम दलाल ज्यादा माने जाते हैं. पर मैं यहाँ ये बात कहने से भी नहीं हिचकिचाउंगी कि इसी लखनऊ में पत्रकारिता के क्षेत्र में मुझे एक से बढ़ कर एक ऐसे भले, कर्त्तव्य-निष्ठ, अपने काम से काम रखने वाले और मानवीय सारोकारों वाले पत्रकार साथी भी मिले, जिनके लिए मन में स्वयं ही सम्मान जग जाता है.

मैं इस पूरी कहानी के बाद सिर्फ ये प्रश्न उठाना चाहती हूँ-

1. जब हम पत्रकार साथियों का अपना अलग काम है तो फिर हमें इन अधिकारियों से दोस्ती बाँधने और उसे सार्वजनिक तौर पर दिखाने की क्या जरुरत पड़ती है?

2. इस तरह से अपना गलत या सही रोब झाड़ने वाले पत्रकार साथियों को इससे क्या मिलता है?

3. क्या ऐसे लोग पूरी पत्रकारिता को बदनाम नहीं करते?

लेखिका डॉ. नूतन ठाकुर लखनऊ से प्रकाशित ‘पीपल्स फोरम’ की एडिटर हैं.

Comments on “‘हां, डीजीपी तो मेरा पुराना साथी है’

  • mem ap ne jo prasan uthaya hai wo bilkul thik hai asea nahi hai ki ye jantu wahi paye jate hai ye har jagha hai jo kam nahi karte bus adhikariyeo ki lolo pocho karte rehte hai inko khabro se koi lena dena nahi hota hai kisi adhikari ki sadhi ko ya koi ghar me program ye waha time se pehle dikhenge mai aapki bato ka samarthan karta hu

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  • manorath mishra says:

    Nutan ji, darasal ye log patrakaar hi nahi hai. khaaron ke dalal hai. aap ensey baat kariye to na enkey paas aadrah hai na vichar balki aisa karney waalon ko ye chota samjhtey hai. CY Chintamani aise editor they jinsey Nehru ji bataur prime minster time lekar milney jaatey hai, afsaron ke darwaaje per khadey ye patrakaar neta aur afasar ke beech ke c-grade dalal ke siwa kuch nahi.

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  • बी.पी.गौतम says:

    नूतन जी’ अब पत्रकारिता के मायने यही रह गये हैं…और खास बात यह कि खाते-पीते नहीं हो तो भी अच्छे पत्रकार नहीं हो…ऐसी धारणा के चलते ही पत्रकार नपुंसक होते जा रहे हैं…दोस्तो अभी समय है……..

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  • amit singh virat says:

    Nootan ji ye ve patrakar hote hain jinhein patrakarita ke naam par dalali karni hoti hai aur aiese prani kahin bhi paaya ja sakta hai. ab zarurat hai ki imaandar patrakaar apni jagar tika rahe. ab to imaandari se patrikarita karna bhi mushkil ho gaya hai madam.

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  • मदन कुमार तिवारी says:

    [img][/img] नूतन जी आपकी बात सही है की संबंधो को भजाने या कम से कम डीगें हाकने में उसक उपयोग लोग करते हैं । पत्रकार भी उससे अलग नही हैं । लेकिन कभी आपने यह सोचा है की कारण क्या है। अंग्रेजों के जाने के बाद भी प्रशासनिक व्यवस्था में कोई सुधार नही हुआ। आज भी जनता प्रजा है और अधिकारी मालिक । अधिकारी कुर्सी पर बैठा रहता है जनता सामने खडी होकर फ़रियाद सुनाती है । इतनी भी तमीज नही होती अधिकारी में की बैठ्ने को कुर्सी दे। नजायज करने की तो बात हीं न करें , ३०-४० हजार वेतन वाला करोड के बंगलें में रहता है और प्रतिमाह १० हजार रु० बच्चे को हा्स्टल में रहकर पढ्ने के लिए भेजता है। वैसे मैं आपको एक सलाह देना चाहता हूं ऐसे निजी मामले और छोटी -छोटी बातों को यहां ऊठाना अच्छा नही लगता ।

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  • अरे नूतन जी आप पत्रकारों की नहीं फेकुओं की बात कर रही हैं। ये फेंकू पत्रकारिता ही में नहीं बल्कि सब जगह पाये जाते हैं। सबसे असुरक्षित सबसे ज्‍यादा बड़बोले होते हैं। कुंठा के शिकार ये मानव अपनी तर फ ध्‍यान खींचने के लिए ऐसी ऐसी बातें करेंगे कि सुनने वाले को शर्म आ जाए। इन्‍हें लेकर भावुक मत होइये। काम करने वाले गंभीर लोग काम कर रहे है लफफाजी नहीं।

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  • Anurag pathak says:

    Aaj k samay m hr jagah yhi kahani h bhot kam hi aise log bche h jo apni kalam ka shi istemal krte h baki sab to isme m apna rutba samjhte h ki fala afsar unhe bhot samman deta h m koi media se juda aadmi nhi hu pr itna janta hu jis din media k sare log apni kalam ka sahi istemal krne lge us din is desh m nyi kranti aa jayegi or hmara desh fir se ek takatvar desh k rup m samne aayega ham or aap milkr ishvar se kamna kre ki media jald se jald apni bhumika ko samjhe

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  • dhirendra pratap singh says:

    dr nootan ji apne bilkul sahi likha h aise log desh ke her kone me mil jayenge.mai to uttrakhand sachivalay me roj aise logo se do char hota hu.lekin apke ? vakai gambhir h. dhirendra pratap singh dehradun.

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  • Grt…jab main ek chnl main reporter tha to kayee ayese patrkar mujhe bhi mile jo sidhe laloo jee, rambilash jee..nitish jee aur news chnl ke bare patrkaro ko bhayee bandhu bata kar dinge hankte the…aaj berojgar hain…pata nahi kahan chali gayee unki ristedari

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  • nutan ji essa sirf up nahi punjab me bhee chalta hai , up ke rehne wale ek mahodya punjab ke barnala me tv reporter hai , wo bhee essi hee bate karte hai , maslan kahte gumege ke d c sahib ki bibi or unki bibi achi dost hai , jab bhee koi call karta hai to jawab hota hai ke dc mahodya ke pass bethha hu , khana kha ke jao ki zid kar rahe hai so khana kha ke hee auga , ya phir phone par jawab milega ke mai ssp sahib ke sath car me kahi ja raha hu , ya ssp mere ache dost hai , falan ig mere tau ji hai , kai police adikari to iss bat se dawab me aa jate hai ke iska tau ig hai , sub chalta hai , wo apna dhanda or kaam kar rahe hai nutan ji , hum apna kaam kare yeh log nahi sudrege inki roti essey he chalti hai
    bal krishan , zee news , barnala 09814164441

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  • Hanuman S Baghel says:

    Nutan Ji,
    Aapke husband S.P.(Rural) , Gorakhpur ke roop me posting thi jinko ek Bhowkali Cop(lwith human face) kaha jata tha pata nahi yeh bat aap ko pata hai ki nahi. kisi ne aap ke samne apna Bhowkal mar diya . Jise dekh kar app ko hajam nahi ho raha hai.naitikata ki baat yad aa gai.Qya kabhi aap ne apne pati ko toka hai.Naitikata salective nahi honi chahiye.Patrakar bhi samaj ke hi ang hai ,honge kuchh Bhowkali ,aap unka naam ujagar karen. Hamara yah manana hai ki unko benakab karna chahiye jisase unka Bhowkal wase he khatam ho jayega.

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  • m faisal khan says:

    aise patrkaron ka koi deen iman to hai nahi bas ligon ke samne is tarah ki baat karke apna wazan badhane ki koshish karte rehte hain auqat 2 paise ki nahi hoti baat 2 karod ki karte hain inke pichhwade par laat maro to seedha aage badh jate hain ,lekin itna to tay hai ki ab aise patrkaron ki pitayi thukayi ab publik karna shru kar degi tab inko apni auqat ka pata chalega,haram ki kha kha kar harami ban gaye hai aise patrkar,m faisal khan ,reporter channel one news,saharanpur

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  • kya sakte hai, patrkaro ka aaj kitna shosahd ho raha hai, iske bare me kya bolna chachti hai aap, pehle to patrkar patrkar kehlate the, lekin aaj ke patrkaro ko kya kaha ja sakta hai, mai manta hu ki kuch aap ki bhasha me kathit dalal hai, to ussse kya, aaaj patrtakarita ka swaroop badal raha hai, koi apna bhai kuch left ri8 karke ke kuch kama letahai to isme galat hi kya hai, aakhir kyo nahi kamaye, aaj koun nahi kama raha hai, patrkar ne kuch kama liya to vo dalal ho gaye, aur neta adhikari kama rahe hai to unka koi kuch nahi karega,
    patrakar ki bhi family hai, aap to editor hai na, apne news paper ke reporter ko kitni salary deti hai, khud b khud hi jawab mil jayega,

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  • nutan ji ajkal patrkarita yai reh gaii hai. mere khayal se ye matra dalali hai nai to app kisi ko jante hai is baat ka danka pitne ke kya mayne hai. maine apne pitaji ko dekha hai jinhe bharat ke sabhi top noch jante the lekin unke muh se bas yai shabd nikalte the bhai mujhe koi nai janta. maine unhe ghar me bas takhat par lete hue padhte hue hi dekha hai. ajkal ka journalism bilkul alag hai yaha koi gyan ki to koi pahuch ki ulti karte dikhta hai jisko dekh kar yai lagta hai shayad ye jante hi nai patrakarita kya hoti hai.

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  • M.P.Singh says:

    You are absulitly write these type patrakar alwaysw search murga for their pocket money and daru and sarsb.

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