
शीतला सिंह
वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. फैजाबाद से सहकारिता के माध्यम से निकलने वाले देश के अकेले सफल अखबार ‘जनमोर्चा’ का पिछले चालीस वर्षों से संपादन कार्य का निर्वहन करने वाले शीतला सिंह आज प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया के माध्यम से देश की पत्रकारिता की दशा और दिशा तय करने में भी अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे हैं. इसके साथ ही अयोध्या के राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद पर अपना एक अलग ही नजरिया रखने के कारण वे कई बार लोगों के कोपभाजन भी बने हैं और विवादों में भी आये हैं जब इनकी पत्रकारिता को इनके व्यक्तिगत विचारधारा का विस्तार बता कर उस पर प्रश्न चिह्न लगाए गए. पर शीतला सिंह जी आज पचहत्तर वर्ष की आयु में भी अपनी मर्जी के अनुसार उसी जोश के साथ अपना काम कर रहे हैं जैसा पचास साल पहले पहली बार पत्रकारिता में आते समय उनमे ऊर्जा थी. पिछले दिनों उनसे पीपुल्स फोरम, लखनऊ की संपादक डॉ. नूतन ठाकुर ने पत्रकारिता के सन्दर्भ में बातचीत की. पेश है इंटरव्यू के कुछ महत्वपूर्ण अंश….
-आपने पत्रकारिता कब शुरू की? पत्रकारिता में आने के पीछे मुख्य सोच क्या थी?
–पत्रकारिता 1958 में शुरू की. पत्रकारिता को कैसे सार्वजनिक उपयोगिता का बनाया जाये, किस प्रकार इससे जनता की सेवा की जाए, इसे जनजागरण और जनचेतना का माध्यम बनाते हुए कैसे इसके जरिये लोकतंत्र की रक्षा हो, पत्रकारिता में आने की मुख्य वजह यही थी.
-‘जनमोर्चा’ की स्थापना कैसे हुई?
–1954 में पत्रकारिता से सम्बंधित कमीशन की रिपोर्ट आई. इसमें जो मुख्य बात कही गयी थी वह यह कि पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सबसे बड़ा खतरा पूँजी से है. कमीशन ने अपने रिपोर्ट में यह भी कहा था कि इससे निपटने का एक मात्र उपाय सहकारिता के आधार पर अखबार निकालना है. हम लोग इसी बात से प्रभावित हो कर देश हित में इस कार्य को करने को उन्मुख हुए.
-क्या ‘जनमोर्चा’ कोआपरेटिव सेक्टर का अकेला अखबार है?
–जी नहीं. मेरी जानकारी के अनुसार 1985 में जो सर्वे हुआ था उसमे ये आया था कि 247 अखबार कोआपरेटिव सेक्टर से निकल रहे हैं. हाँ, इतना अवश्य है कि लम्बे समय तक सफलतापूर्वक निकलने वाला ये पहला और अकेला अख़बार है.
-और अखबार शुरू हुए पर सफल क्यों नहीं हो सके?
–मैं इसके तीन प्रमुख कारण मानता हूँ- साधनों का अभाव, इच्छा-शक्ति का अभाव, प्रोफेशनल एफ़िशिएन्सी का अभाव.
-जनमोर्चा के प्रथम संपादक आप ही थे या?
–नहीं, प्रथम सम्पादक तो हरगोविंद जी थे. मैंने तो जनमोर्चा के सम्पादक का दायित्व 15 अप्रैल 1963 को संभाला.
-हरगोविंद जी के बारे मे कुछ अनुभव बताएँगे?
–वे बड़े ही अदभुत व्यक्ति थे. गंभीर विचारक. सच्चे देशभक्त. पक्के पत्रकार. वे तो स्वतन्त्रता आंदोलनों में भी शरीक थे. तीन वर्ष पूर्व उनकी मृत्यु हुई है पर वे अंत तक लिखने-पढने में सक्रिय रहे थे. इक्कीस-बाइस किताबें उन्होंने लिखीं. वैचारिक रूप से वे बहुत मजबूत थे.
-हरगोविंद जी से आपने क्या कुछ सीखा?
–मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा और जाना पत्रकारिता के बारे में. इसके उद्देश्यों के बारे में. जनता के प्रति समर्पण के बारे में. मुझे लगातार उनका सहयोग और मार्गदर्शन मिलता रहा था. 1976-77 में इमरजेंसी के दौरान जब वे जेल गए, तबसे इस अखबार का भार मुझ पर अकेले पड़ा. उनका मानना था कि किसी शासन-सत्ता की बात को अंतिम मत मानो. किसी भी चीज को बिना साबित हुए अंतिम सत्य मत मानो. जनता को ही अंतिम सत्य मानो. जिस चीज में जनता का हित हो उसे ही पत्रकारिता का अंतिम सत्य मानो.
-आपको वामपंथी बताया जाता है. पत्रकार को किसी विशेष विचारधारा से प्रभावित होना चाहिए?
–देखिये मैं 1963 में कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया (सीपीआई) का मेंबर, प्रदेश कमेटी का सदस्य और जिले का जनेरल सेक्रेटरी रहा. कई पदों पर रहा, काफी सक्रिय था पर पार्टी के विभाजन के बाद किसी पद पर नहीं रहा. फिर पत्रकारिता में आने के बाद तो इससे बिलकुल अलग ही हो गया. मेरा शुरू से ये मानना रहा है कि पत्रकार को किसी भी एक विचारधारा से अलग रहना चाहिए. उसे हर प्रकार के विचारों को सामान रूप से देखना चाहिए
-क्या वामपंथी विचारधारा आपकी पत्रकारिता पर कभी हावी रही है?
–कभी नहीं. एक बार पत्रकारिता में आया तो मैं यहीं का होकर रह गया.
-क्या आपको लगता है कि पत्रकारिता में वामपंथ को धकेल कर दक्षिण पंथ और संघ विचार धारा हावी हो गया है?
–बिलकुल सही. दरअसल इसकी शुरुआत 1977 में तब हुई जब लालकृष्ण आडवाणी सूचना मंत्री बने. उन्होंने जब पत्रकारिता में वामपंथियों का वर्चस्व देखा तो उन्हें इस बात की आवश्यकता महसूस हुई कि उनके विचारों वाले लोग भी पत्रकारिता में आयें. उन लोगों की वैचारिक विचारधारा अलग थी. फिर तो भारी मात्रा में ऐसी विचारधारा के मानने वालों का समावेश हुआ.
-क्या विचारधारा का पत्रकारिता पर प्रभाव पड़ता है?
–निश्चित रूप से. तह तो जीवन के हर क्षेत्र में है- चाहे वह जज हों, ब्यूरोक्रेट या पत्रकार या कोई अन्य.
-क्या प्रिंट मीडिया के पतन का दौर शुरू हो गया है?
–बिलकुल नहीं. मीडिया कई रूपों में है, सबका क्षेत्र अलग-अलग है लेकिन महत्व उन सबों का है. अब अखबार को ही ले लीजिये. इसे आप हर जगह पढ़ सकते हैं. चाहें आप लेटे हुए हों, बाथरूम में हों, हर जगह पढ़ सकते हैं. वो तो हर जगह होता है. वैसे भी दुनिया भर के अखबारों के आंकड़े कहते हैं कि प्रिंट मीडिया लगातार आगे बढ़ रही है.
-छोटे और मझोले अखबारों की क्या समस्याएं हैं?
–देखिये समस्या मूल रूप से व्यावसायिकता की है. व्यावसायिकता के समावेश से, जिसके पास जितनी बड़ी पूंजी है, उसका उतना ही बड़ा स्वार्थ है. साथ ही उसका उतना ही बड़ा रूतबा भी है और असर भी. अब देखिये इन्ही पूंजीवादी अखबारों ने पूरे पब्लिक सेक्टर को बर्बाद करा दिया. देश में गरीबों को उठाने के प्रयास और समाज को बदलने के प्रयास उनकी कभी प्राथमिकता नहीं रही. उनके स्वयं के ही स्वार्थ रहे जिनके प्रति वे हमेशा से बंधे रहे हैं.
-अब जो वेब पत्रकारिता आई है, उस पर आपकी क्या प्रतिक्रया है?
–वो तो जो है सो है ही. जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विज्ञान और टेकनोलोजी का प्रवेश होगा ही, फिर इसके साथ वेब पत्रकारिता जैसी चीज़ तो आएगी और उसमे कोई बुराई नहीं है, उसकी भी अपनी उपयोगिता है. मैं तो कहता हूँ कि इन सभी माध्यमों का अपना-अपना उपयोग है और वे एक साथ आराम से रह सकते हैं.
-पत्रकारिता और पत्रकारों में समय के साथ क्या बदलाव हुए हैं?
–मैं तो यही कहूंगा कि युग बदल रहा है. अतः इसके अनुसार जीवन मूल्य और विचार भी बदलते रहते हैं. कल ही रामायण पढ़ रहा था जिसमें लिखा एक श्लोक है जिसका अर्थ है कि हमारे जीवन में सारी बरबादियों का कारण स्त्री है और ये सब प्रकार की बुराइयों का कारण हैं. एक समय हम इसे मानते रहे होंगे लेकिन आज तो महिलाओं को नौकरियों में आधे की संख्या मिल रही है, संसद और विधानसभा में एक तिहाई प्रतिनिधित्व मिलने वाला है. अब हम लोग महिलाओं को नाशी बिलकुल नहीं मानते. इसी प्रकार बदलते समय मूल्यों के कारण पत्रकारिता में भी भारी बदलाव हुए हैं. लेकिन यहाँ मूल्यों में बदलाव के कारण पैसे का वर्चस्व बढा है. अब मूल्य और गुण के बजाय पूंजी का महत्व होगा तो उसका भयानक असर तो होगा ही. पीपली लाइव इसी का परिणाम दिखाता है कि कैसे अब पत्रकारिता में पैसे का महत्व इतना बढ़ गया है. इस कारण पत्रकारिता से भरोसा और विश्वसनीयता भी समाप्त होने का ख़तरा है.
-नए पत्रकारों को आप क्या सीख देना चाहेंगे?
–मैं तो उनसे यही कहूंगा कि अपने आंतरिक मनोभावों के अनुसार परिस्थितियों के अनुरूप जनता के हित में सतर्क रहें और लोकतन्त के प्रति समर्पित होकर अपना श्रेष्ठतम योगदान देने का प्रयास करें.












Dharmesh
September 26, 2010 at 5:27 pm
behtaren insan ke sath desh ke behtaren patrkar hai setla singh ji.
Dharmesh
faizan musanna
September 29, 2010 at 11:58 am
shetla singh ji imandari se patrkarita karnai waloon ke lyiye ek daharmik garanth ke ssaman hai- magar parashn ye hai ki kya wo dosra shetla singh hame saupen ge ya nahi
rohitashwa mishra
September 29, 2010 at 3:49 pm
आदरणीय प्रणाम,
पत्रकारिता के विषय में महात्मा जी के विचारों और उन्हें जीवंत रखने के आप के भागीरथ प्रयासों का पिछले २७ वर्षों से प्रत्यक्षदर्शी हूँ. यह मेरे लिए गर्व की बात है की आप और जनमोर्चा के जानेमाने पत्रकारों के संपर्क में रहने का सुअवसर मिला. कोशिश यही है की हद दर्जे तक पेशेवर होते आज के खबरिया हाट-बाजार में पत्रकारिता का पैनापन और उद्देश्य कायम रखूँ.
kanet
September 29, 2010 at 3:55 pm
v. gud n i appriciet d work done by this gr8 man.
prabhat chandra mishra
October 25, 2010 at 9:31 pm
RESPECTED SIR, पत्रकारिता से भरोसा और विश्वसनीयता कभी समाप्त नही होगी.
HAPPY DIWALI;
with regards,
prabhat mishra
UPRTOU,
ALLAHABAD
prabhat chandra mishra
October 25, 2010 at 9:36 pm
respected sir,
youngesters ke liye aap aaj bhi prenashrot hai.
with regards
prabhat mishra
UPRTOU
ALLAHABAD
vibhor srivastava
December 6, 2010 at 7:22 am
Shri sheetla singh ji adbhut vyaktitva ke swami hain….hindi patrakaarita me anoothaa yogdaan dene wale hamaare aadarneeya sheetla ji se sabhi patrakaaron prernaa leni chahiye aur seekhnaa chahiye……
gurpreetbadan, ajitjalandnar
December 16, 2010 at 4:41 pm
0 tussi great oh sir g