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मुकाबला धीरेंद्र मोहन व अतुल माहेश्वरी के बीच भी था

नौनिहाल शर्मा: भाग-38 : दैनिक जागरण के बाद अमर उजाला का भी मेरठ से संस्करण शुरू होने पर मेरठ के पुराने स्थानीय अखबारों का अस्तित्व संकट में पड़ गया था। उस समय मेरठ से दो दर्जन से ज्यादा दैनिक अखबार और करीब 800 साप्ताहिक अखबार पंजीकृत थे। इनमें से ज्यादातर नियमित थे। दैनिकों में प्रभात, मेरठ समाचार, हमारा युग और मयराष्ट्र बिकते भी थे। पर नये माहौल में उनकी बिक्री पर बहुत असर पड़ा। मेरठियों को जागरण और अमर उजाला में अपने आसपास की तमाम खबरें पढऩे को मिलने लगीं।

नौनिहाल शर्मा: भाग-38 : दैनिक जागरण के बाद अमर उजाला का भी मेरठ से संस्करण शुरू होने पर मेरठ के पुराने स्थानीय अखबारों का अस्तित्व संकट में पड़ गया था। उस समय मेरठ से दो दर्जन से ज्यादा दैनिक अखबार और करीब 800 साप्ताहिक अखबार पंजीकृत थे। इनमें से ज्यादातर नियमित थे। दैनिकों में प्रभात, मेरठ समाचार, हमारा युग और मयराष्ट्र बिकते भी थे। पर नये माहौल में उनकी बिक्री पर बहुत असर पड़ा। मेरठियों को जागरण और अमर उजाला में अपने आसपास की तमाम खबरें पढऩे को मिलने लगीं।

इसलिए लोकल अखबारों का सर्कुलेशन गिरने लगा। उन्होंने हॉकरों को पटाने की भरपूर कोशिश की, पर वे भी मजबूर थे। बड़े और बेहतर अखबरों के आने से अब पाठकों को अच्छा विकल्प मिलने लगा। इससे इन अखबारों के अलावा दिल्ली से आने वाले अखबार भी परेशानी में पड़ गये। नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान की कॉपियां भी लगातार घटने लगीं। नवम्बर, 1987 में शुरू हुआ जनसत्ता जरूर लोगों को भा रहा था। पर उसमें भी मेरठ की खबरें कम ही रहती थीं। इसलिए अब सीधा मुकाबला जागरण और अमर उजाला में था। और इस मुकाबले में दो मोर्चे खुल गये थे। मेरठ शहर में जागरण आगे था, तो देहात में अमर उजाला। वैसे यह मुकाबला दोनों अखबारों के मालिकों धीरेन्द्र मोहन और अतुल माहेश्वरी के बीच भी था। धीरेन्द्र बाबू का ज्यादा ध्यान मार्केटिंग पर रहता था। उन्होंने संपादकीय विभाग पूरी तरह मंगल जायसवाल के हवाले कर रखा था। पर अमर उजाला में ऐसा नहीं था। अतुल जी खुद सारा काम देखते थे। संपादकीय विभाग पर भी उनकी पूरी नजर रहती थी। मीटिंग भी करते थे।

धीरेन्द्र बाबू केवल सोमवार को मीटिंग करते थे। अतुल जी रोज करते थे। धीरेन्द्र बाबू केवल उन खबरों पर ही जोर देते थे, जिनका असर मार्केटिंग पर पड़ता था। पर अतुल जी न केवल जागरण से, बल्कि दिल्ली के अखबारों से भी खबरों की तुलना करते थे। धीरेन्द्र बाबू संपादकीय विभाग के लोगों से सीधा संपर्क नहीं रखते थे, पर अतुल जी सबसे न केवल सीधा संपर्क रखते थे, बल्कि उन तक सब की पहुंच भी रहती थी। जागरण से एक पेस्टर मनोज जैरथ अमर उजाला में चला गया था। बीरू कुए पर रहता था। उसकी बहन की शादी में अतुल जी खुद गये थे। उनके विपरीत, धीरेन्द्र बाबू किसी स्टाफर से इस तरह के रिश्ते नहीं रखते थे। वे एलीट किस्म का व्यवहार करते थे। अतुल जी आम आदमी की तरह रहते थे। हालांकि बाद में उनमें भी काफी बदलाव आया, पर शुरुआती दिनों में वे बहुत सरल और स्टाफरों के दिलों को जीतने वाले व्यक्ति थे।

इलेक्ट्रा के अरुण जैन मेरठ के पहले मेयर थे। वे अखिल भारतीय टेबल टेनिस संघ के उपाध्यक्ष भी थे। देश का सबसे बड़ा इनामी टेबल टेनिस टूर्नामेंट मेरठ में कराते थे। खुद भी अच्छे खिलाड़ी थे। उस टूर्नामेंट में देश भर के सभी प्रमुख खिलाड़ी आते थे। शहर में उसका अच्छा-खासा माहौल रहता था। टूर्नामेंट के कई दिन पहले से खिलाड़ी मेरठ आने लगते थे। अमर उजाला का वह मेरठ में पहला साल था। सन 1986 की बात है। नौनिहाल की टेबल टेनिस में ज्यादा रुचि नहीं थी। पर वे देश के अंतरराष्ट्रीय खिलाडिय़ों को देखने के लिए जाते थे। पहले यह टूर्नामेंट स्टेडियम में होता था। फिर मवाना रोड पर अरुण जैन ने इलेक्ट्रा विद्यापीठ बना दिया, तो वहां होने लगा। उस साल यह टूर्नामेंट इलेक्ट्रा विद्यापीठ में हो रहा था। मैं कमलेश मेहता और मंजीत दुआ का सेमीफाइनल मैच कवर कर रहा था। नौनिहाल मेरे बराबर में बैठे थे। तभी प्लेइंग एरिना के एक कोने में हलचल हुई। कई लोग एक साथ आये। अरुण जैन तुरंत उस ओर लपके। मैं सुनील छइया को पहचानता था। वे मुरादाबाद से आये थे। मूलत: फोटोग्राफर थे। पर रिपोर्टिंग भी उतनी ही बेहतरीन करते थे। वे अमर उजाला के लिए बड़े एसेट साबित हुए। उनके साथ राजेन्द्र त्रिपाठी तथा और कई लोग भी थे। बीच में एक लंबे से, बहुत प्रभावशाली व्यक्ति थे। मैंने छइया जी से इशारे पूछा। उन्होंने कान में कहा, अतुल जी हैं।

अतुल जी यानी अतुल माहेश्वरी। अपने संपादकीय विभाग के छह प्रमुख लोगों से घिरे हुए। एक साथ कई काम करते हुए। अरुण जैन से बात कर रहे थे। मैच देख रहे थे। और राजेन्द्र को निर्देश देते जा रहे थे कि किस-किस एंगल से समाचार कवर किये जायें। उनकी नजर केवल खेल की खबरों पर ही नहीं थी। वे बड़े खिलाडिय़ों की निजी जिंदगी और यहां मिल रही सुविधाओं पर उनके विचारों पर भी खबरें चाहते थे। बाद में छइया जी ने उनसे परिचय कराया। हमें यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि वे जागरण के हर पत्रकार के बारे में काफी कुछ जानते थे। मसलन वह किस डेस्क पर काम करता है, उसकी कार्य शैली क्या है, अखबार में उसका क्या महत्व है और वह वहां संतुष्टï है। उनका दूसरे अखबार के बारे में ऐसा होमवर्क बहुत कुछ सिखाने वाला था। बाद में अमर उजाला के विस्तार में यह उनके काफी काम आया। उनकी नजर इस पर भी रहती थी कि  दोनों अखबारों में समाचारों की कवरेज में जो अंतर है, उसके लिए कौन-कौन से पत्रकार महत्वपूर्ण है। मसलन उन्होंने राजेन्द्र से कहा कि खेल में भुवेन्द्र जागरण के लिए अकेले डेस्क भी संभालता है और लोकल खेल समाचार भी कवर करता है, नौनिहाल लोकल खबरों के शीर्षकों के मास्टर हैं। इतना सब अतुल जी को पता था। यह उनके पेशेवर रुख के कारण था। इसका उनके अखबार को तो फायदा होता ही था, उनके लिए पूरा स्टाफ पूरी जी-जान से काम करता था।

बाद में नौनिहाल ने एक भष्यिवाणी की कि अतुल जी अब जागरण के पत्रकारों को लेना शुरू करेंगे। और उनके ज्यादातर अनुमानों के अनुसार यह भी सच निकला। कई लो जागरण से अमर उजाला गये। कई जाकर लौटे भी। हालांकि जैसा आजकल मेरठ से इसी महीने शुरू हो रहे ‘जनवाणी’ ने किया, वैसा जागरण और अमर उजाला कभी नहीं कर पाये थे। अब तो यशपाल ने जागरण की आधी टीम को ही इस नये अखबार में शिफ्ट करा दिया है।

बहरहाल। नौनिहाल ने जो कहा था, उसके अनुसार, वे खुद भी कुछ साल बाद अमर उजाला में चले गये। दरअसल, वे अतुल जी से बहुत प्रभावित थे। साकेत के गोल मार्केट में चाय की चुस्कियों के बीच अगले दिन उन्होंने कहा था कि अतुल माहेश्वरी प्रोफेशनल अखबार मालिक हैं।

‘1975 में आपात काल ने देश में पत्रकारिता को एक नयी दिशा दी। सेंसर के बंधन से मुक्त होने के बाद पत्रकारिता में एक नया जोश  गया। पत्रकार नयी जिम्मेदारी से काम करने लगे। खोजी पत्रकारिता में तेजी आयी..’

‘लेकिन गुरू, इसका अतुल जी से क्या मतलब?’

‘यार, तू बीच में बोल पड़ता है। पूरी बात सुने बिना।’

‘हां, बताओ आगे…’

‘तो बात ये है कि अब पत्रकारिता नयी दिशा-दशा में चलेगी। ऐसे में अखबारों के मालिकों और मैनेजमेंट का प्रोफेशनल होना जरूरी है। अब लाला टाइप अखबार नहीं चलेंगे।’

‘मतलब उनके दिन लद गये?’

‘नहीं। दिन तो नहीं लदे। हो सकता है कि वे अपने ढांचे के कारण खूब सफल भी रहें। पर पाठकों की नजरों में प्रोफेशनल अखबार ही चढ़ेंगे।’

‘मतलब ऐसे में उन मालिकों के अखबारों की पौ-बारह रहेगी, जो नये ढर्रे से अखबार चलायेंगे। बड़े कॉरपोरेट हाउसों के अखबारों को वह सफलता नहीं मिलेगी, क्योंकि वहां पुराने ढर्रे से काम होता है।’

भुवेंद्र त्यागीढाई दशक बाद भी ये बात सच है!

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क  [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. Santosh Verma

    January 13, 2011 at 8:21 am

    Bhai Bhuvendra Kaise hai aap. Atul ji ke jane se to laga ki parivar ka bada sadasya hi chala gaya. aise me Naunihal ka jikra, fir jhakjhor gaya. Naunihal ko Amar Ujala mai hi laya tha. uske nidhan ke bad to ghar ki dekhrekh ke liye Atul ji ne mujhe hi bola tha. Ab akhbaro me wo din nahi aa sakte. Mumbay me rah ke bhi meerut se jude rahna aapka baddappan hai.

  2. rajesh kumar

    April 27, 2011 at 6:04 pm

    अपने पत्रकारों को जूते की नोक पर रखने वाले घमंडी धीरेंद्र मोहन और उनका जागरण ग्रुप कभी अतुल माहेश्वरी से तुलना कर ही नहीं सकता और ऐसे लोगों की तुलना दिवंगत अतुल जी से करना अतुल जी का अपमान करने के बराबर है…आज जबकि पूर्व सांसद अमर पाल भी इस दुनिया में नहीं है लेकिन सब जानते हैं कि अपने पत्रकार ओमकार .चौधरी की अमर पाल से हुई पिटाई पर जागरण प्रबंधन चूडियां पहनकर बैठ गया था ,क्योंकि धीरेंद्र मोहन के अपने स्वार्थों के कारण उनके लिए अपने पत्रकार का सम्मान कोई मायने नहीं रखता था ,एक बार और बता दूं कि कुछ साल पहले अपनी मालिकिया अकड़ दिखाने पर धीरेंद्र मोहन के बेटे तरूण की आबूलेन मेरठ पर पुलिस का एक दरोगा पिटाई कर चुका है….

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