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”यशवंत, ऐसे सेक्स की पैरोकारी पर अपना इरादा स्पष्ट करो”

”जेएनयू में सेक्स….” शीर्षक से लिखे मेरे लेख पर कई लोगों के कमेंट आए हैं. मैं कुछ उन कमेंट्स का जवाब देना चाहूंगा जिन्होंने मेरे लिखे पर गंभीर आपत्ति जताई और इसके एवज में अपने तर्क पेश किए हैं. इनमें से खासकर 4 कमेंट्स को प्रकाशित करूंगा और इन चारों के सामने अपना पक्ष रखूंगा. ये चार कमेंट्स देने वालों के नाम हैं- श्रीवास्तव एस., अखिलेश, कबीर और प्रकाश. अपना पक्ष रखने से पहले इन चारों लोगों को थैंक्यू कहूंगा कि इन लोगों ने अपनी बात रखने का साहस किया.

”जेएनयू में सेक्स….” शीर्षक से लिखे मेरे लेख पर कई लोगों के कमेंट आए हैं. मैं कुछ उन कमेंट्स का जवाब देना चाहूंगा जिन्होंने मेरे लिखे पर गंभीर आपत्ति जताई और इसके एवज में अपने तर्क पेश किए हैं. इनमें से खासकर 4 कमेंट्स को प्रकाशित करूंगा और इन चारों के सामने अपना पक्ष रखूंगा. ये चार कमेंट्स देने वालों के नाम हैं- श्रीवास्तव एस., अखिलेश, कबीर और प्रकाश. अपना पक्ष रखने से पहले इन चारों लोगों को थैंक्यू कहूंगा कि इन लोगों ने अपनी बात रखने का साहस किया.

पहले इन चारों कमेंट्स को एक-एक कर फिर से पढ़ लें, जो इस प्रकार हैं…

shrivastav.s : यशवंत! पत्रकार हो, सो इतने नादान तो नहीं ही होओगे कि तस्वीरों की भाषा को न समझो। लेकिन, किसी की मशा भांप सको, इतने इनलाइटेंड भी नहीं हो। तुम लिख रहे हो कि ब्लू फिल्म बना रहे छात्र-छात्रा की मंशा पेशेवर पोर्नस्टार बनने की नहीं थी अथवा वे कोई सेक्स रैकेट चला रहे हो, ऐसा नहीं लगता। समझदार आदमी, तुम्हारे दावे के पक्ष में सुबूत क्या है। विद्या के मंदिर में कुकृत्य करते वे तुम्हें बड़े मानवीय और सहज लग रहे हैं, तो तनिक यह बताओ, चोर-डकैत-हत्यारे किसी वारदात को क्या असहज होकर अंजाम दे सकते हैं। हर माहिर आदमी अपनी फील्ड में सहज होकर ही काम करता है। तुम कह कैसे सकते हो कि यह सेक्स रैकेट नहीं है। वीडियो आटोमोटिव कैमरे से शूट किया गया है, या किसी थर्ड पर्सन ने किया है, जरा बताओगे। ​ तुम कह रहे हो, ​हगना, खाना, मूतना, संभोग करना, सांस लेना, सोना…. सारी जिंदगी हम हगने-मूतने-संभोगने-खाने को ही अंतिम लक्ष्य मानकर जीते रह जाते हैं और मरते हुए पाते हैं कि हम अब तक जिए क्यों थे?)​ ​जरा बताओ तो, तुमने जिंदगी का कौन सा लक्ष्य शर किया है। शब्दों-शब्दों में परमहंस बनने चले हो। ​​​तुम और कुछ नहीं, एक सवाल का जवाब दो, ​रसोई घर में हगोगे तो खाना कहां और कैसे खाओगे। पुराने जमाने में, जब आदमी के पास साधन कम थे, टट्टी करके उसपर राख डाल देता था, ताकि संक्रामक रोग न फैले। तुम चाहते हो, नई पीढ़ी सरेराह हगकर उसे शरीर में लपेट कर घूमे? यह बेशर्मी ही नहीं होगी, बल्कि महामारी भी फैलाएगी। सेक्स ​में मौज किसको न आएगी, पर हर लड़की जिस दिन नंगी होगी, हर युवक उत्तेजित होगा, उस दिन ब्लूफिल्म नहीं बनेगी। हर गली-चौराहा सेक्स का अड्डा होगा। तुम्हारी भाषा में इसे वेश्यावृत्ति नहीं कहा जा सकता, लेकिन तब कहने-न कहने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी। जो कार्य तुम्हें बड़े प्राकृतिक समझ आ रहे हैं, वे तो पशु भी करते हैं। तो फिर तुम हो क्या। बुद्धिमान पशु, या बुद्धिहीन मनुष्य। यह मत समझना कि मै ​तुम्हारी पीड़ा समझ नहीं रहा हूं। सच तो यह है कि तुम उपचार गलत कर रहे हो। समर्थन व्यक्ति उसी का करता है, जिसमें खुद इंट्रेस्टेड होता है। अपना इरादा स्पष्ट करो। ​ ​जिनके नक्शे को फॉलो करने की कोशिश कर रहे हो, वे ही रजनीश बोले तो ओशो, एक गलती कर जीवन भर पछताए। संभोग से समाधि का प्रलाप किया, तो उनके चेले-चांटी जुट गए। समाधि तो भूल गई, सम्भोग में ही डूबे पड़े हैं और जमकर मौज कर रहे हैं। गुरु भी धन्य हो गया, चेले भी। उम्मीद करता हूं, गलत चीज की फर्जी पैरवी बंद करोगे। दो-चार-दस, जितने भी इस ब्लाग के पाठक हैं, उनको बरगलाने का प्रयास नहीं ही करोगे।

akhilesh : tab to bhaiya swami Nityanand ka kaya kasoor. Unhone kaya galat kiya. Mathura me ek Tathakathit sanyasi apni biwi ka blue film banata hai, Uska kaya kasoor. Ummid hai yashwant, In Mahapurusho ka bhi aap naitik samarthan denge.

kabeer : yashwant ji, ladki aapki beti hoti to? kya aapki patrakarita isi tarah ubaal marti. imaandari se likhiyega.

prakash : अरे भाई साहब, आपने भी तो हिट के लिए क्या शब्दों की चासनी में लड़की की इज्जत बेंच दी। क्या आपको नहीं लगता कि आपको कम से कम इस खबर से दूर रहना चाहिए था। आपने फोटो फीचर बनाकर कौन सा सामाजिक सरोकार दिखाया है।

उपरोक्त चारों लोगों को उनकी टिप्पणियों पर मेरा जवाब इस प्रकार है–

श्रीवास्तव एस. जी को जवाब- विद्या के मंदिर में रहने वाले छात्र-छात्राएं बच्चे नहीं होते. वे जवान हो चुके होते हैं और जवान युवक-युवती सबसे ज्यादा सेक्स आग्रही होते हैं. इसी कारण प्राचीन काल से ही विद्या के मंदिरों में युवतियों के अभाव में युवकों में गे रिलेशन बना करते थे. देश के किसी भी पुरुष हास्टल को खंगाल लीजिए. आपको कई गे रिश्ते मिल जाएंगे. मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हास्टलों में रहा हूं. मैं कई युवकों को जानता था, या उनके बारे में सुनता था, कि वे जो दो-दो लोग एक ही हास्टल में रुम पार्टनर बनकर रहते हैं, आपस में शारीरिक संबंध स्थापित करते हैं. साथ ब्लू फिल्म देखते हैं. ब्लू फिल्म तो इन हास्टलों के छात्र सामूहिक तौर पर देखा करते हैं. तब चंदा मंगाकर सीडी व सीडी प्लेयर को मंगाने का काम हुआ करता था और ब्लू फिल्मों का सामूहिक प्रदर्शन होता था, हास्टल के कामन हाल में. और यह रुटीन हुआ करता था. कोई चूं चपड़ नहीं करता था. सब इसे रुटीन मानते थे. कई लड़के प्रयोग करने शहर के कोठों पर पहुंच जाया करते थे. तब सीडी व सीडी प्लेयर हुआ करते थे. अब मोबाइल व लैपटाप हैं. जिन विश्वविद्यालयों में युवक-युवतियों को साथ रहने या एक दूसरे के हास्टल में दिनदहाड़े आने-जाने की सुविधा है, वहां ये लड़की-लड़की आपस में शारीरिक संपर्क बनाते हैं. और फिर ऐसे अलग अलग हो जाते हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो. कई दुस्साहसी युवक-युवती अपने रिश्ते का सरेआम इजहार किया करते थे. और ज्यादातर आपस में शादी कर लिया करते थे. जिनके घरों की ओर से ज्यादा पाबंदी लगा करती थे, वे शादी तो नहीं कर पाते थे लेकिन अपने रिश्ते बनाए रखते थे और हास्टल से बाहर जाने के दौरान एक दूसरे को अलविदा कहते थे. और यह सब अब ज्यादा होता है. इसलिए विद्या के मंदिर में सेक्स करना कोई कुकृत्य नहीं, एक सहज परिघटना है और यह वाकई बेहद सहज और मानवीय है. अब अगर कोई दुस्साहसी युवक युवती आपसी सहमति से अपने शारीरिक रिश्ते के क्षण को फिल्मा भी रहे हों तो इसे सुपर स्पेशल केस भले मान लें, लेकिन यह कामन केसेज से अलग नहीं हो जाता. फिल्माने की सुविधा तब आसानी से उपलब्ध नहीं थी. अब आसानी से उपलब्ध है इसलिए मोबाइल से एमएमएस बन जा रहे हैं और वेब कैम से या हैंडीकैम से सीडी तैयार हो जा रही है. चोर-डकैत-हत्यारे जो करते हैं वो सहज नहीं होता क्योंकि वो खाने-पीने-हगने-मूतने-संभोग करने से अलग कृत्य है और वे जान बूझकर इरादतन दूसरों की संपत्ति पर डाका डालते हैं. इसे भी उन जगहों पर जायज माना जाता है जहां अभाव, गरीबी और भूख के चलते यह कृत्य किया जाता है. क्योंकि जब आपका सिस्टम धन को कुछ लोगों तक केंद्रित कर देता है और भुखमरों की तादात बढ़ती जाती है तो नतीजे में जो अराजकता, चोरी, डकैती, हत्या की घटनाएं होती हैं, उसका स्थायी इलाज पुलिस प्रशासन नहीं कर सकता, उसका स्थायी समाधान नीतियों को बनाकर किया जाता है ताकि पैसा और साधन समाज के अंतिम आदमी तक पहुंच सके. जेएनयू वाले लड़की लड़के अगर सेक्स रैकेट चला रहे होते तो शायद उनमें से कोई जेएनयू में नहीं होता, और जाने कबके पुलिस के हत्थे चढ़ गए होते क्योंकि सेक्स रैकेट संचालित करने वाला आदमी बहुत देर तक पढ़ाई नहीं कर सकता. ज्यादा पैसे का अचानक आने लगना उसे कृत्य को बड़े पैमाने पर संचालित और प्रसारित करने पर मजबूर करता. वीडियो किसी थर्ड पर्सन ने ही शूट किया हो तो क्या, वो भी तो उनका मित्र रहा होगा और उनकी सहमति आपस में थी, कोई मजबूर करके किसी को नहीं लाया था. और वे लोग सेक्स किसी चौराहे, गली या पब्लिक प्लेस पर नहीं, जैसा कि आप लिख रहे हैं, अपने बंद कमरे में कर रहे थे. इसलिए यह अपराध नहीं. मित्र दिक्कत यही है कि पशु को जब इच्छा होती है तो उनकी इच्छा भी शांत हो जाती है क्योंकि उन्हें सब कुछ सहज उपलब्ध है. पर मनुष्य ने सेक्स को ऐसा भयानक बाजार बना दिया है कि पूरा माहौल वैसे तो सेक्सी सेक्सी है लेकिन जब कोई संवेदनशील व संकोची युवा असल सेक्स तलाशने निकलेगा तो उसे हाथ कुछ न लगेगा, बल्कि कह सकते हैं कि उसका हाथ ही उसे हाथ लगेगा. वेश्यावृत्ति दबाने-मना करने-प्रतिबंध लगाने से फैलती है. जो चीज सहज उपलब्ध हो जाए और सहज उपलब्धता के बाद की परिघटना में किसी किस्म की आशंका या भय न हो तो यकीन मानिए वेश्यावृत्ति की दुकान बंद हो जाएगी. मेरा इरादा आपने पूछा है तो मैं तो अपने इरादे लगातार अभिव्यक्त करता जाता हूं, लेकिन आपने यह नहीं बताया कि आपके सेक्सुअल जीवन की क्या कहानी है. क्या आप लिंग-योनि विहीन हैं या कभी किसी के साथ सेक्स किया है. अगर सेक्स किया है, इस सेक्सी माहौल में सेक्स को फैंटेसाइज करते हैं तो आपके मन-मस्तिष्क हर रात मन ही मन कई तरह के पाप कर रहा होगा. पर इसे आप कुबूलेंगे नहीं कि क्योंकि आदमी जब सच को कुबूल लेता है तो वो आदमी नहीं, देवता हो जाता है. हम आदमियों की नियति है कि हम ढोंगी व पाखंडी होते हैं इसलिए दूसरों को लेक्चर देने सबसे पहले चले आते हैं, अपने घरों के पाप-पुण्य को ढंक-छिपा कर. आपके आखिरी बात का मैं भी आखिर में जवाब देकर अपनी बात खत्म करूंगा. मुझे तो लगता है कि अब तक सभी ने जिन जिन सही चीजों की पैरवी की हैं, वे सही चीजें सही होने की बजाय बिगड़ती ही चली गई हैं. तो आइए, हम आप कुछ दिन तक बुरी बुरी चीजों की ही पैरवी करके देख लेते हैं. शायद इससे बुराई के प्रति प्यार कम हो जाए क्योंकि प्यार उसी से होता है जो हासिल नहीं होता. जो हासिल होता है उससे कुछ दिनों बाद मोहभंग होता है और उससे आगे की तलाश होती है. यही मोहभंग व तलाश मनुष्यता को यहां तक ले आई है. लेकिन यह परिघटना कामन मैन के साथ नहीं हो पाती क्योंकि उसका जीवन तो खाने के लिए जीने और जीने के लिए खाने में बीत जाया करती है. गांधी से लेकर आइंस्टाइन तक के सेक्स प्रसंगों को पढ़ डालिए. समझ में आएगा कि सेक्स हर मनुष्य के जीवन में टेढ़ी खीर रहा है जिसे साहसी लोगों ने स्वीकार करके उदघाटित किया है और बौने लोगों ने इसे अपने जीवन का डार्क एरिया मानकर जिंदगी भर छिपाए रखा और काल कवलित हो गए.

अखिलेश जी को मेरा जवाब : स्वामी नित्यानंद का कसूर ये है कि उन्हें पहले सेक्स से मुक्त हो जाना चाहिए था फिर स्वामी बनना चाहिए था. आज के धर्म गुरुओं की दिक्कत यही है कि वे धर्म गुरु का चोला धन-समृद्धि के लिए पहनते हैं, न कि दुखी जनों की पीर हरने के लिए. मैं किसी ईमानदार गृहस्थ को सबसे बड़ा साधु-स्वामी मानता हूं क्योंकि वो बिना चोला बदले अपने रिश्तों में ज्यादा सहज व ईमानदार होता है, उत्पादक होता है, शिक्षक होता है, प्यार करता है और प्यार बांटता है. धर्म गुरु ज्यादा बड़े पाखंडी और अनैतिक होते हैं. स्वामियों के सेक्स स्कैंडल को महापाप मानना चाहिए क्योंकि उन्होंने अपनी इंद्रियों को बिना जीते ही साधना व स्वामी क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है. और जो इंद्रियों में ही अंटका है, भोगों में ही लगा है, वो स्वामी काहे का. ऐसे स्वामियों का पहले लिंग मोचन करना चाहिए फिर उन्हें संकट मोचक मानना चाहिए. इसीलिए मैंने स्वामी नित्यानंद या मथुरा के संन्यासियों के स्कैंडलों का कभी पक्ष नहीं लिया और इन्हें हृदय से घृणित मानता हूं. और, सिर्फ ये दो ही नहीं हैं, क्योंकि ये दो तो पकड़े गए, ऐसे स्वामियों की संख्या 99.99 फीसदी है. इनकी तुलना उन दो जेएनयू के युवक-युवतियों से नहीं करना चाहिए जिन्होंने कभी संन्यासी या स्वामी होने का दावा नहीं किया.

कबीर जी को मेरा जवाब : भाई, अगर आपने कबीर को थोड़ा भी समझा होता तो ये सवाल नहीं करते कि ”यशवंत जी, आपकी बेटी होती तो क्या आपकी पत्रकारिता इसी तरह उबाल मारती.” मैं पूरी ईमानदारी से लिख रहा हूं कि मेरी बेटी है और किशोर उम्र की होने की ओर है. उसके शरीर में वे सारी इंद्रियां हैं, जो किसी बेटी या युवती के शरीर में जन्मना होते हैं और उम्र के अनुरूप विकसित-सक्रिय होते हैं. जब उसे जिस इंद्रिय की जो जरूरत महसूस होगी, अपनी चेतना, बुद्धि, परिवेश, संस्कार के अनुरूप उसका सही-गलत अपने विवेक के हिसाब से इस्तेमाल करेगी / कर रही होगी. और, उसके कभी किसी तथाकथित गलत कदम पर मैं उसे गोली नहीं मारने जा रहा और न ही हाकी स्टिक से पीटकर उसे मौत के मुंह में सुलाने जा रहा. किसी समय की गई कोई गलती अगले समय रियलाइज कर लिए जाने पर गलती नहीं होती, बल्कि वह एक शिक्षाप्रद अध्याय होता है जिससे लेसन लेकर आगे की ओर हम आप बढ़ लेते हैं. मैं इस बात को लेकर ज्यादा सचेत रहता हूं कि मेरी सोच जो मेरे बेटे के प्रति है, उससे ज्यादा उदार सोच मैं अपनी बेटी के प्रति रख सकूं.

प्रकाश जी को मेरा जवाब : हमें और आपको अब लड़कियों की इज्जत की चिंता करने का काम छोड़ देना चाहिए. उनकी इज्जत की चिंता कर कर के हम लोग मरे जा रहे हैं और उनको जान से मार डाल रहे हैं. अगर आपकी इज्जत इज्जत नहीं तो उनकी इज्जत कैसे इज्जत हो गई. आपको मुंह मारने की पूरी छूट है, इसमें आपकी इज्जत नहीं जाती तो कोई किसी एक से सेक्स कर लेगी तो उसमें उसका क्या घिस जाएगा और कौन सी इज्जत चली जाएगी. ऐसी खबरों से क्यों दूर रहा जाए. पत्रकारिता केवल श्लोक बांचने के लिए है? पत्रकारिता केवल सुभाषतानि गाने के लिए है? पत्रकारिता के लोगों को उन विषयों पर ज्यादा बहस करने में जुटना चाहिए जो ज्यादा ढंके-छुपे और विवादित व दुरुह विषय हैं.

यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

[email protected]

जिस खबर पर उपरोक्त टिप्पणियां आई हैं, उस खबर को पढ़ने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें- जेएनयू में सेक्स : आइए लड़का-लड़की को गोली मार दें

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16 Comments

16 Comments

  1. Rajeev Verma

    February 11, 2011 at 3:11 am

    I M Agree With U Dear Yashwant. Ye log sirf ochi publicity ke liye marte hai or kuch bhi nahi. T.V. dekh kar apne aap ki tulna un starputro/putriyon e karte hai jo ki proffesional hai, magar ye badnam hue to kya naam na hoga ki theory par chalte hai.. 99.99% babayon ki tarah ye 90% jamat patrakaron ki bhi khadi ho gayi hai, jinme se kuch aise log bhi hai…

    • Khanshahid

      July 8, 2019 at 11:33 am

      Cheeta camp Trombay palipada

  2. sikanderhayat

    February 11, 2011 at 6:10 am

    maan na padega bhai yashvant me bahut dum ha kalam me jadu ha lakin fir yahi kahonga ki ladkiya in mamlo me safdhani barte to koi harz nahi ha

  3. ashish pandey

    February 11, 2011 at 6:12 am

    सटीक और सधा उत्तर दिया है आपने… बहुत अच्छा लगा… साधुवाद यशवंत जी

  4. pardeep mahajan

    February 11, 2011 at 6:58 am

    यशवंत मेरे भाई ये रंडुओ ,भडुओ गांडुओ की सेना है इनके सामने अपनी सफाई मत दे स्साले अपनी संभाल नहीं पाते है और दूसरो को अक्ल देते है बाकि नर जवाब है -प्रदीप महाजन ( WWW .INSMEDIA .ORG )

  5. devesh charan

    February 11, 2011 at 8:24 am

    dear yaswant,
    bahut dino ke baad likh raha hun.yaha tumhe padh kar yahi laga ki tum kuntao se mukt ho. but their is always two sides of the coin.we should nt advocate sex in abundence.ther is a difference between human and animal although man is also a form of animanl.but animal plus sensitivity= human
    so sensitive sex is welcome nt a mere act of sex for the sex only is nt welcome.sexual acts are meant for procreation not procastination.

  6. nikhil

    February 11, 2011 at 9:29 am

    sawal sex ka nahi, iske pradarshan ka hai. chahe wo kahi par ho. open sex ki pairokari karne wale bataen ki pati-patni ke beech hone wale sex ka vedio bankar bazaron main aaye to kaisa ho.

  7. prakash

    February 11, 2011 at 11:58 am

    यशवंत जी, सवाल सेक्स पर चर्चा का नहीं, आपकी मार्केटिंग का है. आपने महज हिट के लिए उस लड़की का फोटो फीचर बना दिया। कभी सोचा कि वो किसी की बहन होगी, अब उसका हाथ कौन थामेगा। अब आप बोलेंगे कि पहले ही उसका फोटो छप चुका है। मैं कहूंगा कि जरूर..कोई और उसे बदनाम करेगा तो क्या हम भी मजा मारने में और उसकी इज्जन निलाम करने में पीछे नहीं रहेंगे। कभी इतनी सक्रियता लोग प्रधानमंत्री के गैरजिम्मेदाराना बयान पर क्यों नहीं दिखाते हैं। क्या देशहित से ज्यादा जरूरी बाजारवाद और सुविधापरस्ती है।

    • Khanshahid

      July 8, 2019 at 11:34 am

      7039787324

  8. shrivastav.s

    February 11, 2011 at 12:53 pm

    ​यशवंत, बहस कितनी भी कर लें, सत्य नहीं बदलता। पता तुम्हें भी है कि तुम गलत प्रकरण की पैरवी कर रहे हो, यह दिमागी मैथुन का सतही उदाहरण है, और कुछ नहीं। तुम्हारी बात से लगता है कि ठीक सिर्फ वो है, जो तुम मानो। तुम कह रहे हो,​
    ​चोर-डकैत-हत्यारे जो करते हैं वो सहज नहीं होता, क्योंकि वो खाने-पीने-हगने-मूतने-संभोग करने से अलग कृत्य है और वे जान बूझकर इरादतन दूसरों की संपत्ति पर डाका डालते हैं। ​मुद्दे में वेश्यावृत्ति भी शामिल करता हूं। यह भी पुण्य काम होगा तुम्हारी नजर में। चोर-डकैत-हत्यारे इरादतन दूसरों की संपत्ति पर डाका डालते हैं इसलिए पाप हो गया। खाना-पीना-हगना-मूतना भी जानबूझकर ही किया जाता है। सवाल यह था कि रसोई घर में हगोगे तो खाना कहां खाओगे। तुम कह रहे हो, चोरी-डकैती आदि भी उन जगहों पर जायज है जहां अभाव, गरीबी और भूख के चलते किया जाए। ​दोष सिस्टम को देते हो। ​तनिक बताओ, ​क्या सिर्फ गरीब ही चोरी-डकैती करते हैं। बड़े घरों के बिगड़ैल गैंगवार करते हैं, विश्वविद्यालयों में, तुम्हें शायद पता न हो। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, यही चल रहा है। सबसे ज्यादा बलात्कार पैसे और स्त्रियों में खेलने वाले ही कर रहे हैं। दिल्ली का क्राइम रिकार्ड निकलवाकर देख लो। यूपी के दस चर्चित कांड गिनवा दूं, जिनको अंजाम देने वाले तुम्हारे तथाकथित सहज ही पद-पैसा-स्त्रीधारी ही हैं। ये वे लोग हैं, जिनकी तृप्ति कालेज टाइम में वेश्याओं तक से न हुई, तो इन्होंने नई-नई वेश्याएं तैयार कर दीं। एक स्त्री को वेश्या में तब्दील करना इन जैसे संभ्रातों के बाएं हाथ का खेल है। तुम इस वेश्यावृत्ति की पैरवी कर रहे हो। तुम कहते हो,
    ​जेएनयू वाले लड़की लड़के अगर सेक्स रैकेट चला रहे होते तो शायद उनमें से कोई जेएनयू में नहीं होता, और जाने कबके पुलिस के हत्थे चढ़ गए होते क्योंकि सेक्स रैकेट संचालित करने वाला आदमी बहुत देर तक पढ़ाई नहीं कर सकता। सच कड़वा है, पर समझो। जब धर्मस्थलों पर बैठे लोग रैकेट चला सकते हैं, तो जेएनू की बिसात ही क्या है।​ ढंग से जानते हो कि वेश्यावृत्ति में स्कूल की लड़कियों से लेकर हाईप्रोफाइल लोग तक उतर रहे हैं। तुम्हारी मानें तो चूंकि वे सहजता से य़े करने पर उतारू हैं, इसलिए इसे गलत नहीं कहा जाना चाहिए। पुलिस और कानून कहां तक पहुंचते हैं, तुम्हें ढंग से पता होगा। ​अपराधी कोई, पकड़ा कोई और जाता है। क्या तुम्हें पता नहीं है कि अब तमाम उच्चस्थ लोग भी अच्छा खासा रैकेट चलाते हैं। कोई वेश्यावृत्ति का, कोई अपराधियों का, कोई ठंगी-लूटमारी का, तो कोई कालाबाजारी का। हर व्यक्ति अपनी फील्ड का माहिर होता है, और बेहद सहज महसूस करता है। ​भ्रांति मत पालो। यूपी के कुछ इलाके ऐसे हैं, जहां असलहे बनाए जाते हैं। घर में ही इंडस्ट्री लगी हुई है। काम अवैध है, पर सहजता से चल रहा है। तुम्हारी भाषा का सहजता शब्द सिर्फ छल है। सहजता का एक ही अर्थ है, जो आध्यात्मिक आचारसंहिता से आता है। बाकी हर सहजता धोखा है। तुमने भले एयू-बीएचयू में गे-अथवा लेस्बियन लाइफ देखी हो, पर इसका अर्थ यह नहीं कि उसे उचित ठहराया जाए। उदारवादी होने का अर्थ अवैज्ञानिक होना नहीं। विवाहपूर्व शारीरिक संबंध हों, या अप्राकृतिक यौनाचार, कोई इजी फील कर रहा है, इससे उसका औचित्य नहीं साबित होता। उदारता के नाम पर किसी की ले लेना ही नहीं, अपनी दे देना भी बुरा ही है, फिर वो चाहे लड़की हो या लड़का। सेक्स का हौव्वा इन्हीं दिनों क्रिएट हुआ है, पहले न था। पैदा हम-तुम भी सेक्स से ही हुए हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि माथे पर सेक्स का बैनर लगाकर चलें। जिस दिन जननेंद्रियां आंखों की जगह और आंखें किसी और जगह लग जाएगीं, व्यक्ति कैसा लगेगा, कल्पना कर सकते हो। फिर कहूंगा, बुद्धिमत्ता धरती को वेश्यालय बनाने में नहीं, मानवीय गरिमा से पूर्ण बनाने में हैं। ऐसे स्कैंडलों की निंदा करो, संपर्क में लोग आएं तो समझाओ। फांसी तो नहीं देना है, पर उन्हें मर्यादित जीवन का पाठ तो पढ़ाना ही चाहिए। ​
    ​नोटः बेटी का उदाहरण तुमने गलत दियाहै। वह गलती करके सीखे, इससे पहले अपनी गलतियों से ही उसे सिखा दो। जो गलती करके सीखे, वो बुद्धू। बुद्धिमान वो नहीं, जो गलती करें, फिर पछताए। खासकर, सेक्स का क्षेत्र ऐसा है, जहां एक बार गलती करने के बाद दोबारा वही गलती अच्छी लगने लगती है।​ ज्यादा पाश्चात्य संस्कारों की पैरवी मत करो। अब पश्चिम के दां भी मानने लगे हैं कि कुछ क्षेत्रों में उन्होंने भारी भूल की है, और सेक्स का क्षेत्र उनमें से एक है।​ संतति हमेशा मानवी होना चाहिए, बंदरों की तरह नहीं, जहां तीन माह पहले जन्मा बच्चा अपनी ही मां के ऊपर चढ़ने लगता है।​​
    ​​आगे भी चर्चा जारी रखते हैं, कुछ अच्छा निष्कर्ष भी निकल सकता है।

  9. ravinder

    February 11, 2011 at 1:10 pm

    भाई साहब श्रीवास्तव जी, दरअसल कुछ साले फट्टू होते हैं। यूं तो उनकी …में दम नहीं होता, लेकिन किसी की फटी देख पूरी टांग घुसेड़ने लगते हैं। उस लड़की की फट रही है और स्साले मौज ले रहे हैं। ये टीआरपी बढ़ाने की तरीका है और कुछ नहीं। इन स्सालों की समझदानी वहीं खुलती है जहां समाज विरोधी कुछ होता है। कुछ लोगों की फितरत होती है कि गलत चीजों की पैरवी करके अपना नाम चमकाएं। आपकी बातें सही समाज की दिशा में उम्मीद जगाती हैं। लिखते रहिए।

  10. ATUL

    February 11, 2011 at 6:30 pm

    KYA BAT H MAJA AA GAYA

  11. ashish goswami

    February 12, 2011 at 9:10 am

    Dear yeshvantji,

    overall morel yahi hai…ki aane jo bhi likha vo theek hai..par aapni galti man na tha…..kyoki aap jaisa gambheer patrkar se mai yeh apeksha nahi rakhta…

  12. basant

    May 22, 2011 at 12:22 pm

    maansik kunthao se joojhte logon ke liye, naye jamane ke saath badhte hue yaun aakarshan aur yaun samandho ko lekar yashwant ne ek bebaak tippani ki hai, sawal ye nahi hai ki kaun kahan kya kar raha hai, sabki betiyan badi ho rahi hain, lekin kya yaun aakarshan ke khauf matr me unko ghar me band kar dena uchit hoga , ya fir unhe guide karna, ya fir yaun shiksha uplabdh karana?..filhaal iss baat per chintan ki jaroorat hai, yashwant ki tippadi bebaak hai, i appreciate you yashwant..

  13. J.P.

    May 22, 2011 at 5:04 pm

    यशवन्त जी आपने सही कहा है । ये आलोचक अपनी बहन बेटियोँ को फिल्म तो साथ बिठाकर दिखा सकते है, पर उनके साथ कुछ ऐसा घट जाए तो चर्चा करने पर शर्मिन्दगी महसूस करते हैँ।

  14. Khanshahid

    July 8, 2019 at 11:35 am

    7039787324

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