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यादों में आलोक : आयोजन की कुछ तस्वीरें

होली के दिन आलोकजी के चले जाने की खबर मिली थी. तब गाजीपुर के अपने गांव में था. रंग पुते हाथों को झटका और चुपचाप बगीचे की तरफ चला गया. न कोई झटका लगा, न कोई वज्रपात हुआ, न कोई आंसू निकले, न कोई आह निकला… सिर्फ लगा कि कुछ अंदर से झटके से निकल गया और अचानक इस निकलने से शरीर कमजोर हो गया है.

होली के दिन आलोकजी के चले जाने की खबर मिली थी. तब गाजीपुर के अपने गांव में था. रंग पुते हाथों को झटका और चुपचाप बगीचे की तरफ चला गया. न कोई झटका लगा, न कोई वज्रपात हुआ, न कोई आंसू निकले, न कोई आह निकला… सिर्फ लगा कि कुछ अंदर से झटके से निकल गया और अचानक इस निकलने से शरीर कमजोर हो गया है.

भावहीन-सा बैठा रहा, बैठ भी न सका, टहलने लगा, टहल भी न पाया, लेट गया, लेट भी न सका, घर लौट चला, घर में भी न रहा, लैपटाप आन किया, यह भी न कर सका, छत पर गया, वहां भी देर तक न रहा… एक बेचैनी जो लगातार चला रही थी पर जाना कहां है, करना क्या है, यह समझ नहीं पा रहा था. दिल्ली में न होना इतना पहले कभी नहीं अखरा, जितना इस बार दिल्ली से दूर होने की लाचारी महसूस हुई. दिन गुजरते गये. दिल्ली भी फिर पहुंचा. सुप्रिया भाभी से मिला. तेरहवीं हो गई. शोकसभा का भी आयोजन हो गया. और, बिना आलोक की ये दुनिया चलती रही.

मैं भी चलता जीता रहा. पर अब भी मुझे अंदर से कुछ कमी महसूस होती है. जो दिल्ली हम जैसे गांव से आए हुओं को आतंकित करती रहती है, जिस दिल्ली के लोग हम जैसे देहातियों को डराते-धमकाते-फंसाते-समझाते रहते हैं, उस दिल्ली से भयमुक्त होना, उस दिल्ली वालों से निपटने और इस आंतिकत करने वाले शहर के सीने पर पैर गड़ाकर सबको ललकार देने के टिप्स अनजाने में देते रहे आलोक भइया. जिसने अनजाने में इतना कुछ मुझे दिया, उसे मैं क्या दे सका. कुछ नहीं. सिर्फ लेता रहा. उनकी पत्रकारिता के प्रति असीम आस्था, जनता के प्रति अदभुत लगाव, दलालों और लाइजनरों के प्रति अपार गुस्सा… उनके भावों को जहां तक संभव हो सका, उनके लिखे को जहां तक संभव हो सका, कैरी करता रहा. लेकिन मुझे कई बार लगता रहा कि आलोक भइया की स्पीड इतनी तेज है कि भड़ास और मैं, उसे फालो नहीं कर पाते.

लोग जहां सोचना बंद करते हैं, आलोक भइया वहां से लिखना शुरू करते थे. तभी तो वे आलोक तोमर हो गए और जीते जी इतिहास बन गए. उस आलोकभइया के लिए एक आयोजन करना का विचार दिमाग में आया लेकिन अपने स्वाभाविक आलस और दिल्ली में ज्यादा दंदफंद करने से बचकर रहने वाली मानसिकता के चलते आजतक सिवाय भड़ास चलाने के और कुछ कर न पाया. आलोक भइया से बात तय हुई थी, कई बार तय हुई कि भड़ास की तरफ से एक पुरस्कार समारोह किया जाएगा और उसमें ऐसे लोगों को पुरस्कार दिया जाएगा जिन्हें मेनस्ट्रीम मीडिया व मेनस्ट्रीम पुरस्कारदाता रिकागनाइज नहीं करते बल्कि उनके खिलाफ सोचते बोलते हैं पर सच में कहा जाए तो ऐसे लोग साहस और सरोकार के अप्रितम उदाहरण होते हैं. दैनिक जागरण के पत्रकार जरनैल सिंह को एवार्ड देने का तय हुआ था. पर हम लोग कर न पाए. हम लोग नहीं बल्कि मैं कर नहीं पाया क्योंकि करना मुझे था. और यह भी तय हुआ था कि सभी पुरस्कार सिर्फ आलोक तोमर भइया के हाथों दिलाए जाएंगे क्योंकि हम लोगों के वही रोल माडल हैं.

और, पुरस्कार देने के बहाने आयोजनों का जो सिलसिला शुरू होता तो कई तरह के आयोजन करते हम लोग. पर दुर्भाग्य यह कि आयोजन किया तो आलोक तोमर जी के न रहने पर उनकी यादों को सजोने के नाम पर आयोजन किया. जिस पहले आयोजन के हीरो आलोक तोमर को होना था, उस पहले आयोजन के हीरो आलोक तोमर ही थे, पर माहौल जुदा था. उन्हें सशरीर होना था, लेकिन वे सिर्फ तस्वीरों में और लोगों के दिलों में थे. ईटीवी के हिंदी चैनल्स के हेड जगदीश चंद्र को साधुवाद देना चाहूंगा जिनके बार बार कहने और आयोजन की जिम्मेदारियां खुद उठाने का वादा करने के बाद मैं आयोजन की दिशा में बढ़ा. और, ईशमधु तलवार व डा. दुष्यंत ने जिस तरह दिल्ली में आकर कई दिनों तक कैंप करके आयोजन के लिए दिन-रात एक किया, उसी कारण आयोजन सफल हो सका.

किसने क्या बोला, इसे रिकार्ड किया है और जल्द ही वो आडियो इस साइट पर अपलोड किया जाएगा जो करीब तीन घंटे का है. आयोजन की कुछ तस्वीरें यहां दे रहा हूं, जो मैंने खुद अपने मोबाइल से लिए थे. आयोजन में जितने लोग आए, सभी का आभार दिल से कहना चाहूंगा.

और, बताना चाहूंगा कि कल मैंने मदिरा का भरपूर सेवन किया. गया, पटना, जालंधर से आए मित्रों व कुछ दिल्ली के दोस्तों के साथ, जिनकी मिलीजुली संख्या करीब एक दर्जन के आसपास थी, पहाड़गंज के एक होटल में दिल्ली में ड्राइ डे होने के बावजूद डबल रेट में खरीदकर मदिरा सेवन किया गया. और, आयोजन के बाद के जीवन को जीते हुए आलोकजी से जुड़ी दर्जनों ऐसी बातों का वहां जिक्र लोगों ने किया, जिसे कोई मंच से बोल बता नहीं पाया था. और सारी बातों से संदेश सिर्फ एक निकलता था कि एक जमाने में एक आलोक तोमर हुआ करते थे जो थे तो मनुष्य ही लेकिन वे पूरे मनुष्य थे क्योंकि बाकी मनुष्य जिस दंदफंद-गुणा-गणित में पत्रकारीय जीवन के बेसिक मर्म व मूल्यों को धीरे-धीरे तिरोहित करते जाते हैं, उसे आलोक तोमर पूरे जी-जान से जीते थे और इस प्रक्रिया में वे नाकारा मनुष्यों, संस्थाओं और समाज को भी चैलेंज कर डालते थे, सीना तानकर, ताल ठोंककर.

और, कल इसी क्रम में जब देर रात घर लौट रहा था, एक साथी की कृपा से, उनकी कार में सवार होकर तो अचानक जाने कब और कहां रुलाई छूटी तो फिर बंद न हुई. रास्ते भर हुचक हुचक कर रोता रहा. और, बहुत देर बाद जब शांत हुआ तो लगा कि बहुत हलका हो गया हूं, कुछ भरा था अंदर आलोक जी के चले जाने के चलते जो अब निकला है. साथी लोग मनाते रहे, पूछते रहे लेकिन बोलना चाहकर भी बोल नहीं पाता था क्योंकि बोल तो तब निकल पाएंगे जब रुलाई की हूक का लगातार बाहर निकलना रुक पाता. एक तस्वीर मदिरापान के शुरुआत के समय का भी डाल रहा हूं.

पता नहीं यह सब लिख-डाल कर ठीक कर रहा हूं या नहीं लेकिन मुझे लगता है कि आलोक तोमर बहुत ठीक ठीक और बहुत नापतौल कर करने व जीने वाले शख्स का नाम नहीं था. आलोक तोमर अनप्रडिक्टबल थे, आलोक तोमर आवरणों-खोलों को नोचने वाले और बिलकुल सहज व मुंहफट तरीके से जीने, करने वाले इंसान थे. सो, उनकी याद में अगर कुछ लिख रहा हूं, कह रहा हूं, कर रहा हूं तो उसे पूरी संपूर्णता के साथ प्रकट किया जाना चाहिए.

आलोक भइया, देख रहे हैं न, आपके बगैर कितने अटपटे, अनमने और अधमरे से हो गए हैं हम सब. कुछ करते भी हैं तो छूटा सा लगता है, कुछ जीते भी हैं तो अधूरा सा लगता है, कुछ सोचते भी हैं तो टूटा सा लगता है. वो संबल, वो आत्मबल, वो जिजीविषा, वो जीवटता जिसे हम लोग अपने पास मानते थे, आपके कारण ही तो था, उसके स्रोत तो आप ही थे. सच कहा था मयंक ने. आप ऐसे आलोक हैं जिसकी उर्जा व प्रकाश से हम लोग आलोकित व उर्जावान होते थे. वो स्रोत, वो कड़ी टूट गई है. बहुत मुश्किल है कोई आप जैसा उर्जास्रोत और जीवट तलाश पाना. -यशवंत

पापाजी सुरिंदर सिंद, पदमा सचदेव, संजय कुमार सिंह, अर्जुन शर्मा, यशवंत देशमुख

मुक्तिनाथ उपाध्याय, जयंत तोमर, मयंक सक्सेना, डा. दुष्यंत, अनंत मित्तल, वर्तिका नंदा

अमिताभ, पुण्य प्रसून बाजपेयी, परमानंद पांडेय, जगदीश चंद्र, संतोष भारतीय, राहुल देव

आलोक कुमार, राम बहादुर राय, ईशमधु तलवार, बलराम, विनायक विजेता, विकास मिश्रा

आलोक तोमर जी के न रहने पर अब आलोक कुमार डेटलाइन इंडिया में ‘प्रतिदिन’ कालम लिखते हैं. आलोक कुमार ने बताया कि उन्होंने एक छोटे शहर दुमका से आने के बाद दिल्ली में किसी वटवृक्ष की छांव स्वीकार करने की जगह आलोक तोमर जैसे साहसी आदमी का साथ चुना और इस पर उन्हें गर्व है.

आलोक तोमर के अभिन्न मित्र मुक्तिनाथ उपाध्याय ने बताया कि आज जिस 22 तारीख को हम लोग इकट्ठा हुए हैं, आलोक तोमर को याद करने के लिए, उस 22 तारीख को आलोक तोमर ने सुप्रिया के साथ शादी की थी और आज आलोक-सुप्रिया की मैरिज डे है.

आयोजन स्थल के मंच व बैनर की एक झलक और आयोजन के मीडिया मार्टनर ईटीवी की तरफ से बोलते ईटीवी के हिंदी चैनल्स के हेड जगदीश चंद्र.

कांस्टीट्यूशन क्लब का डिप्टी स्पीकर हाल खचाखच भरा था. कई बार तो ऐसा हुआ कि दर्जनों लोगों को पीछे खड़े होकर वक्ताओं को सुनना पड़ा.

आलोक तोमर जी की बिटिया मिष्टी भी श्रोताओं के बीच बैठी हुईं पापा की यादों को दूसरों के मुंह से सुन रहीं थीं.

पदमा सचदेव, जिन्हें आलोक तोमर मम्मीजी कहा करते थे, आलोक जी की पत्नी सुप्रिया राय के साथ अंत तक बैठी रहीं.

कार्यक्रम के खात्मे के बाद रात में पहाड़गंज के एक होटल में अर्जुन शर्मा, अशोक कुमार, मदन कुमार तिवारी समेत दर्जन भर से ज्यादा लोगों ने बैठकी की और मदिरा संग अपने-अपने सुख-दुख को शेयर किया.

आयोजन के बाद बाहर से आए पत्रकार साथियों के साथ एक होटल में बैठकी हुई. दिल्ली में ड्राई डे के कारण डबल रेट में दर्जन भर से ज्यादा पौव्वे ब्लैक में मंगाए गए. पहला पैग बनने के दौरान का दृश्य.

”यादों में आलोक” आयोजन में शरीक कई वक्ताओं, कार्यक्रम में शरीक हुए लोगों के नाम व तस्वीरें प्रकाशित होने से रह गई हैं. उनसे माफी चाहेंगे क्योंकि आयोजन की कोई औपचारिक किस्म की रिपोर्ट नहीं तैयार की गई जिसमें सभी के नाम आदि का ध्यान रखा जाता. जिसने जैसा लिखकर भेजा वैसा प्रकाशित किया गया और जैसा मैंने महसूस किया, यहां लिखने की कोशिश की. हम अपील करेंगे कि अगर कोई साथी, जो आयोजन में शरीक हुआ हो, आयोजन पर अपनी ओर से कुछ लिखकर भेजे. -यशवंत

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0 Comments

  1. श्रवण शुक्ल

    April 23, 2011 at 6:46 pm

    मै आ नहीं पता इसके लिए माफ़ी चाहता हूँ.. शायद मै पहली , आखिरी और अपनी जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण मौके पर लेट हो गया ..

  2. ashutosh

    April 23, 2011 at 7:39 pm

    are yashwant! upar ki sabhi photuen to thik hai, niche daaru ki photu aur us par black me kharidne ki bebsi batane kya jarrorat thi. bina iske bhi samajh me aa raha tha ki tum waakai dukhi ho…. kam se kam dry day par to daaru nahi kharidni aur peeni chaaye thi….. lekin tumka peeni thi peeni thi aur peeni thhhhhheeeeeee…. aayen.

  3. pawan ku bhoot

    April 24, 2011 at 12:50 am

    brother. Alokji is ray of hope…fr we all. Pawan

  4. मदन कुमार तिवारी

    April 25, 2011 at 12:46 pm

    कभी-कभी जिवन में सबकुछ निर्थक सा लगता है । खुद के होने या न होने का मतलब हीं नही रहता , पता भी नही चलता क्यों । रुला गयें यादों में आलोक । हम सब कुछ में सार्थकता तलाशते हैं यह क्या है , कहां मिलेगी , किसी चीज की प्राप्ति या चाहत का पुरा हो जाना अगर सार्थकता है तो फ़िर जिवन की सार्थकता तो मौत है क्योंकि उसकी प्ाप्ति के लिये किसी प्रयास की जरुरत नही , अगर धन -दौलत , पद , दुसरों की नजर में उचा दिखना यानी अहंम की तुष्टि सार्थकता है तो करोडो के पास यह सबकुछ है उसके बाद भी संतुष्टी नही , आलोक तोमर कम उम्र में चले गयें सबका यही कहना था मेरी नजर में धरती पर आना हीं गलत था , एक निर्र्थक जिवन था उनका, लडना -झगडना , आत्मा को मार कर अनुशासित न बनने की जिद , समझौता जैसे शब्दों का सम्मान न करना । अजीब दुनिया है यह , आपकी मौत के बाद आपके जिवन की सार्थकता को मापने का उसका पैमाना है बच्चे बीबी के लिये आपके द्वारा संचित संपति ।

  5. manoj sharma

    April 25, 2011 at 5:04 pm

    me alok ji se kabhi mila nahi bus bhadas par unke lekh padhe./ unki kalm me aag thi or vo aag ab hum logo ko jalaye rakni hogi . .. yashwant ji aap ke lekh se lagta he aap kaafi karibi rahe he . ….. aapki jesi halat meri bhi ho gayi thi jab mujko pata chala …. pata nahi us time kyu rona nahi aaya . par abhi aapka ye likh padh kar jor 2 se ro raha hu ….

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