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ये नकली कप है भारतीयों, अब पवार साहब से पूछो

हम खबरचियों के पास एक सनसनीखेज खबर है। हममें से कोई कहता है कि शुरूआत प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया यानी पीटीआई से हुई तो किसी का दावा है कि सबसे पहले उसने बताया। पता नहीं कौन है सही, लेकिन खबर ये है कि विश्व विजेता भारतीय टीम को असली नहीं, बल्कि रिप्लिका कप मिला। क्यों हुआ ऐसा? खबर है कि मुंबई हवाई अड्डे पर कस्टम ड्यूटी नहीं चुकाने की जिद्द की वजह से असली कप एयरपोर्ट के वेयरहाउस में भेज दिया गया।

हम खबरचियों के पास एक सनसनीखेज खबर है। हममें से कोई कहता है कि शुरूआत प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया यानी पीटीआई से हुई तो किसी का दावा है कि सबसे पहले उसने बताया। पता नहीं कौन है सही, लेकिन खबर ये है कि विश्व विजेता भारतीय टीम को असली नहीं, बल्कि रिप्लिका कप मिला। क्यों हुआ ऐसा? खबर है कि मुंबई हवाई अड्डे पर कस्टम ड्यूटी नहीं चुकाने की जिद्द की वजह से असली कप एयरपोर्ट के वेयरहाउस में भेज दिया गया।

इसकी जगह मुकाबला पूरा होने के बाद विजेता का नकली कप दे दिया गया। एक अऱब 21 करोड़ लोगों की भावनाओं के साथ इतना बड़ा धोखा, ये मैं नहीं कह रहा, हमारे न्यूज चैनल कह रहे हैं।  अब सवाल ये है कि कितना टैक्स बना, एक न्यूज चैनल कह रहा है 15 लाख  रु, दूसरे की माने तो दूसरा  कह रहा है 22 लाख रुपये। अब ये पता नहीं, कौन सी रकम  सही है। लेकिन उससे भी ज्यादा हैरानी इस बात पर है कि जब सरकार ने पूरे मुकाबले के लिए 45 करोड़ रुपये माफ कर दिए तो फिर मुकाबले की जान यानी ट्रॉफी के लिए 22 लाख रुपये के लिए क्यों अड़ गयी। वैसे इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल यानी आईसीसी कह रहा है कि अगर असल ट्रॉफी टैक्स के चक्कर में फंसती तो टैक्स चुकाने में उसे कोई परेशानी नहीं होती।

आईसीसी वैसे एक सिरे से ये खारिज भी कर रहा है कि भारतीय टीम को दी गयी ट्रॉफी नकली है।  हां उसने ये जरूर माना कि ट्रॉफी की एक प्रतिकृति जरूर मुंबई लायी गयी, लेकिन दुबई ले जाने के लिए, इस देश में  नहीं। आग्रह पर प्रतिकृति रोकी गयी और इन पंक्तियों के लिखे जाने के साथ ही दुबई के लिए रवाना हो गयी। वित्त मंत्रालय के सेंट्रल बोर्ड ऑफ एक्साइज एंड कस्टम यानी सीबीईसी ने भी सर्टिफिकेट दे दिया है कि विश्व चैंपिंयन को दिया गया ट्राफी असली था, और बेवजह विवाद पैदा किया गया है।

लेकिन क्या वाकई में विवाद बेवजह  पैदा किया गया, जो आईसीसी कह रहा है वो सही है और बाकी सब झूठ ? आखिरकार आस्ट्रेलिया को मिली 2007 की ट्रॉफी और हमें मिली 2011 की ट्रॉफी का बेस अलग-अलग क्यों दिख रहा है? यही नहीं मुकाबला शुरु होने के समय में जो ट्राफी दिखायी गयी और अंत में दी गयी, उनमें अंतर क्यों है? बीसीसीआई के पदाधिकारी भी परदे के पीछे से कह रहे हैं कि असली नहीं, हमें नकली कप मिला।

क्या वाकई में आईसीसी इतना बड़ा हो गया  है कि वो हमारी भावनाओं  के साथ खुलकर खेले? वो भी तब जब आईसीसी के मुखिया एक भारतीय हो, एक ऐसा भारतीय जो देश का वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री है और महाराष्ट्र की राजनीति का ना मिटने वाला हस्ताक्षर कहलाता हो, फिर भी वो सब कुछ हो रहा है जो हम भारतियों को अपमानित करने में कोई कमी नहीं रह रही। ज्यादा हैरानी तो तब हो रही है कि वित्त मंत्रालय का एक विभाग भी आईसीसी के समर्थन में बेशर्मी के साथ साथ समर्थन में आ गया और सच को वेवजह का विवाद बनाने में जुटा है।

दरअसल, आईसीसी का मकसद बिल्कुल साफ है।  भारत ही नहीं, पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में क्रिकेट मानस की भावनाओं  पर इतना हावी हो चुका है कि वो कोई भी कीमत चुकाने को तैयार है। टिकट के दाम 500 हो या पांच हजार या फिर 50 हजार, खरीदने वालों की कमी नहीं। दूसरी ओर मुनाफे के मार्जिन पर दवाब का रोना रोने वाली कंपनियां 10-10 सेकेंड के विज्ञापन के लिए 24 लाख रुपये तक देने को तैयार है, उसकी भी कीमत तो हमसे ही वसूली जाएगी, बढे हुए दाम या घटी हुई मात्रा के रूप में।

आईसीसी यही  सब भुनाना चाहता है। मोटी कमाई, मोटा मुनाफा और उस पर से टैक्स छूट, और क्या चाहिए। छपी हुई खबरें बताती  हैं कि आस्ट्रेलिया, वेस्ट  इंडीज, इंग्लैंड या दक्षिण अफ्रीका में आईसीसी को कोई खास मुनाफा नहीं हुआ, क्योंकि वहां क्रिकेट एक धर्म नहीं, भावनाओं की पराकाष्ठा नहीं, बल्कि पेशा है और पेशेवर रूप में ही खेला जाता है। लेकिन कहने की जरूरत नहीं कि भारत में ऐसा नहीं। नतीजा जब भावनाओं पर कारोबार हावी हो जाता है तो सामने वाले को जम कर दोहन ही किया जाता है। आईसीसी ने भी यहीं किया।

आईसीसी से हमें कोई गिला नहीं, क्योंकि  वो तो एक मेहमान के तौर पर आए और हमारे घर का एक कोना हथिया लिया। लेकिन ज्यादा दुख तो ये है कि हमारे अपने पवार साहब ने बिल्कुल ही चुप्पी साध ली है। कसम खा ली है कि टिकट खरीदने जाने वाले लाठी खाए, भारतीय न्यूज चैनल के पत्रकार धकियाए जाते है और नकली ट्राफी भी दे दी जाए, तभी भी कुछ नहीं बोलेंगे। क्यों, आईसीसी की सत्ता तो अभी संभाली है, कैसे उसके खिलाफ जा सकते हैं।

लेखक शिशिर सिन्हा युवा और प्रतिभाशाली टीवी जर्नलिस्ट हैं.

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0 Comments

  1. 8A'@0 A.>0

    April 4, 2011 at 5:38 pm

    यही है भैये, क्रिकेट दिखाओ, क्रिकेट खिलाओ और कुछ नहीं. सब ठण्डा..

  2. karan54

    April 5, 2011 at 4:36 am

    india maay aisay buray kam kkk siva ajtak kujh hua hai kya , har jagah paisa kee kala bazari ho rheee hai. naak katva deee bharat keee aisay kam kkk baat ……..

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