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राजदीप सरदेसाई की करतूत जगजाहिर करने वाली तहलका टीम को बधाई

नूतन ठाकुर: आशीष खेतान को सच लिखने और सिद्धार्थ गौतम को सच बोलने के लिए विशेष तौर पर बधाई : तहलका ने सचमुच देश की पत्रकारिता की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया. एक से बढ़कर एक बड़ी खबरें ब्रेक की. कैमरे के सामने नोटों की गड्डियां लहराते भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण का चेहरा सभी को याद होगा.

नूतन ठाकुर: आशीष खेतान को सच लिखने और सिद्धार्थ गौतम को सच बोलने के लिए विशेष तौर पर बधाई : तहलका ने सचमुच देश की पत्रकारिता की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया. एक से बढ़कर एक बड़ी खबरें ब्रेक की. कैमरे के सामने नोटों की गड्डियां लहराते भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण का चेहरा सभी को याद होगा.

पैसे का गुणगान करते उस समय के भाजपा नेता और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पद के लिए घोषित प्रत्याशी दिलीप सिंह जूदेव को सबने देखा. बंगारू और जूदेव की फजीहत पूरे देश के सामने हुई थी. वह पहला मौका था जब देश इस तरह की कोई बड़ी बात देख रहा था. यह तो सब जान रहे थे कि देश के कई नेता दोनों हाथों से पैसा लूट रहे हैं पर पकड़ में कोई नहीं आता था.

तरुण तेजपाल और अनिरुद्ध बहल की जोड़ी ने वह कर दिया जो अब तक केवल फिल्मों में ही दिखाया जाता रहा था. उस समय से अब तक बहुत समय बीत चुका है और इस दौरान बहुत कुछ ऐसा हुआ है जो अब से दस साल पहले एकदम नया-नया और अजूबा था. तहलका भी अब बहुत बदल चुका है- पहले वह पोर्टल था, अब एक प्रतिष्ठित पत्रिका है.  यद्यपि अब भी वह धमाकेदार खबरें लाते रहता है पर शायद अब हम उनके आदी हो गए हैं और कई बार उनका उतना अधिक शोर नहीं मच पाता जितने के वे संभवतः हक़दार होते हैं. इसके अलावा अब उन पर कई बार पक्षपात करने और कॉंग्रेस के पेड एजेंट के रूप में काम करने के आरोप भी यदा-कदा लगाए जाते हैं, चाहे इनमें जितनी सच्चाई हो.

इन्हीं बड़े मामलों में से एक मामला मैं आपके सामने रख रही हूँ. यद्यपि इस खबर को आये करीब पांच महीने बीत चुके हैं पर मैंने इसे हाल में ही देखा और पढ़ा. मैं इस खबर को पढ़ने के बाद इतना अभिभूत हो गयी कि अपने आप को रोक ना सकी और इस लेख का गुणगान करने को मजबूर हो गयी. यह लेख है 02 अप्रैल  2011के अंक में प्रकाशित Cash-for-Votes Scandal: A trap. And a cover-up (नोट के बदले वोट स्कैंडल- एक जाल और उसकी छिपा-छिपी). आशीष खेतान का लिखा यह आलेख सचमुच इतना जबरदस्त है कि मैं ह्रदय से आशीष को साधुवाद देती हूँ. किसी कहानी के तह तक जाना और उससे सच्चाई निकाल कर ला पाना ही किसी भी पत्रकार के लिए सबसे जरूरी काम है और मेरी निगाह में इस कहानी में आशीष खेतान इस मापदंड पर पूरी तरह खरे उतरते दिखाई देते हैं. उसके साथ जो दूसरी बात मुझे उनके इस आलेख में अच्छा लगा वह यह कि तहलका का कॉंग्रेस से चाहे कुछ भी सांठ-गाँठ हो पर कम से कम इस कहानी में तो आशीष और तहलका सिवाय सच्चाई के और किसी भी चीज़ के निकट नज़र नहीं आये.

आशीष ने इस आलेख में जहां इस पूरे घटनाक्रम को उसके प्रारम्भ से प्रस्तुत किया है वहीँ इस में उनकी जो सबसे बड़ी फतह रही है कि वह युवा पत्रकार सिद्धार्थ गौतम, जो इस घटना और स्टिंग ऑपरेशन के समय सीएनएन-आईबीएन चैनल में थे और आजकल हेडलाइंस टुडे में कार्यरत हैं, से लंबी और बेबाक बातचीत करने के सफल रहे जिसके कारण कई सारे रहस्यों से पर्दा उठ सका. इस तरह यह एक पत्रकार की मदद से दूसरे पत्रकार द्वारा पत्रकारिता को गरिमा प्रदान करने वाला लेख था, जिसमे दुर्भाग्यवश वह पत्रकार सबसे बुरी स्थिति में दिखा जिसके लिए मेरे तथा लाखों लोगों के दिलों में हमेशा से बहुत अधिक इज्जत रही थी. पत्रकारिता के सिरमौरों में एक और निष्पक्ष तथा साहसी पत्रकारिता का मिसाल कहे जाने वाले राजदीप सरदेसाई इस कहनी में एक ऐसे कमजोर और स्वकेंद्रित पात्र के रूप में सामने आये जिसके प्रति अंदर से कष्ट होता है.

इस कहानी से कई सारे साक्ष्यों और प्रमाणों के आधार पर यह बात काफी हद तक साफ़ हो जाती है कि “वोट के बदले नोट” का जो ड्रामा तीन सांसदों ने पार्लियामेंट में खेला और नोट लहरा कर पूरी दुनिया का  ध्यान अपनी ओर खींचा वह मूल रूप से एक ड्रामा ही था. इस कहानी को पढ़ने के बात साफ़ हो जाता है कि कैसे उस समय की स्थितियों में, जब अंदरूनी तौर पर सांसदों के खरीद-फरोख्त का “खुला खेल फरुक्खाबादी” चल रहा था, भारतीय जनता पार्टी के बड़े योद्धा भी इसका फायदा अपनी ही तरह से करने को बेताव थे. कहानी के अनुसार इसका तानाबाना बुना गया भाजपा के पुरोधा लाल कृष्ण आडवाणी के स्तर पर जिन्होंने इसकी कमान दी अरुण जेटली को.

अरुण जेटली ने सीएनएन-आईबीएन के राजदीप सरदेसाई से संपर्क पर बाकी काम सौंप दिया उस समय के भाजपा के एक रणनीतिकार सुधीन्द्र कुलकर्णी को. सुधीन्द्र कुलकर्णी को साथी मिले सोहेल हिन्दुस्तानी और इन लोगों ने आइबीएन के सिद्धार्थ गौतम के साथ यह सारा “स्टिंग” करने की योजना रची. लेकिन जैसा कई बार हास्य फिल्मों में हो जाता है, एक आदमी जब कुछ देना चाह रहा होता है, दूसरा लेने को तैयार नहीं होता और फिर पहले वाले को ही मिन्नतें करनी पड़ती हैं. यहाँ भी यही हुआ. लगता है जब तक सुधीन्द्र की टीम सक्रीय हुई थी तब तक कॉंग्रेस पार्टी का पेट पूरी तरह भर गया था और अब उन्हें अधिक सांसद पचाने की जरूरत ही नहीं थी.

सम्राट अमर सिंह भी अपने काम को अंजाम दे कर आश्वस्त भाव से आराम फरमा रहे थे. ऐसे में भाजपा के ये तीन सांसद किसी तरह कुंवर रेवती रमण सिंह को जबरदस्ती पकड़ कर उनके गले लग लिए और किसी भी तरह स्टिंग के लिए व्याकुल स्थिति में अमर सिंह के घर लगभग बिन-बुलाये पहुँच गए. अब पहुँच ही गए तो लगे हाथ अमर सिंह ने भी बोनस के तौर पर कुछ बचा-खुचा दे दिया.

आखिर इससे नुक्सान क्या था- सरकार को थोड़ी और सुरक्षा मिलती, उनकी कुछ और वाह-वाही होती. उन्हें क्या मालूम था कि जो असली खेल उन्होंने कॉंग्रेस के बड़े नेताओं (जिसमे विशेषकर अहमद पटेल का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है) के साथ मिल कर खेल लिया था उसमे तो वे साफ़ बच जायेंगे और यह बिन बुलाये मेहमान उनके गले की फांस बन जायेंगे. सच कहते हैं कि हाथी का निकलना आसान है, असली दिक्कत तो उसकी पूँछ के निकलने में होती है. इस बार अमर सिंह हाथी के पूछ में अटक गए, बाकी सब तो बड़ी आसानी से निपट गया था. शायद यह प्रकृति का नैसर्गिक न्याय भी है.

लेकिन जो असल बात मुझे भारी कष्ट देती है वह यह कि इस पूरे मामले में राजदीप सरदेसाई जैसे आदमी को पहले अमर सिंह और फिर सुधीन्द्र कुलकर्णी आदि को बचाने के लिए असत्य का साथ क्यों लेना पड़ा अथवा अपने एक पत्रकार को झूठा वक्तव्य देने के लिए क्यों मजबूर करना पड़ा? अपने देश में कुछ ही तो स्तंभ बचे-खुचे बताए जाते हैं जिनके लिए पत्रकारिता एक मिशन या एक सफ़ेद कारोबार के रूप में रह गया बताया जाता है. तहलका की इस स्टोरी को पढ़ने के बाद यह जान कर कि उन्होंने अपने एक युवा पत्रकार को गलतबयानी करने को कहा अथवा कई सारे महत्वपूर्ण साक्ष्य जैसे सांसद अशोक अर्गल के घर से अमर सिंह के घर जाने वाला वीडियो टेप तथा सुधीन्द्र कुलकर्णी को दिखाने वाला वीडियो टेप जानबूझ कर नहीं दिखाया ताकि इन लोगों की मदद हो, राजदीप सरदेसाई के प्रति मन में बैठे विश्वास को गहरा धक्का लगा.

पर यह भी अच्छा लगा कि तहलका की स्टोरी के लिखे जाने के करीब पांच महीने बाद दिल्ली पुलिस की विवेचना में लगभग वही सारे तथ्य आ रहे हैं जो आशीष खेतान ने अपने अकेले दम दुनिया के सामने रख दिया था. इसके साथ यह बात भी काबिलेतारीफ है कि तहलका ने आम भारतीय पत्रकारिता के चलन से हट कर जनता और सत्य के प्रति अपनी पहली प्राथमिकता दिखाते हुए अपने एक साथी चैनल की कमियों को भी उजागर करने में कोई हिचक नहीं दिखाई. यह नीति और यह नियम शेष मीडिया जगत को भी अपनाना चाहिए क्योंकि मीडिया की पहली जिम्मेदारी सच्चाई के प्रति है, ना कि अपने साथी मीडिया जगत के प्रति.

अंतिम बात यह कि इस पूरी कहनी से यह तो दिखता है कि भारतीय जनता पार्टी के बड़े लोगों द्वारा यह स्टिंग रचा गया था पर चूँकि अंत में जब अमर सिंह ने पैसा दे ही दिया तो उन तीनों भाजपा सांसदों, सुधीन्द्र कुलकर्णी आदि की कोई ऐसी गलत जिम्मेदारी मेरी समझ में नहीं आती क्योंकि उनका मुख्य उद्देश्य कॉंग्रेस सरकार को बदनाम करना तो था क्योंकि यह बात गलियों-कूचों तक पहुँच गयी थी कि इस समय सांसद महंगे बिक रहे हैं पर उनका उद्देश्य इस बहती गंगा में पैसे के रूप में कमाई करना तो नहीं ही था. फिर जैसा लाल कृष्ण आडवानी ने संसद में कहा, जब यह सारा उपक्रम उनके निर्देश और निर्देशन में हुआ तो घटना के सूत्रधार सुधीन्द्र कुलकर्णी हुए अथवा स्वयं आडवाणी और अरुण जेटली? यह प्रश्न भी अपने आप में विचारणीय होगा.

पीपल’स फोरम की संपादक डॉ नूतन ठाकुर का विश्लेषण

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0 Comments

  1. siddharth trivedi

    September 28, 2011 at 8:47 pm

    हा नूतन जी !तहलका को खोजी पत्रकारिता के लिए ढेर सारा साधुवाद.
    पर मेरी समझ एक जगह मात खा जाती है…की तहलका वालो को ….
    कश्मीर विष्ठापितों के नरसंहार , बलात निष्कासन ,तुस्टीकरण की ओझी राजनीति करने वालो ,वन्दे मातरम् का विरोध, भारत माता के नाम पर साम्प्रदायिकता
    अपराधी महिला साध्वी प्रज्ञा (अभी आरोप साबित नही किये जा सके है)……..के मानव अधिकार हनन , लव- जेहाद सोनिया गाँधी & कंपनी के रहस्यमय अतीत उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरूपो ,गुजरात में ट्रेन की बोगी में गोधरा में मारे गये ५८ हिन्दुओ पर आदि तमाम मुद्दों पर मोतियाबिंद क्यों हो जाता है..या किसी ने मना कर रखा है इन पर लिखने से ..अगर ऐसा है तो..वैरी शमेफुल्ल जौर्नालिस्म ..
    तहलका की एक बहादुर महिला पत्रकार ने पिंक चड्ढी अभियान चलाया था ………..क्या भारत माता विरोधियों को ,संविधान विरोधियों को, अलगाव वादियों को ,आतंकियों को ,पिंक चड्ढी भेजने की हिम्मत है उनमे…??
    नहीं है..बंद कीजिये ये एकतरफा राग …!!
    ये पब्लिक है…सब जानती है…!!

  2. prashant

    September 29, 2011 at 3:05 am

    rajdeep sardesai ne cd kyon dabai, iski bhi jaanch hona chahiye, aur cbi ne is samay amar ko chhod kar sabko galat hi jel bhijwaya hai.

  3. Digvijay chaturvedi

    September 30, 2011 at 8:24 am

    या तो पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं आप या सच को समझने में नाकाम….हां राजदीप की फितरत ही ऐसी है….इसमें कोइ शक नही….

  4. ..Indian..

    October 2, 2011 at 8:40 am

    Dr. Nutan jee , you are not more than a Congress’ worker. Your this analysis is totally biased and immature perception.
    See CNN-IBN , very carefully, You will found that Rajdeep Sardesai is not more than a Congress’ spokesperson (like you), who always broadcast news in favor of Congress party . CNN-IBN (like you) always use diplomatic words in favor of Congress party . Despite of knowing this fact, BJP call Rajdeep ? How ridiculous ?
    You or Rajdeep Sardesai is not more than a Congress’ people, so- do not cry foul . Do not try to become a mirror image of Rajdeep Sardesai. You think that Cash-for-Vote scandal is planned by BJP, even BJP leaders were aware that Congress has sufficient seats ? High profile leaders are not so foolish as you are.
    Be mature madam !

  5. dinesh joshi

    October 2, 2011 at 8:58 am

    rajdeep or ashutosh to akdam choor log hai…jinhone patrikarita ke sabhi mandnndo ko toda hai… or bade pak saf banne ki koshish karte hai…in choro se indian medi bach jayee to achchha hee hoga…dorsoo kee feed chori kar us par gurrana inki hastar hai….

  6. rajeev tomer

    October 2, 2011 at 7:05 pm

    cnn ibn ka kafi naam hai,lakin rajdeep or ashutosh dono hi ab journalism k star ko girana ka kaam kar rahe hai. ye channel netural nahi hai pakshpati ho gaya hai

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