तो ये है पत्रकारिता में टैलेंट संकट का राज!

शेष नारायण सिंहदूरदर्शन में भर्ती किये गए 25 पत्रकारों को नौकरी देने में पक्षपात के सबूत मिलने के बाद केंद्रीय प्रशासनिक पंचाट ने उनकी नौकरी रद्द कर दी है. जिन लोगों की नौकरी ख़त्म हुई है उसमें दिल्ली की एक कांग्रेसी नेता की बेटी भी है. यह नेता जी आजकल केंद्र सरकार में मंत्री हैं. चलता किए गए लोगों में एक अन्य मंत्री के रिश्तेदार भी हैं.

इसके अलावा हटाये गए 25 लोगों में और भी कई लोग ऐसे हैं जिनकी मेरिट की परवाह किये बिना उनकी सिफारिश को प्राथमिकता दी गयी है. सरकार में टाप परे बैठे लोग इस तरह के काम करते रहते हैं और आमतौर पर पकड़े नहीं जाते. पिछले 40 वर्षों में कांग्रेस ने इस तरह की बहुत सारी नौकरियों में अपने लोगों को बैठाया है. आरएसएस की राजनीतिक शाखा के लोग जब विपक्ष में रहते थे तो इस मुद्दे पर खूब आवाज़ उठाते थे और लगता था कि जब यह लोग सत्ता में आ जायेंगे तो हालात बदलेंगे. लेकिन कुछ नहीं हुआ. बीजेपी वाले जब सरकार में आये तो उन्होंने भ्रष्टाचार और बेईमानी के जो रिकार्ड बनाए उसके सामने कांग्रेसी बेचारे शर्म से पानी पानी हो गए.

मुराद यह है कि सत्ता पाने पर नेता भ्रष्ट होता ही है वह चाहे जिस पार्टी का हो. हालांकि केंद्रीय प्रशासनिक पंचाट के नए आदेश के बाद कुछ ख़ास बदलने वाला नहीं है लेकिन पत्रकारिता की नौकरी में भर्ती के क्षेत्र में चल रही हेराफेरी पर एक नज़र डालने का मौक़ा ज़रूर मिलता है. पिछले कई वर्षों में देखा गया है कि जब भी पत्रकारिता के वर्तमान स्वरुप पर बहस चलती है तो इस विधा के नए पुरोधा अजीबोगरीब बातें करते पाए जाते हैं. कहीं बाज़ार की बात होती है तो कहीं पत्रकारिता के नए व्याकरण के आविष्कार की बातें होती हैं. कुछ लोग अपने को पिछली सदी के महान पत्रकारों के बराबर या उनसे बड़े बताकर पेश करते हैं. ज़ाहिर है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और जिसके मन में जो आये वह उसे बोलने के लिए स्वतंत्र है.

यह अलग बात है कि इस तरह की बम्बास्टिक बातों को सूचना क्रान्ति के इस दौर में मजाक के विषय के रूप में ही देखा जाता है. ऐसा इसलिए कि वेब पत्रकारिता के दुनिया में आज के समय से सबसे ज़्यादा कुशाग्रबुद्धि पत्रकार काम कर रहे हैं और कम से कम साधनों के बल पर साहूकारों के नियंत्रण वाले मीडिया की कृपा से अगर कोई झूठ पब्लिक डोमेन में आ रहा है तो उसे डंके की चोट पर गलत साबित कर रहे हैं.

इस बात पर भी कभी बहस की जायेगी कि देश के कई नामी गिरामी मीडिया कम्पनियां इतने बेहतरीन पत्रकारों को साथ रखने में क्यों नाकाम रही. हो सकता है कि टाप पर बैठे लोगों की असुरक्षा के चलते इन लोगों को साजिश का शिकार होना पड़ा हो. बहरहाल इस पर फिर कभी. आज तो बस इतना ही कि प्रतिदिन गिर रहे पत्रकारिता के स्तर के पीछे क्या है.

दूरदर्शन में हुई भर्ती के इस घोटाले ने पत्रकारिता की गुणवता को बहस के दायरे में डाल दिया है. यहाँ यह कहना तो कतई उद्देश्य नहीं है कि मंत्रियों के रिश्तेदारों में कोई योग्यता नहीं होती. बहुत सारे नेताओं के करीबी लोग हर क्षेत्र में अच्छा काम कर रहे हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में भी मंत्रियों और नेताओं के घर वालों ने बुलंदियां हासिल की हैं.

बीजेपी के सर्वोच्च नेता की बेटी ने ही टीवी पत्रकारिता के क्षेत्र में बिना किसी राजनीतिक सिफारिश का लाभ उठाये बुलंदियां हासिल की हैं. लेकिन दूरदर्शन के जिन 25 लोगों को चलता किया गया हैं उनमें कम से कम एक के केस में सौ फीसदी हेराफेरी हुई है. और यह हेराफेरी एक कांग्रेसी मंत्री की बेटी के लिए की गई है. दूरदर्शन एक सरकारी संगठन है इसलिए उसकी हेराफेरी का पता चल गया. लेकिन पत्रकारिता के बाकी सभी संगठन निजी प्रबंध में हैं. वहां इस तरह की व्यवस्था नहीं है. इसलिए उनकी गुणवत्ता को सुनिश्चित करने का ज़िम्मा पूरी तरह वहां के वरिष्ठों और मालिकों पर होता है.

देश के एक अति लोकप्रिय चैनल में शुरू में यह व्यवस्था देखी गयी थी. पति-पत्नी की टीम इस संगठन को चलाती थी और जहां कहीं भी प्रतिभाशाली लोग मिले, उनको अपने साथ लगा लेती थी. नतीजा यह हुआ कि उसकी गुणवत्ता का उदाहरण दिया जाने लगा. लेकिन बीच में कहीं डोर हाथ से छूट गयी और अब वहां भी वह बात नहीं है. इसी तरह एक मीडिया हाउस जब शुरू हुआ तो देश के बड़े से बड़े पत्रकार उसमें बुलाये गए लेकिन मालिकों के ख़ास लोगों के गैर ज़रूरी हस्तक्षेप की वजह से सब चले गए और आज वह संगठन देश के सबसे कम टैलेंट वाले संगठन के रूप में पहचाना जाता है.

असली मुसीबत यह है कि मालिकों और वरिष्ठ पत्रकारों को यह मुगालता हो जाता है कि जिसकी पीठ पर वे हाथ रख देंगे वह पत्रकार हो जाये़या. इसी के चलते वे चेले-चपाटियों को महत्व देने लगते हैं और आज पत्रकारिता जिस मुसीबत की शिकार है, उसका मुख्य कारण यही है. ज़रूरी है कि पत्रकारिता में चारों तरफ व्याप्त इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जाए वरना रोज़ ही पीपली लाइव जैसे हालात होते रहेंगे.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

Comments on “तो ये है पत्रकारिता में टैलेंट संकट का राज!

  • patkarita kisi ke liyedwaar hai to kisi ke liye ivaar, aaj patkarita ek state simbal ban gai hai jise dekho bahi is baat ka anusarad kar patkarita jagat me ghuspaith bana raha hai, ajadi ke samay patkarita bhale hi ek mission hua karti thi per aaj sudh roop me byabsaye ban gai hai or ise bane bale hum or aap hai hai , aaj malik se lekar mafiya tak yahi chahta hai ke adhik e adhek paisa mile , akhbar malik bhi yahi chata hai ki uska akhbar bencho ab chahe bo apradhi ho ya anadi akhbar ki agency dekar patkaar ek kard thama diya , karo patkarita ki aad me kamai yogita anubhav gya tel lene A

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  • Isiliye To Rajput Sampadak ko lagata hai ki sirf Rajput hi patrakar ban sakta hai. Isi prakar brahman Sampadak ko lagata hai ki sirf Brahman hi patrakar ban sakta hai. aur kayastha Sampadak ko lagata hai ki sirf kayasth hi achha patrakar ban sakta hai.

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  • जयहिंद शेष जी…,
    यदि नेताओं के नाम लिखने में डर लगता है तो इस तरह आधा-अधूरी जानकारी देतें ही क्यों हैं? चलो मंत्री कि बेटी का नहीं तो कम से कम बाहर किये गए 25 लोगों कि पूरी सूची ही बता देते. हमारे जैसे लोग जो दिल्ली से बहुत दूर हैं समझ सकते कि आपके यहाँ किस स्तर पर कैसी सिफारिश काम कर रही है.

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  • शेष नारायण सिंह says:

    सत्यम जी ,जयहिंद.

    क्या मेरे लिखे से ही सारी खबरें पकड़ लेना चाहते हो. कोई अखबार उठाकर देख लो, मंत्री का नाम मिल जाएगा. बाकी २५ बच्चों का नाम मुझे नहीं मालूम. और ज़रा फर्क समझ मेरे भाई . मैंने खबर नहीं लिखी है . मैंने एक खबर जो उसी दिन अखबारों में छपी थी उसके हवाले से एक कमेन्ट किया है . और डर का तो तुम जानते ही हो अगर मेरे जयहिंद साथी हो . मैं किसी से नहीं डरता. इसकी गवाही अगर ज़रुरत पड़ी तो तुम भी दे सकते हो .

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