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विनोद शुक्ला और घनश्याम पंकज जैसों के पापों को पत्रकारों की कई पीढियां भुगतेंगी

दयानंद पांडेय: ऐसे लोग सूर्य प्रताप जैसे जुझारू पत्रकारों को दलाली में पारंगत करते रहेंगे : और अब तो प्रणव राय जैसे लोग भी बरखा दत्त पैदा करने ही लगे हैं : पहले संपादक नामक संस्था के समाप्त होने का रोना रोते थे, आइए अब पत्रकारिता के ही खत्म हो जाने पर विधवा विलाप करें : आंखें भर आई हैं सूर्य प्रताप उर्फ जय प्रकाश शाही जी की तकलीफों को याद कर, उनको नमन :

दयानंद पांडेय: ऐसे लोग सूर्य प्रताप जैसे जुझारू पत्रकारों को दलाली में पारंगत करते रहेंगे : और अब तो प्रणव राय जैसे लोग भी बरखा दत्त पैदा करने ही लगे हैं : पहले संपादक नामक संस्था के समाप्त होने का रोना रोते थे, आइए अब पत्रकारिता के ही खत्म हो जाने पर विधवा विलाप करें : आंखें भर आई हैं सूर्य प्रताप उर्फ जय प्रकाश शाही जी की तकलीफों को याद कर, उनको नमन :

अमिताभ जी, आप को बहुत धन्यवाद कि आप ने हारमोनियम के हज़ार टुकड़े पढा और लिखा भी. मैं बाहर गया था. दस बारह दिनों के लिए. अभी लौटा हूं तो आपकी टिप्पणी पढी. आप असली पात्रों को जानना चाहते हैं. यह तो लेखक का व्यक्तिगत होता है. बहुत ही व्यक्तिगत. लेकिन आपने कुछ नामों पर अटकल लगाई है. और साफ़ पू्छा है कि हारमोनियम के सूर्य प्रताप कौन है? और कि कुछ और नामों पर अटकल लगाई है. कुछ अटकलें बहुत ही भ्रमित करने वाली हैं. और कि चूंकि इन पात्रों के बारे में बहुतायत लोग जानते ही हैं. इसलिए भी कि मैं पात्र को बहुत घुमा फिरा कर संकेतों में लिखने का आदी नहीं हूं तो खुलासा कर ही दूं कि मेहता तो आउटलुक के विनोद मेहता हैं. लखनऊ के रहने वाले वही हैं. आलोक मेहता नहीं. हां आलोक मेहता की ससुराल ज़रूर है लखनऊ में.

भैया विनोद शुक्ला हैं. मनमोहन कमल घनश्याम पंकज हैं. अब यह दोनों दिवंगत हैं. तो इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं है कि इनके पापों पर पानी डाल दिया जाय. सच तो यह है कि हिंदी पत्रकारिता के नाम पर यह दोनों नाम दाग हैं.. जैसे हिरोशिमा परमाणु बम की त्रासदी से अभी तक उबरा नहीं है, यूनियन कार्बाइड के संत्रास से भोपाल अभी उबरा नहीं है, पीढियां भुगत रही हैं, ठीक वैसे ही विनोद शुक्ला और घनश्याम पंकज जैसों के पापों को पत्रकारों की कई पीढिया भुगतेंगी और कराहेंगी. ये लोग सूर्य प्रताप जैसे जुझारू पत्रकारों को दलाली में पारंगत करते रहेंगे. तो कोई भी क्या कर लेगा? और अब तो प्रणव राय जैसे लोग भी बरखा दत्त पैदा करने ही लगे हैं. सोचिए कि क्या नाम है और क्या काम है? बात तो अब बहुत आगे जा चुकी है.

कुछ समय पहले तक हम लोग यह रोना रोते थे कि संपादक नाम की संस्था समाप्त हो गई है. अब समय आ गया है कि हम यह विलाप भी शुरू कर दें कि अब पत्रकारिता किसी बीते युग की बात हो गई है. अब तो शो-बाज़ी है, दलाली है, भडुआगिरी है. ऐसे सारे पर्यायवाची जोडते जाएं, पर पत्रकारिता का यह विधवा विलाप हरगिज़-हरगिज़ खत्म नहीं होगा. कोई रूदाली भी आ जाए तो भी इसका रोना खत्म नहीं होने वाला. हां, देखिए इस यातना विलाप में आपका सवाल जवाबना भूल ही गया. हारमोनियम के सूर्य प्रताप कोई और नहीं हमारे जय प्रकाश शाही जी हैं. दिवंगत होने के बावजूद हमारे दिलों में धड़कते हैं, खनकते हैं. उनके सीने में दफ़न हारमोनियम के टुकडे हमारे सीने में अभी तक चुभते हैं. सालती है उनकी तकलीफ, उनकी अनुपस्थिति.

संयोग देखिए कि जय प्रकाश शाही जी का गांव और मेरा गांव पास-पास ही है. पत्रकारिता में हम उनकी ही उंगली पकड़े खेलते-खालते आ गए. जनसत्ता में भी हम साथ-साथ आए. भले वह लखनऊ में और मैं दिल्ली में. लखनऊ जब मैं स्वतंत्र भारत ज्वाइन करने आया तो उन्हें बता कर नहीं आया. सरप्राइज़ देना चाहता था उन्हें. पर यह देखिए कि सरप्राइज़ तो मुझे वह दे बैठे. मैं जब स्वतंत्र भारत कार्यालय पहुंचा सुबह-सुबह तो हमारे शाही जी मेरे लिए बाहें फैलाए वहां पहले ही से खड़े मिले, मेरे स्वागत में.धधा कर मिले औए मुझे बाहों में भर लिया. मैंने छूटते ही पूछा, ‘तूंहे कइसे पता चलल?’ तो वह बोले, ‘तूं नाईं बतइब त पता नाईं चली?’ तब न मोबाइल था, न इंटरनेट. न भड़ास. ऐसी खबरें पता चलते-चलते चलती थीं. और फिर मेरा लखनऊ आना मुझे पता था और संपादक वीरेंद्र सिंह जी को. बस. पर शाही जी जाने कैसे पता पा गए. खैर.

तो मैं संयोग की बात कर रहा था. हमारे गांव आस-पास. पत्रकारिता में साथ-साथ. जनसत्ता में साथ-साथ. टेस्ट, इंटरव्यू हमने उनके साथ ही दिया था. खैर जब लखनऊ आए तो फिर एक संयोग बना कि हम रहने भी अगल-बगल लगे. डालीबाग में. और एक दुर्निवार संयोग भी देखिए कि १८ फ़रवरी, १९९८ को हुई दुर्घटना में उनका दुर्भाग्यपूर्ण निधन भी जब हुआ तब उस कार में भी हम लोग अगल-बगल ही बैठे थे. मुलायम सिंह यादव तब रक्षा मंत्री थे. संभल से चुनाव लड़ रहे थे. हम लोग उनकी कवरेज में जा रहे थे. १३ साल हो गए. खैर, यह यातना मेरी व्यक्तिगत यातना है जिसे आज आपके साथ साझा कर बैठा. शाही जी और उनके उस सूर्य प्रताप को नमन. जाने उनके साथ की कितनी सारी यादें हैं, जो कभी फिर-फिर साझा करेंगे. आज तो अमिताभ जी बस इतना ही. सूर्य प्रताप के बहाने आज आपने बहुत कुछ याद दिला दिया है. आंखें भर आईं हैं उनकी तकलीफों को याद कर, सहेज कर, अभी तो बस शाही जी को नमन!

लेखक दयानंद पांडेय जाने-माने साहित्यकार और पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. दयानंद के लिखे अब तक के सभी उपन्यासों और लेखों को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें…

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0 Comments

  1. RAJU

    February 15, 2011 at 7:09 am

    दयानंद जी आप आदरणीय विनोद शुक्ल को अगर दलाल कहते है तो निश्चित रूप से आप निकृष्ट व्यक्ति है. हमने खुद आपको उनके और घनश्याम पंकज के तलवे चाटते देखा है. आपके चरित्र के बारे मे और खुलासा नहीं करूंगा नहीं तो आपकी नेकर भी उतर जाएगी. किसी पर इल्जाम लगाने के पहले अपना दमन जरूर देख लेना चाहिए.

  2. दयानंद पांडेय

    February 15, 2011 at 8:31 am

    राजू जी, आप की टिप्पणी बहुत शर्मनाक है. आअप के विनोद शुक्ला से भावनात्मक संबंध हैं, यह मैं जानता हूं. आप ने जो लिखा है वैसा मैं ने विनोद शुक्ला के लिए दलाल शब्द लिखा भी नहीं है. आप खुद ही लिख रहे हैं तो मैं क्या कोई भी कुछ नहीं कर सकता. पर अपनी आंखों का मोतियाबिंद उतारिए. विनोद शुक्ला या घनश्याम पंकज जैसे लोग क्या थे और क्या कर गए हैं यह मैं ही क्या बहुत सारे लोग जानते हैं. अंजुम रहबर का एक शेर है, ‘ आइने पर इल्ज़ाम लगाना फ़िज़ूल है, सच मान लीजिए चेहरे पर धूल है.’ और हां, जैसा कि आप ने लिखा है कि आप ने विनोद शुक्ला और घनश्याम पंकज जैसों के तलवे चाटते मुझे देखा है तो कृपया एक भी दृश्टांत आप दे सके तो मुझे भी आइना देखने का मौका मिलेगा. प्लीज़ आप ज़रूर दीजिए. और हां कि मेरे नेकर भी ज़रूर उतारिए. आप का स्वागत है! पता तो चले कि मैं अपने हमाम में जैसा हूं , वैसा हूं पर आप के हमाम में कैसा हूं? यह जानना मेरे लिए भी दिलचस्प होगा. यहां तो खुली किताब हूं. न कभी दलाली भडुवई की न ऐसा करने वालों को पसंद किया. बेरोजगारी भले भोगी, मुकदमे ज़रूर भुगते, अपमानित भी कदम-कदम पर हुआ. पर घुटने तो अभी तक नहीं टेके. न ही दलाली भडुवई की नौबत आने दी. फिर भी आप ने ज़रूर कुछ पाया देखा होगा कि मेरे चरित्र और नेकर उतारने की बात पर आ गए. आप का तहे दिल से स्वागत है ! आमीन !

  3. iftidabhatti

    February 15, 2011 at 10:40 am

    पाण्डेय जी आदाब, आपके द्वारा लिखी किताब पढी अच्छी लगी
    इस तरह की किताबे अगर समय पर आए तो उनका कुछ फायदा भी उन नए लोगों को मिलता जो पत्रकार बनने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते है लेकिन अफसोस की आपकी किताब कुछ देर नहीं बल्कि बहुत देर से आयी। अब इस किताब को पढ़कर नये लोगों को तो कुछ सीखने को नहीं मिलेगा लेकिन पुराने लोग ठहाके जरूर लगायेंगे।
    वैसे आज यूपी में पचास फीसदी ऐसे पत्रकार हैं जो किसी न किसी रूप में इन्हीं दो विभूतियों की देन हैं।जबकि आप विचार करें कि आपके पदचिन्हों पर कितने लोग आज चल रहे है। किसी के न रहने पर उसके बारे में कहना बहुत आसान है लेकिन मजा तो तब है जब उन्हीं के पदचिन्हों पर चलने वाले कुछ पत्रकारों के बारे में उनके जीतेजी ही आप कोई किताब लिखें। हालांकि इसके लिए हौसला और हिम्मत चाहिए।
    और आपको सलाह है कि –
    दूसरों की बुराई जब किया कीजिए,
    इल्तिजा है आईना सामने रख लिया कीजिए।

  4. S.K.Singh

    February 15, 2011 at 2:40 pm

    Sir mai to bahut dino tak Shri jay prakash shahi ji ke sath nahi raha per gorakhpur me mai unke sath kuchh mahine kam kiya hu.unse aapke bare me aksar suna karta tha meri bhi aankhe bhar aayi .un jaise sahasi logo ki jarurat hai hum jaise yuva patrakaro ko bal dene ke liye kash kabhi apka aashirvad mil pata.

  5. दयानंद पांडेय

    February 16, 2011 at 2:26 am

    जनाब iftidabhatti जी, खुमार साहब का यह शेर जैसा आप ने लिखा है वैसे नहीं ऐसे है;’ जब किसी पर तपसरा कीजिए, सामने आईना रख लिया कीजिए.’ और आप को बताऊं कि मैं किसी पर अमूमन तपसरा करता नहीं हूं. और जो कभी विवशता में करना ही पडता है तो सामने आईना ज़रूर रख लेता हूं. जैसा कि खुमार साहब ने तज़बीज़ किया है. हर किसी को करना चाहिए.

  6. अधूरा पत्रकार

    February 21, 2011 at 11:39 am

    दयानंद जी से मेरा परिचय नहीं है लेकिन राजू जी और विनोद शुक्ला जी को मैं जानता हूं, मेरे पत्रकारिता में शुरुआती दिन था। सचमुच वहां का माहौल देखकर ही मैंने पत्रकारिता को छोड़ने का फैसला कर लिया । इन जैसे लोगों को मैं साधुवाद देता हूं जिनके चलते मैं इस दलदल में फंसने से बच गया।

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