खतरनाक खेल खेल रहे अखबार : हरिवंश

हरिवंशहमारा हीरो : हरिवंश (प्रधान संपादक, प्रभात खबर) : भाग-2 : मीडिया ने लोगों का विश्वास अब खो दिया है : मीडिया में गैर-जिम्मेदारी बहुत बढ़ गई है :  लोग समझ गए हैं कि खबरे खरीदी-बेची जाती हैं : ताकतवर हो चुके मीडिया पर नियंत्रण की कोई बॉडी नहीं हैं : ऐसा पोलिटिकल सिस्टम कमजोर होने से हुआ : मीडिया से ज्यादा ब्लैकमेलर पालिटिक्स हो गई है : जिस दिन राजनीति में विचार अहम होंगे, मीडिया भी रास्ते पर आ जाएगा : प्रभात खबर टिका हुआ है तो सिर्फ अपनी साख के दम पर : आज जब आस-पास देखते हैं तो हम सोच नहीं पाते कि किससे प्रेरणा लें : मैं वह व्यवस्था अवश्य देखना चाहता हूं, जिसमें इक्वल डिस्ट्रीब्यूशन हो : हम मशीन की तरह चल रहे हैं और मशीन की तरह खत्म हो रहे हैं

हरिवंश


-पटना संस्करण के बारे में बताइए? आप लोगों ने यहां प्रभात खबर री-लांच किया है। कैसा रिस्पांस है? कंटेंट के लेवल पर किस तरह के प्रयोग किए हैं?

–पटना एडीशन हमने लांच किया 1996 में। उम्मीद थी कि इसके लिए हम थोड़ी-बहुत पूंजी प्रबंधन और बैंक से लोन के रूप में ले आएंगे और अखबार को कंटेंट के लेवल पर बेहतर बना लेंगे, लेकिन हम ऐसा नहीं कर सके। तब तक हिंदुस्तान आ गया झारखंड में। झारखंड हमारा गढ़ है। हम लोग उसको बचाने में लगे रह गए। इस बीच पटना में हमारी एक मामूली उपस्थिति बनी। फरवरी 09 में हम लोगों ने पटना संस्करण को री-लांच किया। पटना में हम लोग हिंदुस्तान और दैनिक जागरण से मुकाबला नहीं कर रहे। हम उनकी पूंजी के सामने कहीं नहीं ठहरते। हमने प्रभात खबर को एक डिफरेंट बेस पर खड़ा किया। बीस पेज का अखबार, सप्ताह में तीन सप्लीमेंट, और उसका कंटेंट बिल्कुल अलग। कंटेंट के लेवल पर हम अनेक स्टोरी ब्रेक करते हैं। दूसरे लोग उसे फॉलो करते हैं।

उदाहरण के तौर पर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा क्यों मिले, इस पर हम कैंपेन चला रहे हैं। ये कैंपेन तथ्यों पर आधारित है। शायद यह पहली बार हो रहा है कि बिहार के साथ क्या भेदभाव हो रहा है, यह हकीकत एक अखबार सामने ला रहा है और बाकी सब इसका फॉलोअप कर रहे हैं। बिहार पहले एक बीमार राज्य के रूप में जाना जाता था। आज बहुत बदल रहा है। बदलने के संकेत क्या हैं, इस पर पहली रिपोर्टिंग हमने कराई। जितनी मोबाइल कंपनियां हैं, इनकी बिहार में प्रत्येक महीने की बिलिंग क्या होती है? जानकर आश्चर्य होगा कि 300 करोड़ रुपये की बिलिंग प्रत्येक महीने यहां से होती है। जहां पर लगभग 3600 करोड़ रुपये सिर्फ टेलीफोन कंपनियों के बिल भुगतान होते हों, आप समझ सकते हैं कि वह राज्य कैसे करवट ले रहा है। यह खबर हम लोगों ने छापी। बडे़ अखबारों ने इसे पेड विज्ञापन के रूप में छापना शुरू किया। इस तरह से एक इंपैक्टफुल अखबार बनाने की कोशिश की गई। हमने अपने अखबार का प्रोफाइल ही बिलकुल अलग कर दिया। जैसा कि आजकल आप देख रहे हैं, लोकलाइजेशन के नाम पर छह-छह पेज छापे जा रहे हैं। इसमें ऐसी भी खबरें होती हैं, जिनका कुछ प्रयोजन नहीं होता। हम दो या तीन पेज ही लोकल खबरें देते हैं। हमें इसमें प्रतियोगिता करनी ही नहीं। बाकी क्या बढ़ाया? इंटरनेशनल, गवर्नेस, विकास और अवसर से जुड़ी खबरें, एजेंडा के नाम से एक पेज। ये नए प्रयोग हमने शुरू किए।

हरिवंशतीन महीने में ही सर्कुलेशन दोगुना हो गया और पटना शहर में तीन गुना। हालांकि, यह बडे़ अखबारों के मुकाबले काफी कम है, लेकिन यह हमारी एक अच्छी कामयाबी है कि तीन महीने में हम एक इंपैक्टफुल अखबार निकाल पा रहे हैं। कोलकाता एडीशन हमने 2000 में शुरू किया। अब प्रभात खबर सात जगहों से छप रहा है- रांची, जमशेदपुर, धनबाद, देवघर, पटना, कलकत्ता और सिलीगुड़ी से। आज हमारा पटना एडीशन दूसरे नंबर का अखबार है।

-चुनाव में आप लोगों ने स्टैंड लिया कि खबरों का सौदा नहीं करेंगे। पर कई बड़े अखबारों ने खबरों का धंधा जमकर किया। मीडिया में ब्लैक मनी खूब आ रही है। प्रचुर पूंजी व बाजार के दबाव से मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी शिथिल हुई है। इस हालत में आप हिंदी पत्रकारिता का भविष्य क्या देखते हैं?

–यशवंत जी, दो चीजें मैं कहना चाहूंगा। एक अपने अनुभव के आधार पर। जैसे प्रभात खबर की एक सबसे बड़ी और गंभीर समस्या आप पूछें तो वह है पूंजी की कमी। पर पूंजी के लिए हम लोग अपने मानदंडों कभी किनारे नहीं रखते। प्रभात खबर के बारे में कोई नीति बनानी होती है तो हम सात-आठ प्रमुख लोग मिल-बैठते हैं, आपस में डिस्कस करते हैं। इसी तरह से हमने हाल के लोकसभा चुनाव में तय किया कि हमें क्या करना है और क्या नहीं करना है। एक-एक चीज तय कर हमने पहले ही अखबार में इसकी घोषणा कर दी और उसको पूरे चुनाव तक निभाया। हमें इस बारे में किसी पाठक का पत्र मिला तो उसे भी छापा। कोई शिकायत मिली, उसे भी अटेंड किया। हमारे थोडा-सा अच्छा कर देने से मीडिया की साख बढ़ी। हम मानते हैं कि प्रभात खबर इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी अगर टिका हुआ है तो अपनी इसी साख के बल पर। अगर हम भी सौदेबाजी करते तो वह अपनी ही साख से खेलना होता। अगर साख खत्म हो जाती तो प्रभात खबर नहीं टिकता। आज देश के दो ताकतवर अखबारों हिंदुस्तान और दैनिक जागरण के मुकाबले बीस महीने तक टिके रहने की हमें उम्मीद नहीं थी। सभी विशेषज्ञ भी प्रभात खबर के अस्त हो जाने के बारे में लिख चुके थे। राजस्थान में दो दिग्गज हैं, राजस्थान पत्रिका और भास्कर। सिर्फ बिहार और झारखंड में ही दो दिग्गजों के बीच एक छोटा अखबार संघर्ष कर रहा है। इसलिए हमें लगा कि अपनी विश्वसनीयता से सौदेबाजी करेंगे तो हम समाप्त हो जाएंगे। प्रभात खबर की पत्रकारिता ही नैतिक आग्रह से संचालित है।

हरिवंशसबसे बड़ी गड़बड़ी हुई है मीडिया के अंदर। अखबार बड़ा खतरनाक खेल खेल रहे हैं। इससे मीडिया लोगों में अपनी साख खो रहा है। जितने सर्वे हो रहे हैं, उनमें लोग कह रहे हैं कि पुलिस, प्रशासन, नेता, मीडिया एक हो चुके हैं। लोग कहते हैं कि अब पुलिस से डर लगता है, मीडिया से भी। ये हालात हैं। दूसरा खतरनाक खेल। इन अखबारों ने अपने संवाददाताओं, अपने लोगों को फोर्स कर बिजनेस में खड़ा कर दिया है। कल को वे दूसरी खबरों पर बिजनेस नहीं करेंगे, इसकी क्या गारंटी है? जब कोई संवाददाता एक नेता से डील करते हुए कहता है कि आप इतने का पैकेज दीजिए, हम आपका इंटरव्यू, आपके समर्थन की खबरें छापेंगे, तो वह पैसे वालों की ही खबरों को प्रमुखता नहीं देगा, ये आप कैसे इन्श्योर करेंगे? ये आप कर नहीं सकते। कोई मैकेनिज्म नहीं है इस वक्त। अब लोग समझ गए हैं कि खबरे खरीदी और बेची जाती हैं। अब मीडिया ने लोगों का विश्वास खो दिया है। ऐसे में मीडिया समाज-परिवर्तन का केंद्र बनना चाहे तो कभी नहीं बन सकता। मीडिया आत्मघाती दिशा में है। इसने अपनी विश्वसनीयता खो दी है। मैं मानता हूं कि मीडिया में गैर-जिम्मेदारी बहुत बढ़ गई है। आज बहुत ताकतवर हो चुके मीडिया पर नियंत्रण की कोई बॉडी नहीं हैं। ऐसा पॉलिटिकल सिस्टम कमजोर होने से हुआ है। हालांकि, इंदिरा गांधी के जमाने में विरोध था, पर ऐसा भी नहीं कि आप जब चाहें, स्टेट को ब्लैकमेल करें। आज ऐसा खूब होने लगा है। वजह? मीडिया से ज्यादा ब्लैकमेलर पॉलिटिक्स हो गई है।

-सर, यह तो बहुत निराश करने वाला परिदृश्य है। आखिर विकल्प क्या है?

–हमेशा दुनिया में वैचारिक आंदोलनों ने ही समाज और सभ्यता की रहनुमाई की है। एक गांधी नाम का व्यक्ति आता है, और देश का सारा गणित बदल देता है। वे तो अपने राजनीतिक प्रचार के लिए किसी अखबार की शरण में नहीं गए। उनका एक ही ध्येय और प्रयास था कि काम बोले। जिस दिन हमारी राजनीति में विचार अहम हो जाएंगे, मीडिया भी रास्ते पर आ जाएगा। आजादी की लड़ाई में, खासकर हिंदी मीडिया की प्रमुख भूमिका रही है। उन दिनों इलाहाबाद में एक स्वराज्य अखबार निकलता था। उसमें नियुक्ति के लिए एक विज्ञापन निकलता था। शर्त होती थी कि जो काले पानी की सजा के लिए तैयार हो, वही पत्रकारिता में आए। आवेदकों की भी लंबी कतार होती थी। उस वक्त के राजनेताओं ने अपने तप, त्याग और चरित्र से दिखाया कि देश, समाज को किस रास्ते ले जाना है। तब नेहरू, गांधी, सुभाष हमारे आदर्श थे। उनकी उस वक्त प्रैक्टिस फीस एक-दो लाख रुपए थे, आज के सौ-दो सौ करोड़ रुपये के बराबर। वे लोग सब-कुछ छोड़कर सड़क पर उतर पड़े। लाख संकट में रहे लेकिन विचार नहीं बदले। आज की राजनीति विचारहीन हो गई है। आजादी की लड़ाई में विचारों की राजनीति थी, सिद्धांतो की राजनीति थी, तप और त्याग की राजनीति थी। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे लोगों की प्रेरणा ने अच्छी पत्रकारिता को जन्म दिया। आज जब हम अपने आस-पास देखते हैं, सोच नहीं हरिवंशपाते कि किससे प्रेरणा लें? मनमोहन सिंह बहुत ईमानदार आदमी हैं, लेकिन निजी ईमानदारी से देश नहीं चलता। वह देश के लिए प्रेरणा स्रोत नहीं हो सकती। जवाहरलाल नेहरू मरे तो दूर-देहात के गांव तक रो पड़े। सन् बासठ के यु़द्ध में अनपढ़ महिलाओं ने भी देश के लिए अपने गहने उतार कर दे दिए। मुझे याद है कि जब शास्त्री जी की मौत हुई थी, तब भी घर-घर लोग रोए थे। जब मैं बनारस पढ़ने गया तो शास्त्री जी का घर देखने गया। तब उनके चाचा जीवित थे। उसी तरह टूटा पड़ा था शास्त्री जी का घर। उनके चाचा, जो देखने में हू-ब-हू शास्त्री जी की तरह थे, जाडे़ में लेवा ओढ़कर पडे़ हुए थे। उन दृश्यों का मेरे मन पर गहरा असर पड़ा। जीवित रहने के लिए हर समाज के पास अपना लीविंग लीजेंड और नायक होना चाहिए। इस समय हमारे समाज में ठहराव जैसी रिक्तता-सी आ गई है तो मीडिया का काम है लोगों के दिलों में ऐसे नायकों को जिंदा करना।

यह कहना ज्यादा सही होगा कि प्रभात खबर को जनता ने बचाया। अगर जनता दूसरा अखबार पढ़ने लगी होती तो हम लोग खत्म हो गए होते। पत्रकारिता में कई नए प्रयोग हमने किए। उनमें ज्यादा योगदान हमारे साथियों का रहा। 1992 में स्कूली बच्चों के बारे में सबसे पहले हम लोगों ने स्टोरी छापनी शुरू की। हमने कहा कि पत्रकारिता को नेताओं के कंधे से उतारकर सामान्य लोगों तक ले जाया जाए। जो बच्चे स्कूलों में बहुत अच्छा करते थे, उनको छापना शुरू किया। आज से 10-12 साल पहले हमने चलाई गुड स्टोरी। यानि अपने समाज में जो लोग बहुत अच्छा कर रहे हैं, उनके बारे में। एक व्यक्ति ने पहाड़ काट डाला था। 1991 में सबसे पहले प्रभात खबर ने उस पर कवर स्टोरी छापी थी। इस तरह अनेक नए प्रयोग किए। विनोद मिश्रा जब ओवरग्राउंड हुए तो सार्वजनिक रूप से सबसे पहले वह प्रभात खबर के मंच से बोले।

-आपकी विचारधारा क्या है? पॉलिटिकल और वैचारिक आग्रह में आपको क्या माना जाना चाहिए, मार्क्सवादी, मानवतावादी या समाजवादी?

हरिवंश–किसी ‘वाद’ की जगह मैं यह कहना चाहूंगा कि जब वयस्क हो रहा था, मुझे पढ़ने की आदत पड़ गई। समाजवादी साहित्य, लोहिया और अन्य समाजवादियों को पढ़ा। उससे समाज को समझने में काफी मदद मिली। कहावत है कि आप युवावस्था में क्रांतिकारी होते हैं, फिर मध्य वय में कैसे धीरे-धीरे व्यावहारिक हो जाते हैं, यह जीवन की एक प्रक्रिया है। उसने काफी प्रभावित किया। फिर नक्सली साहित्य वगैरह पढ़ा। आपको आश्चर्य होगा, नागभूषण पटनायक (बडे़ नक्सली नेता), जो आईपीएफ के संस्थापक थे, मैं उनसे मिलने, उनके गांव गुन्नुपुर गया। वहां न कोई मेरी भाषा समझता, और न मैं उनकी भाषा समझ पाता। वह लोकल तेलुगु बोलते थे। जब एक अनजानी जगह, उनके गांव पहुंचा रात आठ बजे तो पता चला कि वह बहुत बीमार थे। उनको कटक के अस्पताल ले जाया गया है। हम लोग अगले दिन कटक पहुंच गए। उनके साथ जमीन पर सोए। बाद के दिनों में उन्होंने मुझे पत्र भी लिखे थे। वह बहुत ही इंस्पाएरिंग व्यक्ति थे। जब मैंने जयप्रकाश नारायण को आंदोलन में देखा, एक बूढे़ व्यक्ति को लड़ते हुए, उनसे भी बहुत प्रेरणा मिली। बाद में जेल में चंद्रशेखर की डायरी पढ़ी। उस समय के चंद्रशेखर की, जब वह युवा तुर्क थे, इंदिरा गांधी के खिलाफ थे। वैसे ही एके गोपालन, ज्योति बसु, जार्ज फर्नांडिज, मधुलिमये आदि ने उन दिनों बहुत गहराई से प्रभावित किया था। भारतीय चीजों को समझने में समाजवादी साहित्य से मुझे बहुत मदद मिली। मैंने सर्वोदय साहित्य भी खूब पढ़ा। अध्यात्म में भी गहरी रुचि रही। कुल मिलाकर मैं वह व्यवस्था अवश्य देखना चाहता हूं, जिसमें इक्वल डिस्ट्रीब्यूशन हो।

-इतनी व्यस्तताओं के बीच पढ़ने का समय कैसे निकाल पाते हैं?

–मुझे पढ़ने की आदत है। हर सप्ताह एक कॉलम अपने अखबार में लिखता हूं शब्द संसार। नई पुस्तकों के बारे में लिखता हूं। उनमें भी ज्यादातर अंग्रेजी पुस्तकें, जिन्हें मैं खुद खरीदता हूं, किसी से मंगाता नहीं। अगर नहीं पढूं तो जो कुछ दुनिया में हो रहा है, उससे कट जाऊंगा। मुझे लगता है कि अगर इस उम्र में भी नौकरी कर पा रहा हूं तो अपने को इस मार्केट में रिलेवेंट बनाए रखने के लिए इस चीज को डेवलप्ड करूं। यह एक प्रोफेशनल जरूरत भी है। ताकि पढ़ने की आदत बनी रहे और नई चीजों की जानकारियां भी मिलती रहें। यात्रा में होता हूं तो भी दो-तीन किताबें साथ रखता हूं। हावर्ड में कोई लेक्चर दिया हो, कोई नया काम हो रहा हो, ओशो की किताब आई हो, सब मेरे पास होता है। यात्रा में कोशिश करता हूं कि सप्ताह में कोई एक मोटी किताब पूरी तरह न पढ़ पाऊं तो कम से कम उसके मुख्य अंश जरूर पढ़ डालूं।

-पत्रकारों को कौन-कौन सी किताबें पढ़नी चाहिए?

हरिवंश–मैं किताबों की बजाय विधा बता रहा हूं। फ्यूचर शॉक एक किताब है एलविन टाफ्लर की । मैं अंग्रेजी बहुत नहीं समझता था, अब भी पढ़कर थोड़ा समझता हूं, बोलचाल नहीं पाता। हम देहात से आए हुए आदमी हैं। हम लोगों के पठन-पाठन के जमाने में अंग्रेजी हटाओ का नारा गूंज रहा था। विश्वविद्यालय में आने के बाद अंग्रेजी बहुत कोशिश से सीखी। दो-तीन कम्युनिस्ट मित्र मिल गए। वे पुस्तकें मंगाकर पढ़ते थे। उन्होंने मुझे अंग्रेजी, ऊर्दू सिखाना शुरू किया। हमारे यहां बहुत डिबेट चलता था। रामकृपाल बीएचयू, मुंबई, रविवार में साथ रहे। हमारी रात-रात भर हमेशा बहसें होती रहती थीं।

-आपके समकालीन लोग इस समय कहां-कहां पर हैं?

–रामकृपाल, नकवी रविवार में हमारे साथ थे। शैलेश, जयशंकर गुप्त, राजकिशोर, अनिल ठाकुर, राजीव शुक्ला, राजेश रपरिया, अजय चौधरी। सब साथ थे। मैं एक बहुत रोचक बात बता रहा था। एलविन टाफलर मूलत: पत्रकार थे। उनकी किताब आई फ्यूचर शॉक। उन दिनों उसकी काफी चर्चा थी। मैंने पढ़ा। उसमें था कि आने वाले 20-25 वर्षों में दुनिया कैसे और कितनी बदल जाएगी। उसने लिखा था कि जैसे अभी संयुक्त परिवार हैं, कुछ देशों में टूटने लगेंगे। सिर्फ पति-पत्नी रह जाएंगे। फिर वे भी टूट जाएंगे। लोग अकेले-अकेले रहने लगेंगे यानि एकल परिवार होंगे। यह टेक्नोलॉजी प्लस हरिवंशसोसियोलॉजी प्लस इकानमी, तीनों को मिलाकर समाज में आने वाले वर्षों में होने वाले चेंज का संकेत था। इसको विदेश में फ्यूचरोलॉजी कहते हैं। इस पर बाद में टाफ्लर ने तीन-चार किताबें लिखीं। उनसे पता चलता गया कि समाज किस ओर तेजी से बदल रहा है। उन लोगों का निष्कर्ष था कि जो दुनिया चार सौ वर्षो में बदली थी, उतनी आगे पांच वर्षों में बदलने जा रही है। देखिए कि मोबाइल ने कैसे पूरा परिदृश्य बदल दिया है। हम लोग जब अपने समय को याद करते हैं तो यकीन नहीं होता। इस ट्रेंड पर बहुत सारी किताबें आ चुकी हैं। देखें कि बेंगलुरू में बिना ब्याहे लड़कियां रह रही हैं। एकल परिवार। लिव इन रिलेशनशिप। ऐसा भारत में भी होने लगा। संयुक्त परिवार खत्म होने लगे हैं। उन्होंने बहुत बढ़िया बताया था कि संयुक्त परिवार का जन्म कृषि से हुआ। यानि आर्थिक व्यवस्था ऐसी थी। उसमें जरूरी था संयुक्त परिवार का होना। फिर औद्योगिक क्रांति के दौरान संयुक्त परिवार टूटने लगे।

हरिवंश-उम्र और अनुभव के इस स्टेज पर आकर आप अध्यात्म के बारे में क्या सोचते हैं?

–1975 में लगता था कि विनोबा के नाम पर हम जैसे अंदर से उबल जाते हों क्योंकि उन्होंने इंदिरा गांधी का साथ दिया था। दुनिया के बडे़ पत्रकारों में हुए पॉल ब्रंटन। वह इंग्लैंड के पत्रकार थे। वह 1930 से 40 के बीच भारत आते रहे। यहां के साधकों, संतों की खोज की। उनकी बीस-इक्कीस किताबें हैं। अदभुत हैं। गुप्त भारत की खोज का हिंदी अनुवाद अभी छपा है। भारत में कैसे एक अंग्रेज गर्मी में, लू में संतों की खोज में जा रहा है। भारत के संत कौन हैं, चमत्कार करने वाले साधु संत नहीं। असल संत हैं क्या? जैसे दक्षिण में रमण महर्षि के आश्रम। हमारे देश में ऐसे साधु, संत और महात्मा हुए, जिन्होंने जीवन को जानने की कोशिश की। परमहंस योगानंद भारत में कुछ समय तक रहे, फिर अमेरिका चले गए। उन्होंने अपनी ऑटाबायोग्रॉफी लिखी है। यह दुनिया की सबसे अधिक बिकने वाली किताबों में से है। शायद ही दुनिया में कोई ऐसी भाषा हो, जिसमें उसका अनुवाद न हुआ हो। आप पढ़िए तो जीवन का रहस्य आपकी समझ में आ जाएगा। पश्चिम में उन पर शोध हो रहे हैं। अनेक प्रामाणिक साहित्य उन पर आ रहे हैं। यहां तो आप देखेंगे कि आज जिसके पास जितना पैसा है, वह उतना बड़ा धार्मिक हो रहा है। यह सब पाखंड है। असल अध्यात्म मनुष्य को संसार के बारे में बताता है। मैं रमण महर्षि के आश्रम गया। वहां रहा। महर्षि अरविंदो। उनके पिता ने पैदा होते ही उन्हें भारत से बाहर कर दिया कि इस देश की छाया तक उन पर न पडे़। वो आदमी ग्रीक, लैटिन और अंग्रेजी ही जानता था। भारतीय भाषाएं नहीं जानता था। आईसीएस बना, टॉपर बना, भारत आया और भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा प्रवक्ता बन गया। वो व्यक्ति जब पांडिचेरी गया तो जानकर मैं दंग रह गया कि तेईस साल तक एक ही कमरे में रहा साधनारत। जब वे जेल में बंद हुए, नीचे सोना पड़ता था और एक मग था उसी से पानी पीना और उसी से शौचना। आज के नेता जब जेल में जाते हैं तो कहते हैं कि हमें ए श्रेणी उपलब्ध कराओ। उनके पास एक तौलिया था, जिससे आठ लोग देह पोछते थे। यही अध्यात्म भारत की पूंजी रहा है। सब तरफ प्रगति हो रही है लेकिन हमारे पास समय नहीं है। हम जीवन को समझ नहीं पाते। हम मशीन की तरह चल रहे हैं और मशीन की तरह खत्म हो रहे हैं। इंग्लैंड, अमेरिका, रूस में लोग मॉडर्न जीवन से हटकर मोबाइल वगैरह फेंक कर खेतों में रह रहे हैं। वे जिंदगी को नए ढंग से, चैन और सुकून से जीना चाहते हैं। आज अध्यात्म को धर्म के साथ जोड़कर वाद-विवाद किया जा रहा है।

हरिवंश-आपने शराब वगैरह को लेकर गाइडलाइन बनाई है। आज शराब पत्रकारिता में फैशन है। एसपी सिंह और उदयन शर्मा, जो पत्रकारिता के रोल मॉडल बताए जाते हैं, वे भी शराब पीते थे। इस पर आपका क्या कहना है?

–मैं और उदयन शर्मा लगभग एक वर्ष तक एक साथ रहे। एसपी सिंह को भी नजदीक से जाना-सुना। वे लोग शराब पीते थे, लेकिन पीकर दफ्तर नहीं आते थे। निजी जीवन का प्रोफेशन पर असर नहीं पड़ना चाहिए। एसपी सिंह शालीन थे। अपने दोस्तों के साथ जरूर पी लेते थे। मुझे याद है, जब हम धर्मयुग में थे, धर्मवीर भारती कोई भी गिफ्ट लौटा देते थे। उसका गहरा असर हम लोगों पर पड़ा। रिव्यू आदि में हमें जो गिफ्ट मिलते, उन्हें आफिस में रख देते थे क्योंकि आने-जाने का खर्चा तो टाइम्स ऑफ इंडिया देता था। इस प्रकार हमें संस्कार वहां से मिले। आग्रह था कि हम निजी जीवन में जो भी हों, उसको प्रोफेशन में न आने दें। आज प्रेसवार्ता में चालीस को बुलाएं, 100 चले आते हैं। गिफ्ट की मांग करते हैं, झगड़ते हैं, शराब के लिए मारपीट करते हैं। यह सब ठीक नहीं। अखबारी जीवन को सार्वजनिक चीजों से अलग रखना चाहिए। यही मेरा आग्रह रहा है।

-आपको खाने में क्या पसंद है?

–हम पैदा ही हुए ऐसे घर में, जहां शाकाहार के अलावा कुछ नहीं बनता था। शादी होने के बाद जब नौकरी के लिए मुंबई गए तो नॉनवेज खाना शुरू किया। आज भी हमारे घर में सब कुछ वेजेटेरियन ही बनता है।

हरिवंश-वह कौन-सा खाना, जो आप रोज खाना चाहेंगे?

–(हंसते हुए) चावल-दाल-चोखा, जो टिपिकल बिहारी खाना है, और लिट्टी।

जारी…..


अगर आप इस इंटरव्यू पर अपनी कोई प्रतिक्रिया हरिवंश जी तक पहुंचाना चाहते हैं तो उनकी मेल आईडी  [email protected] का सहारा ले सकते हैं.  इंटरव्यू का पहला भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें- वे 20 माह नहीं दे रहे थे, मैंने 20 साल ले लिया. इंटरव्यू का तीसरा भाग अगले शनिवार को पढ़ें. 

Comments on “खतरनाक खेल खेल रहे अखबार : हरिवंश

  • respected HARIVANSH sir,

    i m continiously following you on bhadas. its very effective medium for me to know about you. this interview is also very nice and it can more strengthen ur public figure. but i m really sorry to say that u r not different from the other news brands in the terms of “selling news”. in my opinion ur newspaper is applying the same “hathkanda” to make money. aap nitish sarkaar ko mahimamandit kar khud ke liye advertisement ka raasta saaf kar rahe hai. pichhle kuchh dino me hindustan aur jagran dono ke sarkari vigyaapan band hue lekin aapka add chalu hi raha.
    waise muhe isse koi fark nahi padta lekin plz dhong na kiiye. dhong wali bate na bolenge to aapki pratistha bani rahegi.

    aapka fan aur shubh chintak

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  • aaj k jamane me kisi usool ko ek saal doh nahi saka…aap ne itni lambi pari kheli , o v “sakh” ko bachakar…maan gaye sir!!!…tussi great ho

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  • 1 lakh tnankhaw leker Badi baten krna Asan , patrkaro ke kitne hitasi hai yeh khane ki bat nahi hai aj bhi jharkhand me patrkaro ko sampadak apne faidey ke liye 500 me kam kra rahe hai aur dusro ko sidhanth sikha rahe hai pahle apna akhbar nikaliye sabko 20000 cetan digiye aur usme boliye tab kuch achha lagega , Yaswant ji ko patakar full page ka interview ka koi asar nahi padega.

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