‘जनसत्ता’ से सहयोग क्यों बनाए रखें?

अठन्नी दाम बढ़ाकर संपादक ने पाठकों से सहयोग बनाए रखने की अपील की : जनसत्ता कभी नाम वाला अखबार हुआ करता था. क्या बनारस, क्या बेंगलूर. हर जगह इसके चाहने वाले हुआ करते थे. लेकिन आजकल का जनसत्ता उदास करने वाला होता है. कुछ अलग पढ़ने की चाहत रखने वालों को मायूसी हाथ लगती है. समाचार एजेंसियों की खबरों से भरे पड़े इस अखबार में इनके रिपोर्टरों की भी जो खबरें होती हैं, वे ऐसी नहीं होतीं कि जिससे पाठक कुछ नया पा सके या जिससे हड़कंप, कंपन या मंथन हो सके. उपर से अब इस 12 पेजी अखबार का दाम भी बढ़ा दिया गया है. तीन की बजाय अब साढ़े तीन रुपये में मिला करेगा यह. अठन्नी ज्यादा देने में किसी को दिक्कत नहीं लेकिन अठन्नी बढ़ाने के साथ क्वालिटी बढ़ाने का कोई भरोसा नहीं मिला है अखबार की ओर से.

दिल्ली में प्रकाशित आज जनसत्ता अखबार के पहले पन्ने को देख लें तो सेकेंड लीड के रूप में राजस्थान की खबर मिलेगी. राजीव जैन की बाइलाइन इस खबर की हेडिंग है ‘भाजपा में विपक्ष के नेता की दौड़ तेज, कटारिया व तिवाड़ी आगे’. जयपुर डेटलाइन से प्रकाशित इस खबर की हेडिंग दो लाइनों में है. सेकेंड लीड-सा डिस्प्ले है. हेडिंग देखने से एकबारगी लगता है जैसे लोकसभा या राज्यसभा में भाजपा में विपक्ष के नेता की दौड़ तेज हो गई हो. पर ज्योंही डेटलाइन पर आप जाते हैं, समझ में आ जाता है कि यह राजस्थान की खबर है. इस राजस्थानी खबर से दिल्ली के किस पाठक को क्या हासिल होगा, क्या जानकारी मिल रही है या दी जा रही है, समझ में नहीं आ रहा. इसी तरह लखनऊ से अंबरीश कुमार की बाइलाइन खबर है पहले पन्ने पर, दो कालम में- ‘आर-पार की लड़ाई में जुटी सपा’. हेडिंग पढ़ने के बाद शायद ही कोई पाठक पढ़ने के लिए आगे बढ़ेगा. सिर्फ वही आगे पढ़ेगा जो सपा, बसपा या यूपी की राजनीति में बेहद सक्रिय हो या अतिशय दिलचस्पी रखता हो.

ऐसा नहीं कि इन खबरों की उपयोगिता नहीं है. पर इन खबरों को ये डिस्प्ले क्यों? क्या देश, सिस्टम, सरकार से सब समस्याएं समाप्त हो गई हैं? क्या खोजी रिपोर्टिंग की परंपरा खत्म की जा चुकी है? क्या बड़ी खबरों को पहचानने की दृष्टि बदल गई है? क्या केंद्र सरकार, राज्य सरकार, ब्यूरोक्रेशी, पुलिस, स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण भारत… हर कहीं पर ‘आल इज वेल’ वाली स्थिति आ गई है? बल्कि, कहा जाए तो हर फील्ड में समस्याएं, घपले, रैकेट, पतन, लूट, अराजकता पहले से ज्यादा मात्रा में है. लेकिन इनके भीतर घुसकर, इन्हें चैलेंज कर लिखने-कहने वाले ही नहीं रह गए हैं. वरना जनसत्ता से तो ऐसी उम्मीद न थी कि उसकी हर खबर निर्वीय-सी हो, हर खबर पढ़ते जाने के बाद भी चेहरे, दिल में कोई भाव, भावना का उद्वेलन न हो.

आज का जनसत्ता पढ़कर और अतीत के जनसत्ता के बारे में सोचकर कोई भी निराश हो सकता है. यह तुलना भी तभी आप करते हैं जब ऐसा करने के लिए प्रेरित किया जाए. और यह प्रेरणा दी है जनसत्ता के संपादक ने. उन्होंने दाम में अठन्नी की वृद्धि कर पाठकों से सहयोग की अपेक्षा की है. इस बाबत पहले पन्ने पर सूचना प्रकाशित की गई है- ”कागज और छपाई की लागत निरंतर बढ़ रही है। विवश होकर जनसत्ता की दर में आज से हमें कुछ बढ़ोतरी करनी पड़ रही है। आशा है पाठक हमेशा की तरह अपना सहयोग बनाए रखेंगे। -सं.”

सं. उर्फ संपादक को भले लगता हो कि पाठक सहयोग बनाए रखेंगे लेकिन पाठकों को लगता है कि अगर जनसत्ता को धारधार व तेवरदार अखबार बनाने में उसकी संपादकीय टीम सहयोग नहीं कर रही है तो फिर पाठकों से सहयोग की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? संपादकीय पेज पर कुछ लिक्खाड़ लोगों के आलेख छप जाते हैं, वो जनसत्ता जरूर खरीदते होंगे. जनसत्ता में साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों का कवरेज विस्तार से हो जाता है, तो ये आयोजन करने वाले इसे जरूर खरीदते होंगे. पर कोई पाठक इसे क्यों खरीदे, यह समझ से परे है. जब तक प्रभाष जी थे, कागद कारे का विशाल पाठक वर्ग उन्हें पढ़ने के लिए खासतौर पर रविवार को जनसत्ता खरीदता था. उनके जाने के बाद रविवार वाले ग्राहकों की संख्या में जरूर कमी आई होगी.

अब दाम बढ़ने के बाद बहुत कम हिम्मत वाले पाठक होंगे, जो जनसत्ता को यूं ही अपने घर मंगाते रहेंगे और इस प्रकार, जनसत्ता के साथ सहयोग करते रहेंगे. जनसत्ता को तेवरदार तरीके से चला कर इसे बाकी धंधेबाज अखबारों के सामने रोलमाडल अखबार के रूप में पेश किया जा सकता था. लेकिन दुर्भाग्य यह देखिए कि तेवरदार होने का अंजाम अब पतित व पिटा जनसत्ता मान लिया गया है. मतलब, धंधा करेंगे तो बढ़ेंगे, तेवरदार होंगे तो जनसत्ता की तरह पिटेंगे. जनसत्ता को चलाते रहने की अगर मजबूरी न होती तो शायद गोयनका खानदान जाने कब इससे पिंड छुड़ा लिया होता.

कुछ लोग कहते हैं कि इस अखबार को इसलिए भी चलाया जा रहा है ताकि इसके नाम पर सरकार से रियायती दर पर कागज का कोटा मिलता रहे और उस कागज का इस्तेमाल इंडियन एक्सप्रेस में होता रहे. ढेर सारी बातें, चर्चाएं, अफवाह जनसत्ता के बारे में है लेकिन इन सबमें एक चीज तो सबके सामने है कि इस अखबार का चरम पतन अब देखा नहीं जाता.

Comments on “‘जनसत्ता’ से सहयोग क्यों बनाए रखें?

  • B.P.Kumawat says:

    🙂 🙂 JANSATTA ke dam badne par yashwant singh ji aapki tika-tipanni achchi hai wahi Rajesh Ranjan, Chandrabhan Singh, Nishant Adig, Roshan, Suneet or Vikash ke comment bhi dilkhush karte hai. JANSATTA ki Sampadkiya panna jitna damdar hai utna english ka bhi nahi. Khas baat eske reporter Lucknow se Ambrish Kr., Patna se Ganga Pd. , or Jaipur se Rajive Jain pure state ko rubroo karate hai. Me to iska hiteshi hoo.

    Reply
  • yashwant ji,
    jansatta pehle bhi hindi patrakarita ka role model tha aur ange bhi rahega……………………..aisa hindi ka koi akhwar nahi jisse uska comparision kiya ja sake…jab altoo phaltoo akhwar rate bhada sakte hen to jansatta kyon nahi..rate badhne se jansatta padhne walon me koi kami nahi ayegi yeh mujhe bishwash he.

    Reply
  • chand chattani says:

    Yeh bari dilchasap jang lagti hai jansatta ko lekar….kaun sach keh raha aur kaun jhhoot kehna mushkil hai..shayad kahin na kahin vyaktigat karan najar ate hain jansatta ki ninda main.. kimat bhrane ke naam par yeh jo jang chhiri hai yeh kisi ki niji khundak jyada lagti hai…are bhalemanuso dusri akhvaron se tulna to karo jara jansatta ki…imandari se karo…intellectual ho to sach kehna bhi sikho…technology ka fayada logon ko barglane ke liye to mat karo..duhai dete hain naitikta ki aur jang larte hain fareb ki…jansatta ke muqable aaj bhi koi aur akhvar nahin..kimat barn ke masle par charcha ho sakti hai ki yeh hona chahiye tha ya nahin lekin shayad iske bahane larai to koi aur hee lari ja rahi hai…jansatta ke jariye prabhash joshi ji ne samaj main chetna kee lau yun hi nahin jagai..yeh lau abhi jal rahi hai…koi niji fayede ke liye ise nahin bujhha sakta…ham jaise pathak jansatta ke saath hain…jai jansatta…jai prabhash joshi…

    chand chattani

    Reply
  • satyendra says:

    यशवंत जी, जनसत्ता के बारे में आपका आलेख अर्धसत्य है। और पाठक क्या पढ़े और क्या नहीं इसका निर्धारण करने वाले आप कौन होते हैं। हर व्यक्ति की अपनी अलग विशेषता होती है। हर कोई चाहे वह कितना भी काबिल क्यों न हो प्रभाष जोशी नहीं हो सकता। हम उनके दौर में नहीं हैं और न हीं राम नाथ गोयनका जैसा जनसत्ता का मालिक है। उस दौर से इस दौर की पत्रकारिता काफी कुछ बदल चुकी है। जनसत्ता अपने तेवर, कलेवर, प्रस्तुति और प्रयोग के लिए पढ़ा जाता था, है भी। लेकिन समय के साथ उसने अपने को अपडेट नहीं किया। सबसे बड़ी समस्या उसके साथ यह है। इसमें दो राय नहीं है कि जनसत्ता की सम्पादकीय टीम आज भी बेहतर है लेकिन उन्हें काम करने की स्वतंत्रता रामनाथ जी वाली नहीं है। और फिर हर प्रकाशन का अपना एक समय होता है। अखबार माने कभी हुआ करता था आज। आज तो खुर्दबीन लेकर तलाशने पर भी नहीं दिखता।. जिस अखबार ने आजादी की जंग ही नहीं लड़ी भाषा को नए शब्द और सरोकार दिए उसकी यह स्थिति हो गई। मुझे लगता है कि आज ने समय के साथ अपने को अपडेट नहीं किया जनसत्ता के साथ भी यही स्थिति है। दाम घटने या बढ़ने का कोई बहुत असर नहीं पड़ता हिंदी के पाठकों में काफी बदलाव आया है।
    सत्येंद्र

    Reply
  • brijesh singh says:

    ‘आर-पार की लड़ाई में जुटी सपा’. हेडिंग पढ़ने के बाद शायद ही कोई पाठक पढ़ने के लिए आगे बढ़ेगा. सिर्फ वही आगे पढ़ेगा जो सपा, बसपा या यूपी की राजनीति में बेहद सक्रिय हो या अतिशय दिलचस्पी रखता हो………..इस तर्क से आपका क्या मतलब है….जनसत्ता तो वही खरीदेगा न जिसे वाकई राजनीति और राजनैतिक ख़बरों की अहमियत पता है. राजनैतिक खबरें जनसत्ता में जिस तरह आती हैं उतनी हिंदी के किस दूसरे अखबार में आती है…उत्तर प्रदेश में बसपा सरकार में हो रहे मानवाधिकार हनन और गड़बड़ियों पर सबसे ज्यादा अगर किसी ने लिखा है तो वह जनसत्ता है…बाकी सारे अखबारों ने ये खबरे दबा दीं हैं…मानवाधिकार आयोग से पता करिए किस अखबार से सबसे ज्यादा संज्ञान लिए गए हैं. आपके हिसाब से उत्तर प्रदेश की खबर दिल्ली के अखबार में नहीं होनी चाहिए. तो दिल्ली वालों को बाकी देश के बारे में कैसे पता चलेगा. राजनीति को बिना जाने गाली बकने वाले, साहित्य को बिना जाने नीरस कह देने वाले लोगों के लिए जनसत्ता है ही नहीं. जनसत्ता दाम बढ़ने पर नहीं बिकेगा… इसके लिए आपने कोई सर्वे किया है क्या ? …..

    Reply
  • Suneet Raghav says:

    भाई लोगों, जनसत्ता ने सहयोग की अपील की है..करना है तो करो ना करो..अगर हम चाहते हैं कि एक अच्छा अखबार (चाहे उसमें कितनी ही कमियां भी क्यूँ ना हों) निकलता रहे तो पचास पैसे के लिए दिल छोटा मत करो..दो रुपये में कूड़ा पढने से अच्छा है कि चार रुपये लगें तो भी कुछ मूल्यवान पढ़ें… में केवल कृष्णा सोबती या सुधीर चन्द्र के लेख के लिए जनसत्ता खरीदने को तैयार हूँ..
    -सुनीत

    Reply
  • rajesh ranjan says:

    Jansatta me main 5 saal kam kar chuka hu isliye dave ke sath kah sakta hu ki iski sampadakiya team jitni mazbut utni shayad hi kisi anya akhbar ki hogi. Aisa nahi hai ki sampadakiya team ko khabron ki samajh nahi, lekin hindi patrakarita ke mahasagar me damdar chappu ke sahare bekhauph avyavastha ka seena cheerne wala yeh akhbar ab champuon ke sahare chalne laga hai. Sampadak ke kisi khas champu ki khabar agar nahi lagti hai to turant shikayat ho jati hai. yeh pehla akhbar hai jahan sampadak ko khabron me nahi balki sahitya, kala aur saundarya me hi ruchi hai.Chamchagiri karo to khub tarakki hogi varna aapka kaam pasand nahi kiya jayega.

    Reply
  • Chandrabhan Singh says:

    Men Bhi JANSATTA ka purana pathak hoon. Sampadakiya prasth bemisal huaa karta tha or aaj bhi krarapan hai. Samay-Samay par alag-alag prant ki khabron ko pramukhta milti rahi hai to Rajasthan ki pahale panne par khabar chhap gai to paresani kyon? Mujhe or mere sathiyon ko to JANSATTA pade bina aaj bhi chain nahi milta.
    – Chandrabhan Singh

    Reply
  • saahab, baat to aapane bilkul sahee kahee hai. janasatta ka puraanaa paathak mai v hun. lagaatar ho raha hraash to dikh hee raha hai.
    ham jaise prashikshu ko jansatta se acche shabd aur acche waaky vinyaas kee ummid rahatee hai. us samay to aur buraa lagataa hai jab isake headline me bhee maatraaon ka dhosh hotaa hai. pahalee pej par galatiyon ka honaa to ab aam baat hai janasatta me.

    Reply
  • निशांत अडिग says:

    भड़ास कुछ अधिक ही निकाल दी यशवंत भाई. मैं तो पांच रुपये में भी खरीदूंगा. जनसत्ता ख़बरों के लिए नहीं विचारों के लिए पढ़ा जाता है. पहले ख़बरों के लिए ही पढ़ा जाता था यह बात सही है और अब आलोक तोमर जैसी चटपटी लछेदार ख़बरें उसमें नहीं मिलती हैं. परन्तु भाई साहब टीवी के जमाने में ख़बरों के लिए सुबह तक कौन बैठा वेट करता है? जनसत्ता हम पढ़ते हैं विचारोत्तेजक सामग्री के लिए, ठोस विमर्श और ठोस बहसों आदि के लिए ही. परसों कृष्णा सोबती जी ने और तसलीमा नसरीन ने जनसत्ता में बहुत खूब लिख था. पचास पैसे बचा कर ऐसी सामग्री से में वंचित रहूँ तो नुक्सान मेरा ही होगा. जनसत्ता ने बुरे वक्तों में भी एक गंभीर पत्रकारिता का दीया जला रखा है, भले ही छोटा क्यों ना हो. पचास पैसे के लिए उसे बुझने देंगे क्या?
    -निशांत अडिग

    Reply
  • एस.के.सुमन says:

    पता नहीं अडिग साहब को जनसत्ता में कौन से नए विचार दिखते हैं? अडिग साहब आप जनसत्ता खरीद कर पढ़ते हैं या फिर इसलिए खरीदते हैं कि कभी जनसत्ता अच्छा अखबार हुआ करता था। हाहहाहाह

    Reply
  • yashvant ji, jansatta hamesha se patrkarita ke mulyon ko lekar chala hai…aur doosre news papers me mulyon ko peeche chod aage badhne ki beqaraari hai. Bazaar ke is jangal me is paper ko maar khana he tha. Ye to tay hai ki jansatta band ho jaega, lekin us paper me masaj parlour aur karamati anguthi jaise vigyapan nahi chapenge. Galakaat pratispardha ke is daur me jansatta jaise paper ka tikna mushkil hai, lekin aaj bhi jansatta ka edit page padhne aur uske lie likhne ka apna he maza hai. Han ye zaroor hai ki paper ko agencies ke uper apni nirbharta kam karne par sochna hoga.

    Reply
  • mai to adig ji kai saath hu…unhai nahi janata par vichar unhi kai jaisai hain…jansatta walai articles ki bat kisi aur akhbar mai kaha – english akhbaro mai bhi nahi. Jo thodai bahut padhai likhai lekhak bachai hain unhai sirf jansatta mai hi jagah mil pati hai, aisa mujhai lagta hai – hindi ke baki akhbar to bas uthlai, sarheen aur english akhbaron ki bhondi naqal lagtai hain. janstta sai vyaktigat karno sai naraz log kuch bhi kahain – jansatta bagair mera kam nahi chalega.

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *