गिल्लो के प्रेमी पत्रकार की पटना से आई पाती

पातीकोई पागलपन तो कोई नशा कहता है पर प्यार तो प्यार है। गिल्लो और उनकी मुस्कराहट किसी को भी पागल कर दे, मेरी बिसात क्या! यदि थोड़ा सब्र और इंतजार करने का जज्बा हो तो इनसे आपको भी प्यार हो सकता है। खुशखबरी ये है कि गिल्लो के परिवार में 35 नए मेहमान आये हैं और अब रोटी या बिस्कुट गिल्लो अपने तो खाती ही हैं, बच्चों के लिए भी ले जाती हैं। इस लोकतंत्र के महापर्व में मुझे भी थोड़ी कम फुर्सत मिल रही है। उपर से गर्मी की वजह से गिल्लो भी ज्यादा देर अपने घर में रहना पसंद करती हैं। लेकिन कितना भी कम समय हो, दिल वहीं खींचकर ले जाता है। नहीं जाने पर मन जाने कैसा-कैसा होने लगता है। क्या करें, प्यार न समय देखता है और न दिन।

पाती दूसरी खुशखबरी ये है कि नट जाति के लोग जो गिल्लो को मारकर खा जाते हैं, अब उनका आतंक कम हो गया है। कुछ संवेदनशील लोगों की मदद भी मिलने लगी है। गिल्लो के घर के पास बैठने के दौरान मुझे पता चला कि इस पेड़ के नीचे काफी संख्या में रिक्शा और ठेले वाले दिनभर की मजदूरी के बाद आते हैं और आराम फरमाते हुए राहत की सांस लेते हैं। उन्हें देखकर मेरे मन में एक विचार उठा था कि इस बार पेमेंट मिले तो मैं यहां एक प्याऊ बनवाउंगा जिससे पूरी गर्मी इन लोगों को शीतल जल मिलता रहेगा। लेकिन मन की बात मन में ही रह गई। पेमेंट मिलने से पहले ही यह काम एक भलेमानुस आशुतोषन करा दिया। गिल्लो के घर के पास स्थित एसबीआई के बिहार-झारखंड हेडक्वार्टर के अधिकारी और सीजीएम ए. कृष्ण कुमार से इस मसले पर बातचीत हुई तो उन्होंने पहले प्याऊ बनवाने का वादा किया और बाद में इसे वादे को निभाते हुए गिल्लो के घर के पास प्याऊ की झोपड़ी तैयार करा दी। यहां पानी मिलना शुरू हो चुका है।

मैं बहुत खुश हूं। उम्मीद करता हूं कि यह सूचना पाकर आप पातीलोग भी खुश होंगे। पटना के जिलाधिकारी जितेंद्र कुमार सिन्हा ने वादा किया है कि जहां गिल्लो निर्भय होकर घूमती है, उस जगह के चारों ओर लोही की थोड़ी-सी बाड़ी लगवा देंगे ताकि लोग गिल्लो को तंग न करें। देखिए ना, गिल्लो सबको कितनी प्यारी है। पत्रकार और पत्रकारिता के बारे में मैंने कहीं पढ़ा है कि पत्रकार खबरनवीस होने से पहले एक मुकम्मल इंसान होता है और इंसानियत उसकी खबरों में भी दिखती है। मुझ जैसे का मानना है कि पत्रकार पोस्टमार्टम का डाक्टर ही नहीं होता, वह भावुक, दर्द का एहसास करने वाला, बार-बार विश्वासघात सहने के बाद भी विश्वास करने वाला होता है। पत्रकार को किसी के दर्द, दुख-सुख, अंतरमंथन को उसी के भाव में अभिव्यक्त करना होता है जो बिना संवेदनशील और भावुक बने संभव नहीं है।

आपका अपना

आशू

ashutosh_etv@rediffmail.com

पटना, बिहार


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स्ट्रिंगर का दुख और गिल्लो रानी का सुख

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