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आपका जर्नलिज्म टैम की गिरफ्त में कैसे?

टैम तो बाजार के लिए है पर आप तो जर्नलिस्ट थे : जो लोग हिंदी टीवी पत्रकारिता के पतन के अपराधी हैं, वो अपनी गल्ती छुपाने के लिए ‘टैम-टैम टीआरपी-टीआरपी’ चिल्ला रहे हैं. ये लोग पूरी तरह से मानसिक रूप से दिवालिया हो चुके हैं. अच्छी पत्रकारिता से भी टीआरपी कैसे पाई जाती है, इन्हें पता ही नहीं है. अखबारों पर लाख आरोप लगे हों लेकिन अखबारों का सबसे कम पढ़ा जाने वाला संपादकीय पेज आज भी जस का तस है. वहां पर विज्ञापन नहीं छपने लगे. वहां पर सेक्सी फोटो नहीं दिखाई जा रही हैं. वो एडिट पेज आज भी अपने स्थान पर कायम है. सचेत पाठक एडिट पेज पढ़ते हैं. तो इन टीवी संपादकों से पूछिए कि पूरे 24 घंटे के दौरान वे एक ऐसा कौन-सा प्रोग्राम दिखाते हैं जिसके बारे में वे कह सकें कि इस प्रोग्राम को टीआरपी को ध्यान में रखकर नहीं, पत्रकारिता और सरोकार को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है. उस प्रोग्राम को वे उस समय दिखाएं जब पूरा देश सो रहा हो, अरली मारनिंग दिखाएं, उस वक्त दिखाएं जिस समय पर टीआरपी का कोई खास दबाव न हो.

टैम तो बाजार के लिए है पर आप तो जर्नलिस्ट थे : जो लोग हिंदी टीवी पत्रकारिता के पतन के अपराधी हैं, वो अपनी गल्ती छुपाने के लिए ‘टैम-टैम टीआरपी-टीआरपी’ चिल्ला रहे हैं. ये लोग पूरी तरह से मानसिक रूप से दिवालिया हो चुके हैं. अच्छी पत्रकारिता से भी टीआरपी कैसे पाई जाती है, इन्हें पता ही नहीं है. अखबारों पर लाख आरोप लगे हों लेकिन अखबारों का सबसे कम पढ़ा जाने वाला संपादकीय पेज आज भी जस का तस है. वहां पर विज्ञापन नहीं छपने लगे. वहां पर सेक्सी फोटो नहीं दिखाई जा रही हैं. वो एडिट पेज आज भी अपने स्थान पर कायम है. सचेत पाठक एडिट पेज पढ़ते हैं. तो इन टीवी संपादकों से पूछिए कि पूरे 24 घंटे के दौरान वे एक ऐसा कौन-सा प्रोग्राम दिखाते हैं जिसके बारे में वे कह सकें कि इस प्रोग्राम को टीआरपी को ध्यान में रखकर नहीं, पत्रकारिता और सरोकार को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है. उस प्रोग्राम को वे उस समय दिखाएं जब पूरा देश सो रहा हो, अरली मारनिंग दिखाएं, उस वक्त दिखाएं जिस समय पर टीआरपी का कोई खास दबाव न हो.

कोई एक समय तो होगा जिसमें टीवी वालों को टीआरपी नहीं चाहिए. एक भी प्रोग्राम आपको ऐसा नहीं दिखेगा जिसे टीआरपी को ध्यान में न रखते हुए बनाया गया हो. ऐसा इसलिए क्योंकि जिनके हाथों कमान है उनमें वो समझ और मानसिकता ही नहीं है.  टीआरपी की बहस उससे की जा सकती है जो चीजों को बैलेंस करते हुए आगे बढ़े. जो लोग दिवालिया हो चुके हों, जिन लोगों ने गड़बड़ियां की हैं और लगातार की हैं, उनसे क्या बहस करेंगे. ये लोग ज्यादा बड़े अपराधी हैं. टैम से ज्यादा बड़े अपराधी जर्नलिस्ट हैं. टैम के बारे में क्लीयरकट है कि वो मार्केट के लिए है. मार्केट की देन है टैम. टैम करप्ट है. टैम भ्रष्ट है. सब मान लिया. पर टैम तो विज्ञापन और बाजार के लिए है. आप तो जर्नलिस्ट थे.

आप तो जर्नलिज्म कर रहे थे जो लोगों से जुड़ा हुआ मसला था, बाजार के लिए नहीं था. तो आपका जर्नलिज्म टैम की गिरफ्त में कैसे हो सकता है. और अगर है तो इसके दोषी आप हैं, टैम नहीं. टैम कोई अपराधी नहीं है. अगर अपराधी है भी तो सरकार को नकेल कसनी है. अपराधी तो ये सब लोग हैं जो आज टैम और टीआरपी को गालियां देकर अपनी खाल बचा रहे हैं. जनता को तो आप पर भरोसा था. टैम के बारे में जनता को नहीं मालूम. लेकिन आप टैम का नाम लेकर सुबह से शाम तक क्राइम करते हो, और मजेदार यह कि इनको इस पर अफसोस भी नहीं होता. बताइए, कोई एक प्रोग्राम क्यों नहीं जिसमें टीआरपी का डर भय न हो.

अफसोस तो ये कि अब मीडिया के किसी भी संवेदनशील इशू पर ये लोग स्क्रीन पर भी आने लगे हैं. लेकिन एक दो मिनट बाद ही पकड़ में आ जाता है कि ये क्या कह रहे हैं, क्या छिपा रहे हैं. मुझे नहीं लगता कि इस पूरे मुद्दे पर इन लोगों को उनके प्रायश्चित के लिए माफी दी जानी चाहिए. बल्कि मेरा कहना है कि ये लोग बहस ही गलत दिशा में ले जा रहे हैं ताकि अपने को साफ-पाक दिखा सकें.

लेखक एक वरिष्ठ टीवी जर्नलिस्ट हैं, जो नहीं चाहते कि उनके इस कमेंट के साथ उनका नाम प्रकाशित हो. उनका कहना है कि अगर उनकी बात गलत हो तो टीवी संपादक उसे खारिज करें.

आप अगर टीआरपी और टीवी पत्रकारिता पर शुरू बहस में कोई नया विचार पेश करना चाहते हैं तो स्वागत है. [email protected] या [email protected] पर मेल कर सकते हैं.

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0 Comments

  1. Jeet Bhati

    January 15, 2010 at 9:07 am

    मोहदय,
    आपके विचारो को जानकर अच्छा लगा, सबसे पहले आपका धन्यवाद आपने इस विषय पर आपने विचार रखे,
    आज हम जितना चाहे टैम को कोस ले अपने मन के भड़ास निकल ले कुछ नहीं होने वाला, क्योकि हकीकत यही हैं की तमाम बड़े बड़े समाचार संघटनों मैं ऊँचे ऊँचे पदों पर आसीन और खुद को पत्रकारिता का तीस्मार्खा समझने वाले संपादक आज केवल संगटन के स्वामियों और प्रबंधन के हाथों की कठपुतली भर ही रह गये हैं , जबतक यह लोग दासता के इस जंजीर को तोड़ कर, खबर के नाम पर सिर्फ खबर दिखाने की पहल नहीं करते तबतक, बदलाव के उम्मीद करना बेमानी ही हैं!
    क्या पत्रकारिता और खबर के नाम पर परोसी जा रही अश्लीलता और उल जलूल खबरे ही आज की पत्रकारिता रह गयी हैं ?
    क्या अभी भी हम इसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहे?
    हर खबर को ब्रेकिंग न्यूज़ कहकर बेचना ठीक हैं?

    किसी और को कोसने से पहले हमे इन सवालो का जवाब तलाशना ज्यादा जरुरी हैं .

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