दारू का साथ, जिंदगी के उतार-चढ़ाव

यशवंत सिंहदारूबाजी पर बात हो और मैं न लिखूं, ये भला कैसे हो सकता है। मेरे जीवन में अब जो दो-तीन चीजें बेहद करीब-अजीज हैं, उसमें एक मदिरा भी है। जो बहस शुरू हुई, उसमें सागर साहब और राजेश ने शानदार लिखा। उनका लिखा पढ़ कई बार हंसा, मुस्काया और खुश हुआ। कितने सहज-सरल ढंग से अपनी भावनाओं का इजहार कर लेते हैं ये लोग। दारू की बात चली है तो मुझे याद आ रहे हैं एक संपादक मित्र। उन्हें बताया था कि मैंने छोड़ रखी है। छोड़ने के भावावेग में उनसे भी अपील कर बैठा कि सर, कुछ दिनों के लिए आप भी बंद कर दीजिए, इंटरनल सिस्टम सही हो जाएगा, तब फिर शुरू करिएगा। उनसे बात फोन पर हो रही थी लेकिन उनकी मुखमुद्रा की कल्पना कर पा रहा हूं। वे बड़ी-बड़ी आंखें गोल-गोल नचाते हुए, थोड़ा सांस खींचते छोड़ते हुए और चेहरे पर दर्प का भाव लेते हुए बोले- यशवंत, मेरी अंतिम इच्छा है कि जब मैं मरूं तो दारू पीकर मरूं और मरते वक्त मेरे बगल में दारू रखी हो, इससे अच्छी मौत की कल्पना मैं आज तक नहीं कर पाया। 

मैं सुनकर अवाक। मेरे से भी बड़ा कोई दुस्साहसी, दारू के मामले में है, ये जानकर अंदर से अति प्रसन्नता हुई लेकिन दुख ये हुआ कि यह डायलाग आज तक मुझे क्यों नहीं पता था। फिर सोचा, चलो, आज ही इसे सीख लेता हूं। उसके बाद अगले कई हफ्तों तक अपने पियक्कड़ दोस्तों से यही डायलाग बोलता रहा- गजब चीज है दारू भी। मेरी तो अंतिम इच्छा है कि जब मैं मरूं तो मदिरा मेरे सामने रखी हो और गंगा जल की जगह मेरे मुख में मदिरा जल डाला जाए ताकि मौत को भी मजे-मजे से इंज्वाय कर सकूं। मैं देखता था कि यह बात सुनकर मेरे पियक्कड़ दोस्त आंखें गोल-गोल नचाने लगते थे और मेरी क्रिएटिविटी, मेरी सोच पर मुग्ध हो जाते थे। सही कहूं तो विश्वविद्यालयी लाइफ और कम्युनिस्ट पार्टी की कामरेडगिरी छोड़ने के बाद दारू का जो स्वाद चखा तो मैं अंदर से हिल गया था।

दारू- एक ऐसी चीज जो मिनटों में आपको आपसे अलग कर बिलकुल अलग-सा आप बना देती है। जो नहीं बोल पाते, बोलने लगते हैं। जो नहीं सोच पाते, सोचने लगते हैं। जो काम नहीं  कर पाते, करने लगते हैं। जिनका विजन क्लीयर नहीं होता, वो बिलकुल साफ-साफ परिदृश्य देखने-समझने लगते हैं। जो चीजें नहीं हासिल कर पाते, वे सब कुछ हासिल करने लगते हैं। जो जिंदगी में कुछ भारी-भरकम सा झेल नहीं पाए, दारू पीकर झेलने लगते हैं। मैंने पत्रकारिता के करियर के ज्यादा बड़े फैसले दारू के नशे में लिए। बिन पिए फैसले लेने की कोशिश करता हूं तो उसमें दुनियादारी, घर-परिवार, नफा-नुकसान… मतलब ढेर सारा माया जाल जुड़ा होता है। ऐसे में फैसला-वैसला लेना तो दूर, खुद को बड़ा दीन-हीन सा आदमी महसूस करने लगता हूं। पीकर जब सोचता और फैसले लेता हूं तो तड़ाक से नतीजे पर पहुंच जाता हूं। बाद में तो मैंने आदत बना ली। कभी किसी मुद्दे पर निर्णायक फैसला लेने का मन करता तो मन ही मन अपने को समझाता हूं कि रात में पीकर तय करूंगा। और रात में जो फैसला होता, उससे भले ही मेरा कितना भी फायदा या नुकसान हुआ, फैसला होता बिलकुल सटीक है।

किसी बड़े पद पर बैठे आदमी की नीचता देखकर उसे नीच कहने की हिम्मत दारू के नशे में ही जुटा पाता हूं। किसी कल्लू टाइप के कुत्ते की टेढ़ी पूंछ को सीधी  करने के लिए गरियाने की हिम्मत दारू के नशे में ही जुटा पाता हूं। दिन में लगता है कि छोड़ो यार, जो करता है करने दो साले को। एव्याड करो। लेकिन रात में लगता है कि नहीं, उस पूंछ को बताना चाहिए कि तू कितना बदबूदार पूंछ है। दारू के नशे में दैनिक जागरण, लखनऊ से लेकर दैनिक जागरण, मेरठ तक में क्या-क्या बवाल किया, क्या-क्या सीखा, क्या-क्या झेला, उसे लिखने बैठूं तो रवींद्र कालिया की ‘ग़ालिब छुटी शराब’ से बड़ा माल तैयार कर दूं लेकिन अभी इरादा नहीं है।

आई-नेक्स्ट, कानपुर में जब अपने मुंबइया संपादक पवन चावला ने नाक में दम कर दिया तो फिर मैंने निर्णायक फैसले लेने के लिए दारू का सहारा लिया। दारू में ही सभी ‘गुप्ताज’ को एक साथ एसएमएस कर दिया… इस्तीफा, इस्तीफा और इस्तीफा। अगले दिन इत्मीनान से टांग फैलाकर सोया कि चलो मुक्ति मिली। अब कुछ दिन गांव-घर में दोस्तों-यारों के साथ घूमे टहलेंगे। बच्चों की छुट्टियां हो ही रही हैं। एक पंथ दो काज हो जाएगा। चावला की चिरकुटई से मुक्ति मिली और घर-गांव घूमने का शानदार मौका भी मिल गया। पर आप जो सोचते हैं वैसा कहां हो पाता है। एक गुप्ता ने आफिस बुला लिया और हम सभी की, जिसमें चावला भी थे, बैठक बुलाकर माजरा जानने की कोशिश की तो मैंने रात में ज्यादा पी गई दारू के हैंगओवर की ऊर्जा के सहारे चावला की सारी चिरकुटई बयान कर दी। चावलाजी की लाल-लाल बड़ी-बड़ी आंखें मुझे काट खाने को आतुर थीं लेकिन गुप्ताजी ने साफ-साफ संदेश दे दिया कि आप तीनों वरिष्ठ मेरे प्यारे हैं, इसलिए हे प्यारों, मिलजुल कर रचो,  आपस में लड़ो मत। नौकरी तो नहीं गई लेकिन चावला के तेवर थोड़े ढीले हो गए। वो सोचने लगा कि ये ससुरा बड़ा पग्गल है, मिल-मिलाकर ही रहो वरना फाड़ देगा। पर ये मेल-मुलाकात कुछ दिनों तक ही रहा। मुंबइया पत्रकार ने ज्यादा बड़ी साजिशें शुरू कर दीं और मैं ठहरा ठेठ देहाती स्पष्टवादी। कुछ कान के कच्चे वरिष्ठ लोग इस मुंबइया पत्रकार के मेरे खिलाफ बिछाए गए जाल में फंस गए और फिर शुरू हुआ मेरे मनोवैज्ञानिक टार्चर का दौर। इस दौर से जल्द ही उबर गया।

एक रात जमकर पी। मैं यहां बता दूं कि ज्यादातर दारूबाजी मैं अपनी कार में ही करता हूं और अकेले होता हूं। मेरे दुश्मनों के लिए यह महत्वपूर्ण सूचना हो सकती है। खैर, उस रात नुसरत फतेह अली खान को देर तक जोर-जोर से सुनता रहा। कार से कानपुर के कुत्तों को मारता रहा। बड़े ढीठ हैं कनपुरिया कुत्ते। साले बीच सड़क पर ऐसे इत्मीनान से लेटे रहते हैं जैसे उनके बाप ने सड़क बनाई हो। वे कार वालों से ही उम्मीद करते हैं कि दाएं-बाएं से होकर निकल जाएं, उन्हें न छेड़ें। मैं ठहरा उनसे बड़ा कुत्ता, सो उन कुत्तों को निपटाना शुरू किया। हर रात आठ से दस कुत्तों पर कार चढ़ाने लगा। ढीठ इतने कि बेहद नजदीक आने पर भी वे कार से नहीं डरते और जब कार चढ़ जाती तब ये सोचते हुए कि अरे साला, ऐसा भी हो सकता है, कांय-कांय करते हुए लंगड़ाते-चिल्लाते भागते। बाद में तो ऐसा हो गया कि ‘खूनी कार’ को देखते ही कई चौराहों के कुत्ते इकट्ठे हो जाते और कूद-कूद कर भौं-भौं करते-करते मेरा अंतिम दम तक पीछा करते। वे दिन के वक्त भी ‘खूनी कार’ को पहचानने लगे थे। मेरे स्थायी पियक्कड़ दोस्तों ने बताया कि मैं कानपुर में करीब डेढ़ सौ कुत्तों पर कार चढ़ा चुका हूं। वे पूछते कि ऐसा क्यों करते हैं आप। तो मैं इसका जवाब भी काफी खतरनाक देता। इस जवाब में सच्चाई कम, शेखी बघारने का भाव ज्यादा था। कहता- इसलिए मारता हूं ताकि कभी किसी हरामी संपादक को सड़क पर कार से ठोंक दूं तो मेरा वकील कोर्ट में मुझे बेगुनाह साबित करने के लिए कह सके कि योर आनर, इस आदमी को कुत्ते मारने की सनक उर्फ बीमारी है और रात में संपादक उसे कुत्ते की तरह नजर आया जिसके कारण उसने अनजाने में इस पर कार चढ़ा दी। इस सबके चलते संदेह का लाभ देकर कोर्ट से मैं बरी कर दिया जाऊंगा। मेरे कनिष्ठ साथी आंखें फाड़कर यह बात सुनते और मेरे खतरनाक दिमाग से मन ही मन डरने लगते।

सच कहूं तो मैं अंदर से क्रूर कभी नहीं बन पाया। जो बुरा महसूस किया उसे तुरंत मुंह से सामने वाले के सामने निकाल दिया, उसके बाद अपन का मन चंगा। सामने वाले का मन कसैला या विषैला हुआ तो हुआ करे। शायद मन और मिजाज हलका रखने का इससे आसान तरीका कोई नहीं। वरना जमाने के गम इतने हैं कि ब्रेन हैमरेज होने के बाद भी आपका पीछा न छोड़ें। फिर रास्ते पर लौटते हैं, मैं ऊपर बता रहा था कि मनोवैज्ञानिक टार्चर का दौर शुरू हुआ तो एक रात कार में पीते हुए, नुसरत फतेह अली खान के ……पिलाओ साकी पिलाओ, कि रात बाकी है… चलाओ दौर चलाओ कि रात बाकी है…. को सुनते हुए एक एसएमएस लिखा, जागरण के सभी ‘गुप्ताज’ को, और सेंड कर दिया। अबकी थोड़ा कड़ा एसएमएस था ताकि सुबह नशा उतरने के बाद भी अगर मैं दुनियादारी बुद्धि के वशीभूत होकर ‘गुप्ताज’ से अपील करूं कि प्लीज, मुझसे गलती हो गई, मुझे मत निकालो तो ‘गुप्ताज’ इससे भी न पसीजें और एसएमएस की भाव-भंगिमा से क्रोधित होकर मेरा एसएमएसी इस्तीफा हर हाल में स्वीकार कर लें। मुझे तब तक साफ-साफ पता चल गया था कि मैं यशवंत, दो तरह का आदमी हूं। एक रात में पीने के बाद वाला और एक दिन में बिना पिए वाला। दिन में बिना पिए वाला बड़ा प्रोफेशनल, टू द प्वाइंट, टारगेट पर नजर रखने वाला और रात में पीने के बाद विशुद्ध संत, सहज, सच का सामना करने-कराने वाला व बुद्धि की बजाय दिल की सुनने वाला। तो गुप्ताज ने उस इस्तीफे को वाकई स्वीकारा और मुझे कई वरिष्ठों के किंतु-परंतु-लेकिन के बावजूद मुक्त कर दिया।

इस्तीफे के बाद कार ड्राइव करते हुए पहली बार गाजीपुर वाले अपने गांव पहुंचा। बाद में पता चला कि गांव की कुछ महिलाएं आपस में बात करते हुए कहने लगी थीं कि देखलू, इ लइका पहिले से ही बड़ा तेज रहे, आज इ नाम रोशन कई देहलस, अपन कार खरीद लेहलस।  अब उन्हें कौन बताए कि अमर उजाला की पांच साल की नौकरी से मिले पीएफ के फंड को कार में झोंक दिया और हर महीने साढ़े पांच हजार की किश्त आज भी भरता हूं। दरअसल, उसी अपने गांव में जब मैं कम्युनिस्ट पार्टी के दिनों में दाढ़ी बढाए, फटा-पुराना कपड़ा पहने चमटोली में ढपली बजाता तो मेरी मां अपने घर में जार-जार रोतीं। कहतीं कि किसी ने मेरे बेट पर जादू-टोना कर दिया है, इसका दिमाग फिर गया है। पढ़ने में इतना तेज लेकिन नौकरी करने की जगह गांव-गांव में ढपली बजाते, नाटक करते फिर रहा है। उसी गांव में एक दिन कार से पहुंचा तो लोगों को बड़ा अच्छा लगा। दुनिया सफलता को ही सलाम करती है, यह सुना तो था पर महसूस उस दिन किया। और सफलता भी बहुत बड़ी न हो तो भी चलेगा। आप गांव के हैं, गरीब घर के हैं और किसी रोज अपनी कार से वहां पहुंच जाएं तो पड़ोसियों की जले जान, आपकी बढ़े शान  की भावना पैदा होना लाजिमी है। पटरी से फिर उतर गया हूं, वापस लौटता हूं लेकिन लेखन हो या जिंदगी, पटरी से उतरने में ही असल मजा है। नाप-तौल कर और बने-बनाए पैमाने पर चलने वाले सब हैं। पर देर तक पटरी से उतरे रहना भी कष्टकर होने लगता है। इसलिए आइए, कम से कम इस लेखन में पटरी पर लौट चलें और आपको पटरी से उतरने के दुख से मुक्त रखें।

यशवंत : जहाज से दुनिया दर्शनकानपुर और लखनऊ से आई-नेक्स्ट लांच कराने के बाद आफिस के अंदरूनी चूतियापे के कारण एडिटोरिय इंचार्ज पद से इस्तीफा देकर तीन महीने तक गांव रहा और संयोग बना कि फिर जागरण में ही लौट आया। अबकी दिल्ली में रखा गया, इस नसीहत के साथ कि पीना-पिलाना कम। बात सबको पता चल चुकी थी कि लड़का काम का है पर पीकर हत्थे से उखड़ जाता है। संजय गुप्ता के सामने उनके निर्देश का अक्षरशः पालन करने की गारंटी देने के बाद भी उसी रात फिर पी। वजह- दिल्ली आ गया, दिल्ली वाला हो गया, फिर तो पीना बहुत जरूरी है, दिल्ली को समझूंगा-बूझूंगा कैसे? रोज पीता और किसी पुराने देलहाइट के साथ नोएडा से दिल्ली तक का चक्कर कार से मारता। रास्ता समझने का जुनून सवार था। मुझे दिल्ली में आकर लगा कि मुझे इतना ही बड़ा शहर चाहिए था जहां निकलो तो रास्तों और शहर का अंत न मिले। कानपुर, मेरठ, बनारस, आगरा….. बकवास लगने लगे। मुझे अपने आई-नेक्स्ट से इस्तीफे देने के फैसले पर गर्व महसूस होने लगा। यह भी महसूस हुआ कि मैंने दिल्ली आने के वास्ते अमर उजाला में आगरा का तबादला स्वीकारा। जागरण, मेरठ ज्वाइन किया। कहीं न कहीं दिल में अरमान यही था कि दिल्ली पहुंचना है और ये मेरठ-आगरा जैसे शहर दिल्ली के बेहद करीब हैं। पर दगाबाज दिल्ली ने मुझे तब तक अपने से दूर रखा जब तक मैंने इसके करीब होने-रहने की कोशिश की। जब कानपुर गया और वहां से इस्तीफा देकर गांव रहने लगा तब दिल्ली ने बुला लिया।

जागरण, नोएडा की नौकरी के पांच-छह महीने होने को आ चुके थे। छह महीने में मैं किसी भी काम से बोर होने लगता हूं। सब कुछ दुहराव सा और मोनोटोनस सा लगने लगता है। लगने लगा कि मुझे अब कहीं टीवी-सीवी में चलना चाहिए। वहां तनख्वाह लंबी-चौड़ी मिलती है और एक्सपोजर भी भयंकर है। टीवी के संपादकों के नंबर जुगाड़ना शुरू किया। विनोद कापड़ी तब स्टार न्यूज में हुआ करते थे और उनके बारे में अपने कानपुर, आगरा, बनारस के दिनों में कइयों के मुंह से काफी संघर्षगाथा-सफलतागाथा सुन चुका था। लगा कि सबसे परिचित शख्स यही है। इसी को पटाओ। जागरण, नोएडा के सेंट्रल डेस्क से तब रात दस बजे छूटना होता था। तब तक दिल्ली की दारू की दुकानें बंद हो चुकी होती थीं लेकिन नोएडा में ग्यारह बजे तक यह कारोबार चलता। पव्वे के दो पैग पीने के बाद, जब कपार में रासायनिक क्रिया शुरू होने लगी, विनोद कापड़ी को फोन लगाया और भाई साहब नमस्कार, मैं यशवंत बोल रहा हूं सर, आपका बड़ा नाम सुना है, फलां-फलां आपकी चर्चा और तारीफ करते हैं, मैं भी दिल्ली में हूं, आपसे मिलना चाहता हूं सर……टाइप की झूठी-सच्ची-मक्खनयुक्त बातें बकना शुरू किया। विनोद कापड़ी ठहरे टीवी के और दिल्ली के संपादक, सो, ऐसे सैकड़ों फोनों को रोज सुनने के आदी थे और उनका जवाब भी ऐसे फोनों के लिए सेट हो गया रहा होगा, उसी के परिणामस्वरूप मुझे हड़का लिया… इतनी रात को फोन कर रहे हो…..। आगे क्या-क्या हुआ मुझे ठीक-ठीक याद नहीं लेकिन रात भर गाली-गलौज हुई और कापड़ी साहब ने मेरा स्टिंग कर लिया, मेरी गालियों को विधिवत तरीके से रिकार्ड कर लिया और संजय गुप्ता के पास सुबह को रवाना कर दिया। गुप्ता जी के हनुमान विनोद शील वगैरह तेजी से सक्रिय हुए और मेरा काम तमाम। तो उस रात की नशेबाजी में नौकरी मिलने के बजाय नौकरी चली गई। अब सोचता हूं कि कापड़ी को धन्यवाद कहना चाहिए, वरना मैं अभी तक जागरण में ही तेल पेर रहा होता। नया कुछ करने-रचने में दोस्तों ने कम, दुश्मनों ने ज्यादा योगदान किया, इसलिए दुश्मनों को मैं हमेशा सलाम करता हूं। उनका एहसान मानता हूं। न वे दुख देते, न मैं नए रास्ते तलाशता।

यह सब लिखने के पीछे मेरा मकसद सिर्फ एक है। दारूबाजी के प्रकरण पर बतियाना। मैंने भड़ास4मीडिया के लिए जितने भी संपादकों-वरिष्ठों के इंटरव्यू किए, सभी से पूछा कि वे पीते हैं या नहीं। नहीं पीते हैं तो कोई बात नहीं। पीते हैं तो कौन सा ब्रांड पसंद है। एक मेरे मित्र कहते हैं कि तुम्हारा दारू प्रेम हर जगह झलकता और छलकता रहता है। अभी कल की ही तो बात है। रात में पीकर वायस आफ इंडिया के आफिस पहुंच गया। सोचा, जो लोग एकदम से सड़क पर आ गए हैं, उनकी लड़ाई में शरीक होना चाहिए। यह निर्णय दारू पीकर ही कर सकता था। बिन पिए तो सोचता हूं कि यार, दुनिया में बहुत लोग दुखी हैं, क्या करूं, सबको अपना-अपना हिस्सा जीना और लड़ना है, वे लड़ें, मरें, मेरे से क्या। पर रात में लगता है, नहीं मुझे उनकी लड़ाई का साथी बनना चाहिए। खुद की जिंदगी जी तो क्या जी। ऐसे तो जानवर भी जी लिया करते हैं। वीओआई आफिस पहुंचा और खुद को दर्जनों वीओआईकर्मियों से घिरा पाया। उनके मन में ढेर सारी भड़ास थी। उनने निकाली। मेरी भी भड़ास सुनी। फिर शुरू हुआ गाने-बजाने का दौर। रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे…. जउन मलिकवा के पिया मोर नौकर…. पड़ि जाए छापा मालिक जेल जाए रे…. रेलिया बैरन….

सड़क पर पालथी मारकर गोल-गोल बैठने-बतियाने का सुख। रात बढ़ती गई। लोग अपने घरों के लिए निकलते गए। दो-चार साथी मेरे साथ बचे रहे। एकाएक तलब उठी… काश, एक पैग और होता। इच्छा हुई नहीं कि निकल पड़े खोजने। ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ा। स्थानीय जानकार ने बंदी के समय भी खुली रहने वाली दुकान के बंद शटर तक पहुंचाया और वह खुद झुककर शटर के नीचे बारीक से छेद में हाथ डाल, नोट थमा, एक अद्धा, शायद पौव्वा, ठीक से याद नहीं आ रहा, ले आया। पहले से ही फुल टल्ली मैं और मेरे कुछ साथी, फिर पिए और पीने के बाद सड़क किनारे खडी दो कारों के बीच बचे स्पेश में डांस करने लगे। कार का एफएम फुल साउंड में आन। दे दनादन नाच शुरू। सड़क छाप नाच। नाच नहीं, इसे लेटनाइट योगा कहिए। ओशो कहते हैं कि जरूर नाचो। न आता है तो भी नाचो। नाचो मतलब, शरीर का जो हिस्सा जैसे भी हिलाने-ढुलाने का मन कर रहा है, हिलाओ-डुलाओ। खूब हिलाओ-डुलाओ। थक जाओ। फिर ध्यान का प्रयास करो। ध्यान में तब शरीर सपोर्ट करेगा। विशेष फरमाइश पर फिर वही गाना शुरू…. रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे…. जउने मलिकवा के, नहीं मित्तलवा के, पिया मोरी नौकर…. पड़ जाए छापा, मित्तल जेल जाए रे, रेलिया बैरन….

साथी लोग उलटने लगे। निट पीने का दौर जो शुरू हो चुका था। एक उलटी कर रहा था तो दूसरा उसकी पीठ थपथपा रहा था। उलटने वाला बोल रहा था, अरे नहीं, कुछ नहीं हुआ है, सब ठीक हो जाएगा। यह कहकर वह पीठ ठोंकने वाले को ही तसलल्ली दे रहा था कि ज्यादा टेंशन नहीं लेने का। गजब का भाईचारा होता है पीने के बाद। देर रात तक चले संगीत के इस अखिल भारतीय कार्यक्रम से मुक्त होकर और शराबी साथियों के गले मिलकर घर की ओर लौटने लगा तो मुझे होश नहीं कि मैं कैसे गाड़ी ड्राइव कर रहा था। एक मेरे मित्र कहते हैं कि ज्यादा दारू पीने के बाद आप ड्राइव नहीं करते, भगवान गाड़ी चलाने लगते हैं, आप तो केवल हाथ-पैर घुमाते-दबाते रहने वाले निमित्त मात्र होते हैं। मुझे भी अब यह सच लगने लगा है। जब बिलकुल होश नहीं तो फिर गाड़ी बिलकुल सही-सही कैसे चलती जाती है।

रात के तीन बज चुके थे। सीधे घर नहीं गया। एक बड़े पार्क में घुसा और घांस पर सो गया। उपर आसमान निहारने लगा। फैलाव को समेटने लगा। कुछ देर में नशे के अतिरेक और भावनाओं के आड़ोलन से कुछ बूंदें आंखों से ढुलक पड़ीं। वजह कुछ खास समझ में नहीं आ रहा था लेकिन लग रहा था कि जीवन के प्रति नैराश्य भाव पैदा हो रहा है। हर चीज से बहुत जल्द मोहभंग होता जा रहा है। कहीं कुछ नहीं है जो बांध कर रख सके। आकर्षित कर सके। आकर्षण केवल अकेले रहने, घूमने, गाने-बजाने, आंखें बंद कर लेटे रहने में बचा रह गया है। ऐसा शायद इसलिए कि यही सब केवल नहीं कर पा रहा हूं और जो आप नहीं कर पाते हैं, वह आपको लुभाता है। मुझे अंदर से लगने लगा है कि मैं बहुत दिन तक दुनियादारी में नहीं फंसा रह सकता। एक मित्र से मैंने ये इरादा बताया तो उन्होंने मेल कर समझाया- गृहस्थ सजिए, बनिए मत। संन्यासी बनिए, सजिए मत। मतलब साफ है। संत और गृहस्थ में बाहरी फर्क केवल चोला का होता है। अगर चोला न रहे तो गृहस्थ-संत में भेद केवल उसकी सोच के आधार पर ही किया जा सकता है। मन करने लगा है कि भड़ास आश्रम बना ही लेना चाहिए। लोग कहते हैं दिल्ली-एनसीआर में कहीं जमीन देखो। मकान देखो। मुझे लगता है पूरी दुनिया जमीन-मकान के लिए पागल है। यही मैंने भी किया तो क्या किया। जमीन देखना है पर आश्रम के लिए। भड़ास आश्रम- एक ऐसी जगह जहां गीत-संगीत, भोजन, ध्यान, अध्यात्म, पढ़ाई, तकनीक सब कुछ हो। इनके ढेर सारे प्रयोग हों। बात फिर पटरी से उतर गई है। लौट आते हैं।

कुछ दिनों पहले मुंबई गया था। इंटरनेशनल सेमिनार था। आने-जाने का जहाजी टिकट मिला, सो दो दिन घूम लेने का इरादा बना लिया। सुबह 5 बजे फ्लाइट थी लेकिन रात एक बजे तक दारू पीने के बाद सोया तो ठीक साढ़े चार बजे उठा। एलार्म भी काम न आया। भागते-भूगते एक घंटे में दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचा तो फ्लाइट फुर्र हो चुकी थी, सो उसी एयरलाइंस की दस बजे सुबह वाली अगली फ्लाइट को हजार रुपये एक्स्ट्रा देकर बुक करा लिया। अब तीन घंटे का खाली वक्त बिताएं कैसे। एयरपोर्ट पर घूमते-घामते बार पर नजर पड़ी तो अंदर घुस गया। फिर पीना शुरू कर दिया। चार सौ रुपये प्रति पैग के हिसाब से। ये मत पूछिएगा कि उस वक्त तो एयरपोर्ट वाले बार में ड्रिंक सर्व नहीं होता फिर पिया कैसे। जहाज की यात्रा अगर पी के की जाए तो उसके कई फायदे हैं। एक तो आप अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक दबाव से मुक्त रहते हैं। मुंबई पहुंचा। दिन भर के सेमिनार के बाद एक मित्र के साथ शाम को ‘कमीने’ देखी। फिर अपने दिल की बात उनके सामने जाहिर की। बार गर्ल्स के दर्शन करने की। मैंने सुन काफी रखा था लेकिन आज तक बार गर्ल्स वाले अड्डों को देखा नहीं। देखा भी तो केवल टीवी और सिनेमा में। मित्र का मुंबई में भौकाल है। सो एक हाई-फाई बाल गर्ल्स वाले अड्डे पर मुझे लेकर पहुंच गए। दादा टाइप लोग सफारी सूट में आने-जाने वालों पर कड़ी नजर रखे हुए थे। अंदर घुसा और एक जगह विराजा। आधा दर्जन लड़कियां, विभिन्न साइज वाली, भिन्न-भिन्न उम्र वाली, भिन्न-भिन्न पाशोक वाली बार के बीच में हौले-हौले थिरक रहीं थीं। राउंड टेबल की तरह गोलाई में बैठे और ड्रिंक ले रहे हर क्लाइंट पर प्यार भरी नजर फेर रहीं थीं। मैं ठहरा देहाती सो एकदम अचकचा गया। इतनी सुंदर बालाओं की नजरों का सामना करने की हिम्मत न हो पा रही थी। सो, मैं टीवी पर चल रहे क्रिकेट को देखने लगा।

जब सामने पैग आया तो फटाफट पीने लगा। मुझे पता था जब तक पांच-छह पैग अंदर नहीं उतरेगा, इस माहौल में सहज नहीं रह सकूंगा। दो घंटे तक टीवी देखने और आर्केस्ट्रा के गीत सुनने के बाद दोस्त वहां से मुझे लेकर एक अन्य बार गर्ल्स के अड्डे पर पहुंचा। तब तक मैं रौ में आ चुका था। अगले अड्डे पर कुछ पैग और मारे फिर आर्केस्ट्रा वालों से फरमाइश कर डाली- दिल के टुकड़े-टुकड़े करके… सुनाओ। उनने गाया तो मुझे मजा आने लगा। फिर कहा कि मेरे प्यार की उमर हो इतनी सनम… सुनाओ। बढ़िया सुनाया पर बीच में कुछ शब्दों पर अटका तो उनका माइक मैंने थामा और उन लाइनों को गा कर सुनाया। महफिल ने तालियां बजाईं, मेरा देहाती मन प्रसन्न हुआ।

 

मुंबई के डिस्को-थे का एक दृश्य 

इन दोनों ही अड्डों पर पैसे लुटाए, उड़ाए और बहाए जा रहे थे। लड़कियां सिर्फ पैसे बटोर रहीं थीं। लोगों के सामने जा-जाकर डांस कर रहीं थीं। प्यार से नजरें फेर रहीं थीं। किसी के कान में कुछ कह रही थीं तो किसी से अपने कान में कुछ सुन रहीं थीं। पूरा मादक सा माहौल। मैंने पांच सौ रुपये का नोट गाना गाने वालों को दिया, जिसने मेरी फरमाइश पर दो गाने सुनाए थे। मुझे अब अफसोस हो रहा है कि क्यों दिया। पर जो हो गया उसे अच्छा मानना चाहिए की तर्ज पर आगे बढ़ता हूं। वहां से निकल कर हम लोग तीसरे अड्डे पर पहुंचे जो एक हाईप्रोफाइल डिस्को-थे था।

 

मुंबई के डिस्को-थे का दृश्य नंबर दो

यहां लड़कियां ज्यादा, लौंडे कम थे। सब रइस घरों के। कई नामी फिल्मी निर्माताओं के लौंडे भी थे। भीतर का पत्रकार जाग उठा। चलो, इस मस्ती को मोबाइल में कैद करता हूं। पर लोग कैसे मानेंगे कि इस मस्ती भरी जगह में मैं था, तो चलो अपनी शक्ल भी बीच में मोबाइल से शूट कर लेता हूं। हालांकि ऐसी जगहों पर वीडियो बनाना सख्त मना होता है लेकिन अपने भौकाली मित्र की माया से वीडिया भी बनाने में कामयाब हो गया।

सुबह चार बजे के करीब होटल लौटा। आधी बोतल से ज्यादा पी चुका था लेकिन पिए हुए होने का एहसास न था। एक ऐसी दुनिया में कुछ घंटे बिताए थे जहां होना मेरे लिए इस जन्म में असंभव सी बात थी। उन यादों को सहेजने में जुट गया। अच्छा-बुरा समझने में जुट गया। कह सकता हूं कि उस रात की दारूबाजी ने मुझे मुंबई की मस्ती को वाकई जीने का मौका दिया। खासकर उस दोस्त को थैंक्स जिसने यह मौका उपलब्ध कराया। अब मुझे लगता है कि ये जो मस्ती है, बेहद ‘सस्ती’ और ‘मायावी’ है। इनसे दूर रहो तो ही भला। लेकिन दूर रहने के लिए आपको एक बार पास जाकर बूझना तो पड़ेगा ही वरना खट्टे हैं अंगूर टाइप मामला हो जाएगा।

अंत में, न्यूज चैनल ‘आज तक’ में दारू पर लगाई गई पाबंदी के बारे में कहना चाहूंगा कि हर संस्थान को अपने यहां अनुशासन व नियम-कानून बनाने के हक हैं। दारू पीकर काम करना मैं उचित नहीं मानता क्योंकि इससे नुकसान ढेर सारे हैं, फायदे बहुत कम। मैंने अपने 12 वर्षों के अखबारी करियर में आफिस में कभी पीकर काम नहीं किया। पीना-पिलाना आफिस के बाहर अच्छा लगता है। फिर, पीकर अगर आप आफिस का काम करें तो वह तो और भी बेकार चीज है। पीकर आदमी अपने खुशी-गम को जीता है, न कि ‘लाला’ की दुकान चलाता है। दारू पर जितनी भी चर्चा करेंगे हम लोग, वह कम पड़ जाएगी इसलिए फिलहाल यहीं से विदा लेता हूं।

आपने धैर्य के साथ इत्ता सारा पढ़ा, इसके लिए दिल से आभार। कैसा लगा, जरूर बताइएगा…


लेखक यशवंत सिंह मीडिया की खबरों के सबसे बड़े पोर्टल भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं। यशवंत से संपर्क के लिए yashwant@bhadas4media.com का सहारा ले सकते हैं।

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Comments on “दारू का साथ, जिंदगी के उतार-चढ़ाव

  • shekhar pandit says:

    hmmmmm………………… matlab eak to ye baat hai ki eak botel ka kaam tamam ho gaya padhte padhte . magar janaab ab sharaab ko badnaam karne waale hi milte hai . bahut khushi hui harivansh ray bacchan aur neeraj ke baad “eak aur yashvant” sharaab ka naya naamvar mila. subhaanallah bahut khub. jaipur aana ho to khabar digiyegaa vyvastha rupi prabndh ke liye intzaar rahega.

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  • sandhydeep kashiv says:

    dearji nacha sharab main hota to nachti botal. thik hai. aap ka sharab sagar padkar sharabi film yaad aagi. thanks sir 9300720081

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