गासिप अड्डा में खबर पर सुशील के घर पुलिस पहुंची

राजनीति से लेकर धर्म-अध्यात्म और मीडिया से जुड़ी सत्य और कहीं न प्रकाशित होने वाली घटनाओं को विश्लेषणात्मक अंदाज में अपनी वेबसाइट गासिप अड्डा डाट काम पर पब्लिश करने वाले पत्रकार सुशील कुमार सिंह पुलिस के शिकंजे में आते दिख रहे हैं। बताया जा रहा है कि गासिप अड्डा डाट काम के मीडिया गासिप कालम में दैनिक हिंदुस्तान, लखनऊ से जुड़ी एक खबर प्रकाशित करने पर उनके खिलाफ लखनऊ में मुकदमा दर्ज करा दिया गया है। मीडिया से जुड़े लोगों द्वारा मुकदमा दर्ज कराने पर पुलिस ने आनन-फानन में एक टीम सुशील कुमार सिंह के दिल्ली स्थित उनके आवास पर भेज दिया। भड़ास4मीडिया प्रतिनिधि ने सुशील कुमार सिंह से मोबाइल पर संपर्क किया और उनसे पूरे मामले की जानकारी ली। उन्होंने स्वीकार किया कि पुलिस उनके घर के बाहर खड़ी है।

उन्हें किसी भी क्षण गिरफ्तार किया जा सकता है। सुशील ने साफ तौर पर कहा कि ब्लागिंग, मोबाइल, वेबसाइट के इस न्यू मीडिया के दौर में अपनी बात खुलकर कहने वालों को पुलिस के जरिए डराने-धमकाने की यह कुत्सित साजिश है। इस साजिश में शामिल हैं मीडिया से जुड़े कुछ मठाधीश जिन्हें अपने खिलाफ कुछ भी लिखा जाना बर्दाश्त नहीं।

सुशील के मुताबिक उन्हें भले ही जेल जाना पड़े लेकिन वे इस मुद्दे पर झुकेंगे नहीं। सुशील कुमार ने बताया कि अगर इसी तरह अखबारों में छपी खबरों पर पीड़ित पक्ष रिपोर्ट लिखा दिया करे और पुलिस आकर सब-एडीटरों व संपादकों को गिरफ्तार कर ले तब तो चल चुका चौथा खंभा। पर इसी चौथे खंभे से जुड़े लोगों के बारे में जब ब्लागों और वेबसाइटों पर खबरें प्रकाशित व प्रसारित की जाती हैं तो  मीडिया के कुछ मठाधीश तिलमिला जाते हैं। ये बजाय अपना चाल, चरित्र और चेहरा सुधारने के, आवाज उठाने वाले को ही नष्ट करने पर उतारू हो जाते हैं।  न्यू मीडिया के इस दौर में पत्रकार तो पत्रकार, अब आम जनता को भी ब्लाग व वेबसाइटों के जरिए अपनी बात कहने का अधिकार है। अखबारों में भी गासिप के कालम होते हैं जिसमें राजनेताओं से लेकर नौकरशाहों तक की करतूतों के बारे में लिखा जाता है। अगर वेब माध्यमों के जरिए परंपरागत मीडिया के खेल-तमाशे को उजागर किया जा रहा है तो इससे मीडिया के कुछ मठाधीशों के पेट में दर्द क्यों उठने लगता है?

सुशील कुमार सिंह का कहना है कि देश के सभी ब्लागरों और वेबसाइट संचालकों के साथ लोकतंत्र में आस्था रखने वाले लोगों के लिए यह प्रकरण चेतावनी है। हम सब अब नहीं जागे और एकजुट नहीं हुए तो कल किसी की भी बारी आ सकती है। सुशील ने भारत समेत पूरी दुनिया में विस्तार ले रहे न्यू मीडिया को न बढ़ने देने के लिए परंपरागत मीडिया के मठाधीशों द्वारा की जा रही साजिश की निंदा की। उन्होंने इस लडाई को सड़क से लेकर संसद तक लड़ने की घोषणा की। उन्होंने सभी ब्लागरों और वेबसाइट संचालकों से अपील की कि वे अपने-अपने ब्लाग पर इस कृत्य के खिलाफ खुलकर लिखें और परंपरागत मीडिया के मठाधीशों को अपनी ताकत का एहसास कराएं। अगर वो दो चार लोगों की आवाज दबाएंगे तो दो चार सौ नए लोग आवाज उठाने के लिए आगे आएंगे।

इस मामले में भड़ास4मीडिया का मत है कि सुशील कुमार को पुलिस के जरिए डराने की यह कार्रवाई अभी शुरुआत मात्र है। इस तरह के मामले आगे और ज्यादा सामने आएंगे। संभव है कि कल भड़ास4मीडिया से जुड़े लोगों और ऐसे अन्य सच बयां करने वाले ब्लागों और वेबसाइटों के संचालकों को निशाना बनाने की कोशिश की जाए। ऐसे में हम सभी का फर्ज है कि अपने-अपने न्यू मीडिया माध्यमों के जरिए इस अलोकतांत्रिक कार्रवाई की निंदा करें। भड़ास4मीडिया सुशील के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने का ऐलान करता है।

वरिष्ठ पत्रकार आलोक तोमर ने इस प्रकरण के बारे में भड़ास4मीडिया से कहा- ‘मीडिया के मठाधीशों द्वारा सत्ता के सहारे पुलिस का कमीनेपन भरा उपयोग फिर सामने आ गया है। मैं खुद इस तरह के मामलों का भुक्तभोगी होने के नाते अपने सभी साथियों से आग्रह करता हूं कि वे मन, वचन और कर्म से सुशील कुमार का साथ दें। अगर सुशील जेल में गए तो वे अकेले नहीं जाएंगे।’

उल्लेखनीय है कि वरिष्ठ पत्रकार सुशीर कुमार जनसत्ता में एक दशक से ज्यादा काम कर चुके हैं। इसके अलावा वे एनडीटीवी और सहारा जैसे न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं। मीडिया जगत में सुशील को बेहद शरीफ और भला आदमी माना जाता है।

बताया यह भी जा रहा है कि इस मामले में सुशील के खिलाफ सिर्फ लखनऊ में ही नहीं बल्कि कुछ और जगहों पर मुकदमा दर्ज है। हो सकता है कि उन्हें बेल लेने उन सभी जगहों पर जाना पड़े। ऐसे में सभी पत्रकार साथियों से अपील है कि वे सुशील कुमार के वहां पहुंचने के बाद उनका तन, मन, धन से सहयोग करें।

सुशील कुमार का मोबाइल नंबर 09811846463 है। आप उन्हें उनके सपोर्ट में एसएमएस भेज सकते हैं।

गासिप अड्डा डाट काम पर प्रकाशित जिस खबर के चलते रिपोर्ट लिखाने की बात कही जा रही है, उसे साभार यहां प्रकाशित किया जा रहा है। आप खुद भी गासिप अड्डा डाट काम पर जाएं और खबरों को पढ़ें व परखें।


उनकी आत्मा को शांति मिले

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी अखबार के मालिक का देहांत हो जाए और अपने ही अखबार में उसका फोटो गलत छप जाए। लेकिन यह कमाल किया हाल में हिंदुस्तान टाइम्स ने। उसने अपने हिंदी सहयोगी दैनिक हिंदुस्तान के कारनामों को पछाड़ते हुए के. के. बिरला के निधन पर जो तस्वीरें प्रकाशित कीं उनमें से एक तस्वीर किसी और की थी। उसके अगले दिन भूल-सुधार करते हुए अबार ने बताया कि पिछले दिन एक तस्वीर में कैप्शन गलत छप गया था। यानी फिर गलत सूचना दी गई, क्योंकि कैप्शन ही नहीं वह तस्वीर ही गलत थी क्योंकि वह किसी और की थी। अब इस दूसरी गलती के लिए भूल-सुधार की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी क्योंकि उसके बाद मालिक के निधन पर संस्थान में अवकाश था।

इतना ही नहीं, निधन वाले दिन हिंदुस्तान टाइम्स, लखनऊ में मार्केटिंग के एक सीनियर अधिकारी की फेयरवेल पार्टी थी जिसे स्थगित नहीं किया गया। इस कार्यक्रम में अखबार के सभी सीनियर लोग मौजूद थे। वहां मिठाई भी खिलाई गई और स्नैक्स भी। विदाई के रस्मी भाषण भी दिए गए। चौंकाने वाली बात यह है कि यह कार्यक्रम संस्थान के चेयरमैन के. के. बिरला की शोक सभा के मुश्किल से आधे घंटे बाद शुरू हुआ। फहमी हुसैन और नवीन जोशी इत्यादि जो आधे घंटे पहले बिरला जी को श्रद्धांजलि दे रहे थे अब कंपनी से जा रहे मार्केटिंग अधिकारी की तारीफ में कसीदे पढ़ रहे थे।

गासिप अड्डा डाट काम से साभार


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