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असल में, हमारा समाज और सरकारी व्यवस्था लोकतांत्रिक नहीं है

राजकिशोर: यह नागरिक जमात क्या होती है : जब भारत सरकार ने जन लोकपाल विधेयक पर अण्णा हजारे और उनके समूह के साथ दोस्ती कर ली, तभी मुझे शक हो गया था कि सरकार ने बहुत मजबूरी में यह समझौता किया है और उसके भावी इरादे ठीक नहीं हैं। जन लोकपाल विधेयक वाकई एक रेडिकल विधेयक है और वह संसद द्वारा पारित हो गया, तो भ्रष्टाचार के एक बड़े और अहम क्षेत्र को प्रदूषण-मुक्त किया जा सकता है।

राजकिशोर: यह नागरिक जमात क्या होती है : जब भारत सरकार ने जन लोकपाल विधेयक पर अण्णा हजारे और उनके समूह के साथ दोस्ती कर ली, तभी मुझे शक हो गया था कि सरकार ने बहुत मजबूरी में यह समझौता किया है और उसके भावी इरादे ठीक नहीं हैं। जन लोकपाल विधेयक वाकई एक रेडिकल विधेयक है और वह संसद द्वारा पारित हो गया, तो भ्रष्टाचार के एक बड़े और अहम क्षेत्र को प्रदूषण-मुक्त किया जा सकता है।

भारत सरकार को इस बात का पूरा एहसास था। इसीलिए जब तक अण्णा हजारे का अनशन शुरू नहीं हो गया, तब तक वह इस विधेयक पर बातचीत करने के लिए भी राजी नहीं थी। अनशन शुरू होते ही देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसा माहौल बन गया कि सरकार के हाथ-पाँव काँपने लगे। वह समझौता करने में जितना विलंब करती, माहौल उतना ही उग्र होता जाता। अण्णा हजारे के समर्थन का दायरा बढ़ता जा रहा था और सरकार की प्रतिष्ठा कम होती जा रही थी। इसलिए सरकार को ठीक वही करना पड़ा जो वह नहीं चाहती थी। बाद की घटनाओं ने मेरे शक को पुष्ट ही किया।

शक का एक मजबूत कारण यह था कि सरकार अगर जन लोकपाल विधेयक को पूरी तरह मान ले, तब भी वह संसद से पारित कैसे कराएगी? अण्णा ने भी कहा है कि आखिर कानून तो संसद ही पास करेगी। यह सच है कि सरकार के पास बहुमत है,  लेकिन यह बहुमत कांग्रेस का अपने दम पर नहीं है। उसके कई सहयोगी दल है। सरकार चाहे तो कांग्रेस के सांसदों को राजी कर सकती है, पर वह अन्य दलों के सांसदों को कैसे राजी करेगी? जो समझौता हुआ है, वह यूपीए के सभी दलों से नहीं हुआ है। सरकार में थोड़ी भी ईमानदारी और इस मुद्दे पर गंभीरता होती, तो वह हजारे के साथ समझौता करने के पहले अपने सभी सहयोगी दलों के नेताओं से बात करती और उनके रजामंद हो जाने के बाद ही आगे बढ़ती। यह अण्णा हजारे का भोलापन था कि उन्होंने बिना किसी न्यूनतम शर्त के संयुक्त समिति के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। अब सरकार तरह-तरह के अड़ंगे लगाने लगी है। प्रश्न यहां तक किया जाने लगा है कि कानून बनाना संसद यानी निर्वाचित जन प्रतिनिधियों का काम है – नागरिक जमात (सिविल सोसायटी) का नहीं। उसे अपनी सीमा में रहना चाहिए। चार-छह आदमियों के दबाव से कहीं कानून बनाया जाता है?

आश्चर्य यह है कि यह डाँट नागरिक जमात को क्यों पड़ रही है – सरकार को क्यों नहीं? अगर कानून बनाने या बदलने में नागरिक जमात की कोई वैध भूमिका नहीं है, तो सरकार ने इसके प्रतिनिधियों से बातचीत करने की उत्सुकता क्यों दिखाई? वह कह सकती थी कि कानून बनाने का काम संसद का है, इसलिए हम चंद नागरिकों के अनशन की परवाह नहीं करते? सरकार ने हजारे से भी समझौता किया और बाबा रामदेव से भी। रामदेव के बारे में सरकार की शिकायत यह है कि वे बाद में समझौते से मुकर गए। लेकिन सरकार तो समझौते पर डटी रही। फिर उसने जो मांगें मान ली थीं, उन पर वह अमल क्यों नहीं कर रही है? इसका अर्थ यह है कि सरकार का हृदय इन मांगों के साथ नहीं था, वह सिर्फ एक राजनीतिक संकट से बाहर आना चाहती थी। जाहिर है, नागरिक जमात के सदस्यों का जनाधार सरकार के अपने जनाधार से ज्यादा मजबूत और व्यापक साबित हो रहा था। जनता के अनिर्वाचित प्रतिनिधि संसद के निर्वाचित प्रतिनिधियों पर भारी पड़ रहे थे।

इसे ही नागरिक जमात की ताकत कहते हैं। यह ताकत नैतिक ताकत होती है और इसके आगे सभी को झुकना पड़ता है। संसद के प्रतिनिधियों को पाँच साल के लिए चुन कर जनता अपनी प्रभुसत्ता को स्थगित नहीं कर देती। उचित समय पर हस्तक्षेप करने का अधिकार वह अपने पास रखती है। लोहिया का यह वाक्य अभी भी बहुतों के दिमाग में गूँजता रहता है कि जिंदा कौमें पाँच साल तक इंतजार नहीं करतीं। इसी के कारण जेपी आंदोलन का जन्म हुआ था और इसी के कारण नर्मदा बचाओ और चिपको आंदोलन इतने समय तक चला। सरकार पर दबाव डालना प्रत्येक नागरिक का और नागरिक जमात का जन्मसिद्ध अधिकार है। कोई भी सरकार इस अधिकार को जब्त नहीं कर सकती। अपनी पाशविक शक्ति के बल पर दमन वह जरूर कर सकती है, पर जैसा कि वैज्ञानिक न्यूटन बता गए हैं, हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है और कोई भी सरकार, खासकर लोकतांत्रिक व्यवस्था में, इस प्रतिक्रिया से अपने को बचा नहीं सकती। इंदिरा गांधी जैसी शक्तिशाली नेता इस प्रतिक्रिया से नहीं बच पाईं और अब पश्चिम बंगाल के वामपंथी अपने जख्म सहला रहे हैं। इसलिए सरकार चलाने वालों को ज्यादा गरूर नहीं करना चाहिए।

असल में, हमारा समाज लोकतांत्रिक नहीं है। सरकारी व्यवस्था भी लोकतांत्रिक नहीं है। जो सज्जन चुन कर संसद में आते हैं, वे पूरे मतदाता मंडल के बहुमत द्वारा समर्थित नहीं होते। उन्हें मुश्किल से तीस-चालीस प्रतिशत वोटरों का वोट मिला हुआ होता है। इसीलिए वे नागरिक जमात की नैतिक उपस्थिति का एहसास नहीं कर पाते। इस संवेदनहीनता के कारण ही वे पूछ बैठते हैं कि मुट्ठी भर लोगों के कहने से हम कानून कैसे बदल सकते हैं? दरअसल, नागरिक जमात के सक्रिय सदस्य मुट्ठी भर ही या उससे कुछ ज्यादा होते हैं, पर उनकी ताकत संख्या के अनुपात में इसलिए बहुत ज्यादा हो जाती है, क्योंकि उनके साथ व्यापक जन भावना जुड़ी होती है। अगर देश में भ्रष्टाचार की समस्या इतनी गहरी और व्यापक नहीं हो गई होती, तो अन्ना हजारे के अनशन का कोई असर नहीं होता। साल भर में ऐसे दर्जनों धरने, अनशन और प्रदर्शन होते रहते हैं, पर मामला नक्कारखाने में तूती की आवाज बन कर रह जाता है।

कानून संसद ही बनाती है, पर कई बार जन दबाव से भी कानून बनाना पड़ जाता है। अगर अरुणा राय ने राजस्थान में सूचना का अधिकार आंदोलन नहीं चलाया होता, तो यह कानून बनता ही नहीं। प. बंगाल, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में अगर जन विरोधी भूमि अधिग्रहण के खिलाफ जनता आंदोलन नहीं कर रहो होती, तो सरकार इस कानून को संशोधित करने पर विचार नहीं कर रही होती। पंजाब, महाराष्ट्र,झारखंड, उत्तरांचल और छत्तीसगढ़ राज्य भी नागरिक जमात के दबाव से ही बने। अगर सरकार  बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार तथा जनता के साथ न्याय करने के लिए खुद ही कानून बनाती चलती, तो किसी को पागल कुत्ते ने नहीं काया है कि वह अनशन करे या धरने का आयोजन करे। बहरी संसद को सुनाने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है।

लेखक राजकिशोर जाने-माने पत्रकार, स्तंभकार और विश्लेषक हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. धीरेन्द्र

    June 12, 2011 at 6:27 pm

    भगत जी यह बात बहुत अच्छी तरह से जानते थे. लेकिन आज तो भगत जी को भी पता नहीं क्या बना दिया जाएगा…

  2. khushveer mothsara

    June 14, 2011 at 8:35 am

    ye bat bilkul sahi hain ki hamare desh main koi loktantrik vavstha nahin balki kuchh samnatwadi vichadhara ke logo dwara is ka apharan kar liya gaya hain.Ab anna jaise logo ke andolan se inko apne pawaon tale ki zamin khiskti hui nazar aati hain. is karan yenahi chahte ki koi is tarah ka andolan kamyab ho usko todne ke liye har sambhav paryas karte hain.Ye chate hain ki inki loot ko koi chalenge na kar sake aur ye desh ko yu hin lootte rahen.Desh main kahin bhi nahi lagata koi adikari ya rajneta aam admi ki koi parwah karta hain. Ek gandhi aur Ghatia parmpara ki in logo ne suruaat kar di hain jo desh aur samaj ke liye atyant hi ghatak hain. Dhanyawad

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