दो दिन, दो आयोजन और मेरी भागदौड़… राजेंद्र यादव से बीएचयू वालों तक…

: राजेंद्र यादव की पीसी और बीएचयू के पूर्व छात्रों की बैठक की नागरिक रिपोर्टिंग :

पिछले कई दिनों से दौड़ रहा हूं. दिल्ली में इधर-उधर जाना दौड़ने की ही तरह होता है. पूर्वी दिल्ली इलाके यानि नोएडा या मयूर विहार फेज थ्री में रहते हों तो किसी कार्यक्रम में शरीक होने मेन दिल्ली पहुंचने यानि प्रेस क्लब आफ इंडिया, रायसीना रोड या गांधी शांति प्रतिष्ठान, आईटीओ के पास जाने के लिए कम से कम आपको पंद्रह बीस किलोमीटर की यात्रा करनी होगी. दर्जन भर लाल-हरी बत्तियों के ब्रेक से दो-चार होना पड़ेगा.

घंटा-दो घंटा खर्चने के बाद आप मंजिल पर पहुंचेंगे और यही प्रक्रिया अपनाते हुए जब घर लौटेंगे तो अंततः लगेगा कि काफी दौड़-भाग हो गई. मतलब, साठ सत्तर किमी की यात्रा दिल्ली में आम बात है, रुटीन है, नियम की तरह है. नौकरी की जब तक मजबूरी रही, ऐसी चुनौतियों को जबरन जीता रहा. लेकिन जबसे अपन का खुद का काम है तो चलना-फिरना-भागना कम पड़ गया. हफ्तों अजगर की तरह मांद में पड़ा रहता हूं.

अपन का मांद भड़ास आफिस है. जिसे प्यार से भड़ास आश्रम भी कहता हूं. एक ऐसा आश्रम, जहां सारे कर्म-कुकर्म होते हैं. खबरें अपलोड करने से लेकर दारू पीने तक. मछली पकाने से लेकर बाहर से आए गेस्ट के लिए फ्री में रात बिताने की जगह देने तक. कभी कभार जुआ खेलने से लेकर अक्सर तेज-तेज आवाज में पंडित जसराज को सुनने तक.

मतलब, छोटी सी जगह का मल्टीपल इस्तेमाल है. यह दिल्ली का तरीका है. यही मुंबई समेत अन्य मेट्रो शहरों का तरीका होगा जहां स्पेस कम होता जा रहा है और लोग व गाड़ियां दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं.

अगर किसी दिन भड़ास आफिस उर्फ भड़ास आश्रम में न गया तो स्पष्ट है कि फिर घर में ही एक अलग कमरे में, जिसे खुद के लिए रिजर्व कर रखा है, लप्पूटप्पू आन करा और शुरू हो गया भड़ास भड़ास.

पर अब दौड़ने-भागने लगा हूं क्योंकि लगने लगा है कि अकेले गुफा में बैठकर आप सच्चे, अच्छे, पवित्र, महान… खुद की निगाह में बने रह सकते हैं पर इससे अंततः समाज-देश से कटने का खतरा पैदा हो जाता है. नए लोगों को जानने-समझने-मिलने का मौका खत्म हो जाता है.

और, सौ बात की एक बात की, महीने के तीस हजार रुपये खाने वाले भड़ास के सर्वर को चालू रखने के लिए पैसा कहां से आएगा… भिखमंगई करनी ही पड़ेगी. साफिस्टीकेटेड लैंग्वेज में कहें तो, पीआर, लाइजनिंग, बिजनेस, मार्केटिंग, एसोसिएशन… आदि करने के लिए यहां वहां जाना पड़ेगा, गांव की भाषा में कहें तो हांथ-पांव हिलाना पड़ेगा तब दो जून की रोटी मिलेगी. पर आदत तो आदत होती है. जब मोबाइल की घंटी बजने पर फोन उठाएं और उधर से आवाज आए कि मैं राजेंद्र यादव बोल रहा हूं तो आपको एलर्ट हो ही जाना पड़ेगा कि कहीं ये हंस वाले प्रख्यात साहित्यकार राजेंद्र यादव तो नहीं. और अगर वे कहें कि हां, वही राजेंद्र यादव बोल रहा हूं और आपको फलां बजे फलां जगह आना है तो कोई माई का लाल नहीं रोक सकता वहां पहुंचने से, चाहें जितनी भी कोई और अर्जेंट मीटिंग बैठक कहीं रखी हो.

असल में मुझे लगता है कि दिल्ली की दुनियादारी काफी सीखने के बावजूद अब भी मैं भारी मात्रा में इमोशनल नागरिक बना हुआ हूं. तभी तो कोई प्यार से पुकार ले तो भागा चले जाने को दिल करता है. और कोई जबरन पंगा लेकर सिर भिड़ाने-लड़ाने की कोशिश करे तो सारा काम रोककर पहले उस बंदे को निपटाने में जुट जाने का मन करता है. दिल्ली की दुनियादारी यह करने को कतई नहीं सिखाती. यह तो गांव वालों का नियम है. जैसा अंदर वैसे बाहर. पत्थर की तरह साफ-सपाट और सौ प्रतिशत शुद्ध. कोई आंय बांय सांय दाएं बाएं नहीं. जो हैं सो हैं. पर दिल्ली की दुनियादारी की बात करें तो यहां बताया सिखाया जाता है कि अगर कोई सिर लड़ा भिड़ा रहा है तो उससे उसी तरह बचकर दाएं बाएं निकल लो जैसे कोई मरकहा सांड़ बीच सड़क पर खड़ा होने पर हम आप करते हैं. अगर कोई प्यार से पुकार रहा है तो उसमें लाभ हानि तलाश लो, बेकार में प्यार के पचड़े में पड़ने से टाइम और पैसे का नुकसान करने का क्या मतलब.

यानि मछली की आंख पर निगाह रखते हैं दिल्ली वाले. पैसा और सिर्फ पैसा. कोई चाहे किसी प्रोफेशन में हो. उसका आखिरी लक्ष्य पैसा होता है. और, आखिरी लक्ष्य के पहले ढेर सारे नैतिक-अनैतिक प्रवचन टाइप लक्षण-विलक्षण बातें बकचोदियां होती हैं, जो कम दिमाग वाले या फिर आदर्शवादियों या युवाओं या गरीबों को चूतिया बनाने के काम में आती हैं ताकि उन्हें फांसकर उनसे काम निकलवाया जा सके या उनसे लाभ लिया जा सके.

जड़ें जमीन से गहरी जुड़ी हैं सो कटने उजड़ने में वक्त लगेगा… दिल कहीं वहीं उनके पास है सो संभलने-बदलने में वक्त लगेगा…

राजेंद्र यादव का बुलावा आया कि प्रेस क्लब में एक छोटी सी मीटिंग रखी गई है, कुछ चुनिंदा पत्रकार साथियों के साथ… आपको आना है, यह संगम पांडेय जी का मुझे आदेश है कि मैं आपको सूचित कर दूं…

मैंने खुद को धन्य मानते हुए राजेंद्र जी को आश्वस्त किया कि जरूर पहुंचूंगा. और पहुंचा प्रेस क्लब आफ इंडिया.

प्रेस क्लब आफ इंडिया में मेरा जाना बहुत कम होता है क्योंकि मुझे आज तक वह जगह छककर दारू पीने और मुर्गा खाने से ज्यादा काम की नहीं लगती और यह काम मैं अक्सर अपने सचल मदिरा वाहन उर्फ अल्टो कार में किया करता हूं सो प्रेस क्लब से कोई अपनापा नहीं कि वहां अक्सर जाया करूं. परसों गया.

एक छोटे से कमरे में राजेंद्र यादव के अलावा हंस के एडिटर और कथाकार संजीव, पत्रकार संगम पांडेय, पत्रकार सुधीर श्रीवास्तव, अजय समेत करीब आठ दस लोग थे. हंस के बारे में, राजेंद्र यादव के बारे में काफी बातें हुईं. लोगों ने कई कई सवाल पूछे. मैंने कई वीडियो बनाए, फोटो खींचे. सबने जमकर खाया पिया. मैंने भी मौका-माहौल और आजादी देखकर छककर दारू पी. पिलाने वालों ने जब कोई कमी नहीं की तो पीने वाले को क्या दिक्कत.

जब ”’तन डोले मन डोले” वाली अवस्था में आ गया तो प्रेस क्लब के मेन दारूखाने में पहुंचा. कई एक परिचित लोग दिखे. सबको प्रणाम सलाम के साथ दारू पिलाने का अनुरोध. दारू बंद होने वाली पगली घंटी बज गई तो मैंने कई पैग मंगा लेने का अनुरोध एक साथी से किया. उन्होंने मेरी सेवा में तत्परता दिखाते हुए ऐसा ही किया और इसका नतीजा हुआ करीब दर्जन भर लार्ज पैग पीने के बाद मैं आउट आफ कंट्रोल हो गया.

फिर तो, किससे क्या कहा, किससे क्यों लड़ा, किसी ने क्यों डांटा, किससे क्या कहा, किसको क्यों फोन किया, कैसे घर पहुंचा और घर पहुंचते हुए रास्ते में गाड़ी चलाते हुए और किसी मित्र को सुनाते हुए फूट फूट कर क्यों रोया.. मुझे खुद पता नहीं. वो मैं अक्सर कहता हूं, लिखता हूं न कि चरम दारूबाज की गाड़ी ईश्वर चलाता है, मोक्ष की अवस्था में गाड़ी में ड्राइविंग सीट पर बैठा शराबी तो निमित्त मात्र होता है जो ईश्वरीय निर्देश पर स्टीयरिंग को दाएं बाएं करता रहता है.

और आज जब कल व्यतीत हुई भयंकर शराबखोरी वाली रात के अपराधबोध तले दबा-बुझा मैं जब सुधरने की कसमें खाकर गुमसुम बैठा अपना काम कर रहा था और बीच-बीच में याद आ रही चीजों के आधार पर कई कल रात के कई पात्रों से फोन कर जो भी कुछ अनजाने में हुआ उसके लिए माफी मांग रहा था तो अचानक एक मित्र का फोन आया कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन विभाग के पूर्व छात्र एक बैठक कर रहे हैं, आईटीओ के पास मालवीय स्मृति भवन में, आपको हर हाल में पहुंचना है तो मुझे लगा कि चलना चाहिए. ढेर सारे बनारसी और बीएचयू वाले और उस पर से, जर्नलिज्म डिपार्टमेंट वाले लोग मिलेंगे. सबसे रूबरू हो जाना ठीक रहेगा. जमाना हुआ अपने बनारसी भाइयों से मिले, बतियाये.

फटाफट तैयार होकर गाड़ी रूपी घोड़ा दौड़ाया और पहुंच गया मालवीय स्मृति भवन. देर में पहुंचा था. परिचय सत्र खत्म हो रहा था. वहां सबने मिलने और एक दूसरे की मदद करने की बातें की. एक कमेटी बनाई. डिनर हुआ. ग्रुप फोटो खींचे गए. ढेर सारे नए लोग मिले. भड़ास के कई प्रशंसक भी मिले. अपने बीएचयू वाले छात्र नेता आनंद प्रधान भी मिले. यूनीवार्ता वाले सुफल जी मिले. वरिष्ठ पत्रकार नरेश कुमार मिले, जो हाल में ही रिटायर हो गए यूनीवार्ता से. पत्रकारिता शिक्षक और परम बनारसी उमेश पाठक मिले. इन दो आयोजनों, राजेंद्र यादव की प्रेस से छोटी सी मुलाकात और बीएचयू पत्रकारिता विभाग के पूर्व छात्रों की बैठक, की कुछ तस्वीरें यहां डाल रहा हूं.

बीएचयू के पत्रकारिता विभाग के पूर्व छात्रों की बैठक, मुखातिब हैं पत्रकारिता शिक्षक उमेश पाठक

परिचय के बाद और डिनर के पहले बात-बतकही का दौर, आपको घूर रहे हैं पत्रकारिता शिक्षक आनंद प्रधान

इतने लोग मिले हैं तो फिर ग्रुप फोटो क्यों न हो जाए, और पैदा हो गए कई फोटोग्राफर

राजेंद्र यादव, एक संस्था, एक महान शख्सियत के साथ चुनिंदा पत्रकारों का सवाल-जवाब

बीच वाली मोहतरमा के बारे में बताया गया कि वे मुंबई से आई हैं, अभिनेत्री हैं, राजेंद्र जी की भक्त हैं.

पत्रकार संगम पांडेय, कथाकार संजीव और पत्रकार सुधीर श्रीवास्तव : राजेंद्र यादव के संघर्ष और हंस के उतार-चढ़ावों को बयान करते संजीव

इंडिया टुडे की टीम सबसे लास्ट में आई. आते ही भाई श्यामलाल गरमागरम चिकन पकौड़े पर टूट पड़े. शिवकेश मुखातिब हैं राजेंद्र यादव की तरफ.

बहुमुखी प्रतिभा के धनी चर्चित पत्रकार व साहित्यकार प्रदीप सौरभ प्रेस क्लब में एक साथी के साथ बतियाते दिखे.

और, दिल्ली के गरीबों की (मेरी भी) पसंदीदा जगह इंडिया गेट. पिछले तीन-दिनों की भागादौड़ी के दौरान एक दफे यहां भी पहुंचा. एक लड़की से मनुहार कर अपनी फोटो खिंचवाई, कोई नहीं मिला तो इंडिया गेट पर सैलानियों की तस्वीरें खींचकर जीवनचर्या चलाने वाले एक अनजान फोटोग्राफर भाई के गले में हाथ डाल खुद के अकेले न होने का एहसास कराया… जिंदगी जिंदाबाद का नारा लगाया…

बता दूं, नरसों (परसों के एक दिन पहले का दिन) भी मिशन भागदौड़ का हिस्सा बना था. न्यूज एक्सप्रेस चैनल की लांचिंग पर गया था. और, कल के दिन भी मिशन भागदौड़ का हिस्सा बना रहूंगा. हंस मैग्जीन के पच्चीस साल होने पर जो आयोजन हो रहा है, उसमें शरीक होना है. आखिर इस दौर के महानतम साहित्यकारों में से एक राजेंद्र यादव का न्योता जो हमको आपको सबको आया है.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

संपर्क yashwant@bhadas4media.com

Comments on “दो दिन, दो आयोजन और मेरी भागदौड़… राजेंद्र यादव से बीएचयू वालों तक…

  • A S Raghunath says:

    उम्दा है,यशवंत. बेबाकी से अपनी बतकही रखना आपकी शैली है.

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  • श्रीकांत सौरभ 9473361087 says:

    यशवंत भईया,प्रणाम ! दिल्ली जइसन मेट्रो सिटी में रहके भी आपके लेखनी में गाजीपुर के गंवही मिठास बा . ईहे आपके बड़पन बा,एकरा के आबाद राखब . काहेकी टाटा जइसन कंपनी आपन नैतिकता आउर सिद्धांत के बल प दुनिया में डंका बजा सकेला त भड़ास काहे ना . हम भी हिन्दुस्तान,पटना के संपादक आ गाजीपुर निवासी श्री अवधेश प्रीत के चेला रहल बानी . एही से हमार मत बा कि गाजीपुर पत्रकारन आ साहित्यकारन के धरती ह $ ईहा से निकलल पत्रकार आ साहित्यकार पूरे मीडिया में तहलका मचावत बाड़े .

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  • Shyamlal Yadav says:

    Yashvant ji
    Thanks for this report. But one clarification. I am pure vegetarion and I have taken only Mix Veg Pakoda and Sprouted Grams there at press copference. So, maine Chicken pakode nahi CHANE aur mix veg pakode khaye the, na ki chicken pakode.

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  • कृपया करके अपनी जानकारी दुरुस्त कर ले..प्रेस क्लब केवल दारु पीने और मुर्गा खाने की जगह नही है वहां दूसरी गतिविधियां भी होती है जिसमें आपकी दिलचस्पी न के बराबर है ..अगर मेरी जानकारी सही है तो आप वहां के मेम्बर भी नही है.. जाहिर है आप तक सारी जानकारी नही पहुंच पाती होगी..सुनी सुनाई या फिर थोड़े पल के लिये कुछ चीजों को देखकर राय न बनाए..जैसा कि आपने श्याम लाल यादव के बारे में लिख भी डाला और दिखा भी दिया..

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  • sameer mishra says:

    श्यामलाल जी और गरमागरम चिकन पकौड़ा, एक बार रिपोर्ट को पढ़कर मैं भी विचलित हुआ. फ़ोन करके इस आमूल बदलाव के बारे में जानता, तभी नीचे उनकी टिप्पणी पढ़ी…..समझ गया अभी क्रांतिकारी नहीं बन सके हैं और मेरी जिज्ञासा शांत हो गई.

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  • shravan shukla says:

    मजा आया.. हर चीज के बारे में जानकर.. लेकिन रात में पंगे वाली बात और फुल टल्ली होकर भगवन भरोसे गाड़ी चलने वाली बात पर गुस्सा भी.. इतने लोगों से मुलाकात भी आपने अभी के अभी करा दिया… जिन्हें न जान पाया था उनके बारे में जानकर अच्छा लगा.. और अंतिम में आपकी एकदम मस्त टाइप फोटो देखकर दिल खुश हो गया… क्योकि बाकी फोटो में आप नहीं थे फोटो खीचने में व्यस्त थे न .. हाहा

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  • संजीव कुमार says:

    यशवंत जी आपने जो इतनी सुंदरता से अपने शब्दों में इस पूरे कार्यक्रम का जो बखान किया है वह बहुत ही अच्छा लगा। आपने राजेन्द्र यादव की पीसी और बीएचयू के पूर्व छात्रों से लेकर यशवंत सिंह एक फोटो ग्राफर के साथ इंडिया गेट पर का जो बखान किया है उसे पढ़ कर बहुत अच्छा लगा व कुछ लोगों को जानने का मौका भी मिला.

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  • krishna murari says:

    यानि मछली की आंख पर निगाह रखते हैं दिल्ली वाले. पैसा और सिर्फ पैसा. कोई चाहे किसी प्रोफेशन में हो. उसका आखिरी लक्ष्य पैसा होता है. और, आखिरी लक्ष्य के पहले ढेर सारे नैतिक-अनैतिक प्रवचन टाइप लक्षण-विलक्षण बातें बकचोदियां होती हैं, जो कम दिमाग वाले या फिर आदर्शवादियों या युवाओं या गरीबों को चूतिया बनाने के काम में आती हैं ताकि उन्हें फांसकर उनसे काम निकलवाया जा सके या उनसे लाभ लिया जा सके. bahut badhiya bhaiya

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