मीडिया को आइना दिखाने वाला आईपीएस

कानपुर के डीआईजी प्रेम प्रकाश अपने आफिस में एक टीवी वाले को किसी घटना पर बाइट देते हुए.
कानपुर के डीआईजी प्रेम प्रकाश अपने आफिस में एक टीवी वाले को किसी घटना पर बाइट देते हुए.

: कानपुर में जागरण वालों के दिमाग ठिकाने लगाने के बाद अब हिंदुस्तान अखबार को लाइन पर लाने में लगे डीआईजी प्रेम प्रकाश : प्रेम प्रकाश आईपीएस हैं. डीआईजी के रूप में कानपुर में पोस्टेड हैं. एसएसपी का भी प्रभार उनके पास है. बीते दिनों वे सुर्खियों में तब आए जब उन्होंने जागरण वालों को खदेड़ा था. डीआईजी प्रेम प्रकाश ने कानपुर में जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन गुप्ता व अन्य की खटिया खड़ी कर दी थी.

देर रात चलने वाली एक मस्ती भरी पार्टी से पैदा होने वाले भारी शोर-शराबे को शांत कराने गए पुलिसकर्मियों से अभद्रता करने वाले जागरण के लोगों को डीआईजी प्रेम प्रकाश ने कायदे से कायदे-कानून समझाए थे. तब इससे संबंधित खबरें भड़ास4मीडिया पर भी छपी थीं. जागरण वालों ने बहुत कोशिश की लेकिन डीआईजी प्रेम प्रकाश का बाल बांका नहीं हुआ. लाख कोशिश के बावजूद उनका तबादला नहीं हुआ. वे वहीं, कानपुर में जमे रहे. जागरण वालों का डीआईजी प्रेम प्रकाश के खिलाफ नकारात्मक खबरों की बौछार का अभियान जारी रहा. प्रेम प्रकाश से संबंधित कोई भी रुटीन खबर, गुडर्वक की खबर और अन्य पाजिटिव न्यूज का जागरण ने पूरी तरह बहिष्कार कर दिया. इसका भी प्रेम प्रकाश की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा. कई महीनों बाद अंततः अब जाकर जागरण वालों ने सरेंडर कर दिया.

जागरण वालों को लग गया है कि वे जिससे पंगा ले रहे हैं, वह उनके मीडिया भौकाल में आने वाला नहीं है. ऐसे में जागरण के पास एक ही रास्ता था, वह सरेंडर कर दे. जो कुछ हुआ उसे भूल जाए और फिर से रिश्तों की नई शुरुआतकरे. और जागरण का भला भी इसी में था क्योंकि उसका मकसद समाज में नई रोशनी लाना तो है नहीं. उसका मकसद, सिर्फ एकमात्र मकसद ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना और ज्यादा से ज्यादा लाभ पाना है. इस बनियापे में पंगा-दंगा कहीं नहीं आता क्योंकि कारपोरेट कभी अशांति नहीं चाहता क्योंकि आंतरिक बाहरी किसी भी तरह की अशांति से पैसा बटोरो अभियान पर असर पड़ने लगता है. तो, जागरण के मालिकों ने वही किया जो समझदार उद्योगपति करता है. उसने अपनी तरफ से अघोषित जंग के खात्मे की अघोषित घोषणा कर दी. डीआईजी प्रेम प्रकाश की तस्वीरें व उनसे जुड़ी खबरें दैनिक जागरण, कानपुर में आजकल खूब छपने लगी हैं. हालांकि लगता नहीं है कि डीआईजी प्रेम प्रकाश ने अपनी तरफ से जागरण वालों को माफ किया है. बीते दिनों जागरण ग्रुप के बच्चा अखबार आई-नेक्स्ट वालों की कानपुर में कोई साइकिल रैली थी और डीआईजी ने इसके लिए परमीशन नहीं दी. जागरण वालों ने बहुत कोशिश की लेकिन रैली के लिए स्वीकृति नहीं दी तो नहीं दी. तब आखिरी क्षणों में किसी तरह कमिश्नर को पटाकर जागरण वालों ने प्रोग्राम संपन्न कराया. इससे पता चलता है कि प्रेम प्रकाश जागरण वालों से न किसी तरह डरे हैं न दबे हैं और न झुके हैं. हां, उनके तेवर देख, उनकी पीठ पर यूपी सरकार का हाथ देख जागरण ने अपने तेवर जरूर ढीले कर लिए.

सोच सकते हैं, अगर कोई ईमानदार अधिकारी बिना नतीजों की परवाह किए सच्चाई के साथ चलने की ठान ले तो देखते ही देखते चीजें कितनी जल्दी दुरुस्त होने लगती हैं और ढेर सारे गलत करने वाले लोग भय के मारे गलत काम करना छोड़ने लगते हैं या सरेंडर करने लगते हैं. मीडिया के नाम पर इन दिनों खूब अंधेरगर्दी मची हुई है, भांति भांति की, किसिम किसिम की दुकानें खुली हुई हैं. बातें तो सब फ्रीडम आफ एक्सप्रेसन की करेंगे, जनता की आवाज उठाने की करेंगे लेकिन ज्यादातर, 99 फीसदी मीडिया की दुकानें निहित स्वार्थ सिद्धि के इर्दगिर्द संचालित होती हैं. कइयों के इंट्रेस्ट बहुत पेट्टी किस्म के होते हैं तो कुछ बड़ी-बड़ी डील शीर्ष स्तर पर करते हैं, मीडिया के तामझाम के नाम पर. जिसे देखो वो प्रेस वाला बनकर उल्टे-सीधे काम कराने को अपना अधिकार समझता है. ज्यादातर पुलिस वाले मीडिया से पंगा इसलिए नहीं लेते क्योंकि उनके दामन खुद दागदार होते हैं, सो चोर चोर मौसेरे भाई के अंदाज में मीडिया पुलिस प्रशासन एकता चलती रहती है और दोनों एक दूसरे के दाग को उजले और अच्छे बताते रहते हैं.

लेकिन अगर कोई अधिकारी खुद ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ हो व उसकी प्रतिबद्धता किसी मीडिया हाउस या किसी बड़े आदमी की बजाय जनता के प्रति ज्यादा हो तो वह दागदार एकता के पोल खोल खोलने लगता है. डीआईजी प्रेम प्रकाश ने यही किया. उन्होंने मीडिया वालों के दबाव में आने से इनकार कर दिया. जहां जरूरत पड़ी वहां मीडियो को आइना दिखाने का काम किया. कलम व शब्दों के जरिए जनता के पक्ष को सामने रखने के लिए पैदा हुए प्रेस के लोग अब दबंगई व हेकड़ी के पर्याय बनने लगे हैं, खुद को थानेदार मानने लगते हैं. ईमानदार पत्रकारिता की जगह दबंग किस्म की दलाली करने लगते हैं. ऐसे में देखते ही देखते इन मीडिया वालों के चाल चलन चेहरे में जनविरोधी बदलाव आने लगता है. ऐसे लोग प्रेम प्रकाश से घबराते हैं. ऐसे पत्रकार डीआईजी प्रेम प्रकाश की कानपुर से विदाई के लिए प्रार्थनाएं किया करते हैं. लेकिन जो अच्छे जर्नलिस्ट हैं, जो सिर्फ अपने काम से मतलब रखते हैं, जो मीडिया के नाम पर चल रही दुकानदारी से दुखी हैं, वे डीआईजी प्रेम प्रकाश के सख्त प्रशासक वाले तौर-तरीके से बेहद खुश हैं.

कानपुर में प्रेम प्रकाश को लेकर मीडिया लगभग दो फाड़ है. एक लोग डीआईजी प्रेम प्रकाश की जमकर तारीफ करते हैं और उन्हें बेलगाम मीडिया को आइना दिखाने वाला ईमानदार अधिकारी बताते हैं तो मीडिया का दूसरा खेमा डीआईजी प्रेम प्रकाश के व्यक्तित्व में एक तानाशाह को देखता है, उनकी पीठ पर मायावती के हाथ होने के कारण उन्हें उद्दंड किस्म का मानता है और उनके चाल-चलन को अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरा बताता है. हालांकि प्रेम प्रकाश को अभिव्यक्ति की आजादी के लिए खतरा बताने वाला खेमा वही है जो प्रेस और मीडिया के नाम पर कुछ भी कर लेने, कह देने को, अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानता है और इस तेवर के जरिए बदले में प्रशासन, नेता, पुलिस, उद्योगपित, सबसे कई तरह के लाभ चाहता है. इनके इस अधिकार को चुनौती दे दी प्रेम प्रकाश ने तो इनमें से कई लोग तिलमिला गए.

अब प्रेम प्रकाश फिर सुर्खियों में आ गए हैं. उन्होंने कल कानपुर में हिंदुस्तान अखबार की सप्लाई ले जाने वाली कई गाड़ियों को पकड़ लिया. इनकी जांच कराई जा रही है कि किसके पास कागजात हैं या और किनके पास नहीं. उन्होंने अखबार के आफिस की तलाशी ली. अखबार के दफ्तर के बाहर खड़े वाहनों की जांच कराई. सूत्रों का कहना है कि प्रेम प्रकाश हिंदुस्तान अखबार में सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने वाली खबरों के लगातार प्रकाशन से खफा थे. अयोध्या के मंदिर मस्जिद मसले पर कोर्ट के फैसले वाले दिन के आसपास से ही हिंदुस्तान, कानपुर में कई ऐसी खबरें प्रकाशित की गईं जिसके कारण शहर में तनाव को बढ़ावा मिला. ऐसी खबरों पर रोक न लगते देख डीआईजी प्रेम प्रकाश ने हिंदुस्तान अखबार से अप्रत्यक्ष तरीके से दो-दो हाथ करने का फैसला ले लिया. उन्होंने केवल इतना किया की सारी गाड़ियों की चेकिंग करा दी. हिंदुस्तान वालों ने लखनऊ के हर बड़े अफसर के यहां फोन खटखटाया लेकिन कुछ न हो सका.

डीआईजी प्रेम प्रकाश ने कह दिया कि चाहे जहां फोन कर लो, कुछ नहीं होने वाला, गाड़ी के कागजात दिखा कर गाड़ी ले जाओ, इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है. उल्लेखनीय है कि अखबारों के बंडल ढोने वाली ज्यादातर गाड़ियां प्रेस शब्द लिखकर बिना कागजात के धड़ल्ले से चलती रहती हैं. गलत ड्राइविंग और नियमों के उल्लंघन के बावजूद इनका चालान नहीं होता क्योंकि इन पर प्रेस लिखा होता है. अगर ये गाड़ियां कभी पुलिस के हत्थे चढ़ भी जाती हैं तो इन गाड़ियों को छुड़ाने का दायित्व क्राइम रिपोर्टर को दे दिया जाता है और क्राइम रिपोर्टर सीओ, एसपी, एसएसपी या डीआईजी से कहकर इन गाड़ियों को थानों से छुड़वा लेता है. इस प्रकार प्रेस के नाम पर इन गाड़ियों का गोरखधंधा चलता रहता है. पुलिस वाले प्रेस को टाइट करने के लिए इन गाड़ियों को ही कमजोर नस मानते हैं और सबसे पहले इन्हीं को पकड़ते हैं. गाड़ियों को छुड़ाने को लेकर बाद में पुलिस प्रेस के बीच समझौता हो जाया करता है.

चूंकि ये गाड़ियां अखबार को विभिन्न सेंटरों व जिलों में ले जाती हैं, इसलिए वे अखबार के धंधे की बहुत संवेदनशील कड़ी हैं. इन गाड़ियों के पकड़े जाते ही पूरा अखबार प्रबंधन सिर के बल चलने लगता है और किसी भी कीमत पर गाड़ियों को छुड़ाने के लिए सक्रिय हो जाता है. प्रेम प्रकाश ने प्रेस वालों की इस कमजोर नस को दबा दिया है. हिंदुस्तान, कानपुर में इस मुद्दे पर आज खबर प्रकाशित हुई है जिसमें पुलिस के हिंदुस्तान के खिलाफ सक्रिय हो जाना का कारण कुछ और बताया गया है. इस पूरे मसले पर हिंदुस्तान अखबार का पक्ष उसमें प्रकाशित खबर के आधार पर जान सकते हैं. साथ इस मुद्दे पर लखनऊ व कानपुर से कुछ मेल भी आई हैं, जिसे हम यहां जस का तस प्रकाशित कर रहे हैं ताकि पूरे प्रकरण को कई बिंदुओं से देखा-समझा जा सके.

यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया


हिंदुस्तान, लखनऊ और कानपुर में प्रकाशित खबर
हिंदुस्तान, लखनऊ और कानपुर में प्रकाशित खबर

अफसरों-नेताओं की देर रात पार्टीज को क्यों नहीं रोक पाती पुलिस?

-संजय शर्मा-

संजय शर्मा
संजय शर्मा
: जागरण के बाद अब हिंदुस्तान पर धावा बोलने वाली कानपुर पुलिस के खिलाफ सभी पत्रकार एकजुट हों : धन्य है हमारी कानपुर पुलिस. एक एक करके अखवारों के मालिकों को निबटाने में लगी हुई है. पहले दैनिक जागरण के मालिकों के घर जाकर उनकी पार्टी में हाथापाई की. जब देखा कि तमाम जोर लगा कर भी किसी पुलिस वाले का कुछ नहीं बिगड़ा तो कल हिन्दुस्तान पर धावा बोल दिया. पता नहीं अगला नंबर किसका है. क्या पत्रकार अब पिटने को अभिशप्त हो गया है. जिसको देखो वो मीडिया को निबटाने पर तुल गया है. अगर अभी भी इस बात पर चिंतन नहीं किया गया तो यह हश्र सबका एक न एक दिन होना है. जो बोलने की हिम्मत करेगा उसे ऐसे ही सबक सिखाया जायेगा.

कानपुर पुलिस एक बलात्कार की रिपोर्टिंग से हिंदुस्तान से नाराज थी. आरोपी प्रभावशाली थे. पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं करना चाह रही थी. हिन्दुस्तान रोज इसकी खबर छाप कर पुलिस को परेशान कर रहा था. बीती रात पुलिस ने भी सोचा कि सबक सिखा ही दिया जाये. जिस रास्ते से अखवार लेकर गाड़ी जाती थी वहां पुलिस का पहरा बिठा दिया गया. जो गाड़ी निकली उसे वहीं रोक लिया गया. हिंदुस्तान के कुछ पत्रकारों की मोटर साइकिल रोक ली गई. पुलिस के हौसले इतना बढ गए कि आधी रात को पुलिस अखवार के दफ्तर के सामने खड़ी गाड़ी को यह कर उठा कर ले जाने लगी कि यह गाड़ी चोरी की है. यह पुलिस का अपना स्टाइल है. जो प्यार की भाषा न समझे उसे डंडे की भाषा समझाओ. और जब खुद को सत्ता के करीब पाओ तो इस डंडे का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करो. यह भी बड़ा अहसान किया कानपुर पुलिस ने कि अखवार के अन्दर घुस कर पत्रकारों को नहीं पीटा वरना यह करने का भी हक़ था पुलिस के पास. कोई पुलिस थोड़े ही बंधी है संविधान से कि सारे काम नियम कानून से करे. जो पुलिस कहे वही कानून.

मीडिया से जुड़े सभी लोगों को सोचना चाहिए कि आखिर यह हालात क्यों बनते जा रहे हैं. एक एक करके सभी को निपटाने के पीछे क्या सोच है. क्या मीडिया अब गरीब की जोरू की तरह हो गया है जो सारे गांव की भाभी बन कर रह जाये. कहां गलती हो रही है. दरसल बदलते दौर में हमारे बीच में ही एकता नहीं रही. जब कानपुर में जागरण के मालिकों के साथ मारपीट हुई तो वाकी संस्थानों ने उनका मजाक उड़ाया. अपने को आदर्श घोषित करते हुए कहा कि अगर आधी रात में घर में दारू पार्टी होगी, डांस होगा तो यह तो होना ही था. तब यह बात भी सामने आई की जागरण वाले पैसे लेकर चुनाव में खबरे छापते हैं तो उनका साथ न दिया जाये. पत्रकारिता के सिद्धांत से इस बात पर सहमत हुआ जा सकता है कि पत्रकारों को नैतिकता के उच्च मापदंडों को अपनाना चहिए. पर सिर्फ पत्रकारों को ही क्यों? अफसरों को क्यों नहीं?

यूपी के कृषि उत्पादन आयुक्त ने मुख्यमंत्री आवास से चंद दूरी पर अपने घर पर फैशन शो करवाया. उनके घर पर तो पुलिस ने हंगामा नहीं किया. कोई अफसर पार्टी दे तो देखिये आधी रात को किस तरह शराब और शबाब का नंगा नाच होता है. तब पुलिस कहां होती है. नेताओं की पार्टी की बात ही नहीं कर रहे क्योंकि गलती से पुलिस वहां चली गई तो पिट कर ही वापस आएगी. तब सारी नैतिकता की जिम्मेदारी पत्रकारों की ही क्यों? यह बात सही है कि जागरण को पैसे लेकर खबरें छापने का घिनौना काम नहीं करना चहिए था मगर इसका मतलब यह तो नहीं कि इस अपराध के बदले उन पर कभी भी कोई भी हमलावर हो जाये. अच्छा होता सब मिल कर उनके इस कृत्य की निंदा करते और इस हमले के समय सब अपने यहाँ कस कर छापते. तब किसी पुलिस और किसी सरकार की हिम्मत नहीं पड़ती. मगर अफ़सोस ऐसा हो नहीं सका.

और इसी के परिणामस्वरूप आज हिंदुस्तान पर पुलिस के इस तांडव की खबर हिंदुस्तान के अलावा कहीं नहीं है. क्या सभी अखवारों को प्रमुखता के साथ इस खबर को नहीं छापना चहिए. व्यापार की लड़ाई अपनी जगह है. पर पेशे से तो सभी पत्रकार हैं. अगर पत्रकारों की ही खबरें बाकि अखवारों में नहीं छपेगी तो यह सब तो होगा ही. इन सबमें इलेक्ट्रानिक मीडिया अभी भी सबसे बेहतर है. वहां कभी भी इस तरह की घटना हो तो सभी चैनल  मिल कर उसकी आलोचना करते हैं. फिर हिंदुस्तान पर हुए हमले की खबर उतनी ही प्रमुखता से जागरण और अमर उजाला क्यों नहीं छाप सकता.

हमारी इन कमजोरियो को लोगों ने हमारी मज़बूरी मान लिया है. इन लोगों को पता है कि हमारी यूनियन  भले कुछ भी करे मगर पत्रकारों की पिटाई   उन पर हमले जैसे कामों में हंगामा नहीं करेगी. इससे सम्बन्ध ख़राब होते हैं सरकार और अफसरों से, यूनियन के पदाधिकारी  नहीं चाहते कि ऐसा होने से उनके आर्थिक हितों का कोई नुकसान हो. तभी इमाम बुखारी जैसों की हिम्मत पड़ जाती है कि वो भरी प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों पर हमला बोल दे. मजे की बात यह कि कल जब पत्रकारों ने बुखारी के इस हमले के खिलाफ बैठक की और ज्ञापन दिया तो किसी बड़े अखबार ने इसकी खबर नहीं छापी. अभी भी वक़्त है जब हम सबको एक होना चहिए वरना अगला नंबर किसी का भी लग सकता है आप का भी और मेरा भी.

संजय शर्मा लखनऊ से प्रकाशित वीक एंड टाइम्स के एडिटर हैं.


Police Gagging Media in Kanpur

-Abhishek Pandey-

Police officials came down heavily on media persons for their extensive reporting on an eleven-year old school girl Divya, who was sodomised in a school premises and died of profuse bleeding from her private parts. Investigation officer (IO) and Station Officer, Anil Kumar, has summoned over 21 journalists under section 160 of CrPC and have demanded proof of their media reports.

Not only that, police officials are allegedly making threatening calls in newspaper offices and warning reporters to not file stories on the issue or face consequences. Even, several vehicles meant for transporting newspapers were halted by the police officials and did not allow passing for so called flouting the norms.

The draconian act of police in absolving the culprits in rape cum murder case was exposed by the print and electronic news channels.

Police officials have arrested as many as four people in the case but have failed to prove who the real culprit is? Even, they could not conclusively prove that which is the place of crime? Police theory has numerous loopholes and Justice for Divya has become a people’s movement that is gathering momentum after leaders cuttinmg across party lines, social activists, students, youths have come forward for demanding the arrest of real culprit?

It is important to mention that police officials even did not spare the victim’s family members and resorted cane charge on them while they were staging silent protest in front of the school where the little girl died.

Does the right to speech and expression exist in real means in Kanpur?

Can police force the media persons to reveal its news sources, though even court gives them freedom for not telling their news source?

Media advocacy in several cases has brought justice for the victim’s family. Is this an attempt to put a stop on advocacy or missionary journalism?

Many more questions are being raised in media foray and these questions remain unanswered ……And, until these questions are answered. People of India could be hapless in seeing in near future cases like Priyadarshini Matoo, Jesica Lal, Nitish Katara, Nithari getting solved…..


Comments on “मीडिया को आइना दिखाने वाला आईपीएस

  • Yashovardhan Nayak says:

    Jagran akhabar ko logo nai lakhanau cunav mai lalji tandan se pakeg magte or Dal na galne per peet patrakarita karte hua dekha hi, Jagran ho ya koi or akhabar balo ko ab janta netao kai taraju mai tolne lagi hi. D.I.G. Prem Prakash aapko badhai or bhadas media ki jai..

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  • hame police k khilap awaj uthani hogi unka kala chittha kholna hoga
    jaha-jaha tainaat hai sabki chanbeen kare aur pure up k police walo par najar rakhe har reporter . har khabar ko pramukhata de kyoki ab bari hamari hai

    Reply
  • kuch saalo pahle kanpur shahar me santiya kand hua tha jisme shahar me ye ho gaya tha ki jahan bhi police wale dikhe unhe peeto. Aalm ye ho gaya tha ki shhar ki police vardi utarkar ghoome lagi thi. aaj fir aisa hi kuch karne ki jaroorat hai

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  • avinash aacharya says:

    हिन्दुस्तान की खुंदक में पुलिस अफसर को ईमानदार और नैतिक होने का प्रमाण-पत्र देने का काम भड़ास पर देखकर आश्चयॆ हुआ। जागरण और हिन्दुस्तान दोनो गलत हो सकते हैं। लेकिन एक तरफा वकील की तरह पुलिस के पक्ष में खड़े भड़ास को स्मरण रखना होगा कि आइँदा भी पुलिस के बरताव पर यही समझ रखे, न कि आदमी और अखबार देखकर भाषा बदल जाए।

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  • gaurav chaturvedi says:

    police apna kam karay ye theek hai, magar prem prakash dig sahe hai. ya wo apnay kartavya ka palan kar rahe hai iska certificate bhadas kis bina par de raha hai. khair, har kisi ki apni soch hai aur isi ko right to expression kehtay hai

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  • sudhir pandey says:

    prem prakash accha kar rahe hain .press ko koi visheshadhikar nahi hota .ye apne man se apne ko v v i p aur kanoo se bhi upar samajhte hain .jyadatar mamlon main blackmailing tera dusra naam press jaisi baat sach hoti hai .press walon ko bhi aam aadmi ki tarah behave karna chahiye tabhi wo aam aadmi ka dard samajh payenge .

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  • aashish kumar. rudrapur says:

    police ka yah ravayia nindaniya hai. akhwar walo ki gadi to pakad rahe hai wahi kanpur main mafia mp brijesh singh or anant mishra ke gunde wasuli kar rahe hai. awadh hathiyar le kar jamino par kabja kar rahe hai . unhe rok kar dikhaye.

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  • समशेर says:

    यशवंत जी आप खुद पत्रकार नहीं बन पाए, तो क्या अब पत्रकारों से जलन होने लगी है। हो सकता है अखबारों के मालिकों ने या कुछ पत्रकारों ने गल्त किया हो। इसका ये मतलब नहीं की पुलिस एक तरफ से शुरु करके आखिर तक सबकी ऐसी तेसी कर दे। आपके लेख से साफ है आपको अपनी मानसिकता में इलाज की जरुरत है।

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  • m faisal khan says:

    prem parkash jaise afsar hi patrkaron ke dimagh sahi kar sakta hai kiyunki in tatha kathith patrkaron ne to ye samajh liya ki ye hi sab kuchh hain koi inke samne bolne ki jurrat bhi nahi kar sakta.are bhai patrkar ho to iska matlab ye to nahi ki jo man mai aaye karo.aaj ki tareekh mai sab se bade chor lutere bhi yahi patrkar hain afsaron ko ye apni jaib mai samajhte hain publik ko apne pairon ki jooti samajhte hain aur inka kaam ye hai ki bazar se paison ki ugahi karna aur afsaron ya thano ki dalali karna aur unke office mai baithkar chaye peena,in ka dimagh aisa mazboot afsar hi sahi kar sakta hai,m faisal khan.reporter channel one news , saharanpur

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  • नूतन says:

    दिव्या का इन्साफ
    पुलिसकर्मियों की निष्क्रियता पर सवाल उठाने वाले लोगों की कमी नहीं है. पर ऐसे लोगों की जुबान बंद करने का काम कानपुर पुलिस की अतिसक्रियता ने किया है. काल रात कानपुर पुलिस ने जितनी हिम्मत, बहादुरी और त्वरित गति से हिंदुस्तान अखबार की सप्लाई रोकने के लिए वहां की गाडियों व कर्मचारियों पर कारवाई की वह निश्चित रूप से देखने पढने व सुनने लायक है. पुलिस ने हिंदुस्तान के पनकी स्थित प्रेस और अनवरगंज जी.टी. रोड स्थित कार्यालय के रास्ते की देर शाम से ही नाकेबंदी कर दी थी. अखबार की सप्लाई ले कर जाने वाली जीपों को तो रोक-रोक कर वे पकड ही रहे थे. साथ ही वहां के कर्मचारियों की गाड़ियों को भी पकड़ने में वे कामयाब रहे.
    अब पुलिस वालों की इस सराहनीय सक्रियता से परेशान अखबार कर्मचारियों व पत्रकारों द्वारा इसकी शिकायत आई .जी. , डी आई.जी. , डी.एम. के साथ-साथ ए.डी.जी. ला एंड आर्डर से भी की गई. लेकिन जब एक बार हमारी पुलिस हरकत में आ जाती है तब उसे रोकना बहुत ही मुश्किल हो जाता है. तभी तो रात होते-होते सप्लाई वाली सात गाड़ियों को पकड़ने के साथ-साथ रिपोर्टर , फोटोग्राफर की गाड़ियों को भी पकड़ने में उन्हें सफलता मिल गई. लेकिन इतनी सफलता से ही कानपुर पुलिस संतुष्ट होने वाली नहीं थी. रात साढ़े बारह बजे दफ्तर के बाहर खड़ी गाड़ियों को चोरी का बता कर न सिर्फ उठवाने लगी बल्कि गाली-गलौज और दफ्तर में ताला लगवा देने की चेतावनी भी दे डाली.
    जाहिर है आप सोच रहे होंगे कि अखबार वालों ने कोई भयानक गुनाह कर दिया होगा क्योंकि पुलिस इतनी सक्रियता तो ऐसे ही मामलों में दिखाती है- और वह भी कभी-कभी. हाँ अखबार का गुनाह था पर ये कि उसने कानपुर के बहुचर्चित दिव्या दुराचार और हत्या कांड में पुलिस द्वारा बनायी जा रही गलत-सही थेओरी को चुपचाप नहीं मान लिया बल्कि सच का पर्दाफ़ाश करने में जुट गयी. क्या यह मामूली गुनाह था? क्या हुआ कि दिव्या मात्र ग्यारह साल की मासूम बच्ची थी. क्या हुआ जो उसकी माँ खुद सिक्यूरिटी गार्ड का साधारण काम करके अपनी बेटी, अपने जिगर के टुकड़े और अपनी भविष्य की आस को अपनी औकात से बढ़ कर खर्चीले कानपुर के रावतपुर स्थित भारती ज्ञान स्थली स्कूल में पढ़ाती रही थी? इससे भी क्या अंतर पड़ता है कि यह मासूम और असहाय लड़की एक दिन अचानक भारी ब्लीडिंग के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गयी और दिव्या की माँ सोनू का सपना एक ही बार में चकनाचूर हो गया? क्या हुआ जो सोनू ने स्कूल के ही प्रबंधक चंद्रपाल वर्मा के लड़के पियूष पर विद्यालय प्रांगन में ही दुराचार करने का आरोप लगाया ? क्या हुआ कि उस बच्ची का मरने के पहले साढ़े चार लीटर रक्त स्त्राव हुआ था. इस पर भी क्या हुआ कि बच्ची की माँ चीख-चीख कर पियूष और उसके गुंडे साथियों की आरोपित कर रही थी.
    गलती तो इतनी बड़ी थी सोनू की और हिंदुस्तान तथा दूसरे अखबार के पत्रकारों की कि उन लोगों ने पुलिस की उस समय बात नहीं मानी जब पुलिस जबारिया सोनू के पड़ोस का एक किरदार उठा लायी, उसे सोनू का प्रेमी बता दिया और यह कहानी बना दी कि इस आदमी ने दिव्या का भी बलात्कार किया जिससे वह प्रेग्नेंट हो गयी और बाद में इसी से उसकी मौत हुई. यदि कानपुर पुलिस को ऐसा लगता था तो सबों को यही बात मान लेनी चाहिए थी और यही बात कहनी थी. ऐसा नहीं हुआ.
    न तो माँ चुप हुई और न अखबार वाले. हिंदुस्तान अखबार और कई दूसरों ने इसे मुद्दा बना दिया, मुहीम चलाया और अंत में पियूष को गिरफ्तार तक करवा दिया. अब भुगतो. पुलिस से पंगा लेने की हिम्मत कैसे हुई.
    फिर इससे क्या अंतर कि शिकायत आई जी से करो, डी जी से करो, डी एम से करो, आखिर समूह तो एक ही है- यदि ये पुलिस वाले सुख दुःख में एक दूसरे का साथ नहीं देंगे तो कैसे होगा. आज इसकी तो कल उसकी बारी आएगी. लिहाजा पूरा पुलिस विभाग एक है- एकदम इकठ्ठा. न्याय और सच्चाई जाए तेल लेने.
    मैं सोचती हूँ काश इतनी एकता का दसवां हिस्सा भी हम पत्रकार साथियों में होता. मैं कानपुर पुलिस के इस गलत कृत्य का ना सिर्फ पुरजोर विरोध करती हूँ बल्कि भड़ास के माध्यम से आप सभी साथियों से यह अपील भी करती हूँ कि इस मामले को एक नजीर के रूप में लेते हुए इसमें अन्याय के विरुद्ध पूरी ताकत और एकता के साथ सामने आयें.

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  • भारतीय़ नागरिक says:

    सही है कि प्रेस और पत्रकारों को विशेषाधिकार नहीं है और न ही पुलिस को. यह भी ठीक है कि कुछ पत्रकार अपनी स्थिति का नाजायज फायदा उठा लेते हैं और पुलिस वाले भी. लेकिन कानून-व्यवस्था बनाये रखने के नाम पर इस प्रकार की तानाशाही एक दम गलत हैं. ये प्रेमप्रकाश मुरादाबाद में आईटीबीपी के एक इन्स्पेक्टर को भी पीट चुके हैं. सवाल यह है कि प्रेमप्रकाश जी इसी प्रकार का व्यवहार सत्ता दल के किसी आपराधिक छवि वाले नेता के साथ कर सकते हैं. पूरा सिस्टम ही बदलना चाहिये. यहां के बड़े बड़े लोग विदेश में जाकर सीधे हो जाते हैं…

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  • dileep dudi says:

    media ke virudh police ki is prakar ki harkat bilkul galat hai. police ke bharcht officer ki itni oukat ke media ke virudh bole… media ko ekjut hokar police ki dhajiya ukhedni hogi..

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  • यशवंत जी आपकी मां के साथ हुये अन्याय की हम सब जमकर मुखालिफत करते हैं…लेकिन ये आपका कौन सा चेहरा है कि यहां आपको प्रेमप्रकाश न्याय करते दिख रहे हैं और वहां गाजीपुर की पुलिस अन्याय करते…यानि दूसरों के साथ होता है तो आपकी कलम खाकी के कसीदे पढ़ती है और खुद के साथ गलत हुआ तो यही खाकी गुनाहगार…कृपया कथनी करनी एक करें….

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  • mahesh sharma says:

    i am not agreed with the view of bharhas editor mr. yashwant. D.I.G. kanpur mr. prem prakash is trying to make pressure on midea. if he is honest, he should take transparrent action against his subbordinate, found guilty in vandana, kavita & divya issue, due to his stand, state govt. is defaming

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  • sanjeev sharma says:

    yasvant ji aap is dig ko bhadur na samjhe kyo ki yh prees ko aaina nahi dikha rha balki apni jhep mitane ke liye sirf prees ko damkane ka kam kar rha hai kyoki agr imandar hota to jitni takt prees ko aaina dikhne me lga rha hai utni imandari se agr divya ko insaf dilate to achchhe adhikare khlate agr aap sahi me ptrkarita kar rhe hai to jante honge ki police me kitne prtisht adhikari imandari se kam kar rhe hai charj par rahne vale adhikansh adhikaree apni nakree bchane ke liye jab bhi koi badi vardat hoti to use ujagar karne ki bjay ya to prees ko mainej karne ki koshish karte aur jab safal nahi hote to prees ko dhamkane me lag jate hai lekin yh bhi sach hai ki preem paraksh jaise kitne adhikriyo ne prees ka gla ghotne ki koshish ki lekin saflta nahi milee ha hai vo gadee jaisee chije band karke thodee der ke liye khush jroor ho gye

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  • prayag pande Nainital says:

    yashawant ji es mamale main aapake najariye se main sahamat nahi hun.samaj main eamandar koe bhi ho uaski housala afajae karana aachhi bat hai.lekin loktantra main kisi noakarshah kohiro ki tarah pesh karanathik nahi kaha ja sakata hai. esase officer main tanashahi ki pravraty badhegi.es mamale main sanjay ji se bhisahamat nahi hua ja sakata hai.aaj akhabaron or patarkaron ki moujuda hataton ke liye akhabar hi sabase jyada jimmedar hain.akhabar gharanon ne n kewal patarkaron ko kamajor kiya hai balkipatarkar union ko bhi kamajar kiya hai .jab kisi patrakar ka utpidhan hota hai jyadatar akhabar pidit patarkar ko apana reporter hone se bhi enakkar kar dete hain.kae akhabar toapane yahan kam karane walon walon se kisi union ka member nahi hone ka bakayada bond tak bhara lete hai .easi esatiti main akhabaron or patrakaron ka yahi hasra hona hai. yah abhi suruaat hai. PRAYAG PANDE >MAHASACHIV >Uttarakhand sharmjivee patarkar union

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  • imandar agar kanoon se apne ko uper samajta hai aur press ko cruss ker samaj sudharne ka tamasa karta hai to yese tamase ko aur koi visesan nahi diya ja sakta hai. aiyne ko aiyna dikhane ka kya matlab. hah imandar ka gurur hai. yeh imandari ke prabhav ko prabhavit karta hai. yai se imandar ka ek khoon bhi maf karna chahiye

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