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वीर-बरखा जाएंगे तिहाड़?

बरखा दत्त और वीर सांघवीबड़ा ही अजीब सवाल है। वीर यानी वीर सांघवी- ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के संपादकीय निदेशक, बेहद ऊंचा पद। बरखा यानी बरखा दत्त- ‘एनडीटीवी 24/7 की समूह संपादक, बेहद रसूखदार पद। सवाल यह उठता है कि इन दोनों का तिहाड़ जेल से क्या मतलब। मतलब है, मतलब ही नहीं बल्कि बहुत बड़ा मक़सद है! दरअसल, 2-जी स्पेक्रट्रम घोटाले के सूत्रधारों में इनकी शुमारी काफ़ी मायने रखती है। कथित रूप से दुनिया की सबसे बड़ी दलाल नीरा राडिया की ये दोनों दाएं-बाएं हाथ सरीखे हैं, जो राजनीति के गलियारे में नीरा राडिया की बेलाग इंट्री करवाते हैं।

बरखा दत्त और वीर सांघवी

बरखा दत्त और वीर सांघवीबड़ा ही अजीब सवाल है। वीर यानी वीर सांघवी- ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के संपादकीय निदेशक, बेहद ऊंचा पद। बरखा यानी बरखा दत्त- ‘एनडीटीवी 24/7 की समूह संपादक, बेहद रसूखदार पद। सवाल यह उठता है कि इन दोनों का तिहाड़ जेल से क्या मतलब। मतलब है, मतलब ही नहीं बल्कि बहुत बड़ा मक़सद है! दरअसल, 2-जी स्पेक्रट्रम घोटाले के सूत्रधारों में इनकी शुमारी काफ़ी मायने रखती है। कथित रूप से दुनिया की सबसे बड़ी दलाल नीरा राडिया की ये दोनों दाएं-बाएं हाथ सरीखे हैं, जो राजनीति के गलियारे में नीरा राडिया की बेलाग इंट्री करवाते हैं।

2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले के राजा, यानी ए.राजा सबके गले की फांस बने हुए हैं। देश की राजनीति की उत्तरी से दक्षिणी सीमा तक हहाकार मचा हुआ है। गली के छुटभैया नेताओं से लेकर पीएमओ तक सभी अपना ब्रह्मास्त्र एक दूसरे पर चला रहे हैं, लेकिन सब बेकार। ए. राजा का इस्तीफ़ा भी 70 हज़ार करोड़ के इस घोटाले में कोई मायने नहीं रखता। बस सभी लोग भ्रष्टाचार के उस पुराने पेड़ की ऊपरी फुनगी को काटने में लगे हैं, ताकि जब उनकी बारी आए तो फिर दुबारा उगे उस फुनगी से उगे फूल का आनंद ले सकें। फिर क्या? ज़्यादा से ज़्यादा इसी तरह का हो-हंगामा और एक बार फिर उस फुनगी को काट दी जाएगी।

इसी तरह काटने और फुनगी से मज़ा लेने का यह खेल निरंतर चलता रहे, और एक-एक कर जो सरकारें आएं इसका लाभ उठाते रहें। आज़ादी के बाद से अभी तक निरंतर यही होता रहा है। बोफ़ोर्स, टेलिकॉम (सुखराम), जीप पर्चेज (1948), साइकिल इंपोर्ट (1951), मुंध्रा मैस (1958), तेजा लोन(1960), पटनायक मामला (1965), मारुति घोटाला, कुओ ऑयल डील (1976), अंतुले ट्रस्ट (1981), एचडीडब्ल्यू कमिशन्स (1987), सिक्योरिटी स्कैम (1992) हर्षद मेहता, इंडियन बैंक (1992), चारा घोटाला (1996) लालू,  तहलका, स्टॉक मार्केट; केतन पारीख, स्टांप पेपर स्कैम;  अब्दुल करीम तेलगी, सत्यम घोटाला, मनी लांडरिंग (2009) मधु कोड़ा…आगे सिलसिला जारी है…

इन सारे घोटालों  की जड़ में किसी ने नहीं हाथ डाला, सभी ने फुनगियां ही काटीं। नतीजा सामने है, यानी घोटालों का सिलसिला जारी है। अगर शुरू में ही जड़ पर हाथ डाला गया होता, तो आज इतने घोटालों की नौबत ही नहीं आती। जड़ का तात्पर्य उन सारे लोगों से है, जो बैकग्राउंड में रहकर घोटालों में अपनी भूमिका निभाते हैं। हालांकि इन पर हाथ डालना थोड़ा मुश्किल ज़रूर है, लेकिन असंभव नहीं।

2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जड़ में वीर-बरखा का नाम आया है। इन्होंने किस प्रकार अपने प्रभाव का इस्तेमाल ए. राजा को टेलिकॉम मंत्री बनाने में किया। दरअसल, आयकर निदेशालय द्वारा नीरा राडिया के फ़ोन टैपिंग में यह ख़ुलासा हुआ कि नीरा ने अपने काम को अंजाम देने के लिए प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उन प्रभावी पत्रकारों को भी मैनेज किया, जिनकी हैसियत राजनीतिक गलियारे में ख़ासी है। इसकी पूरी जानकारी सबसे पहले वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसूण वाजपेयी ने अपने ब्लॉग पोस्ट “कॉरपोरेट के आगे प्रधानमंत्री भी बेबश” में दी। हालांकि अपने लेख में उन्होंने वीर-बरखा का नाम लिखने से परहेज किया। उन्होंने वीर-बरखा की जगह ‘प्रिंट और टीवी न्यूज़ चैनल के कुछ वरिष्ठ पत्रकार’ के संबोधन का इस्तेमाल किया। हालांकि तब तक आग पूरी तरह फैल चुकी थी।

भड़ास4मीडिया में वीर सांघवी और बरखा दत्त के नाम को लेते हुए सैकड़ों की संख्या में कई पत्रकारों ने लेख लिखा और उनकी धज्जियां उडाईं। लेकिन देश के किसी भी चैनल, अख़बार या पत्रिका ने इन दोनों का (वीर-बरखा) 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में कोई भी उल्लेख करना उचित नहीं समझा। विभिन्न चैनलों के सारे डंके धरे के धरे रह गए। डंके की चोट पर सच्चाई कहने वाले चैनलों के पत्रकार भी इन दोनों के ख़िलाफ़ कुछ भी बोलने या दिखाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। इस घोटाले का भंडाफोड़ करने वाले चैनल ‘हेडलाइंस टुडे’ ने भी केवल नीरा राडिया पर ही निशाना साधा, वीर-बरखा का नाम लेने की हिम्मत वे भी नहीं जुटा पाए। जबकि कहा जाता है कि दोनों के ख़िलाफ़ पुख़्ता सबूत थे।

इस बाबत, मैंने जब पुण्य प्रसूण वाजपेयी जी से संपर्क साधा और यह सवाल पूछा कि जब आपके पास पुख़्ता दस्तावेज़ थे, फिर आपने दलाल पत्रकारों का नाम छापने की जहमत क्यों नहीं उठाई। इसपर उनका जवाब था कि आपका जो भी सवाल है वह मुझे आप ई-मेल करें, मैं आपके सभी सवालों का जवाब दूंगा। लेकिन आज 6 महीने से ऊपर गुज़र गए, लेकिन मेरे ई-मेल का उनकी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया। बात यहीं ख़त्म नहीं होती। देश के वरिष्ठतम पत्रकार एम.जे. अकबर ने अपने लेख में नीरा राडिया को ही निशाना बनाया, दलाल पत्रकारों पर अपनी लेखनी चलाने की जहमत उन्होंने भी नहीं उठाई।

वीर-बरखा का नाम  2-जी स्पेक्ट्रम दलाली में उजागर होने पर 22 मई 2010 को इंडिया इंटरनेशनल ऑडिटोरियम में फ़ाउंडेशन फ़ॉर मीडिया प्रोफ़ेशनल की ओर से दलाली पर मीडिया डिबेट का आयोजन किया गया, विषय था “Lobbyists, government and media: Dangerous Liaisons?” इस आयोजन में कई पत्रकारों ने शिरकत की। एक से बढ़कर एक पत्रकार माइक पर आए और बार-बार सिर्फ़ ए.राजा, नीरा राडिया और 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले का ही ज़िक्र करते रहे। लेकिन सिनियर जर्नलिस्ट एन.आर. मोहंती ने अपने संबोधन में बरखा और वीर के नाम का जैसे ही ज़िक्र किया कि मंचासीन वरिष्ठ पत्रकारों ने इसपर आपत्ति जताते हुए कहा कि जो लोग यहां मौज़ूद नहीं हैं, उनका नाम न लिया जाए। लेकिन कुछ लोगों ने मंचासीन लोगों को यह कहकर चुप करा दिया कि यहां तो नीरा राडिया और ए.राजा भी नहीं हैं, फिर उनका नाम क्यों लिया जा रहा है। कुल मिलाकर इस डिबेट में वीर-बरखा के नाम को लेकर काफ़ी हो-हंगामा हुआ और डिबेट एक फ़्लॉप शो साबित हुआ।

अब सवाल यह उठता है कि ऐसे में ‘कैसे जाएंगे वीर-बरखा तिहाड़’, जब पूरी पत्रकारिता जगत पर दोनों का प्रोफ़ेशनल ख़ौफ़ सिर चढ़कर बोल रहा हो। इसका फ़ैसला कौन करेगा… एक कार्यक्रम के दौरान प्रेस काउंसिल  के अध्यक्ष जस्टिस गजेंद्र  नारायण रे की टिप्पणी “आज की पत्रकारिता वेश्यावृति में बदल गई है” बिल्कुल  प्रासंगिक प्रतीत होती है।

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लेखक सुधांशु कुमार युवा जर्नलिस्ट हैं. एक मीडिया हाउस में बतौर सब एडिटर कार्यरत हैं.

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0 Comments

  1. A IndWAR

    January 4, 2011 at 2:45 pm

    वीर–बरखा के बारे मीडिया के लोग मुखर नहीं हो पाए। इससे यही साबित होता है कि भारतीय मीडिया अभी वयस्क नहीं हो पाया है। यहाँ पत्रकार अपनी कलम से ज्यादा प्यार नहीं कर पाते हैं। कलम और वाणी सिर्फ अर्थ उपार्जन का एक साधन मात्र है। जहाँ उन्हें दिलेरी दिखानी होती है़, वहाँ ये बगले झांकते नज़र आते हैं। नव पत्रकारों को माडल का अभी इंतजार करना होगा।

  2. A IndWAR

    January 4, 2011 at 2:46 pm

    वीर–बरखा के बारे मीडिया के लोग मुखर नहीं हो पाए। इससे यही साबित होता है कि भारतीय मीडिया अभी वयस्क नहीं हो पाया है। यहाँ पत्रकार अपनी कलम से ज्यादा प्यार नहीं कर पाते हैं। कलम और वाणी सिर्फ अर्थ उपार्जन का एक साधन मात्र है। जहाँ उन्हें दिलेरी दिखानी होती है़, वहाँ ये बगले झांकते नज़र आते हैं। नव पत्रकारों को माडल का अभी इंतजार करना होगा।

  3. A IndWAR

    January 4, 2011 at 2:52 pm

    वीर–बरखा के बारे मीडिया के लोग मुखर नहीं हो पाए। इससे यही साबित होता है कि भारतीय मीडिया अभी वयस्क नहीं हो पाया है। यहाँ पत्रकार अपनी कलम से ज्यादा प्यार नहीं कर पाते हैं। कलम और वाणी सिर्फ अर्थ उपार्जन का एक साधन मात्र है। जहाँ उन्हें दिलेरी दिखानी होती है़, वहाँ ये बगले झांकते नज़र आते हैं। नव पत्रकारों को माडल का अभी इंतजार करना होगा।

  4. dhanish sharma

    November 17, 2010 at 3:17 am

    good.every kadi can learn from barkha ji and sanghvi ji.

  5. vijay mishra

    November 17, 2010 at 3:39 am

    वीर शंघावी-बरखा दत्त कितने बड़े नाम कभी हम लोग सोचते थे की हम भी ऐसा ही बनेगे लेकिन अब क्या बने -इतने बड़े दलाल- जिनके चरित्र से आने वाले छात्र प्रेरणा लेते थे आज उनको ही देखकर ये सोचने पर मजबूर हो जाना होता है की क्या ये सब पैसो के लिए किया गया जब कोई नाम बड़ा हो जाता है तो जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है तो क्या आने वाली युवा पीढ़ी को यही दे कर जायेगे ?

  6. vijay mishra

    November 17, 2010 at 4:02 am

    वीर शंघावी-बरखा दत्त कितने बड़े नाम कभी हम लोग सोचते थे की हम भी ऐसा
    ही बनेगे लेकिन अब क्या बने -इतने बड़े
    दलाल- जिनके चरित्र से आने वाले छात्र प्रेरणा लेते थे आज उनको ही देखकर ये सोचने
    पर मजबूर हो जाना होता है की क्या ये सब पैसो के लिए किया गया जब कोई नाम बड़ा हो
    जाता है तो जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है तो क्या आने वाली युवा पीढ़ी को यही
    दे कर जायेगे ?

  7. vineet kumar

    November 17, 2010 at 4:42 am

    शुक्रिया सुधांशु,बहुत अच्छा। मैं पिछले दो साल से लगातार देख रहा हूं कि मीडिया के भीतर आयी किसी भी तरह की समस्या,गड़बड़ियां,साजिश,घिनौनी हरकतें इससे लड़ने और हटाने के बजाय एक सेमिनार को जन्म देती है जिसमें कुछ बाबा टाइप पत्रकारों को मंच मिल जाता है जबकि इस पर ऐसा कुछ भी नहीं बलते जिससे कि इसे हटाने में मदद मिले। हर समस्या का समाधान सेमिनार में जाकर खोजने की संस्कृति के बजाय सीधे तौर पर विरोध औऱ वहिष्कार हो तो ऐसे नामों के साथ भी कारवाई होने की स्थिति मजबूत होगी।
    मेरा तो मन हुआ कि लिख दूं कि अगर वीर सिंघवी जेल भी जाते हैं तो सुधांशु जैसे कई वीर पैदा होंगे लेकिन मैं सुधांशु की तुलना वीर सिंघवी से करके उसकी धार का अपमान नहीं कर सकता। जमाने बाद पिछले तीन महीने से सिंघवी को फिर से पढञना शुरु किया,बस कार्पोरेट पत्रकारिता में उनके रंगों की जांच के लिए। वो ऐसा कुछ भी नहीं लिखते जिससे की कोई बहस या प्रतिरोध पैदा हो,हम इसकी उम्मीद भी नहीं करते। रही बात बरखा दत्त जैसे नामों की तो लक्ष्य फिल्म के प्रोड्यूसर को खोजो और पता करो कि अबकि करगिल से हटाकर कहां पीटीस करवाएगा?

  8. ..XYZ..

    November 17, 2010 at 12:49 pm

    Vir-Barkha ka prakran to saarwajanik ho chuka hai , par sabse zyaada aashcharya Pranav Roy ji par hai . Pranav Roy jee, ek sammanit naam hai par Barkha maamle mein unhone koi kaaryawaahi nahi ki . Iske do kaaran ho sakte hain – 1) Ya to jo bhi Patrakaar bhai log, Vir-Barkha ke baare mein jo kuch likh rahe hain, un sabko Pranav Roy jhutha maante hain . YA 2) NDTV ke hit mein bhi, Barkha kuch apni *Gopniya Shaktiyaan* istemaal kar rahi hain.
    Pranav Roy ji ko saaf karna chaahiye- ki Barkha sahi hain aur un par lage aarop galat hain , YA Barkha galat hain par Commercial benifit ke chalte Pranav Roy ji unke khilaaf koi action nahi lena chaahte .

  9. shravan shukla

    November 18, 2010 at 8:30 am

    arey yaar……to yeh log hai jo chhadm name aur kams we desh ki band baja rahe hai..

  10. अनूप आकाश वर्मा

    November 18, 2010 at 12:03 pm

    सुधांशु जी इस बेबाकी पर आपकी जितनी तारीफ की जाये कम है…..बहुत-बहुत-बहुत साधुवाद!
    यही सही पत्रकारिता है……..

  11. dr.binay ranjan

    November 19, 2010 at 6:04 pm

    wah sundhansu bhai tum to hilla ke rakh deye ho……keep it up!!!
    bahut aage tak jaoge..

  12. J.P.Dubey

    November 21, 2010 at 11:11 am

    :o:o Bhut ascharya evam man udas huaa .etne bade adrash patrakar esha karte ha bhagvan enko sadbudhi da.

  13. mohan

    November 28, 2010 at 8:25 am

    …Sach to ye hai ki jo jitnaa bada news peper ,electronic media wo utni badi dalali kar sakta hai…..natija hamare saamne hai………………………………………….sach ko likne ke liya dhandywad…………….lage raho…

  14. महेश वत्स

    December 2, 2010 at 9:19 am

    देश की पत्रकारिता आज एक ऐसे दोराहे पर खडी है जहां उसे यह फैसला करने की आवश्यकता है कि वह चौथे स्तमंभ के रूप मे अपना सम्मान बनाए रखना चाहती है या राजनेताओं और उद्दोगपत्तियों के हाथ की कठपूतली बन कर उनके इशारे पर नाचना।
    देश नामी पत्रकारों का इस प्रकार भ्रष्टाचार के दलदल में आरोपित होना कही ना कही पत्रकारिता की सांख पर गहरा प्रहार करता है।

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