शीघ्र पढ़ेंगे दनपा का उपन्यास ‘लोक कवि अब गाते नहीं’

: स्वर्गीय जय प्रकाश शाही की याद में लिखा गया है यह उपन्यास : स्वर्गीय बालेश्वर के जीवन के कई दुख-सुख हैं इसमें : ‘लोक कवि अब गाते नहीं’ सिर्फ भोजपुरी भाषा, उसकी गायकी और भोजपुरी समाज के क्षरण की कथा भर नहीं है बल्कि लोक भावनाओं और भारतीय समाज के संत्रास का आइना भी है।

गांव का निर्धन, अनपढ़ व पिछड़ी जाति का एक व्यक्ति एक जून भोजन, एक कुर्ता पायजामा पा जाने की ललक और अनथक संघर्ष के बावजूद अपनी लोक गायकी को कैसे बचा कर रखता है। न सिर्फ लोक गायकी को बचा कर रखता है बल्कि शीर्ष पर पहुंचता है, यह उपन्यास इस ब्यौरे को बड़ी बेकली से बांचता है। साथ ही शीर्ष पर पहुंचने के बावजूद लोक गायक की गायकी कैसे और निखरने के बजाय बिखरती जाती है, बाजार के दलदल में दबती जाती है, इस तथ्य को भी यह उपन्यास बड़ा बेलौस हो कर भाखता है, इसकी गहन पड़ताल करता है। लोक जीवन तो इस उपन्यास की रीढ़ ही है। और कि जैसे उपन्यास के अंत में नई दिल्ली स्टेशन पर लीडर-ठेकेदार बब्बन यादव द्वारा बार-बार किया जाने वाला उद्घोष ‘लोक कवि जिंदाबाद!’ और फिर छूटते ही पलट कर लोक कवि के कान में फुसफुसा-फुसफुसा कर बार-बार यह पूछना, ‘लेकिन पिंकी कहां है?’ लोक कवि को किसी भाले की तरह चुभता है और उन्हें तोड़ कर रख देता है, फिर भी वह निरुत्तर हैं। वह व्यक्ति जो शीर्ष पर बैठ कर भी बिखरते जाने को विवश हो गया है, अभिशप्त हो गया है, अपने ही रचे, गढ़े बाजार के दलदल में दब गया है। छटपटा रहा है किसी मछली की मानिंद और पूछ रहा है, ‘लेकिन भोजपुरी कहां है?’ बतर्ज बब्बन यादव, ‘लेकिन पिंकी कहां है?’ लोक गायकी पर निरंतर चल रहा यह जूता ही तो ‘लोक कवि अब गाते नहीं’ का शोक गीत है! और संघर्ष गीत भी!


-लेखक दयानंद पांडेय का आत्म-कथ्य-

पीड़ित की पैरवी

कहानी या उपन्यास लिखना मेरे लिए सिर्फ लिखना नहीं, एक प्रतिबद्धता है। प्रतिबद्धता है पीड़ा को स्वर देने की। चाहे वह खुद की पीड़ा हो, किसी अन्य की पीड़ा हो या समूचे समाज की पीड़ा। यह पीड़ा कई बार हदें लांघती है तो मेरे लिखने में भी इसकी झलक, झलका (छाला) बन कर फूटती है। और इस झलके के फूटने की चीख़ चीत्कार में टूटती है। और मैं लिखता रहता हूं। इसलिए भी कि इसके सिवाय मैं कुछ और कर नहीं सकता। हां, यह जरूर हो सकता है कि यह लिखना ठीक वैसे ही हो जैसे कोई न्यायमूर्ति कोई छोटा या बड़ा फैसला लिखे और उस फैसले को मानना तो दूर उसकी कोई नोटिस भी न ले। और जो किसी तरह नोटिस ले भी ले तो उसे सिर्फ कभी कभार ‘कोट’ करने के लिए।

तो कई बार मैं खुद से भी पूछता हूं कि जैसे न्यायपालिका के आदेश हमारे समाज, हमारी सत्ता में लगभग अप्रासंगिक होते हुए हाशिए से भी बाहर होते जा रहे हैं। ठीक वैसे ही इस हाहाकारी उपभोक्ता बाजार के समय में लिखना और उससे भी ज्यादा पढ़ना भी कहीं अप्रासंगिक होकर कबका हाशिए से बाहर हो चुका है तो भाई साहब आप फिर भी लिख क्यों रहे हैं?  क्यों क्या, लिखते ही जा रहे हैं! क्यों भई क्यों? तो एक बेतुका सा जवाब भी खुद ही तलाशता हूं। कि जैसे न्यायपालिका बेल पालिका में तब्दील हो कर हत्यारों, बलात्कारियों, डकैतों और रिश्वतखोरों को जमानत देने के लिए आज जानी जाती है, इस अर्थ में उसकी प्रासंगिकता क्या जैसे यही उसका महत्वपूर्ण काम बन कर रह गया है तो कहानी या उपन्यास लिख कर खुद की, व्यक्ति की, समाज की पीड़ा को स्वर देने के लिए लिखना कैसे नहीं जरूरी और प्रासंगिक है? है और बिलकुल है।

सो लिखता ही रहूंगा। तो यह लिखना भी पीड़ा को सिर्फ जमानत भर देना तो नहीं है? यह एक दूसरा सवाल मैं अपने आप से फिर पूछता हूं। और जवाब पाता हूं कि शायद! गरज यह कि लिख कर मैं पीड़ा को एक अर्थ में स्वर देता ही हूं दूसरे अर्थ में जमानत भी देता हूं। भले ही हिंदी जगत का वर्तमान परिदृश्य बतर्ज मृणाल पांडेय, ‘खुद ही लिख्या था, खुदै छपाये, खुदै उसी पर बोल्ये थे।’ पर टिक गया है। दरअसल सारे विमर्श यहीं पर आकर फंस जाते हैं। फिर भी पीड़ा को स्वर देना बहुत जरूरी है। क्योंकि यही मेरी प्रतिबद्धता है। किसी भी रचना की प्रतिबद्धता हमेशा शोषितों के साथ होती है। मेरी रचना की भी होती है। तो मैं अपनी रचनाओं में पीड़ितों की पैरवी करता हूं। हालांकि मैं मानता हूं कि लेखक की कोई रचना फैसला नहीं होती और न ही कोई अदालती फैसला रचना। फिर भी लेखक की रचना किसी भी अदालती फैसले से बहुत बड़ी है और उसकी गूंज, उसकी सार्थकता सदियों में भी पुरानी नहीं पड़ती। यह सचाई है।

सचाई यह भी है कि पीड़ा को जो स्वर नहीं दूंगा तो मर जाऊंगा। नहीं मर पाऊंगा तो आत्महत्या कर लूंगा। तो इस अचानक मरने या आत्महत्या से बचने के लिए पीड़ा को स्वर देना बहुत जरूरी है। यह स्वर देने के लिए लिखना आप चाहें तो इसे सेफ्टी वाल्ब भी कह सकते हैं मेरा, मेरे समाज का! बावजूद इस सेफ्टी वाल्ब के झलके के फूटने की चीख़ की चीत्कार को मैं रोक नहीं पाता क्यों कि यह झलका तवे से जल कर नहीं जनमता समयगत सचाइयों के जहर से पनपता है और जब तब फूटता ही रहता है। मैं क्या कोई भी नहीं रोक सकता इसे। इस लिखने को।

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Comments on “शीघ्र पढ़ेंगे दनपा का उपन्यास ‘लोक कवि अब गाते नहीं’

  • janardan yadav says:

    pandey jee pranaam.
    cheer-paratikshit entjaar rahega .kyokee reportaz aur khhesagoo ke liye aapka koe saani nahee.

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