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अन्ना व बाबा के सवालों का सटीक जवाब है ‘अर्थक्रांति’

दिनेश चौधरीछत्तीसगढ़ के एक छोटे-से कस्बे बालोद में स्थानीय महावीर विद्यालय का सभागार खचाखच भरा हुआ है। वातावारण में थोड़ी उमस भी है। व्याख्यान प्रारंभ हुए कोई दो घंटे हो चुके हैं, फिर भी लोगों की एकाग्रता भंग नहीं हुई है। मजे की बात यह है कि व्याख्यान किसी धर्मगुरु का नहीं है, जो सरस पौराणिक गाथायें सुनाकर श्रोताओं को बांधे हुए हो।

दिनेश चौधरीछत्तीसगढ़ के एक छोटे-से कस्बे बालोद में स्थानीय महावीर विद्यालय का सभागार खचाखच भरा हुआ है। वातावारण में थोड़ी उमस भी है। व्याख्यान प्रारंभ हुए कोई दो घंटे हो चुके हैं, फिर भी लोगों की एकाग्रता भंग नहीं हुई है। मजे की बात यह है कि व्याख्यान किसी धर्मगुरु का नहीं है, जो सरस पौराणिक गाथायें सुनाकर श्रोताओं को बांधे हुए हो।

दरवाजे की झिरियों से जो शब्द छनकर बाहर आ रहे हैं वे अर्थशास्त्र की किसी उबाऊ, मोटी व ठस्स किताबों से लिये हुये लगते हैं। राजकोषीय घाटा, वित्तीय पूंजी, दोहरी कराधान प्रणाली और सकल घरेलू उत्पाद जैसे भारी-भरकम शब्द कानों से टकराते हैं और सुनने वाला सोचता ही रह जाता है कि इस गांव-गंवई की सभा में इतने सारे अर्थशास्त्री कहां से इकट्‌ठे हो गये हैं? जब तक वह अपनी जिज्ञासाओं को शांत करे, श्रोताओं के सारे सवालों का जवाब देने के बाद अतुल देशमुख अपने लैपटाप को समेटते हुए सभागार के बाहर निकलने लगते हैं, क्योंकि उनकी अगली सभा छत्तीसगढ  के ही एक अन्य नगर धमतरी में व दूसरे दिन भिलाई में हैं।

नागपुर के अतुल देशमुख पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट है और वे ‘अर्थक्रांति’ प्रतिष्ठान के कार्यकर्ता हैं। उनका व्याख्यान उस पावर पॉइंट प्रेजेन्टेशन का एक हिस्सा है जिसे पूर्व में महामहिम राष्ट्रपति, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी, वर्तमान व पूर्व वित्तमंत्री, विपक्ष के नेता, अनेक मंत्री-सांसदों  व आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों समेत अन्ना के सहयोगी अरविंद केजरीवाल से लेकर बाबा रामदेव तक देख चुके हैं। किसी ने भी ‘अर्थक्रांति’ समूह के प्रस्तावों का नकारा नहीं है- उल्टे सराहना की है- पर इसे स्वीकार करने की दिशा में कोई गंभीरता नहीं दिखाई है। हालांकि समूह का मानना है कि ये प्रस्ताव, जिनका बाकायदा पेटेंट हासिल किया गया है, अगर सरकार स्वीकार कर लेती है तो न सिर्फ कालेधन व भ्रष्टाचार की समस्या से स्थायी निजात मिल सकेगी, बल्कि देश की जटिल कर प्रणाली में भी क्रांतिकारी बदलाव आयेगा और उद्यमी व व्यवसायी कराधान के झंझटों से मुक्त होकर देश के रचनात्मक विकास में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकेंगे। समूह का यह भी मानना है कि उनके प्रस्तावों के लागू होने पर नकली नोटों का चलन खत्म करने और फलस्वरुप आतंकी गतिवधियों में नकेल कसने में सहायता मिल सकेगी।

औरंगाबाद की एक सभा में अनिल बोकिल

औरंगाबाद की एक सभा में अनिल बोकिल

बाबा रामदेव ने अपने ‘अनशन’ के दौरान विदेशों में जमा कालेधन को वापस लाने के अलावा भी कुछ मुद्‌दे उठाये थे। इनमें से एक मुद्‌दा बड़े नोटों का चलन बंद करने का था। सरकार ने 3 जून की शाम को ही कह दिया की बाबा की यह मांग पूरी नहीं हो सकती और उन्होंने दोबारा कभी इस सवाल को उठाया भी नहीं। एकाध बार किसी टीवी रिपोर्टर ने जब इस मांग का ‘जस्टीफिकेशन’ मांगा तो बाबा इसका कोई संतोषजनक जवाब भी नहीं दे सके। गांधीवादी कार्यकर्ता तथा अर्थक्रांति आंदोलन के जनक श्री अनिल बोकिल ने बाबा की इस ‘आइसोलेटेड’ मांग का विरोध करते हुए कहा कि (देखें उनका इंटरव्यू) बाबा की आधी-अधूरी मांग देश के लिये खतरनाक है। इस मांग को अर्थक्रांति के मूल प्रस्तावों से अलग करके नहीं उठाया जाना चाहिये।

अर्थक्रांति प्रस्तावों की तह में जाने से पहले यह जान लेना दिलचस्प होगा कि इन प्रस्तावों के जनक श्री अनिल बोकिल आखिर हैं कौन, क्योंकि हिंदी पट्‌टी में अभी तक यह नाम कमोबेश अनसुना है। प्रस्तावों को देखकर किसी को भी ये भरम हो सकता है कि श्री अनिल बोकिल एक अर्थशास्त्री हैं। हकीकतन वे एक मेधावी मेकेनिकल इंजीनियर हैं और अपने पूरे करियर के दौरान अव्वल दर्जे पर आते रहे। पढ़ाई -लिखाई पूरी करने के बाद उन्होंने अपना उद्योग स्थापित किया जो देश की एक जानी-मानी ऑटो कंपनी को कुछ ऐसे सामानों की आपूर्ति करता था, जिसे पूर्व में आयात करना पड़ता था। दुर्योग से 90 के दशक में नरसिंहा राव की सरकार ने उदारीकरण के नाम पर जो नीतियां लागू की उससे औरंगाबाद के आस-पास उनके अनेक मित्रों के उद्योग तबाह हो गये व अनिल को भी भारी नुकसान सहना पड़ा। यद्यपि वे अपना कारोबार बचा सकते थे पर मित्रों को मिले झटके ने उन्हें बेहद व्यथित कर दिया। अर्थशास्त्र की बारीकियों से वे शायद इसी दौरान रू-ब-रू हुए होंगे, हालांकि वे स्वयं इस विषय में कोई बात नहीं करते। अनिल ने सड़क पर आ गये कोई एक सौ उद्यमियों से केवल एक -एक रुपये लेकर एक सहकारी संस्था प्रारंभ की और बैंक से 5 लाख रुपयों का लोन लेकर उन्हें नये सिरे से काम चालू करने के लिये प्रोत्साहित किया। आज उनके सारे सहयोगी गाड़ी व बंगले की हैसियत रखते हैं, पर अनिल ने कभी वापस मुड़ कर कारोबार की ओर नहीं देखा। वे अपना पूरा समय ‘अर्थक्रांति’ आंदोलन को देते हुए न्यूनतम खर्च पर गुजारा करते हैं और उनके साथियों का कहना है वे इतने सादगी-पसंद हैं कि नये कपड़ों व जूते-चप्पलों तक से परहेज करते हैं।

धमतरी (छत्तीसगढ़) की एक जनसभा में अतुल देशमुख

धमतरी (छत्तीसगढ़) की एक जनसभा में अतुल देशमुख

देश की अर्थव्यवस्था में क्रांति के लिये इस आंदोलन ने लंबी छान-बीन, शोध व कड़ी मेहनत के बाद कुल पांच प्रस्तावों को विचार के लिये देश के सामने रखा है। आंदोलन के कार्यकर्ताओं का दृढ  विश्वास है कि इन प्रस्तावों के लागू होने पर न सिर्फ भ्रष्टाचार, काला धन व बेकारी-बरोजगारी जैसी समस्याओं से निजात मिल सकेगी, वरन्‌ भारत के लिये आर्थिक महाशक्ति बनने का मार्ग भी प्रशस्त हो सकेगा। मजे कि बात तो यह है कि इन प्रस्तावों में वैश्विक समस्याओं के लिये ‘ग्लोबल टैक्स’ देने और देश के भीतर राजनीतिक दलों को चुनावी खर्चों के लिये अनुदान देने की व्यवस्था भी रखी गयी है।

जनतंत्र बनाम करतंत्र

‘अर्थक्रांति’ मौजूदा कर प्रणाली को सिरे से खारिज करती है। श्री अनिल बोकिल कहते हैं कि यह व्यवस्था किसी भी ईमानदार व्यक्ति को अपनी ईमानदारी त्याग देने के लिये उकसाती है। भारत की अर्थव्यवस्था व इसके इतिहास की गहरी समझ रखने वाले आदिलाबाद के श्री रवीन्द्र शर्मा का मानना है कि मौजूदा कर व्यवस्था औपनिवेशिक शासनकाल की उन्हीं नीतियों का विस्तार है जो जानबूझकर किसी व्यक्ति को बेईमान बनाता है ताकि उसे राजसत्ताओं के समक्ष आसानी से झुकाया जा सके। रायपुर के व्यवसायी शेखर वर्मा कहते हैं कि कर वसूली की वर्तमान प्रक्रिया इतनी अराजक है मानों राह चलते किसी भले आदमी के पीछे लुटेरों व पिंडारियों के गिरोह को छोड़  दिया गया हो। उसका सारा ध्यान सही राह की तलाश में – अपने प्रोडक्ट की डिजाइन व गुणवत्ता सुधारने में नहीं-बल्कि इस बात में लगा होता है कि इन पीछे लगे हुए लोगों से कैसे बचा जाये? शेखर की इस बात में इसलिए भी दम लगता है कि इस समय देशभर की विभिन्न अदालतों में केवल आयकर के 30 लाख मुकदमें लंबित हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जन व तंत्र का कितना समय, कितनी ऊर्जा इस कार्य में जाया हो रही है।

ईमानदार या भले आदमी की बात तो छोड़ ही दें, किसी विशेषज्ञ कर सलाहकार को भी ठीक-ठीक यह पता नहीं होता कि देश भर में कुल कितने प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कर हैं जो केंद्र सरकार, राज्य सरकार व स्थानीय निकायों द्वारा लिये जाते हैं। कब, कहां, कितना कर किस तरह दिया जाना है, इसको लेकर हमेशा एक अनिश्चय की स्थिति बनी रहती है। गौरतलब है कि इस समय केंद्र व राज्य सरकारों को होने वाली राजस्व आय में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष करों का अनुपात 34 : 66 है। एक आदर्श कर व्यवस्था में समानता का तत्व बेहद महत्वपूर्ण होता है और यह समानता तभी आ सकती है जब प्रत्यक्ष-कर वसूली अप्रत्यक्ष-कर की तुलना में ज्यादा हो। यहां यह उल्लेख करना असंगत न होगा कि आयकर व संपत्ति कर जहां प्रत्यक्ष करों में आते हैं वहीं वस्तुओं व सेवाओं पर लगने वाले कर -जो देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं- अप्रत्यक्ष करों की श्रेणी में आते हैं। यानी एक लीटर पेट्रोल लेने पर एक ऑटो रिक्शा चालक को भी उतना ही कर चुकाना पड़ता है जो मुकेश अंबानी को या महेंन्द्र सिंह धोनी को देना पड़ता है। यहां तो समता के सिद्धांत की हवा ही निकल जाती है।

दूसरी ओर सरकार बार-बार यह कहती रही है कि उसने बाजार को एक स्वस्थ प्रतियोगिता के लिये पूरी तरह से खोल दिया है। यहां गौर करने की बात यह है कि बाहर की कंपनियां तो अपनी सरकारों की सहूलियतों के पंख लेकर आ रही हैं पर भारत सरकार ने अपनी कंपनियों के पैरों पर करों का बोझ लाद दिया है। ऐसे माहौल में ‘स्वस्थ प्रतियोगिता’ की बात भी करना एक तरह का मानसिक दिवालियापन है। अर्थक्रांति का मानना है कि आज के माहौल में यदि आपको प्रतियोगिता में खड़ा होना है तो 1 प्रतिशत का कर भी बहुत ज्यादा है। उसके अनुसार देश में जमीन हड़पने वाले छोटे-छोटे ‘सेज’ (Special Economic Zone) की जरूरत नहीं है, बल्कि पूरे देश को ‘सेज’ घोषित करने की जरूरत है और केवल आयात शुल्क को छोड़ कर सारे कर वापस ले लिये जाने चाहिये तथा कर वसूली से संबंधित इन सभी महकमों को बंद कर दिया जाना चाहिये। गौरतलब है कि कर-चोरी कर जमा की गयी राशि ही काला धन कहलाती है, इसलिए जब कर ही नहीं होगा तो काला धन कहां से आयेगा?

कमाई बिन कर

सरकार यदि कर वसूली ही बंद कर दे तो उसकी राजस्व आय का क्या होगा? अर्थक्रांति के इस प्रस्ताव का सारा दारोमदार बैंकिंग व्यवस्था पर टिका हुआ है जो आंदोलन की निगाह में अब तक काफी विश्वसनीय रहा है। आंदोलन के इस प्रस्ताव के अनुसार समस्त प्रकार के करों के वापस ले लिये जाने के एवज में बैंक में किसी भी खाते में पैसे जमा करने के दौरान सीधे-सीधे खातेदार से जमा की गयी रकम का 2 फीसदी काट लिया जाये। 2 फीसदी का यह आंकडा आगे चलकर और भी कम हो सकता है तथा ‘अर्थक्रांति’ का यही प्रस्ताव एक तरह से तुरूप का इक्का है।

अपने इस प्रस्ताव के समर्थन में आंदोलन ने कर वसूली के आंकड़ों, बैंकिंग कामकाज, केंद्र व राज्य सरकारों सहित विभिन्न स्थानीय निकायों की राजस्व आय तथा अन्य प्रासंगिक तथ्यों की गहरी छानबीन करते हुए सरकार की वर्तमान राजस्व आय व संभावित-प्रस्तावित आय का तुलनात्मक ब्यौरा प्रस्तुत किया है, जो कि वास्तव में चौंकाने वाला है। अधिकृत आंकडों का हवाला देते हुए आंदोलन ने बताया है कि वर्ष 2009-10 के लिये भारत सरकार के बजट अनुमानों के अनुसार केंद्र व राज्य सरकारों की संयुक्त राजस्व आय 10,26,460 करोड  रुपये थी। एकत्र किये गये विभिन्न आंकडों के आधार पर यदि इसमें स्थानीय निकायों के 75,000 करोड  रुपयों की आय जोड़  दी जाये तो मोटे तौर पर कुल आय 11 लाख करोड  रुपये होती है।

‘अर्थक्रांति’ यहां पर तस्वीर का दूसरा पहलू देखने का आग्रह करती है। वे कहते हैं कि आप प्रतिदिन बैंक में जमा होने वाली राशि को फिलहाल छोड़ दें जो व नगद व मांग-जमा पर आधारित होती है। नेशनल फंड ट्रांसफर, इलेक्ट्रानिक क्लीयरिंग सिस्टम और मोबाइल ट्रांसफर के मामले भी दरकिनार कर दें। केवल आर.टी.जी.एस. के मामले को उदाहरण के तौर पर अपने जेहन में रखें, जिसके प्रतिदिन औसतन 60,000 लेन-देन से 2 लाख 70 हजार करोड  रुपयों का अंतरण होता है। गणना की सुविधा के लिये इसे और भी घटाकर 2 लाख 50 हजार करोड  रुपये कर दिये जायें तो इसका 2 फीसदी 5 हजार करोड़  होता है। 5 हजार करोड़ की यह आय केवल एक दिन की होगी। अब यदि बैंक अवकाश व रविवार के दिनों को निकालते हुए मोटे तौर पर केवल 300 दिनों को गणना में लिया जाये तो सरकार की आय 15 लाख करोड  रुपये होगी, जो कि वर्तमान आय से 4 लाख करोड  रुपये अधिक है। वह भी तब जब जमा व अंतरण के अन्य मामलों को शामिल नहीं किया जा रहा है और समूची राशि बगैर भागदौड़ के बैठे-बिठाये आ रही है।

‘अर्थक्रांति’ ने इस 2 फीसदी वसूली के तार्किक वितरण का भी प्रस्ताव रखा है, जिसके अनुसार 0.7 फीसदी राशि केंद्र को, 0.6 फीसदी राशि राज्यों को व 0.35 फीसदी राशि स्थानीय निकायों के हिस्से में जायेगी। सेवा के बदले में बची हुई 0.35 फीसदी राशि बैंकों लिये रखी जायेगी क्योंकि इनका कामकाज कई गुना बढ़ जायेगा। इसी राशि से बैंक की अनेक शाखाओं का विस्तार भी होगा और कर वसूली के महकमों के बंद होने से रोजगार के अवसरों में जो कमी आयेगी उसकी क्षतिपूर्ति हो जायेगी। ‘अर्थक्रांति’ का अनुमान है कि नगद जमा व अंतरण के अन्य मामलों को विचार में लिये जाने के बाद 2 फीसदी की प्रस्तावित कटौती और भी घटकर केवल 1 फीसदी रह जायेगी।

बड़े नोट की बड़ी मुसीबतें

जैसा कि पूर्व में जिक्र किया जा चुका है बड़े नोटों को वापस लेने की जो मांग बाबा रामदेव ने उठायीं थीं, दरअसल वे ‘अर्थक्रांति’ से ही प्रेरित थीं। अनिल बोकिल कहते हैं कि पैसे केवल विनिमय का माध्यम हैं, कमोडिटी नहीं हैं और इसके कमोडिटी में बदलने के अवसर तब ज्यादा होते हैं जब वे आपकी जेब में पड़े होते हैं। इसीलिये एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था के लिये नगद मुद्रा सदैव बैंक मुद्रा से कम होनी चाहिये, लेकिन वर्तमान परिद्श्य इसके ठीक विपरीत है और 8,32,414 करोड  की नगद मुद्रा के मुकाबले बैंक मुद्रा केवल 6,38, 373 करोड़ है। इसका एक बड़ा कारण अधिक मूल्य वाले नोट हैं।

अतुल देशमुख कहते हैं कि बड़े नोट बड़ी रिश्वत के लिये सुविधाजनक होते हैं। रोजमर्रा की खरीदारी के लिये तो नोटों की उपयोगिता समझ में आती है पर बड़े नोटों के होने से करोड़ों के वारे -न्यारे हो जाते हैं और सरकार के हाथ कुछ नहीं लगता।यह भ्रष्टाचार के अलावा देश में आतंकवाद को भी बढ़ावा दे रहे हैं। पिछले दिनों में ऐसे कई मामले सामने आये हैं, जिनमें सीमा पार से नकली नोटों के आने की पुष्टि हुई है। अतुल कहते हैं कि 50 रुपयों से लेकर 1000 रुपयों तक एक नोट को छापने का औसत खर्च लगभग 40 रुपये है। इसलिये यदि  कोई 1000 रूपये का नोट छापता है तो उसे बड़ी आसानी से कमीशन देने के बाद भी एक मोटी रकम मिल जाती है। लेकिन यदि बड़े नोटों को बंद कर दिया जाये तो 40 रुपये के खर्च पर भला कोई 50 रुपये का नोट क्यों छापेगा?

लोगों का दूसरा तर्क होता है कि बड़े नोटों के बगैर लेन-देन किस तरह होगा? अतुल कहते हैं कि यह सरकार के ही आंकड़ें हैं कि इस देच्च में 84 फीसदी लोगों की रोज की आय 20 रुपये से भी कम है, ऐसे में केवल 16 फीसदी लोगों के लिये, जो बैंकिंग व्यवस्था से भलीभांति अवगत हैं, बड़े नोट छापने की क्या आवश्यकता है? इसीलिये अर्थक्रांति का प्रस्ताव है कि 50 रुपये के नोट को छोड कर बाकी बड़े नोट बंद कर दिये जायें, नगद लेन देन की अधिकतम सीमा रुपये 2000 हो, इस लेन-देन पर कोई कर नहीं लगाया जाये तथा इससे ज्यादा राशि के नगद लेन-देन पर कोई कानूनी संरक्षण न हो।

प्रस्तावों को लेकर अनेक लोगों की अनेक जिज्ञासायें होतीं हैं, जिसे आंदोलन ने विभिन्न माध्यमों से सार्वजनिक कर दिया है। वे अपने वेब-ठिकाने के माध्यम से भी प्रतिदिन लोगों से रू-ब-रू हो रहे हैं। महाराष्ट्र में यह आंदोलन काफी जोर पकड़ चुका है। भीलवाड़ा में सामाजिक कार्यकर्ता सुनील आगीवाल इस आंदोलन से इतने प्रभावित हैं कि वे लोगों को मुफ्त में इसकी सीडी बांटने के कार्य में लगे हुए हैं तथा उनकी योजना पूरे राजस्थान में ‘अर्थक्रांति के व्याखयान आयोजित करने की है। छत्तीसगढ  में सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सोनी ने बाकायदा व्याख्यान की ट्रेनिंग हासिल कर लोगों के बीच जाना शुरू कर दिया है। हिंदी पट्‌टी में बाकी स्थानों पर अभी यह काम होना है।

अन्ना हजारे इस व्यवस्था के भ्रष्ट लोगों की नाक में नकेल कसने की कोशिश में लगे हैं, जबकि अनिल बोकिल चाहते हैं कि व्यवस्था ऐसी हो जहां इन सब की संभावना ही न हो। उम्मीद की जानी चाहिये कि इन सभी की मिली-जुली कोशिशें एक दिन रंग लायेगी।

अनिल बोकिल से दिनेश चौधरी की बातचीत पढ़ने के लिए क्लिक करें- हमारे प्रस्तावों की सरलता ही हमारी दिक्कत है : अनिल बोकिल

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. suresh kumar gupta

    August 15, 2011 at 3:41 pm

    aapki arth kranti me dum dikha mai isko oue vistar se samghana chahta hu kripya marg dersan kare

    thanks

  2. girish pankaj

    August 15, 2011 at 6:14 pm

    sundar, prerak vichar lage deshmukh ji k. aise log barhe, yahi shubhkamana hai,.

  3. s.p.singh

    August 16, 2011 at 12:42 pm

    how would say,that after closing all the tax collecting organisations or scraping the tax collection, people automatically will do the transactions through banks is it possible ? and how ?

  4. sunil kumar sharma

    August 16, 2011 at 6:21 pm

    aapne jo arth kranti ka mudda sujhaya wah vistar purwak samjha kar kogo ko is vichar se avagat karana hoga taki logon ka dhyan asli baton per jaye aur koi unhe gumrah karne ki cheshta na kare
    thanks

  5. चंदन कुमार मिश्र

    August 17, 2011 at 3:35 am

    2007 में 84 करोड़ लोग ऐसे थे, अब तो 2011 है। यह कहीं 90 करोड़ तो नहीं हो गया?

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