ये वीडियो देखने के बाद भी आप कहेंगे कि भारत में कानूनराज है?

: मुंबई पुलिस की क्रूरता का वीडियो : मुंबई से एक साथी ने यह वीडियो भड़ास4मीडिया के पास भेजा है. कुछ मिनट के इस वीडियो के जरिए आप देखकर जान सकते हैं कि अपनी भारतीय पुलिस कितनी बर्बर और अराजक है. दुनिया भर में पुलिसिंग को जनपक्षधर बनाने और न्यूनतम हिंसा के जरिए संचालित किए जाने के प्रयास जोरों पर है. लेकिन अपने देश में पुलिस ने जैसे तय कर रखा हो कि उसे तो सिर्फ डंडे के जरिए ही पुलिसिंग करनी है, बाकी कोई फंडा नहीं सीखना.

वीडियो देखने से पता चल रहा है कि एक कम उम्र के लड़के को मुंबई के पनवेल इलाके के पुलिस वाले बेतरह मार रहे हैं. दो पुलिस वालों ने उसके हाथ-पैर पकड़ कर उल्टा कर रखा है और दो-तीन अन्य पुलिस वाले लड़के की पीठ पैर आदि पर पट्टों, फट्टों, लाठियों के जरिए मारे जा रहे हैं. जब लड़का बुरी तरह चीखने लगता है तो उसे कुछ देर के लिए छोड़ते हैं और वह लड़का जाने क्या क्या बोलता रहता है. संभव है, जो युवक इन पुलिस वालों की क्रूरता का शिकार हो रहा है, उसका किसी मामले में कोई अपराध हो और पुलिस उससे कुछ पता लगाने का काम कर रही हो लेकिन क्या यही एक तरीका है पता लगाने का? और, क्यों यह पिटाई का हथियार ही गरीब लोगों पर अप्लाई किया जाता है जबकि कोई अमीर आदमी या बड़ा माफिया पकड़ा जाता है तो यही पुलिस वाले थाने में बिठाकर उसको चाय-पानी पिलाने लगते हैं. क्या पुलिस वालों का डंडा भी अमीर-गरीब के हिसाब से ही चलते हैं?

इस देश में मानवाधिकार आयोग समेत कई ऐसे संस्थान, प्रतिष्ठान, संगठन आदि हैं जो पुलिस उत्पीड़न के शिकार लोगों के लिए काम करते हैं पर ज्यादातर मामलों में गरीब व अशिक्षित लोग इन संगठनों तक पहुंच ही नहीं पाते. इसी कारण पुलिस वाले गरीबों पर अपने डंडों का बेखौफ प्रयोग करते रहते हैं. इस वीडियो के डिटेल्स नहीं पता हैं. कोई पत्रकार साथी अगर वीडियो में दिख रहे युवक व पुलिस वालों व संबंधित प्रकरण के बारे में बता सके तो इस मामले को विस्तार से जाना जा सकता है और न्याय के लिए पहल की जा सकती है. फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि हम भारत में रहते हुए पाकिस्तान-अफगानिस्तान में अराजक हालात को देखकर जिस तरह चिंतित होते हैं और फिर शुक्र मनाते हैं कि हम भारत में हैं जहां ऐसा कुछ नहीं होता, वह सब सिर्फ दिल को खुश रखने का खयाल भर है. अपने भारत में भी आम जन का बहुत भयंकर शोषण व उत्पीड़न होता है और अपराधी-आरोपी किस्म के पुलिसवालों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता.

वीडियो देखने के लिए क्लिक करें- मुंबई में पनवेल पुलिस का कारनामा

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

संपर्क- yashwant@bhadas4media.com

इस पागल, नंगे व खतरनाक शख्स को पुलिस ने मारकर क्या गलत किया?

: देखें सीसीटीवी फुटेज और अन्य वीडियो : सतना (मध्य प्रदेश) की घटना याद होगी. न्यूज चैनलों पर बार-बार दिखाया गया. एक मानसिक रूप से बीमार आदमी को पुलिसवालों द्वारा मिलकर सरेराह पीटा जाना. और इसी के चलते उस आदमी की मौत हो जाना. पिटाई की सीन को जिसने भी देखा, उसने पुलिसवालों को जमकर गालियां दी और देश में अंग्रेजी राज जैसे पुलिस दमन की कल्पना की.

पर इस घटनाक्रम का दूसरा पहलू भी है. जिसे मानसिक रूप से बीमार बताया जा रहा है, वह आदमी एक दुकान में बड़ी-सी हंसिया लेकर घुसता है और दुकानदार के गर्दन के आसपास ले जाकर उसे कत्ल कर देने की धमकी देता है. वह दुकान के टेबल आदि पर चढ़ जाता है. वह हाफ पैंट और बनियान निकालकर पूरी तरह नंगा हो जाता है और नंगा होने के बाद फिर हंसिया लेकर दुकानदार को कत्ल करने की धमकी देता है. दुकान में मौजूद लोग चिल्लाने लगते हैं. यह सब दृश्य एक वीडियो में कैद है. दुकान में लगे सीसीटीवी कैमरे में सब कुछ कैद है. इस फुटेज को कुछ लोगों ने भड़ास4मीडिया के पास भेजा है, एक पत्र लिखकर. पत्र यूं है-

Dear Yashwant ji

Namaskaar

As discussed about the matter over phone please find below two videos. It is clear that the famous “mentally challenged” person was about to KILL a jewellery shop owner and was even moving around in the market of Satna (M.P.) with a sickle & baton in his hand & could have harmed/killed other people if the Police has not reached on time. The public & the business community is in favour of the Police Action but this fact is being hidden by the popular news channels in order to gain fake TRP & mislead the public without probing about the real matter which lead to such a Police action.

As a responsible Police Officer Mr. B.S. Jaggi controlled the situation by first catching the accused person & then to put a psycological pressure on him he used some force to calm-down this guy. But a local News Channel & other popular channels in order to defame the Police Officer only showed HALF TRUTH where only the Police is shown as beating the person but the FULL TRUTH of the nuisance created by that person is deliberately not shown….It was done just to gain TRP but the result is that the diligent & responsible Police Officer – Mr. B.S. Jaggi, Kotwali Incharge, Satna was suspended without even trying to know the real story.

I request your intervention in the matter & request JUSTICE for the Police Officer for his efforts in controlling the person by the medium of your MEDIA which will open the eyes of others & show them what RESPONSIBLE JOURNALISM means….Hope to get your support in the matter on urgent basis.

Thanx & Regards,

Varinder

जिन सज्जन ने ये पत्र भेजा है, उन्हें मैं नहीं जानता. उनका फोन आया तो उन्होंने सारी बात बताई. मीडिया पर आरोप लगाया कि एकतरफा कवरेज करके पुलिस वालों का मनोबल डाउन किया गया और पुलिस वालों को सस्पेंड करा दिया गया. मैंने उनसे वीडियो और डिटेल भेजने को कहा. नीचे तीन वीडियो के लिंक दिए जा रहे हैं. पहला वीडियो सीसीटीवी फुटेज है जिसे देखकर कोई भी कह सकता है कि इस पागल आदमी को दुकान के भीतर ही गोली मार देनी चाहिए, प्राण रक्षा के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए. दूसरे वीडियो में दुकान के बाहर पुलिस, जनता और पागल आदमी के दृश्य हैं. पर इस दूसरे वीडियो में पुलिस द्वारा पीटे जाने के सीन को कम-कट कर दिया गया है.

तीसरा वीडियो स्टार न्यूज पर प्रसारित खबर है, जिसमें पुलिस वाले उस पागल को पीटते दिख रहे हैं. तीनों वीडियो के देखने के बाद मुझे यही लगता है कि उस पागल आदमी ने जो कुछ किया, वह बहुत खतरनाक था, कई लोगों की जान ले सकता था वह. पर पुलिस वाले भी पागल हो जाएंगे, यह कतई उम्मीद न थी. पुलिस वालों को उस व्यक्ति को लोकल नागरिकों की मदद से पकड़कर बांधकर थाने ले जाने चाहिए था और किसी इलनेस सेंटर वगैरह में भर्ती करा देना चाहिए या किसी पागलों के डाक्टरों से उसे दवा-इंजेक्शन वगैरह दिलाकर काबू में कर लेना चाहिए था. इसकी बजाय पुलिस ने सारे नियम कानूनों को ताकपर रखकर अपने आखिरी ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, दे दनादन मारना शुरू कर दिया. यह बिलकुल गलत, निंदनीय और अलोकतांत्रिक है.

इन पुलिसवालों को निलंबित किया जाना छोटा सा दंड है. कायदे से इन्हें नौकरी से बर्खास्त कर देना चाहिए क्योंकि उन्होंने पागल आदमी को कंट्रोल करने के नाम पर खुद को और पूरे पुलिस विभाग को पागल साबित कर दिया है. एक मानसिक रूप से विक्षिप्त और खतरनाक दिख रहे आदमी को पांच-दस पुलिसवाले मिलकर कंट्रोल नहीं कर सकते तो ये किसी शातिर शूटर से मुठभेड़ में कैसे जीत पायेंगे. आखिर क्यों पुलिस वाले छोटी-मोटी घटनाओं में भी आपा खोकर लाठी-डंडा लेकर टूट पड़ते हैं, इन्हें क्यों नहीं समझ में आता कि बल प्रयोग हर हालत में अंतिम विकल्प होना चाहिए और वह भी सीमित मात्रा में.

किसी को मारने, जेल भेजने या फांसी पर लटकाने का फैसला देने का काम करने के लिए अदालतों की व्यस्था इसीलिए है. अगर अदालतों का काम भी पुलिस वालों ने ले लिया है और तालिबानियों की तरह सड़क पर फैसला करने लगे हैं तो फिर इस देश का भगवान मालिक. प्रोग्रेसिव और माडर्न पुलिसिंग के लिए हमारे देश की सरकारें भी कुछ नहीं करतीं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है. कैसे अपराधियों को हैंडल किया जाए, कैसे उन्हें पकड़ा जाए, कैसे उनसे निपटा जाए… इसको लेकर शिक्षण-प्रशिक्षण और जागरूरकता का काम लगातार करते रहना चाहिए. पर सरकारें पुलिस विभाग को पालतू और दिमागविहीन बनाकर रखने में ही खुश रहती हैं क्योंकि ऐसा रखकर सरकारें अपने गलत-सही कानून विरोधी काम इन्हीं पुलिसवालों से बिना ना नुकूर के करा लेती हैं.

सतना की घटना पूरे देश के पुलिसवालों के लिए नसीहत है. सबक है. पुलिस वालों को एक बार फिर अपने मैनुवल, नियम-कानून पढ़ने चाहिए और स्मार्ट पुलिसिंग के लिए खुद के स्तर पर पहल करना चाहिए. वर्दी पहन लेने का मतलब किसी पर भी डंडा चला देना नहीं होता है. वर्दी पहनने का मतलब चीजों को इंटेलीजेंट तरीके से टैकल कर समाज में सुख शांति कायम रखना होता है. सतना में पुलिस वालों ने सड़क पर जिस तरह से पीट पीटकर एक पागल आदमी को मार डाला, उसे देखकर कई संवेदनशील लोगों को डिप्रेशन हो गया होगा. यह सच है. क्योंकि हम पढ़े लिखे लोग यह कतई उम्मीद नहीं करते कि अपने भारत देश में कहीं भी तालिबानियों का राज हो. पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए दिन खबरें आती हैं कि किस तरह वहां पुलिसवालों ने निर्दोष युवकों को घेरकर गोली मार दी, सड़क पर ही तालिबानियों ने (अ)न्याय कर दिखाया.. आदि आदि. तब वह सब देखकर लगता है कि चलो अच्छा है, हम लोगों का देश, हम लोगों की व्यवस्था उनसे ज्यादा मेच्योर और डेमोक्रेटिक है. पर सतना जैसी स्थितियां देखकर लगता है कि नहीं, हम लोग गलत हैं. हमारे यहां भी सिस्टम में पागलों की भयंकर भरमार है.

हां, इस मामले में मीडिया ने यह गलती जरूर की है कि उसने सिर्फ पुलिसवालों द्वारा पीटे जाने का ही दृश्य दिखाया. मीडिया को पागल आदमी के कारनामों को भी दिखाना चाहिए था. सीसीटीवी फुटेज को भी प्रसारित करना चाहिए था. आम लोगों के रिएक्शन को भी दिखाना चाहिए था, भले ही वे आम लोग पुलिस कार्रवाई का समर्थन कर रहे हों. और, मीडिया को वरिष्ठ विश्लेषकों की राय को भी प्रसारित करना चाहिए था. तब जाकर इस प्रकरण के जरिए मीडिया पूरे देश के दर्शकों और पुलिसवालों को ट्रेंड, जागरूक और सचेत कर पाता. पर टीआरपी के भूखे न्यूज चैनलों को चेतना और जागरूकता से क्या लेना देना. वे तो एक ही सीन को बार बार दिखाते रहेंगे और दर्शकों में जुगुप्सा, उत्तेजना पैदा करते रहेंगे. मीडिया के इस एकतरफा और सनसनीखेज रवैये की भी हम लोग भर्त्सना करते हैं.

तीनों वीडियो देखने के लिए इन शीर्षकों पर क्लिक करें-

सीसीटीवी फुटेज : दुकान में

दुकान के बाहर का हालचाल

स्टार न्यूज पर चली खबर

मैंने अपनी बात रख दी. संभव है, मैं गलत होऊं. यह एक बड़ा मुद्दा है जिस पर बात होनी चाहिए. अगर आप अपने विचार रखेंगे तो अच्छा रहेगा. नीचे दिए गए कमेंट बाक्स का सहारा ले सकते हैं या फिर bhadas4media@gmail.com पर मेल भेज सकते हैं.

यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

रामलीला मैदान में टोटल टीवी के कैमरामैन के साथ पुलिस ने की मारपीट

अन्ना हजारे के अनशन स्थल रामलीला मैदान पर शनिवार को एक कैमरामैन से कथित तौर पर हुई मारपीट के बाद पुलिस और मीडिया में तकरार हो गई। मारपीट की घटना टोटल टीवी के संदीप शर्मा नामक कैमरामैन के साथ हुई। शर्मा के मुताबिक जब वह रामलीला मैदान के द्वार संख्या एक से प्रवेश कर रहे थे तो एक पुलिस अधिकारी से उनका विवाद हो गया।

शर्मा का आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने उनके साथ मारपीट की और उनका कैमरा तोड़ दिया। इस घटना के बाद मीडियाकर्मियों ने मंच के निकट पहुंचकर वरिष्ठ अधिकारियों से दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। जब इस घटना की जानकारी हजारे के साथी प्रशांत भूषण को मिली तो उन्होंने आश्वासन दिया कि वह मीडिया की तरफ से पुलिस अधिकारियों ने बात करेंगे।

खीरी रेपकांड : पूर्व एसपी डीके राय लापरवाही में मुअत्‍तल

: लखीमपुर गैंगरेप कांड की जांच सीबीआई से कराने को मायावती तैयार : राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग का दल निघासन पहुंचा : प्रदेश सरकार ने सोनम हत्‍याकांड की जांच सीबीआई को सौंपने का इरादा जाहिर कर दिया है, लेकिन साथ ही कहा है कि इस बारे में अगर पीडित परिजनों की कोई अर्जी आयी तो सीबीआई जांच करायी जा सकती है। लेकिन इस हादसे की आंच से सहमी यूपी सरकार ने आज एक प्रेस कांफ्रेंस में मुख्‍यमंत्री मायावती ने लखीमपुर से हटाये गये पुलिस कप्‍तान डीके राय को निलंबित भी कर दिया है।

सरकार का मानना है कि डीके राय लापरवाही के दोषी पाये गये हैं। उधर उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के निघासन थाने में हुई नाबालिक लड़की सोनम की हत्या के मामले में आज राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग(एनएचआरसी)का  जांच दल आज लखीमपुर खीरी पहुंच गया। इस दो सदस्‍य वाली टीम ने सोनम का पहला पोस्टमार्टम करने वाले तीनों डाक्टरों से पूछताछ की. इनमें डॉ एके अग्रवाल, डॉ एसपी सिंह और डॉ एसके शर्मा शामिल थे.इन तीनों ही डॉक्‍टरों को दूसरी बार किये गये पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में गला दबाकर हत्या किये जाने की बात तय हो जाने के बाद निलंबित कर दिया गया था. कहने की जरूरत नहीं कि इस पूरे मामले में इन तीनों का किरदार अहम माना जा रहा है।

करीब घंटा भर इस टीम ने पूछताछ की। पता चला है कि इस टीम में शामिल एक चिकित्‍सक डॉ एके अग्रवाल ने कहा कि पुलिस ने उनसे नहीं कहा था की पीएम रिपोर्ट में क्या लिखना है। उन्‍होंने इस बात से भी इनकार किया कि उन्‍हें ऐसे कोई निर्देश मिले थे कि पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट में हत्या लिखनी है या फिर आत्महत्या का मामला बनाना है। फिलहाल इस मामले में दो पुलिसकर्मियों का नाम आ रहा है जो इस थाने में तेनात थे। इनमें से एक शिव कुमार और विनय कुमार हैं। वहीं सीबीसीआईडी के भरोसेमंद सूत्र मानते हैं कि मामले में दुराचार कि संभावनाओं को नाकारा नहीं जा सकता। सीबीसीआईडी इन तीनों डाक्टरों और सीएमओ जेपी भार्गव से भी पूछताछ कर चुकी है।

एक युवा पत्रकार की जुबानी, दिल्ली पुलिस की हैवानियत की कहानी

: मुझे मिला उस ‘अपराध’ का दंड जो मैंने किया ही नहीं :  जिदंगी कभी-कभी हमें इतना बेबस कर देती है कि हम मजबूत होने के बावजूद हालातों के सामने झुक जाते हैं और अपने स्वाभिमान को अपनी ही आखों के आगे तार-तार होता देखने को मजबूर हो जाते हैं। पत्रकार होने के नाते पुलिसिया कहर की कहानियां तो मैंने पहले से काफी सुन रखी थी, लेकिन इसके खौफनाक चेहरे से मेरा सामना बीते शनिवार (11 जून, 2011) की रात को हुआ।

पुलिस एक ऐसे मामले में, जिसमें मैं कहीं भी शामिल नहीं था, पूछताछ के बहाने शाम सात बजे उत्तरी दिल्ली के तिमारपुर थाने ले गई। यहां पूरी रात मुझे बुरी तरह से शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताडि़त किया गया। यहां पूछताछ कम, छीछालेदर ज्यादा हुई। थाने में मुझे बाथरूम के अंदर ले जाकर एक मेज पर लिटा दिया गया। मेरे हाथ-पाँव को चार पाँच लोगों ने पकड़ लिया। उसके बाद एक कांस्टेबल ने मेरे चेहरे पर गीला कपड़ा रखकर जकड़ दिया और ऊपर से पानी डालने लगा। ऐसे में मेरी सांस कुछ क्षणों के लिए रूक गई और मैं छटपटाने लगा। हाथ-पैर भी दूसरों की पकड़ में होने के कारण मैं हिलडुल भी नहीं पा रहा था। उस समय मैं न तो सांस ले सकता था और न ही छोड़ सकता था। मुझे ऐसा लग रहा था मानो नदी में डूब रहा हूं और किसी भी समय मैं खत्म हो जाऊंगा।

यह अमानवीय उपक्रम मुझ पर बार-बार दोहराया गया। हालांकि मुझे जिंदा रखने के लिए बीच में 5-10 सेंकेड के लिए छोड़ देते थे। उनके लिए इतना ही काफी नहीं था, इसलिए वे बीच-बीच में मुझे मेरी मां-बहन की गंदी गालियां देते जा रहे थे। इसके बाद मुझे उसी थाने में बस चलाने वाले एक ड्राइवर ने कई तमाचे जड़े। फिर फर्श में फैले पानी पर मुझे बाल पकड़कर घसीटा गया। मुझे दीवार से भेड़ दिया गया। इसके बाद मेरे गुप्तांगों में लगाने के लिए डीजल निकाल लाए। उन लोगों ने मुझसे अपना पैंट उतारने का कहा। यही वह पल था, जब मेरा स्वाभिमान तार-तार हो गया। मैं उन लोगों से हाथ जोड़कर उस ‘बात’ की माफी मांगने लगा, जो मैंने किया ही नहीं था। मुझे यह भी नहीं मालूम था कि मेरी यह दुर्दशा हो क्यों रही है। बस यही समझ में आया कि यदि इनके हाथ-पैर नहीं जोड़े तो अब तक जो हुआ है, उससे कहीं अधिक दुर्दशा आगे मेरे साथ किया जाएगा। पुलिसवाले काम जल्दी खत्म करने की बात कह मेरे साथ यह घिनौना खेल खेलते रहे।

मेरे बार-बार हाथ जोडने पर भी जब उनका दिल नहीं पसीजा और वहां पर बैठा ड्राइवर मुझ पर चोरी और डकैती के झूठे केस ठोकने को कहा। हालांकि उसी समय इस केस का इन्वेस्टीगेटिव ऑफिसर वहां पहुंचा और और मुझे थाने के एसएचओ के पास ले गया। थाने में मुझे लाए अब तक अंदाजन 3 घंटे बीत चुके थे। पुलिस ने इसके बाद पूरी रात मुझे थाने में ही बंधक बनाए रखा। मेरी रिहाई सुबह 10 बजे के करीब संभव हो पाई।

अपनी दुर्दशा की वजह जब मुझे सुबह रिहाई के समय मालूम हो पाई, तो हतप्रभ था। मुझे उस मामले में प्रताड़ित किया गया जिसमें मैं कहीं से भी शामिल नहीं था। टेक्नोलॉजी के उलझे जाल ने मुझे कथित ‘अपराधी’ बना दिया। वाकया यह था कि झारखंड की राजधानी रांची से किसी बड़े कारोबारी की लड़की कुछ दिनों पहले घर से भाग गई। उस लड़की का नाम रानू सहदेव है, जिसका पता मुझे पुलिस की प्रताड़ना के दौरान चला था। घर से भागने के बाद वह लड़की दिल्ली के किंग्सवे कैंप इलाके में किसी गर्ल्स पीजी हॉस्टल में कमरा लेकर रहने लगी। उसी हॉस्टल में लखनऊ के डिग्री कॉलेज की मेरी एक सहपाठी प्रतिमा उपाध्याय भी रहती हैं।

प्रतिमा अभी सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही हैं। वह मुखर्जी नगर के कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई कर रही हैं। पढाई में दखल से बचने के लिए प्रतिमा अपने पास मोबाइल हैंडसेट नहीं रखतीं, बल्कि एक सिम रखती हैं। उसे जब किसी से बात करनी होती है तो वह अपने हॉस्टल की अन्य लड़कियों का मोबाइल हैंडसेट मांगकर उसमें अपना सिम डालकर बातकर लेती हैं। प्रतिमा ने एक दिन रानू के मोबाइल हैंडसेट से मुझे कॉल किया। वह किसके मोबाइल से कॉल करती है, मुझे इसका तो पता नहीं होता क्योंकि मौजूदा तकनीकी यह सुविधा नहीं देती। ये सब जानते हैं कि कॉल आने पर केवल सिम नंबर (मोबाइल नंबर) फ्लैश होता है। मेरी दुर्दशा यहीं से शुरू हो गई। रानू का मोबाइल हैंडसेट चूंकि झारखंड पुलिस ने सर्विलांस पर लगा रखा था, ऐसे में प्रतिमा के नंबर के साथ मेरा मोबाइल नंबर झारखंड पुलिस के पास चला गया। झारखंड पुलिस का एक एसआई दिल्ली पुलिस के तिमारपुर थाने के सिपाहियों के साथ मेरे कमरे में शनिवार 11 जून की रात पूछताछ को आ धमके।

अपनी दास्तान आगे सुनाने से पहले मैं स्पष्ट कर दूं कि कि मैं भारतीय जनसंचार संस्थान यानी आईआईएमसी के 2007-08 बैच का छात्र हूं। आईआईएमसी के बाद मैंने बिजनेस स्टैंडर्ड में बतौर संवाददाता करीब दो साल काम भी किया। सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए अभी मैंने नौकरी छोड़ रखी है और मुखर्जी नगर के पास गांधी विहार में रहता हूं। पुलिस जब मेरे कमरे में रानू की पूछताछ करने को आई तो मैं हतप्रभ हो गया। मैं किसी रानू को न तो जानता था और न ही कभी उसका नाम ही सुना था। मैंने उनसे कहा कि मैं अपने पक्ष से हरसंभव सहयोग करूंगा।

पुलिस ने मुझे एक नंबर दिखाया और पूछा कि यह नंबर किसका है। मैंने उनसे कहा कि आजकल लोग नंबर याद नहीं रखते बल्कि कॉल करने वाले के नाम से सेव कर लेते हैं। पुलिस वाले इस बात पर उखड़ गए और मुझे गाली बकने के साथ बुरे मामले में फंसने की बात कहने लगे। मैंने उनसे कहा कि इस नंबर को मैं अपने मोबाइल से कॉल करता हूं, जिसका भी होगा पता चल जाएगा। मेरे मोबाइल में वह नंबर सेव नहीं था। पुलिस वाले कहने लगे की साले झूठ बोलता है। इस नंबर पर बात करता है और यह नहीं मालूम कि किसका है। पुलिस वालों ने जब मुझे उस नंबर से आई कॉल का समय, डयूरेशन और तारीख दिखाई तो मैंने याद करके उन्हें यह नंबर प्रतिमा का होने का बताया। हालांकि मैं इसके बारे में पूरी तरह आश्वस्त नहीं था।

पुलिस वालों ने मुझसे प्रतिमा का पता पूछा तो मैंने कहा कि वह जीटीबी नगर के पास ऑट्रम लेन या हडसन लेन में कहीं रहती है। मैंने यह सच्चाई भी बयान की कि मैं वहां उससे मिलने कभी नहीं गया हूं। मुझे उसके घर की लोकेशन नहीं पता। पुलिस मेरी बात को मानने को बिल्कुल तैयार नहीं हुई। मैंने उनसे कहा कि मेरे ज्यादातर दोस्त फोन से ही संपर्क रखते हैं, क्योकि सिविल सर्विसेज की तैयारी के चलते हमारे पास इतना समय नहीं होता। इसलिए मिलना जुलना बहुत ही कम हो पाता है। दूसरी बात वह एक गर्ल्स होस्टल में रहती है, जहां कोई लड़का नहीं जा सकता। पुलिस वालों ने मुझे यही बात थाने में चलकर एसएचओ के सामने बोलने को कहा। उसने मुझे झांसा दिया कि आप तो पत्रकार हैं। यह केस सॉल्व हो, यह तो आपका दायित्व भी है। मैंने इस मामले को पूरा समझे बगैर ही हामी भर दी। मैं अब तक यही समझ रहा था कि प्रतिमा को कुछ हो गया है। खैर मैं थाने चलने को तैयार हो गया, लेकिन इसके पहले अपने दोस्तों को फोन करने की बात कही तो पुलिस वालों ने मेरा फोन छीन लिया।

पुलिस वाले जब मुझे थाने ले जाने लगे तो उनके तेवर देख मैं समझ गया कि थाने में मेरे साथ क्या होने वाला है। क्योंकि थाने ले जाते समय ही पुलिस वाले मुझे डराने-धमकाने के साथ गाली-गलौज भी कर रहे थे। थाने पहुंचने के बाद मेरे साथ कैसा जंगली व्यवहार किया गया, यह तो मैं पहले ही बता चुका हूं। टार्चर करने के बाद इन्वेस्टिगेटिव ऑफीसर मुझे एसएचओ के सामने जब लेकर गया तो फिर मुझसे वही सवाल पूछा गया कि प्रतिमा कहां है। मेरा जवाब भी वही था कि मुझे उसका घर नहीं मालूम। बस यह मालूम है कि वह जीटीबी नगर में ऑट्रम या हडसन लेन में कहीं रहती है। इसके बाद एसएचओ ने मुझे फिर उसी कांस्टेबल के हवाले कर दिया, जो मुझे ऊपर प्रताड़ित कर रहा था। इस समय मुझे उस कांस्टेबल का नाम गौरव पता चला। साथ ही एक बात और पता चली कि प्रतिमा नहीं, कोई और लड़की गायब है, जिसके पिता का राजनीतिक प्रभाव काफी तगड़ा है। एसएचओ के कमरे में रुकने के दौरान ही पुलिस महकमे के आला अधिकारियों के फोन बार-बार आ रहे थे, जो ‘आई वांट इमिडियेट रिजल्ट’ कह रहे थे। इसी कारण अधिकारियों की नजर में अपना नंबर बढ़वाने के लिए कांस्टेबल गौरव मुझे बुरी तरह से प्रताड़ित कर रहा था।

ठीक उसी समय गौरव ने मुझसे गाली बकते हुए कहा कि अगर तू नहीं बताएगा तो मैं तो घर जाऊंगा नहीं, उल्टा तुझे रात भर तोडूंगा। मैंने कहा कि मैं पत्रकार हूं तो उसने कहा कि पत्रकारों की तो हम और भी पिटाई करते हैं। नमूना तू देख ही चुका है। तभी वहीं खडे आईओ ने मुझसे कहा कि अब तो तुम तभी छूटोगे जब प्रतिमा मिलेगी नहीं तो इस केस के मुख्य अपराधी के तौर पर तुम अंदर जाओगे। अब तुम मुझे बताओ कि तुम मुझे प्रतिमा तक कैसे ले जाओगे। कुछ देर तक वो मुझे ऐसे ही डराते रहे। फिर नई कॉल डिटेल्स के आधार पर मेरे और प्रतिमा के कॉमन दोस्त अखिलेश पांडे के बारे में पूछा, जो गुडगांव में रहता है। फिर मुझे लेकर रात को 12 बजे के करीब अखिलेश के घर गुड़गांव ले गए। लेकिन अखिलेश का घर भी मूझे मालूम न होने के कारण पुलिस वालों ने मुझसे फोन करवाकर बहाने से उसे घर के बाहर बुलाया। फिर उसकी निशानदेही के आधार पर प्रतिमा के हॉस्टल का पता लगाने की नाकाम कोशिश की। अखिलेश को केवल प्रतिमा के हॉस्टल की गली ही मालूम थी। पुलिस ने वहीं मेट्रो स्टेशन के पास डेरा डाल दिया, क्योंकि उसे हम लोगों ने बताया कि उसका सुबह सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा का पेपर है।

प्रतिमा जब 12 तारीख को होने वाली यह परीक्षा देने जाने के लिए जब जीटीबी नगर मेट्रो स्टेशन पहुंची तो वहां वह हमें दिख गई। प्रतिमा से जब झारखंड से गायब हुई रानू सहदेव के बारे में पूछा गया तो उसने बताया कि वह तो हॉस्टल में सो रही है। रानू अपने कमरे से हंसते हुए बाहर निकली। उससे हुई पूछताछ में पता चला कि सीबीएसई की बारहवीं परीक्षा में फेल होने के बाद परिवार से प्रताड़ित होने के डर से भाग गई थी। उसके बाद टैक्नोलॉजी की भूलभुलैया में मैं निर्दोष यूं ही जौ में घुन की तरह पीस गया। इधर उसकी शातिराना मुस्कराहट पुलिस और उसके पिता को संतोष दे रही थी तो मैं सोच रहा था कि आखिर मेरी गलती क्या थी जो रात भर मुझे भुर्ता बनाया गया।

बहरहाल उस लड़की को उस हॉस्टल से बरामद कर उसके पिता के हवाले कर दिया गया। मुझे 12 की सुबह थाने ले जाकर एक सादे कागज पर मुझसे मेरा नाम, पता आदि लिखवाया गया। साथ में यह भी लिखवाया गया कि मै तिमारपुर थाने में पुलिस को सहयोग करने के लिए बुलाया गया था। अभी मैं स्वस्थ अवस्था में थाने से छोड़ा जा रहा हूं और आगे अगर पुलिस मुझे किसी पूछताछ के लिए बुलाती है तो मैं थाने में जरूर हाजिर होउंगा।

यह थी मेरी उस रात की कहानी जिसमें मैं किसी ऐसे मामले में प्रताड़ित किया गया जिसमें मैं न तो अपराधी था, न ही मेरे नाम पर कोई केस बनाया गया, न ही एफआईआर थी। बस मैं अपने बुरे नक्षत्रों के चलते भूतिया तकनीक का शिकार बना एक इनफार्मर था। सोचिए जब पत्रकार होकर मुझे अपनी रक्षा का मौका नहीं मिला और पुलिसिया कहर से खुद को बचा नहीं पाया तो अन्य अशिक्षित और निरीह लोग अपनी रक्षा इस पुलिस व्यवस्था में कैसे करेंगे। पुलिस की नजर में तो हर कोई अपराधी ही है, चाहे वह राह चलता इंसान हो आईपीएस का ख्वाब संजोए एक विद्यार्थी।

कपिल शर्मा

दिल्ली-09

kapilsharmaiimcdelhi@gmail.com

दिल्ली में पत्रकार कपिल शर्मा को रात भर पीटती रही पुलिस

खबर है कि दिल्ली में कल रात में पत्रकार कपिल शर्मा को पुलिस रात भर पीटती रही. कपिल पूर्व में बिजनेस स्टैंर्डड से जुड़े रहे हैं. वे आईआईएमसी के पूर्व छात्र हैं. कपिल शर्मा को कल रात दिल्ली के तिमारपुर थाने की पुलिस ने बुरी तरह से पीटा. उन्हें पीटने के साथ ही रात भर थाने में बैठाए रखा. आरोप है कि पुलिस कपिल को एक झूठे मामले में फंसाने की कोशिश कर रही है.

कपिल पर पुलिसिया जुल्म के खिलाफ और कपिल को न्याय दिलाने के लिए आज शाम एक मीटिंग रखी गई है. इसमें पत्रकार साथियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्र-नौजवानों से शामिल होने की अपील की गई है. न्याय की इस लड़ाई में अपनी एकजुटता जाहिर करने के लिए आप श्रीराम सेंटर दिल्ली में शाम चार बजे पहुंच सकते हैं.  स्थान: श्रीराम सेंटर, मंडी हाउस, नई दिल्ली (नजदीकी मेट्रो स्टेशन मंडी हाउस) समय: 12 जून, 2011, शाम 4 बजे संपर्क: कपिल शर्मा – 07827242831

पत्रकार पर हमला करने वाला डिप्टी एसपी गिरफ्तार

केरल के कोल्लम से खबर है कि दैनिक अखबार ‘मातृभूमि’ में काम करने वाले पत्रकार वीबी उन्नीथन पर हमले के आरोपी पुलिस अफसर को अरेस्ट कर लिया गया है. यह हमला उन्नीथन पर 16 अप्रैल को तब किया गया जब वह दफ्तर से घर लौट रहे थे. आरोपी हमलावर पुलिस अधिकारी का नाम संतोष एम. नैयर है. केरल के पुलिस उप महानिरीक्षक एस. श्रीजीत ने बताया कि 16 अप्रैल को पत्रकार पर हमला किए जाने के मामले में शामिल डिप्टी एसपी संतोष एम.नैयर को गिरफ्तार किया जा चुका है.

इस आरोपी अधिकारी को शीघ्र ही अदालत में पेश किया जाएगा. इस मामले में पहले ही चार लोगों को न्यायिक हिरासत में भेजा जा चुका है. गौरतलब है कि दैनिक समाचार पत्र “मातृभूमि” में काम करने वाले उन्नीथन 16 अप्रैल को दफ्तर से घर लौट रहे थे. उसी दौरान रास्ते में हथियारबंद लोगों के एक समूह ने उन पर हमला कर दिया. गम्भीर रूप से घायल उन्नीथन को अस्पताल में भर्ती कराया गया. उन्हें अभी तक अस्पताल से छुट्टी नहीं मिल पाई है. इस मामले में धीमी गति से चलने वाली छानबीन के विरोध में मीडिया से जु़डे लोगों ने प्रदर्शन किया. पत्रकारों के विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार ने मामले को गम्भीरता से लिया और श्रीजीत को जांच दल का प्रमुख नियुक्त किया. इस हफ्ते के शुरू में मामले के मुख्य आरोपी संतोष की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को ब़डी कामयाबी मिली थी.

मुख्यमंत्री मायावती के झूठ को उनकी सीबीसीआईडी ने पकड़ा!

नूतन ठाकुर: बबलू और आब्दी की गिरफ्तारी के पीछे का सच : वैसे तो जिंदगी में कोई बात शायद बेमतलब नहीं होती पर उत्तर प्रदेश में तो निश्चित तौर पर हर बात के पीछे कोई ना कोई कारण जरूर होता है. और अक्सर जो दिखता है, सच वैसा नहीं होता. अब जीतेन्द्र सिंह बबलू और इन्तेज़ार आब्दी की गिरफ्तारी का मामला ही ले लीजिए.

बबलू बीकापुर से माननीय विधायक हैं, बहुजन समाज पार्टी से. इन्तेज़ार आब्दी गन्ना संस्थान के अध्यक्ष हैं, राज्य मंत्री का दर्ज़ा हासिल किये हुए. कल ये दोनों माननीय अचानक अरेस्ट हो गए. और इन्हें अरेस्ट किया उत्तर प्रदेश की सीबी-सीआईडी विभाग ने. अब मजेदार बात यह है कि इन्हें जिस आरोप या अपराध में पकड़ा गया है वह घटना घटी थी आज से करीब दो साल पहले. उस समय उत्तर प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ने कथित तौर पर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के लिए कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग कर दिया था जो आम तौर पर अच्छे नहीं कहे जायेंगे. शायद बबलू साहब और आब्दी साहब को ये शब्द इतने नागवार गुज़रे कि संभवतः इन्होंने इसके बदले रीता बहुगुणा जोशी को सबक सिखाने की ठान ली.

इसके कुछ ही दिनों के अंदर रीता जोशी का लखनऊ स्थित मकान अचानक रात में अग्नि के हवाले हो गया. इस तरह माल एवेन्यू जैसे महत्वपूर्ण स्थान पर, प्रदेश की मुख्यमंत्री के आवास से मात्र चंद कदमों पर स्थित एक भारी-भरकम और सुरक्षित से मकान में कुछ गुंडों और आपराधिक तत्वों ने जबरिया घुस कर आग लगा दी. मकान ऐसी जगह पर था कि हर आदमी यह कह सकता था कि यह काम बिना प्रशासन की मिली-भगत से नहीं हो सकता.

चंद कदमों पर मुख्यमंत्री का भारी सुरक्षा घेरे वाला आवास, चारों ओर वीआईपी किस्म के लोग, शहर में बीचों-बीच वह आवास, और फिर भी कुछ गुंडों ने उसमे घुस कर मकान को जला दिया! बहुत शोर मचा, बहुत हंगामा हुआ. उस पर भी तुर्रा यह कि जिस समय यह कुकर्म हो रहा था लगभग उसी समय कुछ इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लोग भी पहुँच गए और आग लगाने वाले कुछ महानुभावों की तस्वीर भी उतार ली. उनमे से एक तो जीतेन्द्र सिंह बबलू से मिलती-जुलती तस्वीर थी और दूसरे एक स्थानीय बसपा नेता इन्तेज़ार आब्दी की थी. इसके साथ कुछ पुलिसवालों की भी तस्वीरें आई थीं, जिनमे एक इन्स्पेक्टर हजरतगंज, एक सीओ, एक एसपी सिटी और एक आईजी स्तर के अधिकारी की भी तस्वीरें आने की चर्चा हुई. इन खुलासों के बाद बहुत शोर-गुल हुआ, बहुत छीछालेदर हुई, बहुत भर्त्सना हुई.

पर माननीय मुख्यमंत्री जी को इस सारे प्रकरण से जैसे कोई खास वास्ता ही नहीं हो. उन्होंने घटना घटने के लगभग तुरंत बाद ही यह कह दिया कि इस मामले से बसपा के किसी भी नेता का कोई लेना-देना नहीं है. अब जब मुख्यमंत्री ने स्वयं ही यह कह दिया तो फिर किसी के कुछ और कहने का मतलब भी नहीं रह गया और ना ही किसी की कोई हिम्मत हुई होगी. उस पर तुर्रा यह कि इस मामले में पुलिस ने ताबड़तोड़ कुछ लोगों को मुलजिम के रूप में पहचान भी लिया, उनकी गिरफ्तारी भी हो गयी और इस तरह मामले का पटाक्षेप ही माना जाने लगा. पर कुछ तो इलेक्ट्रोनिक मीडिया के दिखाए गए फोटो के आधार पर, कुछ स्थानीय लोगों के भारी विरोध पर और कुछ राजनैतिक सरगर्मियों के कारण, ये बेचारे निरीह लोग इस मामले में कोर्ट के स्तर पर बख्श दिए गए. जान बची लाखों पाए, और ये गरीब लोग ऐसे गायब हुए कि गधे के सिर से सींघ.

पर चूँकि घर रीता बहुगुणा का जला था इसीलिए वे ही इससे असल रूप में आहत हुई थीं. उन्होंने इस मामले को छोड़ा नहीं और इसमें पुलिस, प्रशासन से ले कर कोर्ट-कचहरी तक का दरवाज़ा लगातार खटखटाती रहीं. मुश्किल तो बहुत आई पर धीरे-धीरे उनके रास्ते खुलते गए. पहले मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के स्तर पर इस मामले में जीतेन्द्र सिंघ बबलू और इन्तेज़ार आब्दी के खिलाफ नामजद मुक़दमा दर्ज करने के आदेश हुए. फिर इसकी विवेचना सीबी-सीआईडी को गयी. सीआईडी मामले को लिए काफी लंबे समय तक सोयी रही पर इसी बीच रीता जोशी ने हाई कोर्ट में भी रिट याचिका दायर कर दी थी जिसमे इस मामले की विवेचना सीबीआई से कराने की मांग की थी.

अब इस मामले में हाई कोर्ट की सुनवाई अपने अंतिम स्टेज में आ गयी दिखती है और अभी तक जो भी बात सामने आई है, उससे यही दिखता है कि उत्तर प्रदेश सरकार को यह महसूस हुआ हो कि संभव है मामला हाई कोर्ट के आदेश पर सीबीआई के सुपुर्द ना कर दिया जाए. चूँकि रीता बहुगुणा जोशी इस मामले में प्रदेश के चोटी के कई लोगों को शुरू से ही आरोपित करती रही हैं, इसीलिए एक बहुत बड़ा तबका यही मान रहा है कि यह बबलू और आब्दी के खिलाफ जो भी कार्यवाही हुई है, वह मूल रूप से इस पूरे मामले में हाई कोर्ट में सरकार की नाक बचाने और मामले को सीबीआई को भेजे जाने से बचाने के लिये की गयी है.

यदि ऐसा नहीं होता तो फिर यह कैसे संभव था कि जिस मामले में घटना के दो दिन के अंदर ही प्रदेश की मुख्यमंत्री स्वयं किसी बसपा नेता की सहभागिता को अस्वीकृत कर दें, कोई और निरपराध लोग पकड़ लिए जाएँ, ये दोनों आरोपित सरेआम घूम रहे हों और आब्दी को इस घटना के बाद राज्य मंत्री का दर्ज़ा दे दिया जाए (जिसे रीता जोशी और तमाम नेता इस घटना के इनाम के रूप में बताएं), उसी मामले में ये दोनों लोग उसी सीआईडी को अचानक हाई कोर्ट में सुनवाई होने के कुछ दिनों पहले ही अचानक मिल जाएँ और सारी कार्यवाहियां आनन-फानन में हो जाए.

सत्ता की ताकत का खेल खेलना सबों को अच्छा लगता है पर हममे से हर आदमी को यह याद भी रखना चाहिए कि यह सत्ता नाम की चीज़ बहुत फरेबी किस्म की है और यदि आज उसका बेजा  इस्तेमाल क़ानून को धता बताते हुए एक पक्ष करेगा तो कल यही काम दूसरा भी करता नज़र आएगा. इन हालातों से बचने का एक ही उपाय है कि आज जब मेरी सत्ता हो तो मैं यह समझूं और याद करूँ कि यह सत्ता मुझे नेक काम करने और क़ानून का पालन कराने के लिए दी गयी है, खुलेआम क़ानून का गला घोंट कर स्वयं की ताकत पर इतराने के लिए नहीं.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

पुलिस बर्बरता का शिकार पत्रकारिता का छात्र

: आंख में गंभीर चोट, पांच टांके लगे : दरोगा का बेटा होने के बावजूद नहीं बख्शा : देहरादून। मित्रता, सेवा, सुरक्षा को अपना मूल ध्येय और खुद को जन मित्र होने का दावा करने वाली उत्तराखंड पुलिस ने मंगलवार को इन वाक्यों के ठीक विपरीत आचरण करते हुए पत्रकारिता के एक छात्र के साथ जमकर बदसलूकी। एसपी सिटी देहरादून की गाडी पर सवार पुलिसकर्मियों ने उसे बेवजह रोक कर बेरहमी से पीटा। उसकी आंख पर गंभीर चोट आई और पांच टांके लगे हैं।  युवक का नाम संदीप सिंह धारीवाल है और वह राजधानी के मोहिनी रोड क्षेत्र का निवासी है। संदीप ने पुलिस कर्मियों पर आरोप लगाते हुए बताया कि पुलिस ने उसकी सोने की चेन और कुछ नगदी भी छीन ली। जब उसने घटना की सूचना अपने परिजनों को देने कि कोशिश की तो उसका मोबाइल भी छीनकर तोड़ दिया गया।

मॉसकॉम का छात्र संदीप देर रात कहीं से लौट रहा था। जब वह राजधानी के राजीव नगर पहुंचा तो सफेद रंग की बुलेरो सवार पुलिसकर्मियों ने उसे रोक लिया और उसके बुलेट मोटरसाईकिल की चाभी छीन ली और जब उसने इसका कारण जानना चाहा तो उससे मारपीट की गई। संदीप के अनुसार पुलिसकर्मियों की संख्या चार से पांच थी और इनमें बगैर वर्दी वालों ने उसकी पिटाई की, जिनमें वह नेहरू कॉलोनी थाने में तैनात एक कांस्टेबल को पहचानता है।

पिटाई करने के बाद पुलिस वालों ने उसे वहां से भगा दिया। सुबह जब संदीप के घरवालों ने देखा तो उसे नजदीकी अस्पताल पहुंचाया जहां उसकी दांयी आंख के नीचे पांच टांके चले है। सूत्रों के अनुसार संदीप के पिता खुद पुलिस विभाग में हैं और इस समय हरिद्वार जनपद के मंलौर थाने में बतौर दरोगा तैनात हैं। संदीप ने मामले की लिखित तहरीर दी है और पुलिस मामले की जांच का आश्वासन दे रही है। इस मामले पर एसपी सिटी अजय जोशी का कहना है कि संभव है कि रात में पुलिस लाइन से उनकी कार को पुलिसकर्मी खाने के लिए ले गए हों। पर सबसे ये है कि क्या कोई पुलिसकर्मी किसी उच्चाधिकारी की कार से कोई अपराध कर दे तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी। बहरहाल इस घटना ने मानवाधिकारों की मुखर वकालत करने वाले प्रदेश के पुलिस प्रमुख ज्योति स्वरूप पांडे के दावे को पलीता लगाने का काम किया है।

देहरादून से धीरेन्द्र प्रताप सिंह की रिपोर्ट

मुंबई में थाने में पत्रकारों से हैवानियत

मोहम्मद खालिदअब्दुल बाकी अंसारनशे में धुत्त थे पुलिस वाले : मुंबई में भिवंडी पुलिस स्टेशन के आधा दर्जन से अधिक पुलिसकर्मियों ने नशे में धुत्त होकर बीती रात एक घटना की कवरेज कर रहे दो पत्रकारों को पट्टों से इतना पीटा कि उन्हें अस्पताल में दाखिल कराना पड़ा। पुलिस की हैवानियत से पत्रकारों में भारी रोष है। कोई सुनवाई न होने पर रात चार बजे थाने के सामने पत्रकारों को धरना देना पड़ा। डीसीपी ने कार्रवाई का आश्वासन दिया है। सहारा मुंबई के रिपोर्टर दानिश आजमी ने बताया कि स्थानीय न्यूज चैनल ‘आपकी आवाज’ के रिपोर्टर अब्दुल बाकी अंसारी और मोहम्मद खालिद को 2-3 अगस्त की रात सूचना मिली कि भिवंडी थाने के शांति नगर इलाके में एक लड़की का अपहरण हो रहा है। अपहर्ता लड़की को लेकर भाग रहे हैं। दोनों रिपोर्टर तत्काल कवरेज के लिए मौके पर पहुंच गए। दोनों ने ज्यों ही घटना को शूट करने की कोशिश की, पुलिसकर्मियों ने दोनों के कैमरे छीन कर जमीन पर पटक दिए और मां-बहन की गालियां देने लगे। इतना ही नहीं, नशे में धुत्त पुलिसकर्मी दोनों रिपोर्टरों को धकेलते हुए भिवंडी स्टेशन ले आए और अंदर बंद कर पट्टे से जमकर पिटाई की। 

जब पत्रकारों को इस घटना का पता चला तो महुआ, मी मराठी, उर्दू टाइम्स आदि के दस-पंद्रह रिपोर्टर रात में ही भिवंडी पुलिस स्टेशन पहुंच गए। पुलिस वालों का दुस्साहस देखिए कि उनके साथ भी गाली-गलौज किया गया, धमकाया गया। पुलिस कर्मियों का कहना था कि बिना उनकी परमिशन के घटना की शूटिंग की जा रही थी। पुलिस की ज्यादती से गुस्साए सभी पत्रकार रात चार बजे भिवंडी थाने के सामने धरने पर बैठ गए। बात बढ़ते देख सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर भरत निंबालकर को बुलवाया गया। धरना दे रहे पत्रकारों की मांग पर पीड़ित दोनों पत्रकारों को बाहर ले आया गया, जो पुलिस की पिटाई से कराह रहे थे। उन्होंने निबांलकर के सामने रात की आपबीती बयान करते हुए बताया कि उन्हें थाने लाकर पीटने वाले छहों पुलिस वाले अपहरण की घटना के दौरान नशे में धुत्त थे। इस पूछताछ के बाद पुलिस पिटाई से आहत दोनों पत्रकारों को इंदिरा गांधी मेमोरियल अस्पताल भिवंडी में भर्ती कराया गया।  

इधर, थाने पर धरना दे रहे पत्रकारों ने जब निंबालकर से छहों पुलिस कर्मियों के मेडिकल चेकअप की मांग की तो उनमें से पांच को मौके से खिसक जाने दिया गया। सिर्फ एक पुलिसकर्मी का ही मेडिकल परीक्षण कराया गया। मेडिकल रिपोर्ट में साबित हो गया कि वह शराब के नशे में था। इसके बाद पत्रकारों का प्रतिनिधि मंडल डीसीपी जोन-2 चंद्रशेखर बैठंकर से मिला। उन्होंने कहां कि पूरे घटनाक्रम की जांच कराएंगे। इस पर ऐतराज जताते हुए पत्रकारों का कहना था कि तत्कालीन गृहमंत्री आर.आर. पाटिल घोषित कर चुके हैं कि यदि कोई पत्रकार से मारपीट करता है, कवरेज में बाधा डालता है तो उस पर पचास हजार रुपये तक जुर्माना लगेगा और उसे तीन साल के लिए सस्पेंड कर दिया जाएगा। फिर इन नशेड़ी पुलिस कर्मियों को तत्काल दंडित क्यों नहीं किया जा रहा है। पत्रकारों का कड़ा रुख देख डीसीपी कहा कि इसकी जांच के लिए मुझे पांच दिन का समय चाहिए। इस जवाब से गुस्साए पत्रकार उठ कर चलने लगे तो उन्होंने कहा कि कार्रवाई के संबंध में वह आज चार बजे तक कुछ बता सकेंगे।

इस पूरे वाकये का सबसे दुखद पक्ष ये रहा कि मेडिकल रिपोर्ट मिल जाने के बावजूद कार्रवाई तो दूर, उल्टे दोनों पत्रकारों के खिलाफ भिवंडी थाने में रिपोर्ट दर्ज कर ली गई। डरा-धमका कर इसमें मोहरा बनाया गया उस महिला को, जिसकी लड़की का अपहरण हो रहा था। रिपोर्ट उस महिला की ओर से ही दर्ज कराई गई।  सब कुछ देखते-सुनते हुए भी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों तक ने पीड़ित दोनों पत्रकारों का बयान दर्ज नहीं कराया है। अब पत्रकारों को डीसीपी के फैसले का इंतजार है।

पुलिस ने फोटोग्राफर का हाथ और कैमरा तोड़ा

दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर पत्रकार आईजी से मिले : फरीदाबाद में संजय कालोनी पुलिस चौकी के सामने हुई पथराव-हिंसा की घटना में पुलिस लाठीचार्ज में गंभीर रूप से घायल हुए प्रेस फोटोग्राफर नवीन शर्मा के मामले में हरियाणा पत्रकार संघ के बैनर तले पत्रकारों का प्रतिनिधिमंडल आईजी पीके अग्रवाल से मिला। पत्रकारों ने नवीन शर्मा की बर्बरतापूर्वक पिटाई करने के आरोपी पुलिस कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई। प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई जिला प्रधान नवीन धमीजा ने की। ज्ञात रहे कि गौच्छी गांव के लोगों ने पिछले दिनों संजय कालोनी पुलिस चौकी पर एक युवक की पिटाई के मामले में कार्रवाई न होने पर जमकर हंगामा किया था।

देखते ही देखते मामला भड़क गया। लोगों ने चौकी पर पथराव शुरू कर दिया। पुलिस ने भी रोष प्रदर्शन कर रहे लोगों को खदेड़ने के लिए लाठियों का सहारा लिया। इस दौरान जमकर लाठियां बरसाई गईं। घटनाक्रम की कवरेज कर रहे दैनिक भास्कर के प्रेस फोटोग्राफर नवीन शर्मा को भी पुलिस कर्मचारियों ने नहीं बख्शा। उन पर लाठियां बरसाई, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए। फोटोग्राफर का कीमती कैमरा भी तोड़ दिया गया। शर्मा के शरीर पर काफी चोटें आई। उनके हाथ में फ्रैक्चर आ गया है। उन्हें बीके अस्पताल में दाखिल कराया गया।

इसी मामले में आरोपी पुलिस कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर पत्रकारों का प्रतिनिधिमंडल आईजी से मिला। प्रतिनिधिमंडल में हरियाणा पत्रकार संघ के जिला प्रधान नवीन धमीजा, सूरजमल,  महेंद्र चौधरी, रमेश सैनी, परीक्षित, महावीर गोयल,  राजेश शर्मा,  धीरेंद्र राजपूत,  राजेश पुंजयानी, प्रेमचंद गर्ग, सचिन गौड़, दीपक गौतम आदि शामिल थे। आईजी ने गंभीर रूप से घायल नवीन शर्मा के शरीर पर चोट का निरीक्षण किया। उन्होंने घटना पर दुख जताते हुए प्रतिनिधिमंडल को जांच कर कार्रवाई का आश्वासन दिया। उन्होंने बताया कि कैमर के नुकसान की भरपाई भी की जाएगी।

पुलिस ने पत्रकार को अपहरण में फंसाया

अलीगढ़ के पत्रकार सोमेश शिवांकर को जिले के एक थाना प्रभारी ने कथित अपहरण के मामले में फांस कर मामला कोर्ट तक पहुंचा दिया है। यद्यपि इस घटना के बाद थाना प्रभारी को एसएसपी असीम अरुण ने पुलिस लाइन में अपने दफ्तर से अटैच कर दिया है, लेकिन शिवांकर के सिर से आशंकाओं के बादल छंटे नहीं हैं। उन्होंने थाना प्रभारी की इस मनमानी से प्रेस कौंसिल, पुलिस और प्रशासन के उच्चाधिकारियों सहित प्रदेश व केंद्र सरकारों को भी लिखित तौर पर अवगत करा दिया है। शिवांकर पूर्व में ‘स्टार न्यूज’ और ‘डीएलए’ से जुड़े रहे हैं। इस समय वह ‘एनएनआई’ न्यूज एजेंसी के लिए बतौर रिपोर्टर काम कर रहे हैं।

साथ ही, वह ‘सांध्य यूपी’ नाम से स्वयं का एक हिंदी सांध्य दैनिक भी निकाल रहे थे, जो इन दिनों पुलिसिया उत्पीड़न के कारण बंद चल रहा है। शिवांकर ने भड़ास4मीडिया को बताया कि जिले के पाली मुकीमपुर थाने के इंचार्ज विजयकुमार चौरसिया लंबे समय से उनके पीछे पड़े हुए हैं। वजह खबरों को लेकर कोई समझौता न करना। पिछले दिनों उनके थानाक्षेत्र से एक तेईस वर्षीय युवक लापता हो गया था। बरामद होने पर उसने बताया कि वह अपने तीन अन्य साथियों के साथ शराब के नशे में घर वालों को बिना सूचित किए कहीं अन्यत्र चला गया था। पुलिस को पता चला तो उसे पकड़ कर एक दिन थाने में रखा गया। इस बीच थाना प्रभारी के लाख दबाव के बावजूद उसने वही बात पुलिस को बताई, जो घर वालों को मालूम थी कि वह साथियों के बहकावे और नशे में कहीं चला गया था। इसके बावजूद थाना प्रभारी ने पूरे मामले को लिखित में धारा 364 के तहत अपहरण करार देते हुए उसमें मनमाने तरीके से सोमेश शिवांकर का नाम भी अज्ञात आरोपियों में दर्ज कर मामले को कोर्ट फाइल कर दिया है। आरोप लगाया गया है कि सोमेश ने कट्टे की नोक पर युवक को अगवा करने में मदद की है।

जब यह हकीकत जिले के पत्रकारों को पता चली तो उन्होंने जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक असीम अरुण से इसकी शिकायत की। इस बीच सोमेश ने लिखित तौर पर आईजी, डीआईजी, पुलिस महानिदेशक आदि को पूरे प्रकरण से अवगत करा दिया। एसएसपी ने तत्काल मामले को संज्ञान लेते हुए थाना प्रभारी को लाइन से अटैच कर दिया। अब पूरा मामला जांच के लिए अतरौली सर्किल के सीओ प्रवीण रंजन को सौंप दिया गया है। शिवांकर का कहना है कि वह पूरी तरह बेदाग हैं। उन्हें थाना प्रभारी की साजिश के तहत फंसाया गया है। पत्रकारिता के दौरान वह पुलिस के काले कारनामों का अक्सर भंडाफोड़ करते रहे हैं। इसीलिए वह पुलिस के लिए सिरदर्द बनते रहे हैं।  दिक्कत यह है कि थाना प्रभारी ने केस डायरी कोर्ट को में भेज दिया है। पूरी रिपोर्ट झूठी है।