दिल्ली का एक दिन का स्थानीय संपादक

प्रिंटलाइनदिल्ली ने बहुतों को बनते-बिगड़ते-उजड़ते-बसते देखा है। ‘कुर्सी मद’ में चूर रहने वालों की कुर्सी खिसकने पर उनके दर-दर भटकने के किस्से और दो जून की रोजी-रोटी के लिए परेशान लोगों द्वारा वक्त बदलने पर दुनिया को रोटी बांटने के चर्चे इसी दिल्ली में असल में घटित होते रहे हैं। दिल्ली के दिल में जो बस जाए, उसे दिल्ली बसा देती है। दिल्ली की नजरों से जो गिर जाए, दिल्ली उसे भगा देती है। दिल्ली में स्थायित्व नहीं है। दिल्ली में राज भोगने के मौके किसी के लिए एक दिन के हैं तो किसी प्रिंटलाइनके लिए सौ बरस तक हैं, बस, दिल्ली को जो सूट कर जाए। पर यहां बात हम राजे-महाराजाओं या नेताओं की नहीं करने जा रहे। बात करने जा रहे हैं हिंदी पत्रकारिता की। क्या ऐसा हो सकता है कि दिल्ली से दूर किसी संस्करण के स्थानीय संपादक का नाम उसी अखबार के राष्ट्रीय राजधानी के एडिशन में बतौर स्थानीय संपादक सिर्फ एक दिन के लिए छप जाए? ऐसा मजेदार वाकया हुआ है और यह हुआ है वाकयों के लिए मशहूर दैनिक हिंदुस्तान में। जी हां, दैनिक हिंदुस्तान, दिल्ली का 23 अप्रैल 2009 का अंक देखिए। इसके अंतिम पेज पर बिलकुल नीचे प्रिंटलाइन पर जाइए। इसमें स्थानीय संपादक का नाम प्रमोद जोशी नहीं लिखा मिलेगा। वहां नाम लिखा मिलेगा दिनेश जुयाल का। दिनेश जुयाल भी दैनिक हिंदुस्तान में हैं और स्थानीय संपादक हैं, लेकिन वे दिल्ली के नहीं बल्कि देहरादून संस्करण के स्थानीय संपादक हैं। 23 अप्रैल को जिन पत्रकारों की निगाह प्रिंटलाइन पर पड़ी, वे सभी चौंके थे।

प्रमोद जोशी और दिनेश जुयाल के पास उनके जानने वालों के फोन भी पहुंचे थे। प्रमोद जोशी के पास शोक जताने के लिए तो दिनेश जुयाल के पास बधाई देने के लिए। लेकिन दोनों ने शोक या हर्ष ग्रहण करने से मना कर दिया था क्योंकि दोनों को सच मालूम था। प्रिंटलाइन में जो कुछ छपा था, वह प्रबंधन का कोई फैसला नहीं था। वह तकनीकी गलती थी। इस तकनीकी गलती को आप तभी पकड़ पाएंगे जब आप 23 अप्रैल और उसके साथ एक दिन पहले या बाद का कोई अखबार साथ-साथ सामने रखें। तुलना करने पर पता चलेगा कि नीचे फोन नंबर, प्रमुख संपादक और स्थानीय संपादक वाली जो पूरी एक लाइन है, वो बजाय दिल्ली की छपने के, देहरादून की छप गई। इसीलिए फोन नंबर भी बजाय दिल्ली आफिस के होने के, देहरादून आफिस का छपा हुआ है।

यह सब मानवीय-माननीय त्रुटि के चलते संभव हुआ होगा लेकिन कहने वालों को आप कहने से कैसे रोक सकते हैं। कुछ लोगों ने भड़ास4मीडिया को फोन कर आशंका जाहिर की, उनका कहना था- ”लगता है प्रमोद जोशी के विरोधी अब भी दैनिक हिंदुस्तान में बचे हैं जो प्रिंटलाइन से उनका नाम तक गायब कराने का सामर्थ्य रखते हैं!” हालांकि इस बात पर इसलिए विश्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि दैनिक हिंदुस्तान में कई राउंड चले सफाई अभियान के बाद अव्वल तो मृणाल पांडेय और प्रमोद जोशी का कोई विरोधी बचा ही नहीं होगा, दूसरे बच भी गया होगा तो वो इतना बड़ा रिस्क लेकर नौकरी दांव पर नहीं लगाएगा। प्रिंट लाइन की गड़बड़ी को तकनीकी गड़बड़ी ही मान लेना चाहिए लेकिन इस तकनीकी गड़बड़ी ने भी एक इतिहास रच दिया है। वैसे, दैनिक हिंदुस्तान की प्रिंटलाइन में बदलाव होने का मामला पहले भी होता रहा है। एक बार यह हादसा मृणाल पांडेय के साथ भी हो चुका है। तब उनकी विदाई के किस्से प्रचारित होने लगे थे। उस समय भी भड़ास4मीडिया में प्रिंटलाइन में बदलाव और मीडया जगत में फैली चर्चाओं पर खबर प्रकाशित की गई थी। उन खबरों को आप नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

प्रधान की पदवी डिलीट, अब सिर्फ संपादक कही जाएंगी

मणाल पांडे : संपादक से पहले अब प्रमुख का पद

पढ़ लिया आपने। तो आप भी मान गए होंगे कि दैनिक हिंदुस्तान की प्रिंटलाइन में बदलाव कोई नई चीज नहीं है। यहां सब कुछ होता और चलता रहता है। लेकिन इस बार जो कुछ प्रिंटलाइन के साथ हुआ है वह दिनेश जुयाल के लिए सचमुच ऐतिहासिक है। 23 अप्रैल 2009 का दैनिक हिंदुस्तान, दिल्ली का एक अंक दिनेश जुयाल अपने पास आजीवन सुरक्षित रख सकते हैं ताकि वे याद कर सकें कि किस तरह उन्हें बिना दिल्ली गए ही दिल्ली का एक दिन का स्थानीय संपादक बना दिया गया था।

काश, जुयाल जैसी किस्मत हर जर्नलिस्ट की होती !

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