राजेंद्र कभी नहीं रहे शशि के आदमी!

राजेंद्र तिवारीकहानी दिलचस्प होती जा रही है. जिस राजेंद्र तिवारी को शशि शेखर ने संस्थान के साथ दगाबाजी व विश्वासघात का आरोप लगाकर अचानक झारखंड के स्टेट हेड पद से हटाकर चंडीगढ़ पटक दिया, उस राजेंद्र तिवारी के बारे में सबको यही मालूम है कि उन्हें हिंदुस्तान में लेकर शशि शेखर आए थे. शशि शेखर के ज्वाइन करने के बाद राजेंद्र तिवारी ने हिंदुस्तान ज्वाइन किया, यह तो सही है लेकिन यह सही नहीं है कि राजेंद्र तिवारी को शशि शेखर हिंदुस्तान लेकर आए. हिंदुस्तान, दिल्ली में उच्च पदस्थ और शशि शेखर के बेहद करीब एक सीनियर जर्नलिस्ट ने भड़ास4मीडिया को नाम न छापने की शर्त पर कई जानकारियां दीं. इस सूत्र ने भड़ास4मीडिया को फोन अपने मोबाइल से नहीं बल्कि पीसीओ से किया क्योंकि उसे भी डर है कि कहीं फोन काल डिटेल निकलवा कर और विश्वासघात का आरोप लगाकर उसे भी न चलता कर दिया जाए.

हिंदुस्तान के इस उच्च पदस्थ सूत्र का कहना है कि राजेंद्र तिवारी की बातचीत मृणाल पांडेय के जमाने में हिंदुस्तान प्रबंधन से शुरू हुई. तत्कालीन एचआर हेड वासुकी नाथ ने राजेंद्र तिवारी से संपर्क साधा था. वासुकी ने राजेंद्र तिवारी की अमित चोपड़ा से मीटिंग करवाई. बाद में राजेंद्र तिवारी की प्रमोद जोशी, फिर मृणाल पांडेय के साथ मीटिंग हुई. सब कुछ ओके हो गया. आफर लेटर भेजने की तैयारी हो चुकी थी. पर तभी शशि का हिंदुस्तान में आगमन हुआ और शशि के आने के गुस्से में मृणाल का हिंदुस्तान से प्रस्थान हो गया. हिंदुस्तान मैनेजमेंट व एचआर के लोगों ने राजेंद्र तिवारी को आफर लेटर भेजे जाने की तैयारियों के बारे में शशि शेखर को अवगत कराया. नए-नए प्रधान संपादक बनकर आए शशि शेखर को यह अच्छा मौका लगा जब वह टीम बनाने के मामले में अपनी पुरानी खराब छवि को धो-पोंछ सकते थे. उन्होंने राजेंद्र तिवारी को हिंदुस्तान में लाने की क्रेडिट खुद लेने का काम शुरू कर दिया और इसके लिए कई कवायदें कीं. राजेंद्र तिवारी से कई राउंड शशि शेखर की बैठक हुई. पर एक दूसरे को पहचानने में शशि शेखर और राजेंद्र तिवारी, दोनों चूक गए. शशि शेखर ने राजेंद्र तिवारी में चेला बनने के लक्षण देखे, जो गलत साबित हुआ.

राजेंद्र तिवारी चेला बनकर, मुंह बंद कर और जी सर जी सर काम करने वालों में से नहीं है. सो, उन्होंने अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व और आजाद मेधा के हिसाब से रांची में काम करना शुरू किया. उनकी गल्ती यह रही कि वे बेहद तेज स्पीड से दौड़ने लगे. फटाफट ढेर सारे पाजिटिव बदलाव अखबार के हित में कर डाले. कंटेंट के मामले में रांची के स्थापित अखबारों को भी पीछे करना शुरू कर दिया. बेस्ट परफारमेंस संबंधी हिंदुस्तान के इंटरनल एवार्ड भी झटक लिए. जाहिर है, शशि शेखर ने भांप लिया कि राजेंद्र तिवारी उनके कंट्रोल में रहने वाले नहीं हैं. राजेंद्र तिवारी का हिंदुस्तान के अंदर तेजी से बढ़ता कद खटकने लगा. राजेंद्र तिवारी शशि शेखर को पहचानने में जो चूक कर बैठे वह यह कि उन्होंने शशि शेखर में एक उदार हृदया प्रधान संपादक देखा जो अपने अधीनस्थों को खुलकर काम करने देने, हर मुद्दे पर जमकर बोलने-बतियाने-बहस करने देने और कभी मुश्किल वक्त आने पर संभालने-संबल देने का माद्दा रखता हो. हालांकि कहने वाले आफ द रिकार्ड यह भी कहते हैं कि दोनों एक दूसरे को देखकर तपाक से इसलिए भी एक साथ काम करने पर राजी हो गए क्योंकि दोनों ने एक दूसरे के अंदर के ब्राह्मण को पहचाना-जाना और माना. पर फिलहाल हम यहां पत्रकारिता के ब्राह्मणवाद की चर्चा नहीं करेंगे क्योंकि इस नए कारपोरेट दौर में ‘वाद’ की जगह ‘माल’ ज्यादा प्रधान हो गया है. जो जितना ज्यादा बिजनेस और प्रसार दिला सके, वो उतना सफल संपादक.

तो बात ये हो रही थी कि राजेंद्र तिवारी भले ही शशि शेखर के हिंदुस्तान में प्रधान संपादक बनने के बाद हिंदुस्तान के हिस्से बने हों लेकिन वे हिंदुस्तानी बनने के लिए नामित मृणाल पांडेय, प्रमोद जोशी के समय में किए गए थे. शशि शेखर ने पहले से चल रही प्रक्रिया पर बस मुहर भर लगाई क्योंकि वे आते ही आते कोई विवादित और नकारात्मक कदम उठाने से बचना चाह रहे थे. पर शशि शेखर ने जिस भी मन-मस्तिष्क से राजेंद्र तिवारी की हिंदुस्तान में इंट्री को ओके किया हो, बाद में उन्हें अपनी इस ‘गल्ती’ के लिए ‘पछताना’ पड़ा. शशि शेखर ‘गल्ती’ सुधारने में देर नहीं करते. शशि शेखर रावण को राम और राम को रावण साबित करने के मास्टर हैं. उनके साथ काम कर चुके दर्जनों लोग इसके दर्जनों उदाहरण देते हैं कि कब वे किस पर किसलिए मेहरबान हो जाएं और कब वे किस महानुभाव की भरी सभा में चड्ढी उतार दें, कोई ठिकाना नहीं.

तो, शशि शेखर ने हिंदुस्तान में तेजी से अपना ग्राफ बढ़ा रहे राजेंद्र तिवारी को किनारे करने के लिए जो तरीका अपनाया वह ऐसा तरीका है जिस पर कोई मैनेजमेंट असहमत नहीं हो सकता. वह तरीका है ‘देश द्रोह’ का. ‘संस्थान द्रोह’ को ‘देश द्रोह’ जैसा ही माना जाता है. काम के मामले राजेंद्र तिवारी को काटना नामुमकिन था क्योंकि उन्होंने रांची में वो लकीर खींच दी थी जिससे हिंदुस्तान प्रबंधन भी प्रसन्न था. पर शशि शेखर ने जो कागज-पत्तर प्रबंधन के सामने पेश किया और जो तर्क गिनाए, उससे प्रबंधन की बोलती बंद हो गई और प्रबंधन ने शशि शेखर की योजना पर ओके का ठप्पा लगा दिया. ये कागज पत्तर राजेंद्र तिवारी के फोन के काल डिटेल थे. हिंदुस्तान प्रबंधन को समझाया गया कि देखिए, जो शख्स अपने विरोधी संस्थान, जिसका अखबार रांची से लांच होने जा रहे हैं, उसके मैनेजमेंट के लोगों से इतनी लंबी लंबी बात करता हो, उस पर हम आप कैसे भरोसा कर सकते हैं. मान लो, अचानक वह पूरी टीम लेकर भास्कर के खेमे में चला जाए तो? ये हो जाए तो? वो हो जाए तो? ढेर सारे तो तो तो देख प्रबंधन के होश फाख्ता हो गए. प्रबंधन ने चुप्पी साधते हुए शशि शेखर को अपने मन मुताबिक करने की अनुमति दे दी.

शशि शेखर ने अपने प्रिय अशोक पांडेय को फ्लाइट से रांची बुलाया और खुद भी पहुंचे. राजेंद्र तिवारी को तलब किया और पतली गली से चंडीगढ़ की ओर निकल लेने का फरमान सुनाया. इस प्रकार हिंदुस्तान में शशि शेखर के कार्यकाल में तेजी से पनप रहे, आगे बढ़ रहे एक स्टेट हेड को, जो शशि के कार्यकाल से पहले हिंदुस्तान में लाए जाने के लिए फाइनल हुआ, महत्वपूर्ण जिम्मेदारी से अपमानजनक तरीके से हटाकर काला पानी की सजा के लिए चंडीगढ़ की ओर रवाना कर दिया. यहां ध्यान रहे, हरिनारायण सिंह को भी चंडीगढ़ भेजा गया था जहां जाने से हरिनारायण ने इनकार करते हुए इस्तीफा दे दिया था. हरिनारायण की जगह पर आए राजेंद्र तिवारी को भी उनकी ही तरह चंडीगढ़ भेजा जा रहा है. अब ये तो नहीं पता कि काला पानी काटने राजेंद्र तिवारी चंडीगढ़ जाएंगे या नहीं पर इतना तय है कि शशि शेखर ने राजेंद्र तिवारी को जो झटका दिया है, वो उसे जिंदगी भर नहीं भूल पाएंगे. खासकर तब जबकि एक व्यक्ति एक संस्थान में पूरी निष्ठा के साथ काम कर रहा है, विरोधी संस्थान के प्रलोभनों के बारे में शीर्ष प्रबंधन को जानकारी दे चुका हो और अपनों के बीच घोषित कर रखा हो कि वह किसी कीमत पर संस्थान का साथ नहीं छोड़ेगा बल्कि विरोधी संस्थान के लांचिंग अभियान को फेल करके दम लेगा.

दरअसल, इसी को कहते हैं कारपोरेट वार. इस वार के दो पहलू हैं. जहां व्यक्ति मजबूत हो जाते हैं वहां कभी-कभार व्यक्तियों की आपसी लड़ाई इतनी आगे बढ़ जाती है कि शीर्ष पदों पर बैठे लोग अपनी जीत व दूसरे की हार के लिए संस्थान व प्रबंधन का इस्तेमाल मोहरे की तरह करने लगते हैं. इसका दूसरा पक्ष ये है कि जब प्रबंधन मजबूत होता है तो संस्थान के हित के लिए शीर्ष स्तर पर काबिज लोगों की लड़ाई को रणनीतिक रूप से इस्तेमाल करता है और जो संस्थान के लिए जितना फायदेमंद होता है उसे उतना ही तवज्जो दिया जाता है.

फिलहाल तो हिंदुस्तान प्रबंधन के लिए शशि शेखर बेहद फायदेमंद हैं. ऐसे में राजेंद्र तिवारी या तो चंडीगढ़ में काला पानी की सजा काटेंगे या फिर हिंदुस्तान छोड़कर किसी नई जगह ज्वाइन करेंगे.  अगर वे किसी नई जगह ज्वाइन करते हैं फिर तो कोई बात नहीं. अगर काला पानी की सजा काटेंगे तो दो बातें होंगी. या तो वे सजा काटते काटते टूट जाएंगे और झुक जाएंगे. या फिर ‘हिंदुस्तान’ में रहकर अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ ‘आंतरिक जंग’ लड़ेंगे. टूट जाएंगे और झुक जाएंगे तो कोई बात नहीं लेकिन आंतरिक जंग लड़ेंगे तो दो बातें होंगी. या तो वे हार जीएंगे या फिर जीत जाएंगे. जीतेंगे तो फिर तो उनकी ही बात हर जगह होगी. हारेंगे तो दो बातें होंगी. या तो वे वाकई शशि शेखर के शिष्य बन जाएंगे या फिर उनसे बदला लेने के लिए बागी हो जाएंगे और मुख्य धारा की मीडिया को बाय-बाय कह डालेंगे. शिष्य बन जाएंगे तो कोई बात नहीं. बागी हो जाएंगे तो दो बातें होगी….

अगर आप इस पूरे मामले में कोई अलग राय रखते हैं तो उसे नीचे कमेंट बाक्स में डाल सकते हैं.

Comments on “राजेंद्र कभी नहीं रहे शशि के आदमी!

  • rajkumar sinha says:

    कहावत है सेठ के आगे और गधे के पीछे खड़े होने पर लात पड़ती है। राजेंद्र तिवारी सेठ यानी शशि शेखर के आगे खड़ा होने की कोशिश में लात खा गए। कहावत ध्‍यान रखना पंडित जी। अपने को महान बनाने का अभियान जारी रखें।

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  • gautam tripathi says:

    यश्वंत जी ,पहले तो आप ही ने छापा था कि शशि शेखर जी ने अपने खास चहेते राजेंद्र तिवारी को हिन्दुतान का चौथा सिनियर आर इ बना कर रांची ले आये है.अब उल्ता बोल रहे है.यही आपकी बिश्वस्नियता है.

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  • avinash aacharya says:

    गौतम का प्रश्न काबिल-ए-गौर है। भड़ास या तो पहले गलत लिख चुका है, या अब। अजीब बात है कि मीडिया में इतने सारे सवाल है। इस मंच पर उनसे संबंधित भड़ास निकाली जाए तो कुछ नतीजा भी निकले। यह तो शशिशेखर डाट काम बनकर रह गया है। अजीब है कि कमेंट भी उसी पर ज्ादा आते हैं। शायद. यशवंत की मजबूरी ये भी होगी कि घूम-फिर कर माहौल बनाए रखे। यकीन जानिए भड़ास पर आने वाले लोग सिफॆ शशिशेखर नामा पढ़ने नहीं आते। आप भड़ास पर शशिशेखर चैनल बना दें, जिन्हें पढ़ना हो वहां जाएं

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  • banrasi babu says:

    abb yaswantwa tum to butring mean docter nikala re. rajedre tiwari ki appoiment ki kaahanai aase bata raha hea jase shobana didi saba tumase hi salaha leti hea. abb jo kaam kar raha hea wohi kar. thakur hokar naugiri kar raha hea. sharm nahi aa rahi hea. jis taraha ajit anjum se paisa khaakar unko mahan banae mea kage ho uss tarah rajendre tiwari se paisa khaakar kalama mean makhana bharkar chal raha hea re. are sasur apani niyat thik kar nahi to dakhin lag jayega. to gharwale kahenge daru peekar dahkin mikl gaya mere lal. beta yaswant daru peena kam kar kitani bar tumko likha samagh mean nahi aa raha hea. lagat bay ki dilli aakar tukee samjhana hoga.

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  • ramesh singh says:

    ye kya ho raha hai bhaaii…patrakarita mai ganit (arthmatic) ka itna bobala kaisai ho gaya?…ganesh shankar vidyarthi aur paradhkar ji ki jagah aryabhatt, patrakaro kai adarsh kab sai ban gaye?….

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  • manorath mishra says:

    chalo bhai. mai kaafi sukun me hoon, ye dekhkar ki log samjhaney lage hai ki Shashi shekhar Rajendra tiwari episode chalney ke peechey bhadas ki niyat kya hai. kanhi ye post Rajendra khud to nahi likhwa rahey hai, es nazar se bhi dekheyn, kyonki jitna khuddar aur mahan bataya jaa raha hai wo rajendra ko jaanney waale kisi ko hazam nahi hoga. ek aur baat bhadas ko Hindustan me increment aur promotion me shashi shekhar kanhi yaad nahi aaye, ye badniyati ka dusara udaaharan hai.

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  • Rajendra Tiwari ji ye kaise bhool gaye ki wo bhi apne jr. se aisi hi umeed karte hain jaise unse shashi shekhar ne ki. Sach to ye hai ki har boss chahta hai k uske employees unki har baat mane, unse zyada gyan ki baat na kare or ek kadam chalne ko kaha jaye to utna hi chale. Journalism me itne saal k exp. ke baad tiwari ji ye sab kaise bhool gaye. Ya fir wo jharkhand jakar bhaskar k liye apna gussa nikal rahe the.

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  • दीपक नौटियाल says:

    यशवंत जी, आप राजेंद्र तिवारी पुराण लिख रहे हैं वह काफी अच्‍छा है। अंदर की कई बातें बाहर आई। लेकिन मैं आपको बता रहा हूं राजेंद्र तिवारी न तो चंडीगढ़ जाएंगे और न ही टूटेंगे। हालांकि, इन लेखों से शशि शेखर पर दबाव बनाने की कोशिश है। राजेंद्र तिवारी भास्‍कर सहित किसी दूसरे मीडिया हाउस को जल्‍दी ही ज्‍वाइन करेंगे और आप यह खबर हमें भड़ास के माध्‍यम से बताएंगे। मुझे जो पता है उसके मुताबिक भास्‍कर में अच्‍छी पोजीशन पर जाने की उनकी तैयारी है लेकिन पद और पैसा फाइनल होने पर। अब वे रांची ही जाना चाहते हैं ताकि शशि शेखर को चिढ़ाया जा सके।

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  • Radha mathur says:

    rajendra tivari ko smriti dosh ho gya lgta hai. shashi shekhar is se pehle amar ujala me bhi rajendra tivari ko aise hi thokar mar chuke hain. dono k beech keval ek-doosre ko gariyane ka rishta hai.

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  • pradeep kumar says:

    aapko phir mauka mil gya HINDUSTAN aur SHASHI ji ke khilaf likhne ka. ek bar phale bhi maine aap se pucha tha ki aakir aap ka shashiji ne kya bigada hai.

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  • Raghav Dhwani says:

    यशवंत जी, आपकी खुन्नस सिर्फ शशिजी से ही नहीं है, लगता है कि राजेंद्र तिवारी से भी पुरानी खुन्नस है। इसीलिए इस प्रकरण को इतना तूल दे रहे हैं कि शशिजी भी पिटें और राजेंद्र तिवारी भी यानी एक तीर से दो शिकार…..वाह भाई वाह क्या बुद्धि पाई है आपने…..

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